भारत को यदि केवल भौगोलिक सत्ता मान लिया जाए तो यह एक बड़ी भूल होगी। यह भूमि संसार की सबसे प्राचीन जीवित सभ्यता का केंद्र है, जो वेदों, उपनिषदों और पुराणों की परंपरा से आज तक निरंतर चल रही है। यहाँ मंदिर केवल उपासना स्थल नहीं होते, बल्कि समाज की धड़कन और संस्कृति के केंद्र होते हैं। मंदिर हमारे सामूहिक जीवन का केंद्र, कला का उत्कर्ष और आध्यात्मिक साधना का प्रतीक हैं। परंतु आक्रांताओं ने जब इस भूमि पर आक्रमण किया तो उन्होंने केवल राजसत्ता को नहीं, बल्कि भारत की आत्मा को ही चोट पहुँचाई। मंदिरों को तोड़कर मस्जिदें खड़ी करना राजनीतिक वर्चस्व का साधन नहीं था; यह हिन्दू मानस को तोड़ने और उसकी सांस्कृतिक जड़ों को काटने की सुनियोजित रणनीति थी।
आज जब भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की खुदाइयाँ, न्यायालयीन आदेश और शिलालेख सामने आते हैं तो एक ही प्रश्न उभरता है— आखिर क्यों हर बड़े विवादित मस्जिद परिसर के नीचे मंदिरनुमा अवशेष मिलते हैं? रामजन्मभूमि का विवाद किसी परिचय का मोहताज नहीं। 1528 में बाबर के सेनापति मीर बाकी ने भव्य राममंदिर को ध्वस्त कर वहाँ मस्जिद खड़ी की। यह घटना करोड़ों हिंदुओं की आस्था पर सबसे बड़ा प्रहार थी। 2003–04 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय के आदेश पर ASI ने वैज्ञानिक उत्खनन किया। 574 पृष्ठों की रिपोर्ट में मंदिरनुमा संरचना के साक्ष्य मिले 131 स्तंभों के आधार, नक़्क़ाशीदार शिलाएँ, धार्मिक प्रतीक और देवप्रतिमाओं के अवशेष।
2010 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इसे स्वीकार किया और 2019 में सर्वोच्च न्यायालय ने भी कहा कि बाबरी ढाँचे के नीचे विशाल गैर-इस्लामी संरचना थी। यह केवल कानूनी विजय नहीं थी; यह पाँच सौ वर्षों से प्रतीक्षित हिंदू समाज की ऐतिहासिक जीत थी। आज रामलला अपने भव्य मंदिर में विराजमान हैं, और यह सिद्ध हो गया कि सत्य दबाया जा सकता है, पर मिटाया नहीं जा सकता।
वाराणसी, जिसे काशी कहते हैं, हिंदू आत्मा का केंद्र है। यहाँ 1669 में औरंगज़ेब ने विश्वनाथ मंदिर को ध्वस्त कर ज्ञानवापी मस्जिद का निर्माण कराया। 2023 में न्यायालय के आदेश पर ASI ने ज्ञानवापी परिसर का वैज्ञानिक सर्वेक्षण किया। रिपोर्ट में स्पष्ट हुआ कि मंदिरनुमा संरचना मौजूद है, 32 संस्कृत-प्राकृत शिलालेख मिले, गर्भगृह की दीवारें और योनिपट्ट तक सुरक्षित हैं। आज मामला न्यायालय में है, किंतु तथ्य यह है कि विश्वनाथ ही काशी की आत्मा हैं। मंदिर के बिना काशी अधूरी है।
मथुरा भगवान श्रीकृष्ण की जन्मभूमि है। 1670 में औरंगज़ेब ने केशवदेव मंदिर तोड़कर वहाँ शाही ईदगाह बनाई। आज भी वहाँ केशवदेव मंदिर और ईदगाह दीवार से सटे खड़े हैं। वर्तमान में कई याचिकाएँ न्यायालयों में लंबित हैं। हिंदू पक्ष का आग्रह है कि ASI सर्वेक्षण कराया जाए। यह केवल भूमि विवाद नहीं है, बल्कि कृष्णभक्ति और हिंदू मानस की प्रतिष्ठा का प्रश्न है।
मध्यप्रदेश के धार में स्थित भोजशाला राजा भोज (1010–1055 ई.) की कृति है। यह संस्कृत विद्यापीठ और सरस्वती मंदिर दोनों था। यहाँ 94 संस्कृत शिलालेख, 106 स्तंभ, देवी-देवताओं की मूर्तियाँ मिलीं। आज भी वसंत पंचमी पर पूजा और शुक्रवार को नमाज़ की स्थिति इस स्थल की ऐतिहासिक विडंबना को दर्शाती है। यह भारत की गंगा-जमुनी नहीं, बल्कि आक्रमणकारी मानसिकता और सहिष्णु हिन्दू चेतना का साक्ष्य है। उत्तर प्रदेश के संभल में विद्यमान मस्जिद के नीचे हरिहर मंदिर के अवशेष मिले। स्थानीय किंवदंतियों और ऐतिहासिक ग्रंथों में यह स्थान महादेव और विष्णु की संयुक्त पूजा का केंद्र बताया गया है। ASI सर्वेक्षण में यहाँ के स्तंभ और आधारशिलाएँ विशुद्ध मंदिर शैली की पाई गईं।
अजमेर की यह संरचना मूलतः संस्कृत विद्यापीठ और मंदिर परिसर था। आक्रमणकारियों ने इसे ध्वस्त कर मस्जिद बना दी। मस्जिद की दीवारों में जैन और वैदिक प्रतिमाओं के शिलालेख आज भी जड़े हुए हैं। देवी-देवताओं की आकृतियाँ स्पष्ट दिखाई देती हैं। यह स्थल इस सत्य का उद्घाटन करता है कि आक्रमणकारी मंदिरों की सामग्री से ही अपनी मस्जिदें बनाते थे।
दिल्ली के क़ुतुब परिसर में कुव्वत-उल-इस्लाम मस्जिद 27 हिंदू और जैन मंदिरों को तोड़कर बनाई गई। ASI रिपोर्टों में कहा गया है कि मस्जिद की दीवारों और स्तंभों पर देवी-देवताओं की मूर्तियाँ लगी हैं यहाँ के शिलालेख संस्कृत भाषा में हैं। कुछ इतिहासकार क़ुतुब मीनार को “विष्णु स्तंभ” मानते हैं, जिसका उपयोग सूर्य-आधारित समय-गणना और पूजा के लिए होता था।
चारमीनार को आज लोग शाही प्रतीक मानते हैं, किंतु स्थानीय परंपराओं और लोकस्मृतियों में यह महालक्ष्मी मंदिर के ध्वंस का परिणाम माना जाता है। चारमीनार के आसपास आज भी हिन्दू प्रतीकों की आकृतियाँ मिलती हैं। आवश्यकता है कि इस पर भी गहन पुरातात्विक जाँच हो।
वामपंथी इतिहासकार सदैव इन तथ्यों को “राजनीतिक एजेंडा” कहकर खारिज करने का प्रयास करते रहे। किंतु प्रश्न यह है कि क्या हजारों शिलालेख, मूर्तियाँ, स्थापत्य शैली और स्थानीय परंपराएँ झूठ बोल सकती हैं? 2019 में सर्वोच्च न्यायालय ने रामजन्मभूमि मामले में ASI रिपोर्ट को “वैज्ञानिक और विश्वसनीय” माना। इसका अर्थ है कि अब इन साक्ष्यों को नकारना असंभव है। 1991 में संसद ने Places of Worship Act पारित किया, जिसके अनुसार 15 अगस्त 1947 को जो धार्मिक स्वरूप था, वही यथावत रहेगा। केवल रामजन्मभूमि को इससे बाहर रखा गया। यही आज काशी, मथुरा और अन्य विवादित स्थलों पर सबसे बड़ी बाधा है।

प्रश्न यह है— क्या यह न्यायसंगत है कि जिन करोड़ों हिंदुओं के मंदिर ध्वस्त किए गए, वे सदा के लिए अपने अधिकार से वंचित रहें? क्या यह धर्मनिरपेक्षता है या बहुसंख्यक समाज के साथ अन्याय? अयोध्या का समाधान केवल अदालत से नहीं आया, बल्कि समाज की एकजुट चेतना और संघर्ष से निकला। लाखों कारसेवकों का बलिदान, साधु-संतों का संकल्प और हिंदू समाज की प्रतीक्षा ही उसकी नींव बनी। इसी प्रकार, काशी और मथुरा का समाधान भी केवल न्यायालयों से नहीं, बल्कि हिंदू समाज की जागरूकता और राष्ट्रधर्म से निकलेगा। जब तक जनमानस में यह प्रश्न जीवित रहेगा, तब तक किसी भी अधिनियम या न्यायिक दीवार से इसे रोका नहीं जा सकेगा।
भारत के मंदिर केवल पत्थर नहीं हैं; वे हमारी आत्मा का प्रतीक हैं। आक्रांताओं ने इन्हें तोड़ा, मस्जिदें खड़ी कीं, परंतु सत्य दबा नहीं। आज उत्खनन, शिलालेख और जनचेतना से वह सत्य पुनः बाहर आ रहा है। हर मस्जिद के नीचे मंदिर मिलने का अर्थ यही है कि भारत की आत्मा कभी नष्ट नहीं हो सकती। यह संघर्ष केवल इतिहास का नहीं, बल्कि हमारी अस्मिता का है। और इस अस्मिता की रक्षा करना ही हिंदू समाज का धर्म है।

विजय शंकर तिवारी
(प्रवक्ता, विश्व हिंदू परिषद)
(आलेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं। उनसे संपादक व प्रकाशक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है। किसी भी विवाद की स्थिति में हमारा न्याय क्षेत्र दिल्ली होगा।)
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