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अमेरिकी टैरिफ को दो टूक जवाब 

A blunt response to US tariffs


दीपक कुमार रथ


अमेरिका के विदेश मंत्री मार्को रुबियो की भारत यात्रा ऐसे समय में हुई, जब बदलती वैश्विक व्यवस्था वाशिंगटन की उस आर्थिक दबाव की नीति की सीमाओं को उजागर कर रही है, जिसके माध्यम से वह उभरती हुई शक्तियों की नीतियों को प्रभावित करना चाहता है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की आक्रामक टैरिफ रणनीति इस धारणा पर आधारित प्रतीत होती है कि अमेरिका का आर्थिक प्रभुत्व दूसरे देशों को अपने निर्णय अमेरिकी प्राथमिकताओं के अनुरूप ढालने के लिए प्रेरित कर सकता है। हालांकि, भारत की प्रतिक्रिया समकालीन भू-राजनीति की एक बुनियादी सच्चाई को रेखांकित करती है कि आर्थिक दबाव को अनिवार्य रूप से राजनीतिक सहमति में नहीं बदला जा सकता, विशेषकर तब, जब उसका सामना ऐसे देश से हो, जो अपनी रणनीतिक स्वायत्तता और राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध हो। भारत का संदेश स्पष्ट है—वह सहयोग का स्वागत करता है, लेकिन इस धारणा को स्वीकार नहीं करता कि साझेदारी के लिए राजनीतिक अधीनता आवश्यक है। रुबियो की यात्रा के महत्व और भारत-अमेरिका संबंधों के व्यापक विकासक्रम को समझने के लिए इस अंतर को पहचानना जरूरी है। भारत की ऊर्जा संबंधी आवश्यकताएं उसकी रणनीतिक स्वायत्तता के व्यावहारिक आधार को स्पष्ट करती हैं। कच्चे तेल की अपनी 85 प्रतिशत से अधिक जरूरतों को आयात के माध्यम से पूरा करने वाला भारत अंतरराष्ट्रीय कीमतों में उतार-चढ़ाव, आपूर्ति में व्यवधान और भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के प्रति संवेदनशील बना हुआ है। तेल की कीमतें परिवहन लागत, औद्योगिक उत्पादन, महंगाई और घरेलू खर्च को प्रभावित करती हैं। इसलिए ऊर्जा की खरीद राष्ट्रीय आर्थिक सुरक्षा का महत्वपूर्ण विषय है। भारत किसी दूसरे देश की राजनीतिक प्राथमिकताओं को अपने ऊर्जा आपूर्ति स्रोतों का निर्धारक नहीं बनने दे सकता। अमेरिकी दबाव के बावजूद रूस के साथ भारत का निरंतर जुड़ाव कीमतों की प्रतिस्पर्धात्मकता, आपूर्ति की विश्वसनीयता और घरेलू जरूरतों के व्यावहारिक आकलन को दर्शाता है। भारत की तेल शोधन क्षमता भी उसकी स्थिति को मजबूत बनाती है। गुजरात स्थित जामनगर रिफाइनिंग कॉम्प्लेक्स, जिसकी क्षमता लगभग 14 लाख बैरल प्रतिदिन है, इस बात का प्रमाण है कि भारत कच्चे तेल को मूल्यवान पेट्रोलियम उत्पादों में बदलने और अपनी औद्योगिक क्षमताओं को अंतरराष्ट्रीय बाजारों से जोड़ने में सक्षम है। इस प्रकार का बुनियादी ढांचा भारत को केवल एक बड़े ऊर्जा उपभोक्ता तक सीमित नहीं रखता, बल्कि वैश्विक ऊर्जा बाजार में उसके आर्थिक महत्व को भी बढ़ाता है। भारत-रूस आर्थिक संबंध भी इसी तर्क को पुष्ट करते हैं। वित्त वर्ष 2024-25 में दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार लगभग 68.7 अरब डॉलर तक पहुंच गया, जबकि दोनों देशों ने वर्ष 2030 तक इसे 100 अरब डॉलर करने का लक्ष्य निर्धारित किया है। हालांकि, इस संबंध के सामने कुछ चुनौतियां भी हैं। इनमें व्यापार में असंतुलन और भारतीय निर्यात बढ़ाने की आवश्यकता प्रमुख हैं। इन समस्याओं के समाधान के लिए स्थापित साझेदारियों से अचानक दूरी बनाने के बजाय निरंतर आर्थिक वार्ता और व्यावहारिक नीतिगत प्रयासों की जरूरत है। भारत को अपने व्यापारिक संबंधों में विविधता लानी होगी, निर्यात की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता बढ़ानी होगी और ऊर्जा आपूर्ति के लिए अनुकूल शर्तें सुनिश्चित करनी होंगी। रूस के साथ भारत का जुड़ाव अमेरिका के महत्व को कम नहीं करता। इसके बजाय, यह किसी एक साझेदार पर अत्यधिक निर्भरता से बचने की भारत की रणनीति को दर्शाता है। एक परिपक्व विदेश नीति का तकाजा है कि विभिन्न देशों के साथ संबंध बनाए रखे जाएं और प्रत्येक का मूल्यांकन राष्ट्रीय हितों के दृष्टिकोण से किया जाए।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का दृष्टिकोण कूटनीति में धैर्य और दूरदर्शिता के महत्व को रेखांकित करता है। हर उकसावे का सार्वजनिक टकराव से जवाब देने से राजनीतिक चर्चा तो पैदा हो सकती है, लेकिन इससे अनुकूल परिणाम मिलना जरूरी नहीं है। बाहरी दबाव के बावजूद अपनी नीतिगत प्राथमिकताओं पर कायम रहकर भारत ने प्रदर्शित किया है कि कूटनीतिक दृढ़ता के लिए बयानबाजी को आक्रामक बनाना आवश्यक नहीं है। हालांकि, इस दृष्टिकोण को वाशिंगटन के प्रति उदासीनता नहीं समझा जाना चाहिए। रक्षा, उन्नत प्रौद्योगिकी, व्यापार और हिंद-प्रशांत क्षेत्र की सुरक्षा सहित अनेक क्षेत्रों में भारत-अमेरिका सहयोग महत्वपूर्ण बना हुआ है। दोनों देशों के पास अपने संबंधों को और गहरा करने के पर्याप्त कारण हैं, लेकिन दीर्घकालिक सहयोग के लिए परस्पर सम्मान और वैध मतभेदों की स्वीकार्यता आवश्यक है। टैरिफ व्यापारिक निर्णयों को प्रभावित कर सकते हैं, लेकिन वे किसी संप्रभु देश की विदेश नीति को अपने अनुसार चलने के लिए बाध्य नहीं कर सकते। इसलिए रुबियो की भारत यात्रा दोनों देशों के संबंधों को दबाव आधारित आर्थिक गणनाओं से आगे ले जाकर अधिक संतुलित साझेदारी की दिशा में बढ़ाने का अवसर प्रदान करती है। अमेरिका को यह समझना होगा कि भारत का बढ़ता आर्थिक प्रभाव और उसकी रणनीतिक महत्ता एकतरफा मांगों पर आधारित संबंधों को लगातार अव्यावहारिक बना रही है। इसी तरह, भारत को अपनी ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक हितों की रक्षा करते हुए निरंतर वार्ता के माध्यम से व्यापारिक विवादों का समाधान तलाशना चाहिए। रणनीतिक स्वायत्तता का अर्थ अलग-थलग रहना या किसी देश के प्रति शत्रुता रखना नहीं है। इसका वास्तविक अर्थ है विभिन्न शक्तियों के साथ सहयोग करते हुए अपने स्वतंत्र निर्णय लेने के अधिकार को सुरक्षित रखना। अंततः भारत-अमेरिका संबंधों की मजबूती इस बात पर निर्भर नहीं करेगी कि वाशिंगटन भारत को अपनी शर्तें मानने के लिए कितना बाध्य कर सकता है, बल्कि इस पर निर्भर करेगी कि दोनों देश संवाद के माध्यम से अपने मतभेदों को सुलझाने में कितने सक्षम हैं। भारत का रुख स्पष्ट है—वह अधीनता के बिना मित्रता, दबाव के बिना सहयोग और राष्ट्रीय संप्रभुता से समझौता किए बिना समृद्धि चाहता है।

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