जितने भी आध्यात्मिक व्यक्ति है उन्हें यह जरूर ज्ञात है की संसार में खुश रहने का एक मात्र लक्ष्य खूद को ईश्वर के पास समर्पित करना और सर्वदा सही रास्ते पर चलना... इस सुंदर सृष्टि में सबसे श्रेष्ठ प्राणी होकर भी हम सब हमेशा दुख और परेशानी में रहते हैं । इन समस्त दुख का एक मात्र कारण है माया। जब शिशु जन्म लेता है वो निष्कपट और निर्माया के भाव का परिचालन करता है । तभी उसके पास शांति और सहजता होती है । अपना पराया लाभ हानि का ख्याल नहीं होता है । केवल जीवन का उपभोग यानी कि जीवन का सुख प्राप्त करता है । प्रत्येक वस्तु, प्रत्येक परिस्थिति को केवल अनुभव करता है । हमेशा आनंद में रहता है। जैसे-जैसे बड़ा होते जाता है उसके अंदर माया का प्रवेश होता है और धीरे-धीरे अपने अस्तित्व से दूर होते जाता है और अपने पवित्र आत्मा को धीरे-धीरे कलुषित कर बैठता है । फिर वो परम आनंद से अलग होने लगता है । हाँ देखा जाए तो वो माया ही है जो हमे एक दिव्य पुरुष से साधारण बनाता है । माया धीरे धीरे हमारे अंदर ऐसे प्रवेश करती है मानो कोई रेशम की डोर जैसे हमारे शरीर पर लिपट रहा हो। लेकिन जब अधिक समय हमारे साथ रहने लगता है या फिर उससे मुक्त होने का समय आता है एक लौह श्रृंखला से अधिक मजबूत अनुभव होता है । सवाल यह उठता की हम माया किसे कह सकते हैं। जो भी कुछ चीजें हमें केवल क्षणिक सुख देते हैं जिसे पाने की इच्छा हमें बार-बार आये। ऐसी ख़ुशी से अंदरूनी सुख नहीं मिल पाता है । केवल मन में अजीब सी छटपटाहट रहती है । जो हमें सुख मिलता है उसे हम ख़ुद को खो बैठते हैं। माया किसी भी चीज से हो सकती है कोई व्यक्ति, कोई वस्तु ,कोई स्थान या कोई भी। देखा जाए तो माया वो चिन है जिसे हम अपने आप को बांध कर रखते है । कोई कैसे वो आनंद ले सकता है जब तक वो ख़ुद को कोई चीज से जकड़ कर रखा हो। जब तक ख़ुद को मुक्त नहीं करेंगे किसी भी चीज, या किसी भी सोच से तब तक आप आनंद से नहीं बैठ सकते हैं या फिर आप शांत नहीं रह पाएंगे।
माया से मुक्त होना अथवा माया से दूर रहने का एक ही रास्ता है ज्ञान । वो ज्ञान जो हमे सही गलत में फर्क समझा सके ... वो ज्ञान जो हमे जीवन के हर परिस्थिति में सही और अडिग निर्णय लेने के समय पूर्ण रूप से सहायक हो । हमेशा हम ज्ञान को प्राप्त करने के लिए बाहर भटकते हैं। किसी पुस्तक की सहायता लेते हैं या किसी अध्यात्मिक गुरु, संन्यासी या फिर महाराज को सुनने लगते हैं। पुस्तक का ज्ञान हमारे जीवन पर कुछ ही क्षण या कुछ पल के लिए असर या प्रभाव डाल सकता है....लेकिन वो हमारे सोच को पूर्ण रूप से बदल नहीं पायेगा । हम कुछ हद तक आनंद पा सकते हैं । घूम फिर कर फिर से उसी माया में आकर लिप्त हो जाते हैं । अगर सच्चे ज्ञान की तलाश हो तो उस वक्त हमें अपनी अंतर्दृष्टि को खोलना और एकांत आवश्यक है ।अपने अंदर उस वक्त माया से दूर होने के लिए झाँकना या आत्मनिरीक्षण करना बेहद जरूरी हो जाता है । उस वक्त अधिक से अधिक हमें अपनी सभी गतिविधियों पर नजर रखना चाहिए... किसी शांत स्थान पर बैठ कर शांति की अनुभूति करते हुए अपनी सोच को बुराइयों से दूर करना और सोच को स्थिर करना चाहिये। जैसे ही पानी जब अस्थिर रहता तो पानी के निचले हिस्से में क्या होता... वो दृश्यमान नहीं होता है यानी की हम उसे अपनी खुली आंखों से नहीं देख पाते हैं ना ही उसकी परिकल्पना कर पाते हैं । लेकिन जब पानी स्थिर रहता है तो सब कुछ स्वच्छ और साफ तौर पर दिखने लगता है । वैसे ही ज्ञान हमारे अंदर ही है लेकिन उसे देखने और समझने के लिए हमे एकाग्र चित्त होकर आत्म निरीक्षण करना बहुत जरुरी होता है औऱ यह आत्मनिरीक्षण कुछ समझने के लिए जरूरी तो होता ही है यह हमारे ज्ञान के सीमा को बढाएगा औऱ जिन माया से हम ग्रसित रहते हैं या फिर बार बार उसके बारे में सोचते रहते हैं यह हमें उससे दूर रखने का कार्य करेगा....औऱ हम उसे अपने हिसाब से संभाल सकेंगे... उस वक्त हम किसके भी अधीन नहीं रहेंगे । ख़ुद को मुक्त महसूस करेंगे । देखा जाए तो हमें ख़ुद को एक बच्चे के जैसा बिना किसी मोह- माया के निष्कपट बना लेना है....

उपाली अपराजिता
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