
दीपक कुमार रथ
अक्टूबर, 2001 को नरेंद्र मोदी ने गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली थी। पच्चीस वर्ष बाद भी वह लगातार सरकार के शीर्ष पर बने हुए हैं—पहले गुजरात में और फिर 2014 से केंद्र सरकार का नेतृत्व करते हुए। संसदीय लोकतंत्र में, जहां राजनीतिक परिस्थितियां एक ही चुनावी चक्र के भीतर बदल सकती हैं, इतनी लंबी निरंतरता असाधारण है। हालांकि, मोदी की 25 वर्षों की यात्रा का महत्व केवल राजनीतिक दृढ़ता के रिकॉर्ड तक सीमित नहीं किया जा सकता। इससे भी अधिक महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि इन वर्षों के दौरान क्या-क्या बदला है और मोदी युग के कौन-से तत्व उनके कार्यकाल के समाप्त होने के बाद भी लंबे समय तक भारत की दिशा और दशा को प्रभावित करते रह सकते हैं। मोदी के शासन-दर्शन की सबसे प्रमुख विशेषता सरकार चलाने और देश को बदलने के बीच की दूरी को कम करने का प्रयास रहा है। उनकी राजनीतिक शब्दावली में क्रियान्वयन, योजनाओं का लाभ सीधे लोगों तक पहुंचाने और मापने योग्य परिणामों पर लगातार जोर दिया गया है। सड़कें, रेलवे, बिजली, स्वच्छता, आवास, स्वास्थ्य सेवाएं, रसोई गैस, नल से जल और बैंक खाते जैसी सुविधाओं को केवल सरकारी योजनाओं के रूप में नहीं, बल्कि आम लोगों के दैनिक जीवन में बदलाव लाने वाले माध्यमों के रूप में प्रस्तुत किया गया है। जन धन-आधार-मोबाइल ढांचा इस दृष्टिकोण को स्पष्ट रूप से दर्शाता है। बैंक खातों, डिजिटल पहचान और मोबाइल संपर्क को प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (डीबीटी) के साथ जोड़कर सरकार ने बिचौलियों की भूमिका कम करने और कल्याणकारी योजनाओं का लाभ सीधे नागरिकों तक पहुंचाने का प्रयास किया है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, प्रत्यक्ष लाभ अंतरण कल्याणकारी सहायता पहुंचाने का एक व्यापक माध्यम बन चुका है, जिसके तहत अब तक कुल हस्तांतरण की राशि लाखों करोड़ रुपये तक पहुंच गई है। हालांकि, इससे भी अधिक स्थायी बदलाव नागरिकों और प्रौद्योगिकी के बीच संबंधों में आया हो सकता है। यूपीआई ने डिजिटल भुगतान को केवल शहरी क्षेत्रों और तकनीक से जुड़े लोगों तक सीमित गतिविधि से आगे बढ़ाकर आम जीवन की आर्थिक आदत में बदल दिया है। वित्त वर्ष 2024-25 में भारत के खुदरा डिजिटल भुगतान लेनदेन में यूपीआई की हिस्सेदारी 81 प्रतिशत थी। वर्ष 2026 तक इसका दायरा और भी विस्तृत हो गया। यह केवल वित्तीय सुधार नहीं है, बल्कि इस बात में बदलाव का प्रतीक है कि नागरिक बाजारों, कारोबार और सरकार के साथ किस प्रकार संवाद और लेनदेन करते हैं। आर्थिक दृष्टि से भी मोदी के कार्यकाल में संरचनात्मक सुधारों के साथ बुनियादी ढांचे और घरेलू विनिर्माण पर अधिक जोर देखने को मिला है। वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) का उद्देश्य अप्रत्यक्ष कर प्रणाली को अधिक एकीकृत बनाना था, जबकि दिवाला एवं दिवालियापन संहिता (आईबीसी) ने कंपनियों के वित्तीय संकट से निपटने के लिए एक नया ढांचा प्रस्तुत किया। इसी दौरान सार्वजनिक पूंजीगत व्यय में भी उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। केंद्र सरकार का पूंजीगत परिव्यय वित्त वर्ष 2021-22 में 5.92 लाख करोड़ रुपये था, जो वित्त वर्ष 2025-26 के बजट में बढ़कर 11.21 लाख करोड़ रुपये निर्धारित किया गया। विनिर्माण के क्षेत्र में हुआ बदलाव भी उतना ही महत्वपूर्ण है। इलेक्ट्रॉनिक्स उत्पादन में उल्लेखनीय विस्तार हुआ है, जबकि सेमीकंडक्टर विनिर्माण एक रणनीतिक प्राथमिकता के रूप में उभरा है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, इलेक्ट्रॉनिक्स उत्पादन वर्ष 2014-15 के 1.9 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर वित्त वर्ष 2025-26 में 13.11 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया। सेमीकंडक्टर, रक्षा उत्पादन और तकनीकी आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देने का प्रयास भारत को वैश्विक मूल्य शृंखलाओं में अधिक ऊंचे स्थान पर पहुंचाने की व्यापक रणनीति को दर्शाता है।
इसके अतिरिक्त, राष्ट्रीय सुरक्षा मोदी युग की एक अन्य निर्णायक विशेषता रही है। सर्जिकल स्ट्राइक, बालाकोट कार्रवाई और वर्ष 2019 में अनुच्छेद 370 से संबंधित बदलावों ने सुरक्षा के प्रति अधिक आक्रामक और दृढ़ रुख को प्रदर्शित किया। वर्ष 2025 में ऑपरेशन सिंदूर ने सीमापार आतंकवाद के प्रति सीधे जवाब देने की सरकार की घोषित नीति को और मजबूत किया। रक्षा मंत्रालय ने इस अभियान को केंद्रित और तनाव न बढ़ाने वाला अभियान बताया। इन फैसलों को लेकर राजनीतिक मतभेद चाहे जितने भी रहे हों, लेकिन उन्होंने भारत के राजनीतिक विमर्श में राष्ट्रीय सुरक्षा को निर्विवाद रूप से एक केंद्रीय स्थान दिलाया है। मोदी युग का सांस्कृतिक पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण रहा है। राम मंदिर, काशी विश्वनाथ धाम का पुनर्विकास, योग, भारतीय भाषाएं, मोटे अनाज और सभ्यतागत विरासत को ऐसे राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बनाया गया है, जो यह तर्क देता है कि आधुनिक बनने के लिए अपनी संस्कृति से दूरी बनाना आवश्यक नहीं है। इसके पीछे मूल विचार यह है कि तकनीकी रूप से उन्नत भारत अपनी ऐतिहासिक और सभ्यतागत विरासत के प्रति जागरूक रहते हुए भी आगे बढ़ सकता है। अंततः, यही प्रश्न मोदी की विरासत के संदर्भ में सबसे महत्वपूर्ण साबित हो सकता है। उनके 25 वर्षों का आकलन केवल इस आधार पर नहीं किया जा सकता कि कितनी सड़कें बनीं, कितने बैंक खाते खोले गए, कितने चुनाव जीते गए या कितनी योजनाएं शुरू की गईं। इससे भी गहरी कसौटी यह होगी कि क्या उन्होंने सरकार से भारतीयों की अपेक्षाओं और स्वयं अपने प्रति उनके दृष्टिकोण में कोई बुनियादी बदलाव किया है। ‘चलता है’ की मानसिकता से ‘बदलाव संभव है’ के विश्वास तक का सफर, सरकार चलाने से सुशासन की ओर बढ़ना, लाभार्थी से अधिकार-संपन्न नागरिक बनने की यात्रा और परंपरा तथा आधुनिकता के बीच कथित टकराव को समाप्त कर दोनों के समन्वय का प्रयास—ये सभी मोदी युग की व्यापक महत्वाकांक्षा को अभिव्यक्त करते हैं। इसलिए, गुजरात में पहली बार शपथ लेने के पच्चीस वर्ष बाद मोदी की कहानी अब केवल राजनीतिक दीर्घायु की कहानी नहीं रह गई है। यह इस प्रश्न से जुड़ गई है कि उनके कार्यकाल से संबंधित संस्थाएं, प्रौद्योगिकियां, नीतिगत प्राथमिकताएं और राजनीतिक विचार भारत को वर्ष 2047 तक ‘विकसित भारत’ के लक्ष्य तक पहुंचाने में कितनी प्रभावी भूमिका निभाएंगे। अंततः, यही उनकी विरासत को परखने की अधिक कठिन और निर्णायक कसौटी है।
Leave Your Comment