पिछले कुछ सालों से प्रत्येक वर्ष अक्टूबर- नवंबर के आसपास दिल्ली में वायु प्रदूषण की समस्या उत्पन्न हो जाती है जिससे यहाँ के निवासियों, बच्चों और वयस्कों को श्वसन संबंधी समस्याओं, हृदय रोग, आँखों में जलन, इत्यादि अन्य प्रकार की समस्याओं से जुझना पड़ता है। वैज्ञानिक रिपोर्ट के मुताबिक ये प्रदूषित हवा अनुमानतः एक दिन में 30 सिग्रेट के जलाने से निकलने वाली धुएं बराबर जितनी समस्या फेफड़ों के लिए उत्पन्न करता है। परिणामस्वरूप दिल्ली एवं इसके आसपास के इलाकों में रहने वाले लोगों के फेफड़ों की कार्यक्षमता में कमी आई है जिससे दिल्ली के लोगों की जीवन प्रत्याशा में औसतन 12 वर्ष की कमी देखी गयी है। साथ ही प्रदूषित वायु का दुष्प्रभाव वनस्पति, जीव-जन्तुंओं के साथ-साथ जल क्षेत्र पर भी देखने को मिलता है।
बीते दिनों दिल्ली में वायु प्रदूषण की स्थिति पुनः गंभीर हो गई है। 23 अक्टूबर को दिल्ली में इस साल का सबसे निम्न स्तर का वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) अंकित किया गया। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अनुसार इस साल 23 अक्टूबर को दिल्ली का AI 364 दर्ज किया गया जो की इस सीजन का सर्वाधिक प्रदूषित स्तर था। इसके अलावा दिल्ली के विभिन्न जगहों जैसे विवेक विहार, आईटीओ, द्वारका समेत अन्य जगहों पर AQI 500 तक पहुँच गया। हालाँकि यह समस्या केवल दिल्ली की न होकर पूरे राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के लिए एक गंभीर चुनौती है। आखिर दिल्ली में हर साल रिकॉर्ड स्तर के वायु प्रदूषण के क्या कारण हैं तथा सरकार इसके रोकथाम के लिए क्या कदम उठा रही है आइये इस पर विस्तार से चर्चा करते हैं ; वास्तव में वायु विभिन्न घटकों का मिश्रण है जिसमें अवांछनीय तत्वों की सामान्य से अधिक सांद्रता होना ही वायु प्रदूषण है। भारत में इसका मापन वायु गुणवत्ता सूचकांक के माध्यम से किया जाता है जो की पृथ्वी विज्ञान मत्रालय के अंतर्गत 'SAFAR ' (सिस्टम ऑफ़ एयर एंड वेदर फोरकास्टिंग एंड रिसर्च ) एजेंसी द्वारा जारी किया जाता है। AQI की गणना दैनिक आधार पर एक निर्दिष्ट समय में वायु में उपस्थित प्रमुख प्रदूषकों के औसत से अधिक उत्सर्जन की माप द्वारा की जाती है जिसमें उच्च संख्यात्मक मान से तात्पर्य होता है की AQI बढ़ा है। इस सूचकांक में 8 वायु प्रदूषकों को शामिल किया गया है जो की पार्टिकुलेट मैटर 2.5 और 10, नाइट्रोजन डाई ऑक्साइड, सल्फर डाई ऑक्साइड, लेड, अमोनिया,धरातलीय स्तर की ओजोन और कार्बन मोनो ऑक्साइड हैं । स्मरण रहे इन प्रदूषित गैसों में कार्बन डाई ऑक्साइड शामिल नहीं है। इन प्रदूषकों की मात्रा के आधार पर AQI को 6 श्रेणियों (अच्छा , संतोषजनक , मध्यम , ख़राब , अस्वास्थ्यकर एवं खतरनाक ) में बांटा गया है। तात्कालिक वायु गुणवत्ता सूचकांक को मद्देनजर रखते हुए दिल्ली सरकार ने इस समस्या के निराकरण के लिए GRAP-2 लागू किया है। यह GRAP (ग्रेडेड रिस्पांस एक्शन प्लान ) योजना पर्यावरण , वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा जनवरी 2017 में अधिसूचित की गयी थी जिसका मुख्य उद्देश्य वायु प्रदूषण को संरचनात्मक तरीके से सम्बोधित करना है। जिसके परिचालन का कार्यभार पर्यावरण प्रदूषण (रोकथाम और नियंत्रण ) प्राधिकरण करती है। जैसा की उपरोक्त पंक्तियों में लिखित है यह समस्या केवल दिल्ली की नहीं है बल्कि दिल्ली से सीमा साझा करने वाले बाकी राज्यों की भी है अतः इस सार्वभौमिक समस्या के संगठित उपचार के क्रियान्वयन के लिए 2021 में वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग की स्थापना की गयी ताकि विभिन्न राज्य आपसी सहयोग एवं समन्वय से समस्या का उचित निराकरण कर सकें।
ग्रैप (GRAP) 2 के अंतर्गत दिल्ली में कई पाबंदियां लगायी गयी हैं जिससे प्रदूषकों के उत्सर्जन में कुछ कमी की जा सके। गौरतलब है की ग्रैप 2 के साथ-साथ ग्रैप 1 सम्बन्धी पाबंदियां भी अनवरत रूप से लागू रहेंगी। ग्रैप का पहला चरण तब लागू किया जाता है जब AQI 201 से 300 तक रहता है, इसी तरह AQI 301 से 400 तक रहने पर दूसरा चरण, AQI 401 से 450 रहने पर तीसरा चरण तथा AQI 450 से ज्यादा होने पर ग्रैप-4 लागू हो जाता है। ग्रैप 2 के तहत मुख्य रूप से कोयला और लकड़ी जलाने पर रोक लगाई जाएगी। सामान्यतया भोजनालयों (विशेषकर तंदूर पर भोजन पकाना) एवं सर्दी में आग सेंकने के लिए इनका उपयोग किया जाता है जिसपे सरकार कड़ाई से निगरानी करेगी साथ ही सरकारी कार्यालयों में इलेक्ट्रिक हीटर उपलब्ध कराकर इस समस्या का उचित समाधान करने का प्रयास करेगी। साथ ही नगर निगम के ठोस अपशिष्ट और बायोमास को जलाने पर भी प्रतिबन्ध रहेगा। डीजल चालित वाहनों और जेनेरेटरों पर भी प्रतिबन्ध रहेगा, 800 किलोवॉट से अधिक क्षमता के जनरेटर तभी उपयोग में लाये जा सकेंगे जब इनकी नियमित तौर पर रेट्रोफिटिंग जाँच होती रहेगी। इसके साथ ही सरकार पर अबाधित रूप से बिजली संचालित करने का परोक्ष दबाव भी बना रहेगा। इसके अलावा निजी वाहनों के उपयोग को हतोत्साहित करने के लिए पार्किंग चार्ज में वृद्धि की जाएगी जबकि मेट्रो एवं इलेक्ट्रिक वाहनों के फेरों को बढ़ा दिया जायेगा। विदित है की दिल्ली में वाहनों से उत्सर्जित होने वाले प्रदूषकों का अहम् योगदान है। अस्पताल , विद्यालय , रेलवे इत्यादि सरकारी विनिर्माण को छोड़कर बाकी सभी निर्माण कार्य पर जनवरी तक प्रतिबन्ध रहेगा। इनके अलावा अन्य प्रमुख उपायों में सड़कों की नियमित सफाई एवं धूल निरोधक पदार्थों के साथ जल छिड़काव किया जाना , प्रदूषण के हॉट-स्पॉट जगहों पर एंटी स्मॉग टॉवर स्थापित करना आदि है। यदि वायु गुणवत्ता सूचकांक इससे भी गंभीर स्थिति में पहुँचता है तो सरकार BS-3 पेट्रोल और BS-4 डीजल वाहनों पर प्रतिबन्ध लगा देगी। साथ ही सार्वजनिक और निजी कार्यालयों में केवल 50 प्रतिशत कार्यबल को बुलाने का प्रावधान किया जायेगा, आपातकालीन स्थिति में विद्यालयों को बंद करना तथा सम -विषम नियम के आधार पर गाड़ियों के प्रयोग पर बल दिया जायेगा।
हालाँकि मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार ग्रैप उपाय उत्सर्जन एवं स्थान केंद्रित हैं जबकि वायु प्रदूषण की चुनौतियों से निपटने के लिए हमें एयरशेड दृष्टिकोण को अपनाने की आवश्यकता है। सरल भाषा में कहें तो भूगोल में एयरशेड एक ऐसा क्षेत्र है जो की हवा के सामान्य प्रसार पर निर्भर होता है अर्थात वायुमंडलीय प्रदूषकों के प्रसार में सामान्य विशेषताएं साझा करता है जो की राजनितिक सीमाओं द्वारा प्रतिबंधित नहीं होता। अतः इसके लिए दिल्ली समेत उत्तर प्रदेश, हरियाणा एवं राजस्थान इन सभी राज्यों में आपसी तालमेल की दरकार रहेगी। राजनितिक पार्टियों का एक -दूसरे पर दोषारोपण अवश्य ही समस्या के समाधान में बाधक बनेगा साथ ही सतत विकास के लक्ष्य को प्रभावित करेगा। इसकी समन्वयता की आवश्यकता इसलिए भी है क्यूंकि दिल्ली में जहरीली हवाओं के सांद्रण का एक प्रमुख कारण पंजाब , हरियाणा एवं उत्तर प्रदेश के किसानों द्वारा पराली जलाना (स्टबल बर्निंग) भी है। हालाँकि कई वर्षों से यही समस्या है फिर भी ये सभी राज्य उचित मानदंड अपनाने तथा इनका संरचनात्मक निवारण करने में विफल रहे हैं।
अक्सर यह समस्या सर्दी के आने के पूर्व ही इसलिए दर्ज की जाती है क्यूंकि इस समय तक राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में वायु प्रवाह संचार स्थिर हो जाता है जिससे हवा में धूलकण और अन्य प्रदूषक यथास्थिर बने रहते हैं, ये विस्तारित नहीं हो पाते हैं जो की अवश्य ही वायु की गुणवत्ता को ख़राब कर देता है। साथ ही दिल्ली में औद्योगिक इकाईओं से होने वाले उत्सर्जित प्रदूषक स्मॉग के स्तर को भी बढ़ा देते हैं। यह समस्या अक्टूबर माह से शुरू होकर करीब -करीब पूरी ठण्ड (लगभग फ़रवरी ) तक बनी रहती है जिसमें उपरोक्त सभी कारणों के अलावा दिवाली के समय पटाखों का जलाना भी एक मुख्य कारण है। अतः इस गंभीर चुनौती से निपटने के लिए सरकार और आम नागरिक दोनों को ही अपने स्तर से उचित कदम उठाने होंगे।

स्मृति उपाध्याय
(आलेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं। उनसे संपादक व प्रकाशक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है। किसी भी विवाद की स्थिति में हमारा न्याय क्षेत्र दिल्ली होगा।)
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