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गुदड़ी का लाल: अरमान सोरेंग का मिट्टी के घर से भारत की हॉकी टीम तक की यात्रा

A Gem from Humble Beginnings: Arman Soreng's Journey from a Mud House to the Indian Hockey Team

राउरकेला: भारत में खेल प्रतिभाओं की कोई कमी नहीं है। देश के दूर-दराज़ गांवों और आदिवासी अंचलों से निकलकर अनेक खिलाड़ी अपनी मेहनत और लगन के दम पर अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंचे हैं। ओडिशा के सुंदरगढ़ जिले के एक छोटे से गांव के रहने वाले अरमान सोरेंग भी ऐसे ही उभरते सितारे हैं, जिनकी कहानी संघर्ष, समर्पण और सपनों को सच करने की मिसाल है। सोलह वर्षीय अरमान सोरेंग इसी माह जापान में संपन्न छठी अंडर 18 एशिया कप हॉकी चैंपियनशिप में भारतीय दल के सदस्य, ओड़िशा से इकलौते,  के रूप में स्वर्ण पदक जीतकर लौटे हैं। 

मिट्टी के घर में जन्मा एक सपना

राजगांगपुर प्रखंड के  केसरामल पंचायत के लुथुपात्र बरपाली गांव में जन्मे अरमान का बचपन अभावों के बीच बीता। उनके पिता संजीत सोरेंग दिहाड़ी मजदूर हैं और मां सुनीता सोरेंग गृहिणी। तीन भाइयों और एक बहन वाले परिवार में आर्थिक तंगी हमेशा बनी रही। मिट्टी के घर में पले-बढ़े अरमान के लिए जीवन आसान नहीं रहा। लेकिन उनके सपने कभी छोटे नहीं हुए।

भारतीय हॉकी की नर्सरी कहे जाने वाले सुंदरगढ़ जिले में अरमान ने भी बचपन में अपने दोस्तों के साथ बांस से बनी स्टिक लेकर नंगे पांव खेला करते थे। बाद में केसरामल  के ग्रासरूट ट्रेनिंग सेंटर में उन्हें पहली बार असली हॉकी स्टिक से खेलने का अवसर मिला। यहीं से उनके जीवन ने नई दिशा पकड़ ली।

वर्ष 2022 में उनका चयन स्पोर्ट्स हॉस्टल के लिए हुआ, जिसने उनके पेशेवर करियर की मजबूत नींव रखी। प्रशिक्षक प्रफुल्ल तिर्की और राजन एक्का ने उनकी प्रतिभा को पहचाना और लगातार निखारा।

मिडफील्डर से भरोसेमंद डिफेंडर तक

अरमान शुरू से मिडफील्डर के रूप में खेलते थे। लेकिन इस वर्ष भोपाल के राष्ट्रीय प्रशिक्षण शिविर में पहली बार चयन के बाद कोच सरदार सिंह ने टीम में मजबूत डिफेंडरों की कमी को देखते हुए उसे डिफेंडर की भूमिका निभाने की सलाह दी। 
अरमान ने बिना किसी झिझक के नई जिम्मेदारी स्वीकार की और जल्दी ही खुद को उस भूमिका में ढाल लिया। आज वे मिडफील्ड और डिफेंस, दोनों पोजीशन पर समान दक्षता से खेल सकते हैं।
हॉकी छात्रावास में चयन के बाद से वे निरंतर राष्ट्रीय स्कूल गेम्स, सबजूनियर राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में ओडिशा का प्रतिनिधित्व करते आ रहे हैं।  रांची में पूर्वी क्षेत्र अंडर-16 प्रतियोगिता में चैंपियन बनने से लेकर गुवाहाटी, ग्वालियर, रोहतक और राजगीर में उन्होंने अपनी टीम को कई पदक दिलाए और दल की कप्तानी भी की। 

एशिया कप में धमक

2026 में भोपाल में पहली बार राष्ट्रीय शिविर में चयन के बाद अरमान को अंडर-18 एशिया कप के लिए भारतीय टीम में जगह मिली। जापान में आयोजित इस प्रतिष्ठित प्रतियोगिता में भारत ने स्वर्ण पदक जीता और अरमान ने पूरे टूर्नामेंट में शानदार प्रदर्शन किया। दिलचस्प बात यह रही कि कोचिंग स्टाफ ने उन पर इतना भरोसा जताया कि उन्होंने हर मैच में पूरे 60 मिनट मैदान पर बिताए। उन्हें किसी भी मुकाबले में रोटेशन के तहत आराम नहीं दिया गया।
एशिया कप में अपने अनुभवों को साझा करते हुए अरमान बताते हैं कि टूर्नामेंट का सबसे कठिन मुकाबला पाकिस्तान के खिलाफ था। एक समय भारतीय टीम 2-3 से पिछड़ रही थी, लेकिन शानदार जुझारूपन दिखाते हुए वापसी की और 5-3 से जीत हासिल की। फाइनल से पहले जापान के खिलाफ लीग मैच में मिली हार ने टीम को अपनी कमजोरियों को समझने का मौका दिया। कोचों ने वीडियो विश्लेषण के जरिए गलतियों को सुधारा और उसी का परिणाम स्वर्ण पदक के रूप में सामने आया।

अंतरराष्ट्रीय सफलता के बावजूद अरमान के परिवार के सामने आर्थिक चुनौतियां बनी हुई हैं। फिर भी परिवार का विश्वास है कि बेटे की मेहनत एक दिन उनके जीवन में नई रोशनी लेकर आएगी।
भारतीय टीम के स्टार खिलाड़ी हार्दिक सिंह को अपना आदर्श मानने वाले अरमान का सपना है कि वे सीनियर भारतीय टीम में जगह बनाकर बड़ी प्रतियोगिताओ में देश का प्रतिनिधित्व करें।
एक छोटे से गांव से जापान की यात्रा बताती है कि प्रतिभा किसी बड़े शहर या संपन्न परिवार की मोहताज नहीं होती। मिट्टी के घर, आर्थिक अभाव और सीमित संसाधनों के बावजूद यदि लक्ष्य स्पष्ट हो और मेहनत ईमानदार हो, तो सफलता का रास्ता स्वयं बन जाता है। उनका सफर इस बात का प्रमाण है कि गुदड़ी के लाल जब चमकते हैं, तो उनकी रोशनी पूरे समाज को प्रेरित करती है।

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