भारत का पूर्वी राज्य बिहार इन दिनों विधानसभा चुनावों में व्यस्त है। बेरोज़गारी और पलायन जहां लंबे समय से राज्य के मुख्य मुद्दे रहे हैं, वहीं बुनियादी ढांचा, बिजली, सड़क, शिक्षा और घूसखोरी पर भी वादे और सवाल सुनाई देते रहते हैं। पर जो बुनियादी ज़रूरत बिहार को सबसे ज़्यादा प्रभावित करती है, उसके इर्द-गिर्द राज्य में चुनाव नहीं लड़ा जाता है।
चाहे बाढ़ हो, अवैध बालू खनन और प्रदूषण से जूझती नदियां हों, घटता भूजल स्तर हो या फिर पानी में खतरनाक स्तर पर बढ़ी हुई खनिजों की मात्रा, बिहार की जल सुरक्षा के बारे में न जनता सवाल करती है और न ही प्रत्याशी किसी तरह के वादे। ऐसा ही एक मुद्दा है 31 ज़िलों के पानी में लगातार बढ़ रही आर्सेनिक, फ्लोराइड और नाइट्रेट जैसे विषैले खनिजों की मात्रा का, जिसे लेकर चुनावी समय में भी सियासती हलकों में चुप्पी पसरी हुई है।
भूवैज्ञानिक संदूषण से जूझ रहे हैं 26 फीसद से ज़्यादा वार्ड: सरकारी रिपोर्ट
साल की शुरूआत में विधानसभा में बिहार आर्थिक सर्वेक्षण (2024-25) पेश किया गया। इसके साथ दी गई रिपोर्ट में पब्लिक हेल्थ इंजीनियरिंग डिपार्टमेंट (पीएचईडी) के हवाले से बताया गया कि राज्य के लगभग 26 फीसद ग्रामीण वार्डों के भूजल में आर्सेनिक, फ्लोराइड और आयरन की मात्रा इसके मानक स्तर (भारतीय मानक ब्यूरो के अनुसार भूजल में आर्सेनिक, फ्लोराइड और आयरन का मानक स्तर क्रमश: 0.01 mg/L, 1.0 mg/L और 0.3 mg/L तय किया गया है) से अधिक पाई गई है।
बिहार की कुल 8053 ग्राम पंचायतों में करीब 1,15,000 वार्ड हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, बिहार के कुल 30,207 ग्रामीण वार्ड खनिज प्रदूषण से जूझ रहे हैं, जिनमें से कुल 4709 में आर्सेनिक, 3789 में फ्लोराइड और 21,709 वार्डों के भूजल में आयरन की मात्रा स्वीकृत स्तर से ज़्यादा पाई गई है।
यह समस्या बिहार के 38 ज़िलों में से 31 को प्रभावित करती है। इन ज़िलों में बक्सर, भोजपुर, सीतामढ़ी, पटना, सारण, वैशाली, लखीसराय, दरभंगा, समस्तीपुर, बेगूसराय, भागलपुर वगैरह शामिल हैं। ये सभी ज़िले अपनी भौगोलिक स्थिति के कारण भी भूजल पर बहुत ज़्यादा निर्भर हैं। दरअसल गंगा और उसकी सहायक नदियों (जैसे गंडक, घाघरा, बागमती, कोसी) के तटवर्ती या बाढ़-मैदानी क्षेत्रों में आने के कारण इन ज़िलों की मिट्टी की जल-धारण क्षमता बहुत अधिक है। इसलिए हैंडपंप, ट्यूबवेल, और छोटे बोरवेल कम गहराई में होने पर भी आसानी से पानी देने लगते हैं। जिसका नतीजा यह है कि दशकों से इन ग्रामीण इलाकों के लोग पानी की अपनी ज़रूरतों के लिए भूजल पर ही निर्भर हैं।
ये सभी ज़िले अपनी भौगोलिक स्थिति के कारण भी भूजल पर बहुत ज़्यादा निर्भर हैं। दरअसल गंगा और उसकी सहायक नदियों (जैसे गंडक, घाघरा, बागमती, कोसी) के तटवर्ती या बाढ़-मैदानी क्षेत्रों में आने के कारण इन ज़िलों की मिट्टी की जल-धारण क्षमता बहुत अधिक है। इसलिए हैंडपंप, ट्यूबवेल, और छोटे बोरवेल कम गहराई में होने पर भी आसानी से पानी देने लगते हैं। जिसका नतीजा यह है कि दशकों से इन ग्रामीण इलाकों के लोग पानी की अपनी ज़रूरतों के लिए भूजल पर ही निर्भर हैं।

गंगा के मैदानी इलाकों में मैंगनीज़ संदूषण से बढ़ रहा कैंसर
पटना स्थित महावीर कैंसर संस्थान के वैज्ञानिकों की एक टीम ने अपने अध्ययन के हवाले से दावा किया है कि बिहार में गंगा के मैदानी इलाकों में पानी में मैंगनीज़ (Mn) प्रदूषण के कारण कैंसर हो रहा है।
टीम ने कैंसर के 1146 मरीज़ों के खून के नमूनों की जांच की। इनमें से 20.5 फीसद में मैंगनीज़ की मात्रा सामान्य (15 µg/L) पाई गई, जबकि 28.8 फीसद में 16-50 µg/L, 13.8 फीसद में 101-500 µg/L, 4.1 फीसद में
1001-5000 µg/L पाई गई।
अध्ययन में इन मरीज़ों के घर से लिए गए पानी के सैंपल की भी जांच की गई। हालांकि, 84.8 फीसद घरों में हैंडपंप के पानी में मैंगनीज़ की मात्रा ब्यूरो ऑफ़ इंडियन स्टैंडर्ड के मानक 100 µg/L या उससे कम पाई गई, पर वैज्ञानिकों ने पीने के पानी में लंबे समय से मैंगनीज़ के बढ़े स्तर को कैंसर की एक वजह माना।
अध्ययन में शामिल कैंसर रोगियों के खून में मैंगनीज़ की मात्रा का भूस्थानिक (जियोस्पैशियल) विश्लेषण करने पर पाया गया कि सबसे ज़्यादा और गंभीर मामले बिहार में मध्य गंगा के मैदान से थे। हालांकि, राज्य के दक्षिण पश्चिमी और उत्तर पूर्वी हिस्सों के नमूनों में भी मैंगनीज़ की काफ़ी ज़्यादा मात्रा देखी गई।

क्यों होता है भूवैज्ञानिक संदूषण
भूवैज्ञानिक संदूषण तब होता है जब भूमिगत चट्टानों और मिट्टी में मौजूद खनिज तत्व (जैसे आर्सेनिक, फ्लोराइड, आयरन, मैंगनीज़, नाइट्रेट आदि) धीरे-धीरे भूजल में घुल जाते हैं। यह एक प्राकृतिक प्रक्रिया है, लेकिन भूजल दोहन, जलस्तर में गिरावट, मिट्टी की रासायनिक संरचना और जल प्रवाह की दिशा जैसे कारण इस प्रक्रिया को तेज़ कर देते हैं।
बिहार में भूजल प्रदूषण का एक बड़ा हिस्सा भूवैज्ञानिक संदूषण है। राज्य की भौगोलिक बनावट और गंगा के मैदान की जलोढ़ मिट्टी इस प्रदूषण को बढ़ाने में भूमिका निभाती है। यही कारण है कि बिहार के बक्सर, भोजपुर, पटना, वैशाली, नालंदा, लखीसराय और भागलपुर ज़िले आर्सेनिक और आयरन प्रदूषण से सबसे अधिक प्रभावित हैं।
बिहार में पानी में खनिजों की बढ़ती मात्रा का एक कारण सिंचाई के लिए भूजल का किया जाने वाला अंधाधुंध दोहन भी है। दरअसल बिहार के सीतामढ़ी, भागलपुर, समस्तीपुर और दरभंगा जैसे ज़िलों में धान, गेहूं और गन्ना प्रमुखता से उगाया जाता है और इन फसलों की सिंचाई के लिए यहां के किसान मुख्य रूप से भूजल पर ही निर्भर हैं और अच्छी फसल के लिए भूजल का अंधाधुंध उपयोग करते हैं। जिसका नतीजा यह हुआ है कि इन इलाको में ज़मीन के नीचे पानी का स्तर घटा है और उनमें इन आर्सेनिक, फ्लोराइड, आयरन जैसे विषैले खनिजों की मात्रा और उन का घनत्व दोनों बढ़े हैं।
इसका कारण यह है कि जब जलस्तर नीचे जाता है, तो हम ज़्यादा मात्रा में पानी निकालने लगते हैं। ऐसे में जलभृत (ऐक्विफ़र) में पानी की मात्रा घटती है, लेकिन मिट्टी और चट्टानों में घुले खनिज पहले जितनी मात्रा में ही मौजूद रहते हैं।
बिहार के भूजल में खनिज तत्वों की अधिकता और उनके स्वास्थ्य प्रभाव
आर्सेनिक, नाइट्रेट, फ्लोराइड और मैंगनीज़ जैसे खनिजों के अत्यधिक सेवन या लंबे समय तक उनके संपर्क में रहने से बिहार के विभिन्न ज़िलों में लोगों के स्वास्थ्य पर भी गंभीर असर पड़ रहा है।
डॉ. कुमारी रोहिणी
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