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अमेरिका का भारत पर टैरिफ हमला भारत के लिए वरदान या अभिशाप

America's tariff attack on India is a boon or curse for India

मैं भारत पर अमेरिका के 50 फिसदी टैरिफ लगाने पर बात करने से पहले सभी को साल 1965 में लेकर चलना चाहूंगा। जब भारत पाकिस्तान का युद्ध हो रहा था और तब भी अमेरिका पाकिस्तान के साथ खड़ा था और भारत को आंख दिखा रहा था। उस समय भारत अनाज के लिए अमेरिका पर ही निर्भर था और अमेरिका से मदद के तौर पर (PL-480) अनाज भारत को मिलता था यानी खैरात मिलती थी। उस समय के तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री अमेरिका की धमकी से डिगे नहीं, घबराए नहीं और भारतवासियों को एक दिन का उपवास करने का आह्वान किया। तब भारत समझ गया था कि दूसरों की फेंकी रोटी पर नहीं जीना। अपने देश के सामर्थ्य को मजबूत करना है। और तब भारत की आबादी आज की आबादी से एक तिहाई यानि केवल 49 करोड़ थी। तब भारत ने आत्म निर्भर होने का फैसला किया और 1967 में देश में हरित क्रांति का आगाज हुआ।

हरित क्रांति में आज भारत की जनसंख्या 140 करोड़ को पार कर गई है और भारत 49 करोड़ नहीं 140 करोड़ भारतीयों का पेट भी भर रहा है और दुनिया में सबसे ज्यादा चावल का निर्यात भी भारत ही कर रहा है। यही नहीं गेहूं की पैदावार में भी भारत ने दुनिया के सामने उदाहरण पेश किया है। 1965 में जो भारत केवल 123 लाख टन गेहूं का उत्पादन करता था आज वही भारत 1200 लाख मीट्रिक टन का उत्पादन कर रहा है। और चावल का उत्पादन 1400 लाख टन के करीब पहुंच गया है।

यही क्रांति भारत ने दूध के क्षेत्र में श्वेत क्रांति ला कर की। जब देश में लोगों को दूध नसीब नहीं होता था और दूध को लेकर भी भारत की निर्भरता विदेशों पर थी। तब इसी समय, 1967 में दुग्ध क्रांति भी आई और भारत आज दुनिया का सबसे बड़ा उत्पादक और सबसे बड़ा उपभोक्ता होने के साथ साथ दुग्ध निर्यात में अहम भूमिका निभा रहा है।

तो एक बार फिर अमेरिका ने भारत को आंख दिखलाई है और कृषि पर अमेरिका की बुरी नज़र ने भारत को फिर से जागने और तेजी के साथ अब आगे बढ़ने की चुनौती दी है। और अब भारत के पास ना सिर्फ युवा शक्ति है बल्कि भारत पहले से अधिक वैज्ञानिक और शोध के साथ आगे बढ़ने की और मजबूती के साथ कदम रख रहा है।

निश्चित तौर पर पहली नजर में भारत को, भारत के कारोबार को 41 अरब डॉलर का सालाना नुकसान दिखाई देता है। लेकिन क्या यह नुकसान हमेशा नुकसान ही रहेगा ? आज भारत अमेरिका को करीब 86.5 अरब डॉलर का निर्यात करता है जिसमें कपड़ा, हीरा, रत्न और आभूषण, इंजीनियरिंग सामान, इलेक्ट्रॉनिक सामान, दवाइयाँ व फार्मास्युटिकल्स का कारोबार शामिल है।

अगर भारत का 85 अरब डॉलर का कारोबार खतरे में है तो क्या अमेरिका का 45 अरब डॉलर का कारोबार खतरे में नहीं है? क्या अमेरिका दुनिया के सामने सही उदाहरण पेश कर रहा है ? नहीं अमेरिका ने दुनिया को बताया है कि अमेरिका विश्वास करने योग्य नहीं है ? वो किसी का नहीं है ? भले ही अमेरिकियों को ये बात अच्छी लग रही हो, तो क्या यही बात दूसरे देशो पर लागू नहीं होती ?

एक तरफ अमेरिका, भारत पर रुस से तेल लेने पर जुर्माना लगा रहा है, और दूसरी तरफ खुद रुस के पास क्या करने पहुंच रहा है? राष्ट्रपति ट्रंप को ये याद रखना चाहिए कि आज दुनिया का भूगोल बहुत छोटा हो गया है और दुनिया समझती भी है और समय आने पर जवाब भी देती है।

भारत को इस समय को एक चुनौती के तौर पर लेकर विश्व के सामने एक ऐसा उदाहरण पेश करना चाहिए जैसा चीन ने किया है। चीन ने अमेरिका के आगे घुटने नहीं टेके बल्कि चीन ने अमेरिको को जवाब दिया है।

अमेरिका का नुकसान सही मायनों में अंकित करना हो तो भारत से तुरन्त प्रभाव से फेसबुक, इंस्टाग्राम, गुगल, गूगल मैप, टविट्र, एप्पल, और उन सभी डिजिटल सेवाओं पर तत्काल प्रतिबंध लगा देना चाहिए जिससे भारत और भारतवासियों की निजी जानकारियां अमेरिका पहुंच रही हैं। अमेरिका की हर एजेंसी आज गूगल और गूगल मैप के जरिए हर भारतवासी की हर मूवमेंट पर नजर रखे हुए है। इन कंपनियों का भारत में बैन होना अमेरिका की अर्थव्यवस्था को गहरी चोट देने के समान होगा।

कभी कभी बीमारी का इलाज करना हो तो थोड़ी कड़वी दवा बीमार आदमी को दे देनी चाहिए। सभी के लिए अच्छा होगा। अगर ट्रंप के लिए अमेरिका फस्ट है तो मोदी जी के लिए भी भारत प्रथम ही होगा। चीन ही नहीं दुबई ने भी अमेरिका की इन कंपनियों को बैन किया हुआ है। क्या आप दुबई में रह रहे लोगों से व्हाट्सप पर मैसेज या कॉल कर सकते हैं? नहीं। कुछ चुनिंदा भारतीय जो दुबई में रह रहे हैं,  वहीं इसका प्रयोग बहुत ही सीमित दायरे में करते हैं नहीं तो दुबई का अपना ही प्लेटफार्म है। भारत को भी यही पॉलिसी लानी चाहिए।

यू-ट्यूब जैसा प्लेटफार्म भारत का खुद का हो। आज भारत अमेरिका को जितने का निर्यात करता है उससे कहीं ज्यादा कीमती भारतीयों का डाटा अमेरिका के पास जा रहा है। जिसे तत्काल रोकने की आवश्यकता है।

यू-ट्यूब, ट्विटर, व्हॉटसअप, फेसबुक, गूगल, गूगल मेप जैसी कंपनियां भारत की होंगी तो उनकी कीमत आज हो रहे निर्यात से कहीं ज्यादा होगी। जिस तरह डॉ. एम. एस. स्वामीनाथन, डॉ. वर्गीज कुरियन विदेशी धरती पर ट्रेन्ड थे और भारत को समर्पित हुए, इसी प्रकार भारत को आईटी में भी अपनी विरासत को समझना होगा और उन्हें भारत वापिस लाकर ऐसे प्रोजेक्ट पर काम करने देना होगा।

आज इसरो पर हर भारत को नाज है, इसी प्रकार निजी कंपनियों को भी स्पेस साइंस में भारत को अग्रणी करना होगा ताकि स्पेसएक्स जैसी कंपनी भारत में भी खड़ी की जा सके।

भारत को कृषि के क्षेत्र में भी कुछ अग्रणी कदम उठाने की जरुरत है जिससे दुनिया भारत को अन्नश्री के तौर पर देखे और निर्यात में कृषि की भी भागीदारी बढ़े।





सुरेश मनचन्दा
(आलेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं। उनसे संपादक व प्रकाशक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है। किसी भी विवाद की स्थिति में हमारा न्याय क्षेत्र दिल्ली होगा।)

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