भुवनेश्वर, 15 सितंबर: ओडिशा में मानव-हाथी संघर्ष पर किए गए एक दीर्घकालिक अध्ययन में सामने आया है कि राज्य में हाथियों की मौत का बड़ा हिस्सा उन क्षेत्रों में हुआ है, जहां जंगलों का संपर्क खनन, बस्तियों, कृषि भूमि और परिवहन ढांचे से है। वन्यजीव संस्थान भारत और प्रोजेक्ट एलिफेंट द्वारा किए गए ‘ओडिशा में मानव-हाथी संघर्ष (2000–2025): प्रवृत्तियां, चुनौतियां और निष्कर्ष’ शीर्षक वाले अध्ययन में राज्य के 45 वन प्रभागों के वन विभाग के आधिकारिक आंकड़ों का 25 वर्षों तक विश्लेषण किया गया।
मानवीय गतिविधियों से 508 हाथियों की मौत
अध्ययन के अनुसार वर्ष 2000 से 2025 के बीच ओडिशा में कुल 1,671 हाथियों की मौत दर्ज की गई। इनमें कम से कम 508 मौतें यानी करीब 30 प्रतिशत मानवीय गतिविधियों से संबंधित थीं। शेष मौतें बीमारियों, शारीरिक कारणों, प्राकृतिक दुर्घटनाओं और हाथियों के आपसी संघर्ष जैसी वजहों से हुईं। मानवीय कारणों में बिजली का करंट लगना हाथियों की मौत का सबसे बड़ा कारण रहा। इससे 274 हाथियों की मौत हुई। इसके अलावा शिकार (पोचिंग) से 129, रेल दुर्घटनाओं में 45, विष देने से 20 तथा मानव-हाथी संघर्ष के प्रतिशोध में की गई हत्याओं में 16 हाथियों की जान गई।
वहीं, कुएं, तालाब, नहर, खाई, नालियों तथा अन्य मानव निर्मित संरचनाओं में गिरने से 16 हाथियों की मौत हुई। वाहनों की टक्कर से आठ हाथियों की मृत्यु दर्ज की गई। मृत हाथियों में 328 वयस्क मादा, 283 वयस्क नर, 269 उप-वयस्क, 222 किशोर और 246 शावक शामिल थे। 323 मामलों में हाथियों की उम्र निर्धारित नहीं की जा सकी।
खनन क्षेत्र सबसे ज्यादा जोखिम में-
अध्ययन में तैयार किए गए मृत्यु जोखिम मॉडल से पता चला कि खदानों, जंगलों, संरक्षित क्षेत्रों, आबादी वाले इलाकों, कृषि भूमि और रेलवे लाइनों के आसपास हाथियों की मौत की संभावना अधिक रही। इनमें खनन क्षेत्रों से निकटता का हाथियों की मृत्यु के साथ सबसे मजबूत संबंध पाया गया। ओडिशा के उत्तरी और मध्य हिस्सों, खासकर खनिज संपदा वाले क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर खनन, सड़क एवं रेलवे निर्माण तथा बस्तियों के विस्तार ने जंगलों को खंडित किया है। इससे हाथियों के पारंपरिक आवागमन मार्ग प्रभावित हुए हैं।
हालांकि, रिपोर्ट ने किसी खास खदान, रेलवे लाइन या गांव को हाथियों की मौत के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया है। अध्ययन के अनुसार मौतें आम तौर पर ऐसे व्यापक वन-खनन-बस्ती वाले क्षेत्रों में हुईं, जहां जंगलों से बाहर निकलने के दौरान हाथियों का सामना खेतों, गांवों, बिजली की लाइनों और परिवहन नेटवर्क से होता है।
ढेंकानाल में सबसे अधिक हाथियों की मौत
हाथियों की मौत के मामले में ढेंकानाल सबसे आगे रहा, जहां 229 मौतें दर्ज की गईं। इसके बाद आठगढ़ में 178, क्योंझर टेरिटोरियल डिवीजन में 150, सिमिलिपाल टाइगर रिजर्व में 100 और सतकोसिया वन्यजीव प्रभाग में 80 हाथियों की मौत हुई। मानवीय गतिविधियों से हुई मौतों में भी ढेंकानाल 78 मामलों के साथ शीर्ष पर रहा। इसके बाद क्योंझर में 66, अंगुल में 38 और आठगढ़ में 30 मौतें दर्ज की गईं। प्राकृतिक कारणों में बीमारी सबसे बड़ा कारण रही, जिससे 469 हाथियों की मौत हुई। शारीरिक कारणों से 309, प्राकृतिक दुर्घटनाओं से 95 तथा क्षेत्रीय संघर्षों में 53 हाथियों की मौत हुई।
मानव जीवन पर भी भारी पड़ रहा संघर्ष
मानव-हाथी संघर्ष का असर केवल हाथियों तक सीमित नहीं है। अध्ययन में 244 गांवों में 2,242 संघर्ष की घटनाएं दर्ज की गईं। इन घटनाओं में 1,677 लोगों की मौत और 565 लोग घायल हुए। वर्ष 2023 सबसे घातक रहा, जब 243 संघर्ष घटनाओं में 175 लोगों की जान गई। मानव मौतों के मामले में भी ढेंकानाल 355 मौतों के साथ सबसे आगे रहा। इसके बाद क्योंझर में 155, अंगुल में 141, राउरकेला में 140 और खुर्दा में 45 मानव मौतें दर्ज की गईं। अध्ययन ने ढेंकानाल, आठगढ़, अंगुल, क्योंझर, बणई और राउरकेला को प्राथमिकता वाले मानव-हाथी संघर्ष क्षेत्र के रूप में चिन्हित किया है।
एआई से मिलेगी हाथियों की गतिविधियों की चेतावनी
अध्ययन में हाथियों के आवागमन वाले मार्गों, बस्तियों की सीमाओं और संवेदनशील रेलवे क्रॉसिंग पर कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) आधारित प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली के परीक्षण का सुझाव दिया गया है। कैमरों और थर्मल सेंसरों की मदद से हाथियों की मौजूदगी का पता लगाकर नियंत्रण कक्ष और वन विभाग की टीमों को तत्काल सूचना भेजी जा सकती है।
पश्चिम बंगाल में इसी तरह की एक प्रणाली ने 266 बार हाथियों की मौजूदगी का पता लगाया और औसतन करीब 42 सेकंड में चेतावनी भेजी। रिपोर्ट के अनुसार ओडिशा में इस तकनीक को पहले चुनिंदा स्थानों पर परीक्षण के तौर पर लागू किया जाना चाहिए, ताकि इसकी सटीकता, गलत चेतावनी, हाथियों का पता न चल पाने की स्थिति और प्रतिक्रिया समय का आकलन किया जा सके।
अध्ययन में हाथियों की मौत के मामलों में बेहतर पोस्टमार्टम, रोग निगरानी और फोरेंसिक जांच की भी सिफारिश की गई है। रिपोर्ट में कहा गया है कि ओडिशा में हाथियों की मौत और मानव जनहानि को कम करने के लिए विभिन्न सरकारी विभागों तथा स्थानीय समुदायों के बीच समन्वित कार्रवाई जरूरी है। हर वर्ष संवेदनशील क्षेत्रों का आकलन, भौगोलिक निगरानी और उच्च जोखिम वाले क्षेत्रों में लक्षित उपाय अपनाकर मानव सुरक्षा के साथ-साथ हाथियों के प्राकृतिक आवागमन और संरक्षण को बेहतर बनाया जा सकता है।
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