सेक्स मनुष्य की बुनियादी जरूरत है। भूख के बाद सेक्स, मनुष्य की सबसे प्रमुख वृत्ति है। सेक्स की इस अपमानजनक और बदसूरत अभिव्यक्ति को रोकने के लिए, हमें सामाजिक परिप्रेक्ष्य में इस समस्या से निपटना होगा, क्योंकि किसी भी तरह की सजा ऐसे जघन्य और अमानवीय कृत्य को पूरी तरह रोकने में सक्षम नहीं होगा।
दिल्ली में पारामेडिकल छात्रा के साथ चलती बस में हुए घृणित अपराध को एक वर्ष हो चुका है। तब दुष्कर्मियों के खिलाफ पूरे देश भर में जबरदस्त उबाल था। उनके खिलाफ देश के कोने-कोने में प्रदर्शन हो रहे थे। इस घृणित अपराध के खिलाफ समाज के हर तबके में जबरदस्त गुस्सा था। युवा से लेकर बुजुर्ग तक, महिला से लेकर पुरूष तक, हर कोई सड़कों पर उतर आया था। जनता की मांग के अनुसार, ऐसे बर्बर अपराध पर अंकुश लगाने के लिए संसद ने भी कड़े कानून बनाए। पीडि़ता की मौत की पहली बरसी पर लोगों ने बैठकों का आयोजन किया, प्रदर्शन किए और मोमबत्ती जुलूस निकालकर पीडि़ता को श्रद्धांजलि दी। बावजूद इसके, इस तरह की प्रवृत्ति में कोई बदलाव देखने को नहीं मिल रहा है। बलात्कार और सामूहिक बलात्कार की घटनाओं में लगातार वृद्धि हो रही है और देश के किसी न किसी कोने से बलात्कार की खबर प्रतिदिन अखबारों में पढऩे को मिल जाती है। यहां तक कि नाबालिग और बच्चे भी इसके शिकार होने से नहीं बच पा रहे हैं। इससे जाहिर होता है कि सभ्य और समझदार लोगों का संदेश अब भी सेक्स-शिकारियों तक नहीं पहुंचा है।
जनता का गुस्सा जायज है, इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता। महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने और उनके खिलाफ अपराधों की रोकथाम के लिए सख्त कानून की मांग भी स्वाभाविक है। लेकिन बलात्कार, व्याभिचार, कौटुंबिक व्याभिचार, अनाचार, छेड़छाड़ और महिलाओं की खरीद-फरोख्त जैसे अपराधों के कारणों की गहराई में जाने की हमें जरूरत है। इस तरह के क्रियाकलापों को समझने के लिए हमें मनोवैज्ञानिक, शारीरिक और सामाजिक मानकों के साथ-साथ अन्य विस्तृत मापदंडों को भी शामिल करना होगा।
सेक्स मनुष्य की बुनियादी जरूरत है। भूख के बाद सेक्स, मनुष्य की सबसे प्रमुख वृत्ति है। सेक्स की इस अपमानजनक और बदसूरत अभिव्यक्ति को रोकने के लिए, हमें सामाजिक परिप्रेक्ष्य में इस समस्या से निपटना होगा, क्योंकि किसी भी तरह की सजा ऐसे जघन्य और अमानवीय कृत्य को पूरी तरह रोकने में सक्षम नहीं होगा। इसमें कोई शंका नहीं है कि कानून सख्त होना चाहिए।
पुलिस को और अधिक सर्तक रहने की जरूरत है। न्याय प्रक्रिया को और तेज बनाने की आवश्यकता है।
लेकिन सवाल उठता है कि कोई भी व्यक्ति इस तरह के असभ्य और बर्बर कृत्य में क्यों शामिल होता है? जवाब साधारण है - वह अपनी सेक्स जरूरतों को सभ्य और कानूनी तरीके से पूरी करने में असमर्थ हैं।
हमारे समाज का दोहरा नैतिक मानक, पुरूषों के बेलगाम भोग को उदार बनाता है, जबकि महिलाओं की किसी भी नैतिक चूक को अक्षम्य और अपमानजनक मानता है। पुरूषों को माफ करने का रवैया, उसके सामाजिक रसूख और गरिमा को खोए बिना उसे विवाह पूर्व और विवाहेत्तर सेक्स जरूरतों को पूरा करने में सहयोगी होता है। लेकिन, भारत जैसे पारंपरिक नैतिक समाज में किसी पुरूष की सेक्स जरूरतों की पूर्ति सिर्फ जिस्म बेचने वाली किसी सार्वजनिक महिला से ही हो सकती है। इसलिए कहा जाता है कि एक वेश्या, सम्मानजनक महिलाओं के सदाचार की रखवाली करती है। उन्हें पुरूषों के अतिरिक्तजूनून से राहत देने वाला सेफ्टी वॉल्व भी कहा जाता है। इस प्रकार वेश्यावृत्ति को एक आवश्यक बुराई कहा जा सकता है।
हमारे समाज में वेश्यावृत्ति तब से है, जब से सभ्यता की शुरूआत हुई। लेकिन विडंबना यह है कि जिस सभ्यता ने विवाह जैसी पवित्र संस्था की रचना की, उसी ने वेश्यावृत्ति के सहवर्ती अभ्यास को भी जन्म दिया।
ऐतिहासिक दृष्टि से देखा जाए तो समय और जगह की सार्वभौमिकता के अनुसार वेश्यावृत्ति सभ्यता का अभिन्न हिस्सा रहा है। कहा जाता है कि यह दुनिया का सबसे पुराना पेशा है, जो सभ्य मनुष्यों के साथ मौजूद पाया गया है। आदिम जीवन की परिस्थितियों ने वेश्यावृत्ति को अनावश्यक बना दिया था। आदिम समाज में ऐसे कई अवसर थे, जब यौन नैतिकता की तिलांजलि दे दी गई। हालांकि विवाह-संस्था वैश्विक रूप से मान्य है, फिर भी मेले और कई त्यौहारों के अवसरों पर आदिम समाज को नैतिकता का सारा बंधन तोडऩे की स्वतंत्रता होती थी।
जब हम सभ्य समाज के रूप में आगे आए, हमने पाया कि वेश्यावृत्ति कई रूपों में फल-फूल रही है। धर्म, समाज के रीति-रिवाजों और नैतिक अनुमोदनों के संरक्षण में पेशेगत संकीर्णता का पालन किया जाने लगा। खुलेआम या गुप्त रूप से इसे हमेशा ही कुछ न कुछ लोगों का समर्थन मिलता रहा। भारत में वेश्यावृत्ति मंदिरों में अनुष्ठान की परंपरा के रूप में शुरू हुई। धार्मिक विश्वास के तहत, सिर्फ युवा लड़कियों को ही मंदिरों में देवताओं की सेवा के रूप में समर्पित किया जाता था। स्वभाविक है कि उसका परिणाम धार्मिक पूजा और देवताओं की सेवा के रूप में आता था। इस तरह देवदासी के रूप में वेश्याओं के लिए एक सम्मानजनक परंपरा की शुरूआत हुई। भारत में वेश्याओं को गणिका या नगर वधू के रूप में सम्मान दिया जाता था और राजसभा में वे सीट की हकदार होती थीं। उच्च पदस्थ व्यक्ति अपने बच्चों को शिष्टाचार और सामाजिक व्यवहार सिखने के लिए इन महिलाओं के पास भेजते थे। इस तरह गणिकाओं का निवास-स्थल खुशियों और हंसी-ठहाकों से गुंजायमान रहता था। इन गणिकाओं ने गीत, संगीत, कविता और नृत्य को पोषित किया। वे संस्कृति की सत्ता केन्द्र होती थीं। बीतते समय के अनुसार, समाज में उनकी स्थिति गिरती गई और समाज में उन्हें गंदगी के रूप में देखा जाने लगा। गुपचुप तरीके से आने वाले ग्राहकों के लिए, उनके मन में हमेशा कानून का डर बना रहता है।
यदि सेक्स वर्करों को कानूनी अधिकार देने के लिए एक व्यापक कानून होता तो वे पुलिस के पंजों और असमाजिक तत्वों से खुद को मुक्त महसूस करतीं। उनका स्वास्थ्य भी बेहतर रहता और उनके बच्चों की देखभाल भी बेहतर होती। वेश्यावृत्ति को वैधता बनाने वाला कानून उनके पुनर्वास और उचित शारीरिक एवं मानसिक देखभाल में मदद करता। तब उन्हें यौनिक बीमारियों के संवाहक के रूप में दुष्प्रचारित होने से मुक्ति मिल जाती।
यह जाना माना तथ्य है कि जिन देशों में वेश्यावृत्ति कानूनी रूप से वैध है, वहां सेक्स से संबंधित अपराध भी कम हैं। अत:, समय की मांग है कि इसके लिए एक उचित कानून बनाया जाना चाहिए। कुछ समय पहले उच्चतम न्यायालय ने भी अपना मत व्यक्त करते हुए कहा था कि सेक्स-वर्करों को सौहाद्र्रपूर्ण माहौल मिलना चाहिए, जहां वे गरिमा के साथ अपने पेशे को जारी रख सकें। न्यायालय ने सेक्स-वर्करों की जिंदगी से जुड़ी परेशानियों का अध्ययन करने के लिए कुछ वरिष्ठ वकीलों और सामाजिक कार्यकर्ताओं की अगुआई में एक आयोग का गठन किया था और उनके मौलिक अधिकारों की रक्षा करने के लिए सुझाव मांगा था। उसके पहले सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था कि वेश्यावृत्ति को कानूनी मान्यता, महिलाओं के अनैतिक देह-व्यापार पर अंकुश लगाने का एक विकल्प हो सकता है।
अब समय आ गया है कि सरकार को सर्वोच्च न्यायालय की राय पर सेक्स वर्करों को मान्यता देने के लिए कानून बनाना चाहिए, ताकि वे अपना व्यवसाय बिना किसी हस्तक्षेप के जारी रख सकें और अपने ग्राहकों को शांतिपूर्ण ढंग से सेवा प्रदान कर सकें।
इस तरह उन्हें समाज की मुख्यधारा में आसानी से लाया जा सकता है। बहुत सारे समाजशास्त्रियों का मानना है कि सरकार का यह कदम अपराध, खासकर बलात्कार को कम करने में कारगर सिद्ध होगा। यह सेक्स स्कैंडल और अफेयर को रोकने में भी मददगार होगा।
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