कृत्रिम बुद्धिमत्ता आज मानव सभ्यता के सबसे महान और प्रभावशाली आविष्कारों में गिनी जाती है। यह वह विज्ञान है जो मशीनों को सोचने, समझने, निर्णय लेने और सीखने की क्षमता प्रदान करता है। स्वास्थ्य सेवा का क्षेत्र, जो मानव जीवन की रक्षा और उपचार का आधार है, अब कृत्रिम बुद्धिमत्ता के कारण एक नए युग में प्रवेश कर चुका है।
पहले जहाँ चिकित्सक केवल अनुभव और परीक्षणों के आधार पर रोग का अनुमान लगाते थे, वहीं अब कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित प्रणाली कुछ ही क्षणों में लाखों स्वास्थ्य अभिलेखों, परीक्षण परिणामों और आनुवंशिक सूचनाओं का विश्लेषण कर सटीक निष्कर्ष प्रस्तुत कर सकती है। इस तकनीक ने चिकित्सा जगत को गति, सटीकता और सहजता प्रदान की है, जिससे स्वास्थ्य सेवाओं का स्वरूप ही बदल गया है।
स्वास्थ्य सेवा का क्षेत्र, जो मानव जीवन की रक्षा और उपचार का आधार है, अब कृत्रिम बुद्धिमत्ता के कारण एक नए युग में प्रवेश कर चुका है। पहले जहाँ चिकित्सक केवल अनुभव और परीक्षणों के आधार पर रोग का अनुमान लगाते थे, वहीं अब कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित प्रणाली कुछ ही क्षणों में लाखों स्वास्थ्य अभिलेखों, परीक्षण परिणामों और आनुवंशिक सूचनाओं का विश्लेषण कर सटीक निष्कर्ष प्रस्तुत कर सकती है। इस तकनीक ने चिकित्सा जगत को गति, सटीकता और सहजता प्रदान की है, जिससे स्वास्थ्य सेवाओं का स्वरूप ही बदल गया है।
विश्व के विकसित देशों में आज कृत्रिम बुद्धिमत्ता स्वास्थ्य प्रणाली का आवश्यक अंग बन चुकी है। अमेरिका, जापान, जर्मनी और इंग्लैंड जैसे देशों में यह तकनीक निदान, दूरचिकित्सा और औषधि निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। भारत जैसे विकासशील देश में भी अब सरकारी और निजी दोनों स्तरों पर इसका प्रयोग तेज़ी से बढ़ रहा है। यह तकनीक केवल रोग उपचार तक सीमित नहीं है, बल्कि रोग की पहचान, रोकथाम, औषधि अनुसंधान, अस्पताल प्रबंधन और रोगी देखभाल तक विस्तृत हो चुकी है।
चिकित्सा निदान में कृत्रिम बुद्धिमत्ता का प्रयोग सर्वाधिक उपयोगी सिद्ध हुआ है। किसी भी रोग का सही समय पर निदान उपचार की सफलता का आधार होता है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता के गणनात्मक सूत्र अब चुम्बकीय अनुनाद चित्रण, संगणित टोमोग्राफी, क्ष-किरण चित्रण और रक्त परीक्षण जैसे परिणामों का गहन अध्ययन कर सकते हैं। यह तकनीक उन सूक्ष्म संकेतों को पहचान लेती है जिन्हें मानव आँखें अक्सर नहीं देख पातीं। इस प्रकार कैंसर, हृदय रोग, नेत्र रोग, मस्तिष्क संबंधी विकार और हड्डियों के रोगों का पता अब पहले से कहीं अधिक सटीकता से लगाया जा रहा है। इसने चिकित्सकों को समय से पहले चेतावनी और सटीक निर्णय का अवसर प्रदान किया है।

उपचार की प्रक्रिया में भी कृत्रिम बुद्धिमत्ता ने उल्लेखनीय योगदान दिया है। प्रत्येक व्यक्ति की शारीरिक बनावट, जीवनशैली और वंशानुगत संरचना भिन्न होती है, इसलिए एक ही औषधि सभी पर समान प्रभाव नहीं डालती। इस समस्या के समाधान के लिए व्यक्तिकृत चिकित्सा की अवधारणा सामने आई है, जिसमें कृत्रिम बुद्धिमत्ता व्यक्ति के शरीर की संरचना, उसके स्वास्थ्य इतिहास और जीवनचर्या के आधार पर उपचार योजना तैयार करती है। इससे यह तय किया जा सकता है कि किस औषधि की कितनी मात्रा और कौन-सा उपचार किस व्यक्ति के लिए सबसे प्रभावी रहेगा। विशेषकर कैंसर जैसे जटिल रोगों में यह तकनीक अद्भुत सफलता दे रही है।
औषधि निर्माण के क्षेत्र में कृत्रिम बुद्धिमत्ता एक वरदान साबित हुई है। पहले नई दवाओं के अनुसंधान और निर्माण में वर्षों का समय तथा बहुत अधिक धन लगता था, परंतु अब यह प्रक्रिया अत्यंत तीव्र हो गई है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता के गणनात्मक सूत्र लाखों रासायनिक संयोजनों का विश्लेषण कर यह अनुमान लगा सकते हैं कि कौन-सा संयोजन किसी विशेष रोग पर प्रभावी होगा। इस प्रकार औषधि अनुसंधान में प्रयोग और त्रुटि की प्रक्रिया घट गई है और वैज्ञानिकों को संभावित परिणामों की स्पष्ट दिशा मिल जाती है। वैश्विक महामारी के समय इस तकनीक ने रोगजनक तत्वों के विश्लेषण और टीका निर्माण की गति को कई गुना बढ़ा दिया था।
रोग की भविष्यवाणी और रोकथाम में कृत्रिम बुद्धिमत्ता ने स्वास्थ्य सेवाओं को एक नई दिशा दी है। आज ऐसे अनुप्रयोग विकसित हो चुके हैं जो व्यक्ति के स्वास्थ्य अभिलेख, उसकी दैनिक गतिविधियों, भोजन, व्यायाम और पर्यावरणीय परिस्थितियों का अध्ययन कर यह अनुमान लगा सकते हैं कि भविष्य में उसे किन रोगों का खतरा हो सकता है। उदाहरण के लिए, हृदयाघात, मधुमेह या मस्तिष्काघात की संभावना का पता पहले से लगाया जा सकता है। यह चेतावनी प्रणाली रोग को बढ़ने से पहले ही नियंत्रित करने में सहायक बनती है। इस प्रकार स्वास्थ्य सेवा अब केवल उपचार पर केंद्रित न रहकर रोकथाम आधारित स्वास्थ्य प्रणाली की दिशा में अग्रसर है।
अस्पतालों के प्रबंधन में भी कृत्रिम बुद्धिमत्ता का योगदान अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। पहले रोगी पंजीकरण, समय निर्धारण, औषधि वितरण, परीक्षण परिणामों का संग्रहण और अभिलेखों का रखरखाव बहुत जटिल प्रक्रिया थी। अब कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित प्रबंधन प्रणाली इन सब कार्यों को स्वचालित रूप से संपन्न करती है। संवाद सहायक नामक तंत्र रोगियों के प्रश्नों के उत्तर देकर उन्हें उचित विभाग तक पहुँचाता है। इससे अस्पतालों में कार्यकुशलता बढ़ी है, त्रुटियाँ घटी हैं और चिकित्सकों का समय बचा है।
ग्रामीण और दूरस्थ क्षेत्रों में जहाँ चिकित्सकों की कमी रहती है, वहाँ कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित दूरचिकित्सा प्रणाली एक बड़ा सहायक सिद्ध हुई है। इसके माध्यम से गाँवों में रहने वाले लोग अपने मोबाइल या संगणक से स्वास्थ्य विशेषज्ञों से संपर्क कर सकते हैं। प्रारंभिक जाँच कृत्रिम प्रणाली द्वारा की जाती है जो संभावित रोगों का अनुमान लगाकर चिकित्सक को पूरी जानकारी प्रदान करती है। चिकित्सक इस सूचना के आधार पर रोगी को उचित परामर्श और उपचार दे सकता है। इससे चिकित्सा सेवाओं की पहुँच हर व्यक्ति तक संभव हो रही है।
मानसिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी कृत्रिम बुद्धिमत्ता ने मानव जीवन को राहत दी है। अनेक संवाद सहायक ऐसे बनाए गए हैं जो मानसिक तनाव, अवसाद और चिंता से ग्रस्त लोगों से संवाद कर उन्हें परामर्श देते हैं। ये संवाद सहायक व्यक्ति की भाषा और भावनाओं का विश्लेषण कर उपयुक्त उत्तर देते हैं, जिससे व्यक्ति को आत्मबल और संतुलन प्राप्त होता है। यह सेवा विशेषकर उन युवाओं के लिए उपयोगी है जो अपनी भावनाओं को खुलकर व्यक्त नहीं कर पाते।
यांत्रिक शल्यक्रिया के क्षेत्र में कृत्रिम बुद्धिमत्ता का प्रयोग अत्यधिक उन्नत स्तर पर हो चुका है। अब चिकित्सक यांत्रिक उपकरणों की सहायता से सूक्ष्मतम शल्यक्रियाएँ करते हैं। इन यंत्रों का संचालन चिकित्सक करते हैं, परंतु उनका मार्गदर्शन कृत्रिम बुद्धिमत्ता करती है। इससे शल्यक्रिया अत्यंत सटीक, सुरक्षित और तीव्र हो जाती है। रक्तस्राव और संक्रमण का जोखिम घट जाता है तथा रोगी की स्वस्थ होने की अवधि भी कम हो जाती है। यह तकनीक विशेषकर मस्तिष्क, हृदय और नेत्र शल्यक्रियाओं में अत्यंत लाभदायक सिद्ध हो रही है।
धारणीय उपकरणों द्वारा रोगी की निगरानी में भी कृत्रिम बुद्धिमत्ता का उपयोग बढ़ रहा है। कलाई पर पहने जाने वाले यंत्र अब हृदय गति, रक्तचाप, रक्त में ऑक्सीजन की मात्रा, नींद की अवधि और गतिविधियों का निरंतर लेखा रखते हैं। कृत्रिम बुद्धिमत्ता इन आँकड़ों का विश्लेषण कर यदि किसी असामान्यता का संकेत पाती है तो तुरंत चिकित्सक या परिवार को सूचना भेज देती है। यह सुविधा वृद्धजनों और हृदय रोगियों के लिए जीवनरक्षक सिद्ध हो रही है।
यद्यपि कृत्रिम बुद्धिमत्ता के लाभ अनेक हैं, पर इसके साथ कुछ चुनौतियाँ और नैतिक प्रश्न भी जुड़े हुए हैं। सबसे बड़ी चिंता रोगियों के आँकड़ों की गोपनीयता और सुरक्षा की है। यदि स्वास्थ्य संबंधी अभिलेख असुरक्षित रहें तो उनका दुरुपयोग हो सकता है। साथ ही, कृत्रिम प्रणाली पर अत्यधिक निर्भरता से मानवीय निर्णय क्षमता में कमी आने का खतरा भी रहता है। यदि गणनात्मक सूत्रों में कोई त्रुटि रह जाए तो गलत निदान या अनुचित उपचार की संभावना बन जाती है। अतः आवश्यक है कि इन प्रणालियों का प्रयोग चिकित्सक की देखरेख में ही किया जाए और इनके लिए कठोर नीतियाँ बनाई जाएँ।
भारत में कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित स्वास्थ्य व्यवस्था के विकास के लिए सरकार और निजी संस्थाएँ मिलकर कार्य कर रही हैं। राष्ट्रीय स्तर पर डिजिटल स्वास्थ्य मिशन चलाया जा रहा है, जिसके अंतर्गत प्रत्येक नागरिक का स्वास्थ्य पहचान पत्र तैयार किया जा रहा है। इससे चिकित्सकों को रोगी के पुराने अभिलेख तुरंत प्राप्त हो सकेंगे। नीति आयोग और प्रमुख वैज्ञानिक संस्थान इस दिशा में अनेक परियोजनाएँ चला रहे हैं। अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान, भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान और कई निजी अस्पताल कृत्रिम बुद्धिमत्ता का प्रयोग रोग पहचान, उपचार और अनुसंधान में कर रहे हैं। यह भारत की चिकित्सा व्यवस्था को आधुनिक और पारदर्शी बना रहा है।
भविष्य में कृत्रिम बुद्धिमत्ता स्वास्थ्य क्षेत्र को और भी उन्नत बनाएगी। आने वाले वर्षों में प्रत्येक व्यक्ति का स्वास्थ्य विवरण उसके यंत्रों से जुड़ा रहेगा और कृत्रिम प्रणाली उसकी स्थिति का निरंतर विश्लेषण करती रहेगी। इस आधार पर व्यक्ति को समय-समय पर आवश्यक सलाह, औषधि सेवन की सूचना और रोग की रोकथाम के उपाय बताए जाएँगे। शल्यक्रिया, औषधि निर्माण, मानसिक परामर्श, आपातकालीन सहायता – सभी क्षेत्र कृत्रिम प्रणाली के माध्यम से अधिक प्रभावी और सटीक बनेंगे। इससे न केवल चिकित्सा सेवाओं की गुणवत्ता में वृद्धि होगी बल्कि इनकी पहुँच भी समाज के अंतिम व्यक्ति तक सुनिश्चित होगी।
कृत्रिम बुद्धिमत्ता के प्रयोग से स्वास्थ्य सेवाओं ने जिस गति और सटीकता को प्राप्त किया है, वह मानव इतिहास में अभूतपूर्व है। यह तकनीक चिकित्सकों को केवल निर्णय-सहायक उपकरण नहीं देती, बल्कि उन्हें रोगी की स्थिति को गहराई से समझने, विश्लेषण करने और उपचार की दिशा में नए विकल्प खोजने की प्रेरणा भी देती है। परंतु इस प्रगति के साथ यह भी आवश्यक है कि हम इसकी सीमाओं को समझें और इसे मानव करुणा तथा नैतिकता से जोड़े रखें। मशीनें चाहे कितनी भी सक्षम क्यों न हों, वे मानव की संवेदनशीलता, करुणा और नैतिक विवेक का स्थान नहीं ले सकतीं।
इसीलिए भविष्य की चिकित्सा व्यवस्था में संतुलन का सूत्र यही होगा — तकनीक और मानवता का समन्वय। कृत्रिम बुद्धिमत्ता को स्वास्थ्य सेवा में सहयोगी बनाना चाहिए, प्रतिस्थापक नहीं। इसका उद्देश्य मानव चिकित्सकों की भूमिका को कम करना नहीं, बल्कि उन्हें और समर्थ बनाना है। आने वाले समय में यह अपेक्षा की जाती है कि चिकित्सा विज्ञान और कृत्रिम बुद्धिमत्ता का संगम ऐसा स्वरूप ग्रहण करेगा, जहाँ रोगों की रोकथाम, निदान और उपचार अधिक मानवीय, अधिक संवेदनशील और अधिक प्रभावी होंगे। यही समरसता ही वास्तविक स्वास्थ्य क्रांति का मार्ग प्रशस्त करेगी।
अंततः कहा जा सकता है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता ने स्वास्थ्य सेवाओं को न केवल तकनीकी रूप से उन्नत किया है, बल्कि इसे अधिक मानवीय भी बनाया है। यह चिकित्सक का स्थान नहीं लेती, बल्कि उसे अधिक सक्षम और समर्थ बनाती है। इसके माध्यम से रोग की पहचान शीघ्र, उपचार सटीक और प्रबंधन सुगठित हुआ है। यदि इसे उचित दिशा, नैतिक नियंत्रण और सुरक्षा नीति के साथ अपनाया जाए तो यह मानव स्वास्थ्य इतिहास की सबसे बड़ी क्रांति सिद्ध होगी। यह केवल एक तकनीकी उपलब्धि नहीं, बल्कि मानवता की भलाई की दिशा में उठाया गया युगांतरकारी कदम है।

डॉ दीपक कोहली
(आलेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं। उनसे संपादक व प्रकाशक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है। किसी भी विवाद की स्थिति में हमारा न्याय क्षेत्र दिल्ली होगा।)
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