दुनिया में परिस्थितियां तेजी से बदलती जा रही हैं। यूक्रेन, सीरिया, गाजा, अफ्रीका जैसे विश्व के कई इलाकों में जंग जैसे हालात हैं। पाकिस्तान और चीन जैसे भारत के घोषित दुश्मन लगातार नए नए हथियारों का परीक्षण कर रहे हैं। ऐसे हालातों में भारत आंख मूंदकर नहीं बैठ सकता। केन्द्र सरकार लगातार प्रयास कर रही है कि सैन्य बलों का आधुनिकीकरण किया जाए। उन्हें स्वदेशी हथियारों से लैस करके आत्मनिर्भर बनाया जाए। यह मुहिम काफी हद तक थल सेना और नौसेना में सफलतापूर्वक पूरी होती दिख रही है। लेकिन कई कारणों से वायुसेना के मामले में आत्मनिर्भरता हासिल करने में मुश्किल आ रही है। जो कि भारतीय आकाश की सुरक्षा की दृष्टि से खतरनाक हो सकता है।
भारतीय वायुसेना में लड़ाकू विमानों की संख्या में भारी कमी
भारतीय वायुसेना इस समय सबसे कम लड़ाकू विमानों की समस्या से जूझ रही है। वास्तविक युद्ध लड़ने के लिए वायुसेना को 42 फाइटर स्क्वाड्रन यानी लड़ाकू विमानों के 42 दस्ते चाहिए। एक स्क्वाड्रन में आम तौर पर 18 विमान होते हैं। लेकिन उसके पास अभी सिर्फ 31 फायटर स्क्वाड्रन है। यानी कि वास्तविक जरुरत से 11 स्क्वाड्रन कम, कुल जरुरत का मात्र दो तिहाई। वह भी तब जबकि सभी जानते हैं कि भारत के खिलाफ चीन और पाकिस्तान दोनों ही साजिश कर रहे हैं और भारत को पूर्वी और पश्चिमी दोनों सीमाओं से खतरा है। अपनी दोनों सीमाओं की रक्षा के लिए भारत को लगभग 750 से ज्यादा लड़ाकू विमानों की जरुरत है, जबकि उसके पास अभी कुल 560 विमान ही हैं। इस कमी को पूरा करने के लिए 15 साल का लंबा वक्त लग सकता है।
भारत में लड़ाकू विमान तैयार करने का काम हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड करती है। जिसके तेजस विमान को सबकी तारीफ मिल चुकी है। खुद अमेरिकी वायुसेनाध्यक्ष इसे उड़ा चुके हैं। 40 LCA मार्क 1 ‘तेजस’ के दो स्क्वाड्रन अब तक स्थापित किए जा चुके है। स्वदेश निर्मित 83 तेजस मार्क 1A के लिए करार हो चुका है। इन सभी 83 विमानों की डिलीवरी शुरू होनी थी। लेकिन अमेरिका से जनरल इलेक्ट्रिक के इंजन ना मिलने के चलते यह काम अटका हुआ है। इसके निर्माण का काम बड़े पैमाने पर शुरु नहीं हो पा रहा है। तेजस मार्क 1A आधुनिक 4+ जेनेरेशन का फाइटर एयरक्राफ्ट है। तेजस मार्क 1A से कुल 4 स्क्वाड्रन बनाने की योजना है। इसके अलावा 5 अतिरिक्त स्क्वाड्रन के लिए 97 तेजस मार्क 1A की खरीद की मंजूरी भी दे दी गई है। तेजस मार्क 1A का एडवांस वर्जन यानी की तेजस मार्क-2 पर काम ज़ोरों पर चल रहा है। यह मार्क-1 ए से ज्यादा आधुनिक होगा। यह अभी डिजाइन और डिवेलपमेंट स्टेज में है।
विमानों के इंजन की सप्लाई में देरी चिंता का विषय
भारतीय लड़ाकू विमानों के बेड़े को कुल 42 स्क्वाड्रन तक पहुंचाने के लिए हमें अपने स्वदेशी तेजस मार्क 1A विमान का तेजी से उत्पादन करना होगा। लेकिन इसके लिए जिस F404 इंजन को चुना गया है, उसे अमेरिकी कंपनी जनरल इलेक्ट्रॉनिक्स बनाती है। इसकी आपूर्ति के लिए 2023 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अमेरिका यात्रा के दौरान समझौता हुआ था। लेकिन इस इंजन की आपूर्ति में देरी हो रही है, जिसके चलते भारतीय वायुसेना का इंडक्शन शेड्यूल ठप पड़ गया है। शुरुआत में इस इंजन की 2023 के अंत में डिलीवरी की जानी थी, लेकिन अब अप्रैल 2025 तक ही मिल पाने की उम्मीद है।

जिसकी वजह से भारतीय वायुसेना में लड़ाकू विमानों की संख्या पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है। इस देरी की वजह हे भारतीय रक्षा मंत्रालय को जनरल इलेक्ट्रॉनिक्स पर जुर्माना लगाना पड़ा है। जनरल इलेक्ट्रॉनिक्स ने देरी के लिए कोरियाई साझेदार से आपूर्ति शृंखला संबंधी मुद्दों को जिम्मेदार ठहराया है। हालांकि, इसका पता लगाया जाना बाकी है कि क्या वास्तव में यही समस्या है या कार्यक्रम में बाधा डालने के लिए जानबूझकर ऐसा किया गया है। क्योंकि तेजस में पूरी दुनिया की रुचि बढ़ रही है। कई देशों ने अपने पुराने विमानों को बदलने के लिए 4.5 पीढ़ी के लड़ाकू विमान के रूप में तेजस में रुचि दिखाई है।
जबकि अमेरिका अपना एफ-16 लड़ाकू विमान दुनिया भर में बेचना चाहता है। अर्जेंटीना में तो खरीदारी के लिए अमेरिकी एफ-16,चीनी जेएफ-17 और तेजस में कड़ी टक्कर हुई थी। क्योंकि तेजस में चीनी JF-17 से ज्यादा एडवांस तकनीक है। जबकि अमेरिकी एफ-16 के बराबर क्षमता का होने के बावजूद उससे बेहद सस्ता है। इसीलिए तेजस में खरीदारों की रुचि बढ़ी है। ये भी एक वजह हो सकती है कि अमेरिका इंजन की सप्लाई में देरी कर रहा है। अगर इसी स्पीड से काम चलता रहा तो अब से छह साल बाद भी यानी 2030 तक भी वायुसेना के लड़ाकू विमानों के स्क्वाड्रन की संख्या केवल 35-36 तक ही बढ़ पाएगी।
नए विमान बन नहीं रहे, पुराने विमान रिटायर हो रहे हैं
भारतीय वायुसेना के लिए तेजस विमान इंजन की कमी की वजह से तैयार नहीं हो पा रहे हैं। यूक्रेन-रूस के बीच चल रहे संघर्ष के कारण, भारतीय वायुसेना ने रूस से 21 और मिग-29 तथा 12 और सुखोई एसयू-30 MKI विमानों के ऑर्डर स्थगित कर दिए हैं।
2035 तक की बात करे तो मौजूद लडाकू विमानों की मिग 21 और मिग 29 पूरी तरह से फेज आउट हो जाएंगे। जैगुआर का पहला स्क्वाड्रन फेज आउट होना शुरू हो जाएगा। इसके बाद नंबर आएगा मिराज 2000 के फेज आउट होने का। भारतीय वायुसेना के मौजूदा फाइटर फ्लीट के मिग 21 के 2 स्क्वाड्रन, मिग 29 अपग्रेड के 3, मिराज 2000 के 3 और जेगुआर के 6 स्क्वाड्रन का अपग्रेड हो चुका है। दो स्क्वाड्रन रफाल और तेजस के भी मिल चुके हैं। भारतीय वायुसेना के बेड़े में इस समय सबसे ज्यादा 250 की संख्या में फ्रंट लाइन फाइटर सुखोई 30 है। लेकिन इसके पुर्जों की सप्लाई यूक्रेन युद्ध की वजह से बाधित हो रही है।

साल 2022 में वायुसेना के तत्कालीन एयर चीफ मार्शल वीआर चौधरी ने बयान दिया था कि फिलहाल विमानों की जो वर्तमान संख्या है, उसके आधार पर सर क्रीक से सियाचिन और आगे पूर्व में 24/7 लड़ाकू हवाई गश्त या हवाई रक्षा निगरानी बनाए रखना संभव नहीं हो सकता है। इसलिए संख्या निश्चित रूप से आवश्यक है कि 42 स्क्वाड्रन ही रहेंगी। हालांकि अगले एक दशक में इसे हासिल करना एक कठिन लक्ष्य है, हम पड़ोस में उत्पन्न होने वाली स्थिति के आधार पर ही इसकी समीक्षा करेंगे। वर्तमान स्थिति के आधार पर, भारतीय वायुसेना को दिए गए अधिदेश के अनुसार, यह आवश्यक है कि हम संख्या बढ़ाएँ। वर्तमान में केवल 31 लड़ाकू स्क्वाड्रन हैं, जो लगभग 18 लड़ाकू विमानों को प्रति स्क्वाड्रन बनाता है, लड़ाकू विमानों के सेवानिवृत्त होने के साथ ही भारतीय वायुसेना की दुर्दशा हर साल बढ़ती जा रही है। हाल ही में श्रीनगर स्थित मिग-21 बाइसन स्क्वाड्रन के चरणबद्ध तरीके से समाप्त होने के साथ ही भारतीय वायुसेना की लड़ाकू स्क्वाड्रन की ताकत 31 तक गिर गई। बल को लड़ाकू विमानों की सख्त जरूरत है, क्योंकि आने वाले दशकों में इसकी घटती संख्या एक चुनौती पेश करने की उम्मीद है।
IAF के ट्विन-इंजन जगुआर को 2032-33 तक चरणबद्ध तरीके से हटा दिया जाएगा, जबकि अपग्रेड किए गए मिग-29 और मिराज-2000 बेड़े का शेल्फ लाइफ और कुल तकनीकी जीवन लगभग उसी समय तक पूरा हो जाएगा। भारतीय वायुसेना की परेशानी को और बढ़ाने वाली बात यह है कि अगले 15 सालों में कई स्क्वाड्रन को सेवामुक्त किया जाना है, जिसकी शुरुआत 2025 तक तीन शेष मिग-21 बाइसन स्क्वाड्रन से होगी।
रक्षा सूत्रों के हवाले से मिली खबर के अनुसार सिर्फ लड़ाकू जहाजों की ही कमी नहीं है। बल्कि ट्रांसपोर्ट और एयर रिफ्यूलर जैसे दूसरे विमानों की संख्या भी कम है। क्योंकि पुराने विमान रिटायर होते जा रहे हैं। भारतीय सेना को 18 एयर रिफ्यूलर विमान चाहिए, जबकि उसके पास सिर्फ छह हैं। इसके अतिरिक्त हमले की पूर्व सूचना देने वाले एयरबॉर्न अर्ली वार्निंग एंड कंट्रोल विमान भारत पास मात्र छह की संख्या में मौजूद हैं, जो कि पाकिस्तान से भी कम हैं। भारत को अभी कम से कम 12 और एयरबॉर्न अर्ली वार्निंग एंड कंट्रोल विमानों की जरुरत है।
पायलटों की संख्या में कमी

भारतीय वायुसेना के पास ना केवल फायटर जेट्स की कमी है। बल्कि उन्हें उड़ाने वाले पायलटों की संख्या भी कम हो रही है। जिसपर डिफेंस की स्टैंडिंग कमेटी और CAG ने भी ध्यान देने की जरुरत बताई है। खास तौर पर फाइटर एयरक्राफ्ट, पायलट और ट्रेनिंग को लेकर। भारतीय वायुसेना अभी इन्हीं तीनों पर तेजी से काम करना शुरू भी कर चुकी है। इस कमी को दूर करने के लिए रक्षा मंत्रालय ने एक हाई लेवल कमेटी का भी गठन कर दिया है।
स्टैंडिंग कमेटी और CAG की रिपोर्ट में वायुसेना की मौजूदा कमियों के बारे में बताया गया है कि-
रिपोर्ट के अनुसार 2016 और 2021 के बीच 222 प्रशिक्षु पायलटों की वार्षिक भर्ती की योजना बनाई गई थी। लेकिन वास्तविक भर्ती कम ही हुई, जिससे पायलटों की कमी बढ़कर 596 हो गई।
एक्सपर्ट्स का मानना है कि पायलटों की भर्ती के लिए कई प्रकार की चुनौतियां आ रही हैं। कॉमर्शियल एविएशन सेक्टर तेजी से बढ़ रहा है। वहां पैकेज ऑफर घरेलू और अंतरराष्ट्रीय दोनों क्षेत्रों में ज्यादा बेहतर हैं। लाइफस्टाइल संतुलित और स्थिर है। किसी तरह का खतरा नहीं है। ऐसे में अनुभवी मिलिट्री पायलट सर्विस से निकल कर वहां जा रहे हैं।
नए पायलटों के प्रशिक्षण में समस्या
नए पायलट को ट्रेनिंग देकर उसे तैयार करना एक चुनौती भरा काम है। इसमें काफी समय लगता है। कई बार तो एक पायलट को तैयार करने में वर्षों लग जाते हैं। तब जाकर वह पूरी तरह से उड़ान के लायक बनता है। कैग ने अपनी रिपोर्ट में यह भी बताया है कि Pilatus PC-7 MK-2 ट्रेनर एयरक्राफ्ट के ऑपरेशनल इश्यू की वजह से भी ट्रेनिंग पाइपलाइन में है। नए प्रशिक्षु पायलटों को ट्रेनिंग देने के लिए भारतीय वायुसेना के पास 64 पिलाटस पीसी-7 एमके-II विमान हैं। जिनमें से 16 विमानों के इंजन लीक हो रहे हैं। यानी कि 25 प्रतिशत ट्रेनिंग विमानों में इंजन लीक हो रहा है। इन विमानों से 2013 और 2021 के बीच 38 इंजन ऑयल लीक की घटनाएं हुईं थीं। भारतीय वायुसेना ने निर्माता के साथ इस मुद्दे को उठाया था।
भारतीय वायुसेना की विमान आधुनिकीकरण योजनाओं में देरी के कारण परिवहन और हेलीकॉप्टर क्षेत्रों के लिए 'चरण 2' और 'चरण 3' के पायलट प्रशिक्षण प्रभावित हुए हैं। हालांकि वायुसेना सूत्र बताते हैं कि ट्रेनर एयरक्राफ्ट के ऑपरेशनल इश्यू, ट्रेनिंग इंफ्रास्ट्रक्चर को बढ़ाने और नई भर्तियों पर तेजी से काम चल रहा है।
दुश्मन तेजी से बढ़ा रहा है अपनी ताकत
भारतीय वायुसेना का मुख्य मुकाबला चीन से है। जिसने अपनी वायुसेना के सभी पुराने फाइटर एयरक्रफ्ट को 4.5 से 5वीं पीढ़ी के विमानों से बदलना शुरू कर दिया है। पेंटागन की ताजा रिपोर्ट में इस बात का खुलासा किया है कि चीनी वायुसेना और नौसेना के पास 3150 एयरक्राफ्ट मौजूद है। इनमें के पास 2400 लड़ाकू विमान है। जिनमें 1900 फाइटर एयरक्राफ्ट है। जिनमें 1300 से ज़्यादा चौथी श्रेणी के हैं। चीन पांचवी श्रेणी के विमान J-20 को भी अपनी वायुसेना में शामिल कर चुका है। पश्चिमी मीडिया का अनुमान है कि 200 के करीब J-20 एयरक्राफ्ट चीन की वायुसेना में शामिल किए जा चुके है। चीन का लक्ष्य है कि वह 2025 तक लगभग 500 की संख्या में 5वीं श्रेणी के फाइटर जेट्स को चीन की वायुसेना में शामिल कर लेगा।
समस्या पर है सरकार की नजर
भारतीय वायुसेना के आधुनिकीकरण की राह में आ रही बाधाओं पर सरकार की निगाह बनी हुई है। नवंबर 2024 में दिल्ली में वायुसेना के कमांडरों की बैठक हुई थी। जिसमें रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह को जानकारी दी गई थी कि भारतीय वायुसेना के पास पायलटों की कमी होती जा रही है।

उन्हे बताया गया कि सैन्य विमानों के बेड़े में आधुनिक विमानों की कमी भी है... जिसे देखते हुए 23 दिसंबर 2024 को सरकार ने डिफेंस सेक्रेटरी राजेश कुमार सिंह के नेतृत्व में हाई-लेवल कमेटी बनाई है। यह कमेटी जरूरतों को ध्यान में रखकर पुराने और नए प्रोजेक्ट्स पर नजर रखेगी। इस कमेटी में डिफेंस सेक्रेटरी (प्रोडक्शन) संजीव कुमार, डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट ऑर्गनाइजेशन (DRDO) के प्रमुख डॉ. समीर वी. कामत और वायुसेना के उप प्रमुख एयर मार्शल टी. सिंह को शामिल किया गया है। कमेटी तीन महीने के अंदर सेना की आवश्यकताओं के विस्तृत आकलन के साथ रक्षा मंत्री के सामने अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करेगी। यह समिति स्वदेशी माध्यम से वायुसेना की आवश्यकता को पूरा करने का तरीका सुझाने का काम करेगी।

अंशुमान आनंद
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