logo

2024 लोकसभा चुनाव: भाजपा की पौ बारह : नरेन्द्र मोदी टीम बनाम बेनामी टीम

2024 Lok Sabha Elections

आजादी के बाद से आज तक हुए लोकसभा चुनावों में 1952 के प्रथम चुनाव को छोड़ कर कभी एकतरफा चुनाव नहीं हुआ, यहां तक कि आपातकाल (इमरजेंसी) लगाने के बाद 1977 में हुये चुनाव में भी देश में एक तरफा चुनाव नहीं हो पाया था जबकि तत्कालीन प्रधानमंत्री इन्द्रा गांधी सरकार द्वारा किये गये आपातकाल के जुल्म एक काला अध्याय था। 2024 के चुनाव में भाजपा के नेतृत्व में एनडीए (नेशनल डेमोक्रेटिक अलायंस) की सरकार बनना सौ प्रतिशत पक्का है। जीत के मार्जिन और सीटों के अनुमान पर ही बहस होती है। आम जनता मंे एेसी चर्चा करता हुआ  शायद ही कोई मिले जो कहे कि चुनाव में टक्कर है।

यूपीए ने अपना नाम बदल कर एेसा नाम रखनें की कबायद की जिससे लोगों को इंडिया नाम पर गुमराह किया जा सके इसके लिये एेसे अंग्रेजी के नाम पर जिससे फाइनल इंडिया बोल सकें, तरह-तरह के फालतू अंग्रेजी शब्द जिसे न कोई समझा न किसी को याद रहता है, जोड़े गये। एक-एक करके कहीं की ईट कहीं का रोड़ा विपक्ष ने कुनबा जोड़ा। घर बननें से पहले ही उसकी ईंटंे गिर-गिर कर बिखर गयीं।

कांग्रेस के बाद लोकसभा में सबसे बड़ी पार्टी तृणमूल कांग्रेस ने इंडी एलाइंस से अलग होकर चुनाव लड़ने की घोषणा कर दी। पार्टी अध्यक्ष बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने यहां तक कह दिया कि कांग्रेस और कम्युनिस्ट पार्टी दोनो ही भाजपा से मिली हुयी है। ममता अपना मुस्लिम वोट बैंक सहज कर रखनें के लिये कुछ भी कर सकती है। राष्ट्रहित को भी तक में रख सकती है और राष्ट्रहित या जनहित के बदले पार्टी हित ही देखती है। ये वही ममता दीदी है जिन्होंने कुछ समय पहले कांग्रेस पार्टी नेता मल्लिकार्जुन खड़गे को विपक्ष की ओर से प्रधानमंत्री चेहरा बनाये जाने की बात कही थी। ये उनका राजनैतिक नाटक था, क्योंकि वे जानती थी कि सोनिया गांधी कभी भी राहुल गांधी के अतिरिक्त किसी भी नाम पर एकमत नहीं होंगी। इस तरह उन्होने अपने सभी विपक्षी पार्टियों के संभावित नेता जैसे नीतीश कुमार, शरद पवार आदि का पत्ता काट दिया। साथ ही साथ एक दलित नेता का नाम सुझा कर दलित वोटों को खुश करने की चाल भी चली थी। ममता बनर्जी खुद के अलावा किसी को प्रधानमंत्री के रूप में स्वीकार नहीं कर सकती थी, न ही करेंगी। उन्हें बात बात में दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल की तरह अपने को सजाने के लिये विपक्षी पार्टियों की जरूरत भी नहीं पड़ती है।

ममता बनर्जी ने मल्लिकार्जुन खड़गे का नाम प्रधानमंत्री पद के लिये सुझा कर एक तीर से कई शिकार कर डाले।

1.    कांग्रेस पार्टी के राहुल गांधी को पीछे ढकेल दिया।

2.    खड़गे का नाम लेकर दलित वोटों को समेटने का काम किया।

3.    बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को इंडी ग्रुप छोड़ना पड़ा।

4.    महाराष्ट्र सुप्रीमो शरद पवार को भी पीछे हटना पड़ा।

5.    अन्य पार्टी के लोग दलित नेता खड़गे का विरोध नहीं कर सके।

6.    दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल का मंुह बन्द हो गया।

7.    भविष्य में ममता अकेली प्रधानमंत्री पद की दावेदार रह गयीं।

दूसरा बड़ा विपक्षी गठबंधन महा विकास अघाड़ी का जिसमें शिवसेना (ठाकरे) नेशनल कांग्रेस पार्टी आदि छोटी मोटी पार्टियां मिली हुई हैं। इन पार्टियों के दो टुकड़े होने पर मनचाहा चिन्ह इन्हंे नहीं मिल सका। मुख्य नाम भी नहीं मिला न ही मुख्य चुनाव चिन्ह मिला। नतीजा ये कि देश की क्या बात करें अपने ही महाराष्ट्र में सिकुड़ कर रह गये। ये किस मुंह से राष्ट्रीय होने की बात करेंगे जबकि प्रादेशिक ही नहीं बचे।

हालात यहां तक बिगड़ गये कि उनके ही क्षेत्र में सरकारी सार्वजनिक समारोह हुआ जिसमें लोगों को नौकरियां दी जानी थी। इसमें पार्टी के अन्य नेता शरद पवार की पुत्री सुप्रिया सुले को बुलाया गया पर पवार साहब को निमंत्रित नहीं किया गया। पवार ने कोई नई चाल की सोच में तुरन्त एक कार्यक्रम भोज रखा, इसमें मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे, भाजपा नेता उपमुख्यमंत्री फड़नवीस और पार्टी से अलग हुये अपने भतीजे अजित पवार को बुलाया। अब इस भोजन पर कौन-कौन क्या करता है और शरद पवार का नया गेम प्लान क्या है ये तो वही जाने। ये सामने दिखाई दे रहा है कि शरद पवार अपने रिश्ते भाजपा से सुधारना चाहते हैं। दूसरी ओर उनकी बेटी के सामनें एनडीए से अजित पवार की पत्नी सुनेत्र के चुनाव की लड़ने की बात चल रही है। सुनेत्र हाल ही में क्षेत्र में अत्यधिक क्रियाशील हो गयी है। पवार की पुत्री सुप्रिया जो श्रेष्ठ सांसद का  पुरस्कार पा चुकी है, कह रही हैं कि हमारे पारिवारिक नहीं वैचारिक मतभेद हैं। 

मतलब साफ है कि लोकसभा में पवार परिवार की दो महिलायें एक दूसरे के सामने हो सकती है जिसे पवार हर सूरत में रोकना चाहेंगे। शरद पवार अब अपनें ही घर में, क्षेत्र में, प्रदेश में बुरी तरह घिर गये हैं, राष्ट्रीय बात तो आयी गयी हो गयी। हाल के एक महत्वपूर्ण सर्वे में एनडीए को महाराष्ट्र में 48 सीटों में 45 सीटें दी गयी हैं।

तीसरे घटक आप पार्टी जिसे हाल ही में राष्ट्रीय दर्जा मिला है उसके दिल्ली सरकार के दो मंत्री महीनों से जेल में है। एक मंत्री को एक साल से अधिक हो गया पर किसी भी कोर्ट से जमानत नहीं हो पा रही। एक राज्यसभा सांसद भी जेल में है जिन्हें बड़बोला कहा जाता है। दिल्ली प्रदेश के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल से भी ज्यादा बोल जाते हैं। इसके बावजूद केजरीवाल अपने को कट्टर ईमानदार पार्टी का मुखिया बताते हैं। उनकी पार्टी का एक मंत्री झूठी डिग्री में सजा पा चुका है उसे भी कट्टर ईमानदार कहते थे। एक विधायक भी सजा पाया है। उन्होंने पंजाब में कोई समझौता ही नहीं किया, अकेले लड़ रहे हैं। दिल्ली में बर्बाद हो रही कांग्रेस भाजपा के खिलाफ मजबूती से लड़ सकती थी पर केजरीवाल ने उसे भी दांव देकर समझौता करके छोटा भाई बना दिया। दिल्ली में अगले विधान सभा चुनाव में कांग्रेस को चार लोकसभा क्षेत्र में न नेता मिलेगा न कार्य कर्ता मिलेगा। कांग्रेस यहां आप पार्टी के झांसे में आ गयी। जबकि पंजाब में केजरीवाल ने कांग्रेस को एक भी सीट नहीं दी।

उत्तर प्रदेश में सपा एक मजबूत विपक्ष की भूमिका में विधान सभा में है। पर उसने आजमगढ़ और रामपुर सीटें लोकसभा उपचुनावों में खो दी। वहंा कांग्रेस की केवल 1 सीट रायबरेली लोकसभा में है। मुख्य विपक्षी पार्टी जिसका उप्र में कभी गढ़ था अब 17 सीटों पर ही लड़ेगी। सपा के साथ समझौता किसी काम का नहीं होगा। वहां मुस्लिम वोट बंटेगा, बसपा में भी जायेगा और मायावती तो बसपा से कई मुसलमान चेहरे चुनाव में उतारेेेगी। एैसे में वहां भी विपक्ष को दो चार सीटें ही मिल सकती है।

बिहार में विपक्ष का भट्ठा पहले ही नीतीश कुमार बैठा चुके हैं। एन वक्त पर गठबंधन छोड़ कर सत्तारूण गठबंधन में नरेन्द्र मोदी के हाथ मजबूत करने आ गये और साथ में बिहार की सरकार भी ले लाये। अकेले लालू प्रसाद और मरी हुयी कांग्रेस चुनाव लड़ने की स्थिति में नहीं होगी। उन्हें नीतीश से मुकाबला करना कठिन होगा।

महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, बिहार और अन्य प्रदेशों में जहां जहां मुस्लिम वोटों का अच्छा प्रभाव है, औवेसी अपनी पार्टी के प्रत्याशी लड़ायेंगे। बिहार में राजपा, उत्तर प्रदेश में सपा और महाराष्ट्र में अगाड़ी गठबंधन के लिये बड़ा खतरा बनेंगे।

कुल मिला कर मुख्य विपक्षी उत्तर प्रदेश, बिहार, बंगाल और महाराष्ट्र में पहले ही काफी नीचे पायदान पर आ गया है। विपक्षी गठबंधन पार्टियां जिसे इंडिया का नाम लेकर चुनाव लड़ना चाहती है इनकी सभी बड़े प्रदेशों में हालत एक दम पतली है। नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में एनडीए गठबंधन चुनाव लड़ रहा है उसके पास एक मजबूत नेता है, एक ऐसी पार्टी का संगठन है जो अनुशासित है, उसके साथ शक्तिशाली संगठित आर एस एस है। केन्द्र सरकार के विकास कार्यों का वृहद लेखा-जोखा है। मोदी के पास एक मजबूत निरंतर विकास कार्य करने वाली मंत्रियों की टीम है। नरेन्द्र मोदी की टीम में तीन पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह, नितिन गडकरी और अमित शाह जैसे राजनैतिक शतरंज के खिलाड़ी हैं। विपक्ष की स्थिति वाॅक ओवर देने जैसी है। 2024 लोकसभा चुनाव नरेन्द्र मोदी टीम बनाम बेनामी टीम होगी। एन डी ऐ को 360 से 400 सीटें मिलने की संभावना साफ दिखाई दे रही है।







डॉ. विजय खैरा
(आलेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं। उनसे संपादक व प्रकाशक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है। किसी भी विवाद की स्थिति में हमारा न्याय क्षेत्र दिल्ली होगा।)

Leave Your Comment

 

 

Top