बिहार चुनाव के नतीजों ने एक बार फिर भारतीय राजनीति के उस बुनियादी सच को सतह पर ला दिया है कि 'नेतृत्व, संगठन और विश्वसनीयता ही अंततः किसी भी गठबंधन की सफलता तय करते हैं'। इन तीनों ही मोर्चों पर राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) ने अपनी मज़बूती साबित कर दी। चुनावी रणभूमि में सावधानीपूर्वक तैयारी, ज़मीनी स्तर पर गहरी पकड़ और एक सुसंगत विमर्श के साथ उतरना, जिसने एनडीए की ऐतिहासिक जीत का मार्ग प्रशस्त किया। इसके ठीक विपरीत, राजद-कांग्रेस-वामपंथी दलों का महागठबंधन एक एकीकृत नेतृत्व, एक प्रभावशाली संदेश, यहाँ तक कि बुनियादी संगठनात्मक सामंजस्य भी प्रस्तुत करने में विफल रहा, जिसके परिणामस्वरूप उनकी ऐसी हार हुई जिसका विश्लेषण वर्षों तक किया जाएगा। एनडीए की विजय कोई अनायास नहीं, बल्कि एक अनुशासित रणनीति का परिणाम थी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के दृढ़ नेतृत्व में गठबंधन ने स्थिरता और अनुभव की छवि प्रस्तुत की। एनडीए नेताओं का आख्यान स्पष्ट और प्रभावशाली था: नीतीश कुमार की शासन की विरासत और मोदी के राष्ट्रीय सुरक्षा तथा केंद्रीय समर्थन के वादे का संयोजन। यह केवल बयानबाजी नहीं थी बल्कि इसके पीछे एक मज़बूत संगठनात्मक तंत्र मौजूद था। जिसने इस आख्यान को वोट बैंक में बदलने के लिए अथक प्रयास किया। भाजपा के सुव्यवस्थित बूथ-स्तरीय प्रबंधन और जदयू के स्थानीय नेटवर्क ने यह सुनिश्चित किया कि उनका संदेश राज्य के हर कोने तक पहुँचे। वे किसी सुविधाजनक गठबंधन के रूप में नहीं, बल्कि एक तैयार और आश्वस्त इकाई के रूप में मैदान में उतरे।
इस पृष्ठभूमि में यह कहना गलत नहीं होगा कि पूरे चुनाव के दौरान महागठबंधन में अव्यवस्था और अफरा-तफरी छाई दिखी। राजद के तेजस्वी यादव ने रोज़गार और सामाजिक न्याय के मुद्दे पर ज़ोरदार प्रचार किया, लेकिन उनके गठबंधन की बुनियादी कमज़ोरियों ने इन प्रयासों को बुरी तरह से कमज़ोर कर दिया। सबसे स्पष्ट और नुकसानदेह कारक राष्ट्रीय स्तर पर नेतृत्व का शून्य होना था। राहुल गांधी का चुनाव प्रचार से बीच-बीच में गायब होकर जंगल सफारी करना, महत्वपूर्ण मुद्दों पर उनकी कथित उदासीनता और असंगति, महागठबंधन की विफलता के सबसे बड़े कारण के रुप में उभरकर सामने आए। नेता प्रतिपक्ष के दिशाहीन अभियान और उनके द्वारा बार-बार की गई राजनीतिक ग़लतियों, जिनमें विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) और वोट चोरी जैसे प्रमुख मुद्दों पर दिए गए अस्पष्ट बयान भी शामिल हैं, ने महागठबंधन की विश्वसनीयता को गंभीर रूप से कम कर दिया। लेकिन महागठबंधन की राजनीति ने मतदाताओं के सामने एक विनाशकारी प्रश्न छोड़ दिया कि वह नेता कौन था, जिस पर उन्हें भरोसा करने के लिए कहा जा रहा था? चुनाव प्रचार में अपनी पूरी ऊर्जा झोंकने के बाद भी तेजस्वी यादव नेतृत्व की कमी के संकट से जूझते रहे और मज़बूत एनडीए को चुनौती देने का पूरा भार अपने कंधों पर उठाने में असमर्थ रहे। इसलिए यह चुनाव तात्कालिक आंकड़ों से परे है। यह राजनीतिक जवाबदेही का एक स्पष्ट और सशक्त संदेश देता है। भारत जैसे परिपक्व लोकतंत्र में, जनता का विश्वास निर्णायक रूप से उन लोगों के साथ जुड़ जाता है जो नेतृत्व करने की क्षमता दिखाते हैं—न कि उन लोगों के साथ जो अपनी ज़िम्मेदारियों से भागते हैं। अपनी चतुर राजनीतिक चेतना के लिए पहचाने जाने वाले बिहार के मतदाताओं ने उस गठबंधन को पुरस्कृत किया जिसने क्षमता और एकता का परिचय दिया, जबकि उस गठबंधन को दंडित किया जो बिखरा हुआ और अस्पष्टता का शिकार दिखाई दिया। महागठबंधन की यह करारी हार भारतीय राजनीति में आने वाले वर्षों तक एक निर्णायक चेतावनी के रूप में गूंजती रहेगी। यह इस बात की पुष्टि करती है कि चुनाव केवल आकर्षक नारों और जल्दबाजी में बनाए गए गठबंधनों से नहीं जीते जाते। वास्तव में चुनावी जीत के पीछे विश्वसनीय नेतृत्व, अथक परिश्रम और जनता का विश्वास जीतने की क्षमता की धधकती हुई अग्नि की तपिश होती है। बिहार का जनादेश इस बात का एक उदाहरण है कि कैसे यह शाश्वत सिद्धांत देश के राजनीतिक भाग्य को आकार देता रहता है।

दीपक कुमार रथ
Leave Your Comment