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नक्सलवाद की विचारधारा पर निर्णायक प्रहार

A decisive blow to the ideology of Naxalism

दुष्टों के विनाश और सज्जनों की रक्षा की संकल्प शक्ति की पुनीत पंरपरा नक्सली आतंक के संपूर्ण विनाश के साथ भारत में पुनः प्रकट और मूर्तिमंत हुई है। हथियार थाम दिन-रात चौकसी की चौकियों पर मोर्चा संभाले हमारे सुरक्षा बलों के धुरंधर जवानों का सत्संकल्प पूर्ण हुआ है। हथियारों की शुभ शक्ति विजयादशमी पर जन-मन की श्रद्धा का बल लेकर 2026 की अक्षय तृतीया के पूर्व सूचित की गई तिथि 31 मार्च 2026 के पूर्व ही पूर्ण फलीभूत हो गई है। नक्सली हिंसा को सदा के लिए खत्म करने का विचार जब से कार्य रूप में परिणित हुआ है, भारतीय जन-मन में अद्भुत शांति और आनंद का संचार हुआ।

भारत के वर्तमान राजनीतिक नेतृत्व के सुनियोजित प्रयत्नों से हमारे सुरक्षा बलों ने रेड कॉरिडोर को सशस्त्र नक्सलियों से मुक्त कर लिया है तो यह समय उत्सव मनाने और जन-जन को विकास और ज्ञान के मार्ग पर निर्भय रीति से प्रेरित करने का ही तो है। प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी और उन्हीं के मार्गदर्शन में देश को नक्सली आतंक से मुक्त कराने की रणनीति के सफल क्रियान्वयनकर्ता केंद्रीय गृहमंत्री श्री अमित शाह निश्चित रूप से बधाई के पात्र हैं।

केंद्र सरकार और सुरक्षा एजेंसियों के समन्वय में बीते पांच वर्षों में अद्भुत गति देखी गई। 2019 में देश के गृहमंत्री के रूप में शपथ लेने के बाद अमित शाह ने नक्सली हिंसा के खात्मे को भी अपने एजेंडे में सर्वोपरि स्थान दिया। केंद्र और राज्य की अनेक सुरक्षा एजेंसियों के बीच मजबूत तालमेल ने इस सफलता में अहम भूमिका निभाई। सुरक्षा, विकास और पुनर्वास को साथ लेकर चलने की नीति ने जमीनी स्तर पर ठोस परिणाम दिए। यही कारण है कि 2019-20 के बाद से नक्सली हिंसा में लगातार और ऐतिहासिक गिरावट दर्ज की गई है।

सबसे बड़ा बदलाव नक्सलियों के व्यवहार में देखने को मिला है। बड़ी संख्या में उग्रवादी अब हथियार छोड़कर सामान्य जीवन की ओर लौट आए। उन्होंने देश की लोकतांत्रिक प्रक्रिया में भरोसा व्यक्त किया। पंचायतों के जरिए वह ग्रामीण विकास और रोजगार की अनेक नई योजनाओं से जुड़कर अपनी शक्ति का सार्थक उपयोग करने लगे। छत्तीसगढ़ में बस्तर के घने जंगलों में बदलाव की बड़ी मुहिम सफल हुई। । गृह मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2024 में 881 नक्सलियों ने और 2025 में 1225 नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया। बड़ी संख्या में आत्मसमर्पण इसलिए हो सका क्योंकि सुरक्षा बलों ने एनकाउंटर अभियान तेज किए। केंद्र की रणनीति के अंतर्गत सबसे प्रभावित इलाकों में किलेबंदी मजबूत की गई। नतीजा ये निकला कि 2024 से 2025 के 20 महीनों में 560 नक्सलियों को सुरक्षा बलों ने मुठभेड़ में मार गिराया। 1770 नक्सली गिरफ्तार किए गए।

आत्मसमर्पण करने वाले नक्सलियों के प्रति सरकार की दया-नीति ने जमीनी कैडरों को सोचने पर विवश किया। सबसे बड़ी मानसिक क्रांति भी पैदा की गई कि आखिर अपने ही देश के लोगों के विरुद्ध हथियार हम क्यों उठाएं? विदेशी नेटवर्क के भाड़े के टट्टू कॉमरेड अपने नक्सली साथियों के सवालों का जवाब भी नहीं दे पाए। महिलाओं और बच्चों के दुरुपयोग के सवाल पर भी हथियारबंद पोलित ब्यूरो की घिग्घी बंध गई। सरकार की रणनीति ने एक साथ अनेक मोर्चों पर निरंतर संवाद और ऑपरेशन किए।

सरकार की पुनर्वास योजनाओं से नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में नई उम्मीद जग गई। आत्मसमर्पण करने वाले पूर्व उग्रवादी अब “बस्तर कैफे” जैसे उद्यम चला रहे हैं, जबकि कई “बस्तर फाइटर्स” के रूप में सुरक्षा बलों में शामिल होकर समाज की सेवा कर रहे हैं। सुरक्षा बलों ने नक्सली संगठन के शीर्ष नेतृत्व को भी बड़ा नुकसान पहुंचाया। पिछले चार वर्षों में केंद्रीय समिति के 18 से अधिक सदस्य मारे गए या गिरफ्तार हुए हैं, जिससे संगठन की कमर टूट गई। 

सरकार ने सुरक्षा बलों को पुष्ट सूचना नेटवर्क के साथ एक्शन के लिए पूर्ण स्वतंत्रता दी, जिससे त्वरित कार्रवाई संभव हो सकी। पहले किसी एनकाउंटर के लिए दिल्ली तक अनुमति लेनी पड़ती थी, यह काम अब सुरक्षा बलों के स्थानिक नेतृत्व के जिम्मे किया गया कि वह जहां जरूरी समझें, पुष्ट सूचना और पूरे बंदोबस्त के साथ धावा बोलें।

सुरक्षा एजेंसियों के साथ बहुकोणीय-समन्वय, ड्रोन से निगरानी और मजबूत खुफिया तंत्र के कारण नक्सली गतिविधियों पर प्रभावी नियंत्रण स्थापित करने में बड़ी मदद मिली। आतंक निरोधी केंद्रीय एजेंसी एनआईए और प्रवर्तन निदेशालय ने भी इस दिशा में गंभीर प्रयास किए। ईडी ने फंडिंग के स्रोतों को ध्वस्त किया, तो एनआईए ने नक्सलियों की लॉजिस्टिकल यानी हथियार समेत अन्य आवश्यक सामग्री हासिल करने के स्रोतों की बुनियाद हिलाकर रख दी। बाहर से मिलने वाले समर्थन के लिहाज से सब कुछ नेस्तनाबूद कर दिया गया।

मोदी सरकार के पहले यह कर पाना इसलिए संभव नहीं हो पा रहा था क्योंकि सिस्टम में ही नक्सली प्रेमी तत्व बैठे हुए थे, जिनके कारण त्वरित एक्शन दूरगामी लेटलतीफी का शिकार होता था।

सुरक्षा बलों के प्रयासों के साथ, सरकार की “क्लियर,  होल्ड एंड डेवलप” रणनीति के तहत विकास कार्यों को तेज किया गया। नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में नक्सिलयों को मिटाकर जिस इलाके में शासन की पहुंच स्थापित हुई, वहां तेजी से विकास कार्य किए गए। 8,300 किलोमीटर से अधिक नई सड़कें बनाई गईं, जबकि 2014 से अब तक कुल 14,618 किलोमीटर सड़क निर्माण हुआ है।

छत्तीसगढ़, जो कभी नक्सलवाद का गढ़ माना जाता था, वहां भी उल्लेखनीय परिवर्तन देखने को मिला है। बस्तर क्षेत्र में समूह के समूह आत्मसमर्पण करने आग आए। दंडकारण्य आदिवासी किसान मजदूर संघ से जुड़े 200 से अधिक कैडरों का एक साथ आत्मसमर्पण अरण्य क्षेत्र के साधारण परिवारों में आए बदलाव का सबसे बड़ा उदाहरण है।

केंद्र सरकार की विकास एजेंसियों ने सुरक्षा बलों के साथ कंधे से कंधा मिलाया। जहां जहां नक्सलियों ने विनाश की इबारत लिखी, वहां इन्फ्रा-वीरों ने फिर से नए स्कूल, अस्पताल, दूरसंचार स्टेशन खड़े किए। 7,768 नए संचार टॉवर के जरिए संपूर्ण नक्सल प्रभावित क्षेत्र को संचार और इंटरनेट से जोड़ दिया गया। सुदूर जंगलों में गांव-गांव तक 4जी कनेक्टिविटी मुहैया कराई गई। बैंकिंग सेवाओं का विस्तार हुआ। 1007 नई बैंक शाखाएं, एक हजार के करीब एटीएम भी खोले गए।

इसी के साथ सुदूर गांवों में आवासीय स्कूलों का नेटवर्क खोला गया। 95 एकलव्य मॉडल आवासीय विद्यालय, 50 के करीब आईटीआई, 50 के करीब कौशल विकास केंद्रों ने नक्सल प्रभावित युवाओँ के हाथ में सृजन की नई शक्ति सौंप दी। बुद्धि का झुकाव हिंसा के समर्थन की जगह सृजन के संस्कारों की तरफ हुआ। ग्रामीण इलाकों में 186 नए प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र खुल जाने से रोजमर्रा के दर्द से, दुःख और कष्ट से भी अरण्य को मुक्ति मिली।

वस्तुतः जंगलों से नक्सलियों का खात्मा तो करीब करीब कर ही दिया गया है, किंतु अभी असल चुनौती बाकी है। अनेक अदृश्य मोर्चे हैं जहां नक्सलवाद नई करवट ले सकता है। उसकी विचारधारा अभी मरी नहीं है। उसे किसी न किसी बहाने खाद-पानी देने वाले कथित वैचारिक समूह अभी जिंदा हैं। ये एनजीओ नेटवर्क के जरिए दुनिया भर के अपने आकाओं से इस नई परिस्थिति में मार्गदर्शन अभी भी ले रहे हैं।

यह लोग भारतीय संविधान और लोकतंत्र के स्थान पर अपनी विदेशी शक्ति से संचालित डिक्टेटरशिप वाली व्यवस्था को भारत में लाना चाहते हैं। और इस कार्य में अभी भी अर्बन नक्सलिज्म पूरी मुस्तैदी से जुटा हुआ है। उसके हाथ में हथियार तो नहीं है लेकिन हथियार से भी अधिक घातक जहर उगलने वाले पोर्टल, कलम, पत्र आदि से वह देश के युवाओं को कभी भी बरगला कर नई करवट तो ले ही सकता है।

देश के अनेक विश्वविद्यालयों में इस समूह की सीधी पहुंच है जहां जहर बांट रहे संगठन अपने साहित्य के साथ छात्रों को भड़काते रहते हैं, यूनिवर्सिटी की दीवारों पर नफरत के नारे चस्पा करने में इन समूहों को महारत हासिल है। नक्सली हिंसा को “क्रांति” और “सामाजिक न्याय” का नाम देकर यही समूह परिसरों में खून-खराबे और हिंसा को महिमामंडित करने से कभी बाज नहीं आते।

लेकिन क्या खून-खराबे से न्याय संभव है? क्या कभी कोई न्याय हिंसा से मिलता है? गरीबों को उनके ही लोकतांत्रिक तंत्र के खिलाफ हथियार उठाने के लिए प्रेरित कर कौन सा आदर्श समाज बनाया जा सकता है? केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री श्री अमित शाह ने संसद में इस तथ्य को रेखांकित भी किया है कि कुछ लोग सशस्त्र नक्सलियों के प्रति सहानुभूति दिखाने की बात करते हैं, लेकिन किसानों, शहीद जवानों और उनके परिवारों के लिए उनकी संवेदना कहां है? यह “मानवता” केवल उन लोगों के लिए क्यों है, जो संविधान के खिलाफ हथियार उठाते हैं?

इन समूहों के सक्रिय गुर्गों को कानूनी सहायता, सहानुभूतिपूर्ण मीडिया नैरेटिव और कभी-कभी गुप्त फंडिंग के जरिए इस विचारधारा को बढ़ावा देने वाले अभी देश की राजधानी सहित अनेक राज्यों में मजबूती से उपस्थित हैं। विपक्ष के अनेक दलों की सरकारें इन्हें रणनीतिक सहायता भी मुहैया कराने से पीछे नहीं हैं। जबकि हकीकत है कि इनमें से अनेक न केवल नक्सली विचारों से सहानुभूति रखते हैं बल्कि देश को तोड़ने के लिए राष्ट्रविरोधी गतिविधियों में यह कई जगह प्रत्यक्ष रूप से तो बहुत मामलों में परोक्ष रूप से शामिल हैं। इसलिए ऐसे तत्वों से निपटने के लिए अभी भी भारतीय शासन को बहुत सावधानी बरतनी है, बहुत गंभीर स्तर पर काम करना है।

नक्सलवाद के खिलाफ अब लड़ाई केवल बंदूकों से नहीं, बल्कि विचारों से ज्यादा गहराई से लड़ी जानी है। सरकार की रणनीति अब शिक्षा, जागरूकता और वैचारिक जवाब पर केंद्रित है। विश्वविद्यालयों में नक्सलवाद की असफलताओं पर चर्चा, डिजिटल माध्यमों से सही जानकारी का प्रसार और भ्रामक नैरेटिव का तथ्यात्मक खंडन—ये सभी कदम इस दिशा में महत्वपूर्ण कार्य हैं। साथ ही, गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) के तहत कार्रवाई और सभी संदिग्ध एनजीओ, लोगों की पहचान और उनकी निगरानी भी आवश्यक है।

आज भारत एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है। सशस्त्र नक्सलवाद पर बड़ी हद तक काबू पा लिया गया है, लेकिन उसकी विचारधारा को जड़ से समाप्त करना अभी बाकी है। जागरूकता, कड़े कानून और वैचारिक संघर्ष के जरिए ही भारत एक सुरक्षित और हिंसा-मुक्त भविष्य की ओर बढ़ सकता है।

 


डॉ. राकेश उपाध्याय
(लेखक सुप्रसिद्ध विचारक, लेखक, पत्रकार और प्रोफेसर हैं)

(आलेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं। उनसे संपादक व प्रकाशक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है। किसी भी विवाद की स्थिति में हमारा न्याय क्षेत्र दिल्ली होगा।)

 

 

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