नरेन्द्र मोदी सरकार में अनगिनत काम हुए हैं जिनको सूचीबद्ध करने के लिये एक पूरी किताब की जरूरत पड़ेगी। देश में अभूतपूर्व विकास, गरीबों की खोज-खबर से लेकर भारत को आत्मनिर्भर और सुरक्षित बनानें में 10 साल में इतने काम हो गये जिनका होना 20 साल में भी संभव नहीं था। पिछले 2019 के लोकसभा चुनाव में मोदी सरकार अपने काम की दम पर दुबारा और अधिक बहुमत से जीती थी। इस बार भी उसकी भारी जीत सुनिश्चित लग रही थी पर भाजपा संगठन में कहीं कमजोरी रह गयी, ऊपर से इंडी गठबंधन की चालबाजियां झूठ, फरेब, मिथ्या, प्रचार मोदी सरकार के विकास एजेण्डे पर दिन पर दिन भारी पड़ता गया। चुनाव के पास आने तक इंडी गठबंधन की घोषित रेवड़ियां और भाजपा सरकार आने पर आरक्षण बन्द हो जाने की बात जबरदस्त रूप से प्रचारित हो गयी जिसका जवाब मोदी जी ने तो दिया पर क्षेत्रीय और जिला स्तर पर पार्टी द्वारा भोंपू की तरह नहीं दिया गया। यह काम भाजपा के प्रदेशीय और जिला संगठन का था। पार्टी का केन्द्रीय नेतृत्व प्रदेश को इस बाबत क्रियाशील नहीं कर पाया। प्रदेश स्तर पर और जिला स्तर पर भी इसका समुचित जवाब गांव-गांव तक नहीं जा सका। यदि मोदी जी या मोदी सरकार से लोगों की नाराजगी होती तो राजग को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलता। उल्लेखनीय है कि मोदी सरकार के महत्वपूर्ण महारथी पांचो मंत्री नरेन्द्र मोदी, राजनाथ सिंह, नितिन गडकरी, अमित शाह और पीयूष गोयल अलग अलग प्रदेशों में लाख वोट से ऊपर जीत कर आये हैं। इनकी भारी जीत प्रमाणित करती है कि सरकार से जनता को पूरी संतुष्टि थी। इनमें से तीन भाजपा के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं जिन्होंने पार्टी के संगठनात्मक स्वरूप को राष्ट्रीय स्तर पर मजबूत करने का काम किया है। इस बार पार्टी का संगठन उस तरह से मजबूत और क्रियाशील नही रहा। वर्तमान अध्यक्ष ने मेहनत कि वे ईमानदार व्यक्ति हैं पर उनके अपने प्रदेश हिमाचल में उपचुनावों में भाजपा हारी फिर प्रदेश के विधान सभा चुनावों में भी भाजपा हारी। वहीं उत्तर प्रदेश में लोकसभा उपचुनाव रामपुर, आजमगढ़ में मुख्यमंत्री योगी के कारण जीत हुई थी। मध्य प्रदेश विधान सभा चुनाव में शिवराज सिंह चाैहान का काम बोल रहा था। राजस्थान में भाजपा की भूमिका से ज्यादा अशोक गहलोत की अलोकप्रियता ही भाजपा के जीत का मुख्य कारण था।
पश्चिमी उत्तर प्रदेश और राजस्थान में जीत के लिये जाटों को अत्यधिक महत्व दिया गया। देश के उपराष्ट्रपति पद पर जाट को बिठाया गया, ये बात और है कि जगदीप धनखड़ इस पद के लिये योग्य व्यक्ति हैं। उत्तर प्रदेश में पार्टी अध्यक्ष के पद पर जाट को बिठाया जबकि पूरे प्रदेश में जाट केवल पश्चिमी उत्तर प्रदेश में है। जयन्त चैधरी जो कि पूर्व प्रधानमंत्री चरण सिंह के पुत्र अजीत सिंह के पुत्र हैं उनको राजग में शामिल कर वो भी कमी भी पूरी कर ली, पर इन सबका लाभ नहीं मिला। पिछला लोकसभा चुनाव महेन्द्र नाथ पांडे की अध्यक्षता में लड़ा गया और विधान सभा का चुनाव स्वतंत्र देव सिंह की अध्यक्षता में लड़ा गया। दोनों ही बिरादरी के वोट पूरे उत्तर प्रदेश में थे, जिसका लाभ चुनावों में पार्टी को मिला था।
उत्तर प्रदेश में क्यों हारे?
भाजपा उत्तर प्रदेश में दलितों को अपनी ओर करने में सफल नहीं हुई। पार्टी का ध्यान दलितों में विशेष तौर से कोरी और खटीक जाति तक ही सीमित रहा। पार्टी ने अहिरवारों की ओर ध्यान नहीं दिया जबकि दलितों में सबसे अधिक यही वोट हैं और इनमंे एकता भी है दलितों का नेतृत्व पिछले साठ सालों में अहिरवारों के हाथों में ही रहा। बड़ी छोटी सभी सरकारी नौकरियों में उनका भारी वर्चस्व है इनको नजर अंदाज करना भी पार्टी को भारी पड़ा है, विशेष तौर से उत्तर प्रदेश में। साथ ही साथ दलितों के आरक्षण बन्द करनें की बात जिसे इंडी ग्रुप ने महामारी की तरह फैलाया उसका समुचित समाधान भाजपा संगठन नहीं कर पायी। टिकट वितरण से भारी असंतोष था। आरएसएस कैडर में बहुत उत्साह दिखाई नहीं दिया। पिछड़ी जाति के लोगों में भी आरक्षण बन्द होने का डर व्याप्त हो गया जिसको भाजपा दूर नहीं कर पाई।
पश्चिम बंगाल में क्यों हारे?
भाजपा ने 2019 के लोकसभा चुनाव में बंगाल में 42 सीटों में से 18 सीटें जीत कर अपना झंडा गाड़ दिया था। लगता था इस बार कम से कम 25 सीटें आयेंगी लेकिन केवल 12 सीटें ही भाजपा जीत सकी। पिछले विधान सभा चुनाव में 77 सीटें जीत कर भाजपा ने अपना वर्चस्व जमा लिया था। 2024 के चुनाव में बंगाल में भाजपा का घर बनते बनते उजड़ गया। इसका कारण घर बसाने में गलती नहीं थी, पर घर को बचाने में गलती हुयी। धड़ा धड़ भाजपा के कार्यकर्ताओं को मारा पीटा जा रहा था, उन्हें प्रताड़ित किया जा रहा था, उनके घर जलाये जा रहे थे, यहां तक कि उनके कत्ल हुए, उनकी बहु बेटियों के बलात्कार हुए, यानि हर तरह से भाजपा के समर्थकों को घर से बाहर आने में डर लगने लगा। भले आदमी, शिक्षित समाज असुरक्षित होने के कारण वोट डालने नहीं गया। राज्यपाल ममता सरकार की जुल्म ज्यादतियों की बात कर रहे थे, खुद वास्तिविक स्थिति देखने गये और केन्द्र सरकार को बताया भी था। हाईकोर्ट ने ममता सरकार के खिलाफ तल्ख टिप्पणियां कीं थीं फिर भी नरेन्द्र मोदी ने बंगाल में राष्ट्रपति शासन नहीं लगाया। यदि राष्ट्रपति शासन लगा होता तो शायद आज बंगाल में दूसरी तस्वीर देखनें को मिलती और भाजपा वहां उड़ीसा की तरह अच्छा प्रदर्शन करती। उड़ीसा में भाजपा ने अपनी सरकार भी बनायी और 1 सीट छोड़ कर सभी लोकसभा की सीटें जीत ली। अब बंगाल में खराब से खराब परिस्थितियों में राष्ट्रपति शासन लगाना आसान नहीं होगा। एक तो राष्ट्रपति शासन लगाने पर विरोध करने के लिये पूरा इंडी गठबंधन खड़ा हो जायेगा। लोकसभा में पास कराने के लिये भाजपा को दांतो चने चबाना पड़ेंगे क्योंकि सहयोगी दल शायद ही इससे सहमत हो पायें। इस तरह थाली मंे आया बंगाल भाजपा केे हाथों से निकल गया, अब वहां पांव जमाना भाजपा के लिये टेढ़ी खीर होगी।
महाराष्ट्र
महाराष्ट्र में भाजपा ने अपनी साख के साथ साथ सीटें भी खोयी। किसी तरह महाराष्ट्र में भाजपा ने शिवसेना को तोड़ कर अपनी सरकार बना कर शिवसेना के उद्धव ठाकरे से धोखा देने का बदला ले लिया पर लोकसभा चुनाव में कांग्रेस, नेशनल कांग्रेस और शिवसेना उद्धव ग्रुप ने एनडीए को मात दे दी। इससे महाराष्ट्र की राजनीति के दूरगामी परिणाम होंगे। ये समझ पाना कठिन है कि पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष और भाजपा के सबसे बड़े महाराष्ट्र के कद्दावर नेता को महाराष्ट्र में चुनाव की बागडोर क्यों नहीं सौंपी या उनके उचित मार्गदर्शन का उपयोग क्यों नहीं किया। महाराष्ट्र में नितिन गडकरी को जिम्मेंदारी देने में शायद कुछ बेहतर हो सकता था। शरद पवार को नियंत्रित करना या उनको सहयोगी बनानें का काम हो सकता है। शरद पवार को महाराष्ट्र की राजनीति में कमजोर समझना भाजपा की भूल थी। आखिर शरद की बेटी सुप्रिया ने अजीत पवार की पत्नी यानी अपनी भाभी को हरा दिया।
देश के सबसे बड़े प्रदेशों उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और बंगाल जहां भाजपा अच्छा प्रदर्शन कर सकती थी वहीं मार खा गयी। उत्तर प्रदेश तो आदित्यनाथ योगी के मुख्यमंत्री रहते संभल जायेगा लेकिन बंगाल और महाराष्ट्र में भाजपा आगे चल कर और कमजोर हो सकती है। बंगाल में तो ममता बनर्जी से पार पाना संभव नहीं दिखाई देता। महाराष्ट्र में कांग्रेस को 13 सीटें मिलना उसे फिर जिन्दा कर देगा। इंडी को महाराष्ट्र में 30 सीटें और राजग को 17 सीटें मिलना प्रदेश की शिंदे सरकार को तनाव दे सकता है। भाजपा के नेता महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री देवेन्द्र फणनवीस अपने इस्तीफा देने की मंशा जता चुके हैं।
भाजपा को आत्मचिंतन करना होगा बड़े प्रदेशों में हार का आंकलन करना ज्यादा आवश्यक है। नयी योजनाओं में दलितों को रिझाने, संगठन में भारी फेर बदल करने और आर एस एस की भूमिका पर विचार किये जाने की पूरी संभावना है।

डॉ विजय खैरा
(आलेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं। उनसे संपादक व प्रकाशक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है। किसी भी विवाद की स्थिति में हमारा न्याय क्षेत्र दिल्ली होगा।)
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