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नशा मुक्त पंजाब का धाराशायी सपना और निशाने पर केजरीवाल

The dream of a drug-free Punjab shattered; Kejriwal in the crosshairs.


उमेश चतुर्वेदी


पंजाब के 2017 के विधानसभा चुनाव में भी नशे का कारोबार बड़ा मुद्दा था और 2022 में भी। दोनों ही चुनावों में पंजाब में भ्रष्टाचार और नशे के कारोबार को लेकर आम आदमी पार्टी के प्रमुख अरविंद केजरीवाल ने पहले शिरोमणि अकाली दल और बीजेपी की सरकार  को निशाना बनाया था और दूसरे चुनाव में तत्कालीन कांग्रेस सरकार को। तब केजरीवाल ने पंजाब को नशामुक्त बनाने का वादा किया था। इसकी वजह से पंजाब के चुनावों में आम आदमी पार्टी को बंपर जीत मिली। मुख्यमंत्री बनने के बाद भगवंत मान ने पंजाब को रंगीला यानी संस्कृति की धरती बनाने का वादा किया। लेकिन जिस तरह अतीत की सरकारें नशे से पंजाब को मुक्त करने में नाकाम रहीं, कुछ ऐसा ही हाल आम आदमी पार्टी की सरकार का भी रहा है।

राज्य में औपचारिक रूप से चुनावी बिगुल बजने में देर है। राज्य की सत्ता की दावेदार पार्टियां अपनी-अपनी सेनाएं सजाने में मशगूल हैं। इसी बीच कांग्रेस ने भूपेश बघेल को हटाकर राजस्थान के तेजतर्रार नेता सचिन पायलट को राज्य का प्रभारी महासचिव बना दिया है। प्रभारी महासचिव बनते ही जिस तरह सचिन पायलट ने आम आदमी पार्टी पर निशाना साधा, उससे साफ है कि आने वाले दिनों में कांग्रेस भी आम आदमी पार्टी की सरकार क उसी के हथियार यानी नशाखोरी को लेकर हमला करने वाली है। प्रभार संभालते ही सचिन पायलट का कहना कि पंजाब में नशे का बढ़ता कारोबार बेहद चिंता का विषय है। लेकिन उससे भी अधिक चिंताजनक यह है कि नशे के खिलाफ सवाल उठाने वाले गुलजार सिंह जी ने इस पर जब पंजाब के वित्त मंत्री हरपाल सिंह चीमा से सवाल पूछा तो उन्हें डराया-धमकाया गया। प्रताड़ित करने की सीमा इतनी बढ़ गई कि उन्होंने जहर खा लिया और इलाज के दौरान दम तोड़ दिया। सचिन पायलट ने सवाल पूछ है कि क्या नशे के मुद्दे पर सवाल पूछना क्या गलत है? सचिन यहीं नहीं रूक रहे। उन्होंने पंजाब के वित्त मंत्री के इस्तीफे की ना सिर्फ मांग की है, बल्कि गंभीर आरोपों की जांच की मांग को लेकर आम आदम पार्टी की सरकार को घेरना तेज कर दिया है।

असल में हुआ यह कि इसी सितंबर महीने में संगरूर जिले के एक मजबूर पिता गुलजार सिंह ने आत्महत्या कर ली। दरअसल उन्होंने एक सार्वजनिक कार्यक्रम में पंजाब के वित्त मंत्री से गांव में बिक रहे नशे और अपने बेटे की लत को लेकर सवाल पूछा था, जिसके बाद आरोप है कि आम आदमी पार्टी की सरकार की तरफ से गुलजार सिंह पर दबाव बनाया गया और अपमानित होकर उन्होंने जान दे दी। इस घटना ने राज्य में नशे के खिलाफ उठने वाली आवाजों और जमीनी हकीकत को फिर से चर्चा में ला दिया है।

इसमें दो राय नहीं है कि पंजाब में नाबालिगों  में नशीले पदार्थों के इस्तेमाल का स्तर चिंताजनक है। राज्य के 18 से 75 साल की उम्र के वयस्कों में यह स्थिति और भी गंभीर है। सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय ने नेशनल ड्रग डिपेंडेंस एंड ट्रीटमेंट सेंटर और अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान यानी एम्स के साथ मिलकर 'भारत में नशीले पदार्थों के इस्तेमाल का स्तर - 2019' नाम से एक सर्वे किया था। इस सर्वे के आंकड़ों के मुताबिक, राज्य में 10 से 17 साल की उम्र के 6 लाख 25 हजार से ज़्यादा नाबालिग भांग, ओपिओइड, सिडेटिव, कोकीन, एम्फेटामाइन टाइप स्टिमुलेंट्स  और हेलुसिनोजेन्स जैसे नशीले पदार्थों का इस्तेमाल कर रहे हैं। जबकि इन नशीले पदार्थों का इस्तेमाल करने वाले वयस्कों की संख्या तो और भी चौंकाने वाली है।  इस सर्वे के अनुसार, इन नशीले पदार्थों का इस्तेमाल करने वाले राज्य के वयस्कों की संख्या 63 लाख 60 हजार से ज़्यादा है। करीब दो करोड़ 78 लाख की जनसंख्या वाले राज्य में नशाखोरों की इतनी बड़ी संख्या चिंताजनक ही कही जाएगी।

साल 2025 में राज्यसभा में एक सवाल के लिखित जवाब में गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने पंजाब में नशाखोरी के इस भयावह आंकड़े की जानकारी दी थी। तब उन्होंने कहा था कि सामाजिक न्याय और अधिकारिता पर बनी स्टैंडिंग कमेटी की 2022-23 की 51वीं रिपोर्ट का भी हवाला दिया था। वैसे यह पहला मौका रहा, जब देश के सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में नशीले पदार्थों के इस्तेमाल का अध्ययन और दस्तावेज़ीकरण किया गया। इस सर्वेक्षण की रिपोर्ट के अनुसार, नशीले पदार्थों के इस्तेमाल के अलावा, पंजाब देश के उन शीर्ष दस राज्यों में दूसरे स्थान पर है जहाँ अलग-अलग उम्र के लोग इंजेक्शन के ज़रिए भी नशा लेते हैं। दिलचस्प यह है कि इस आंकड़े की सूची में पंजाब का पड़ोसी राज्य हरियाणा छठवें स्थान पर है।

बीते पंद्रह अगस्त को लाल किले की प्राचीर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश से नशे का समूल नाश करने की अपील की थी। वैसे गृहमंत्रालय पंजाब में ड्रग्स की तस्करी रोकने और नशाखोरी पर लगाम लगाने के लिए अपनी ओर कई कदम उठाए हैं। इनमें से एक राज्य में नशीले पदार्थों और साइकोट्रोपिक पदार्थों  की अवैध तस्करी की रोकथाम से जुड़े मामलों के लिए एक सलाहकार बोर्ड का गठन है। इससे पंजाब पुलिस को नशाखोरी और तस्करी के मामलों में मदद की संभावना बढ़ी है। इस बीच नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो से कहा गया है कि वह नशाखोरी से जुड़े मामलों की सिफारिश सलाहकार बोर्ड के सामने करेगा।

दिल्ली स्थित अखिल भारतीय आयुर्वेद विज्ञान संस्थान ने भी 2015 में पंजाब में मादक पदार्थों की लत की भयावहता का आकलन करने के लिए व्यापक अध्ययन किया था। इस रिपोर्ट का निष्कर्ष था कि राज्य में दो लाख से अधिक व्यसनी थे। यहां यह जानना दिलचस्प होगा कि नशे के आदी लोग अक्सर हेरोइन को "नशीले पदार्थों का शैम्पेन" मानते रहे हैं। जिस तरह शराब में शैम्पेन सबसे ज्यादा महंगी होती है, कुछ उसी तरह, हेरोइन भी महंगी होती है। पता नहीं आज इसकी कितनी कीमत है, इसकी सटीक जानकारी नशाखोरों और तस्करों को कहीं ज्यादा होगी। लेकिन यहां जानना हैरत अंगेज है कि नशे का आदी व्यक्ति आमतौर पर एक दिन में आधा ग्राम से दो ग्राम तक का सेवन करता है। राज्य की पुलिस भी ऑफ द रिकॉर्ड मानती है कि शहरों में "दवाओं का दुरुपयोग" अधिक आम है, वहीं हेरोइन "ग्रामीण क्षेत्रों में अधिक प्रचलित है"।

अपनी भारी कीमत के बावजूद, हेरोइन सामाजिक वर्ग और आय की परवाह किए बिना नशेड़ियों के बीच लोकप्रिय बनी हुई है। इसी वजह से हेरोइन की तस्करी में काफी लोग लगे हुए हैं। इसे पुलिस के भ्रष्टाचारी कर्मचारियों-अधिकारियों का उन्हें संरक्षण हासिल है। इसकी वजह है हेरोइन की तस्करी से भारी कमाई। सुरक्षा अधिकारियों का कहना है कि तस्कर अक्सर सीमा पार नशीले पदार्थों के पैकेट फेंकते हैं और कुछ किसान इसमें उनकी मदद करते हैं। किसान नशीले पदार्थों को छिपाने के लिए अपने औजारों में छेद भी कर देते हैं, जिससे उन्हें पकड़ना मुश्किल हो जाता है।

एक मीडिया हाउस को नाम न छापने की शर्त पर कुछ दिनों पहले एक खुफिया अधिकारी ने बताया था, "किसानों को बस इन पैकेटों को अपने घर तक ले जाना होता है। एक बार जब ये पैकेट भारतीय क्षेत्र में प्रवेश कर जाते हैं, तो कूरियर इन्हें किसानों से ले लेते हैं।"

चंडीगढ़ स्थित इंस्टीट्यूट फॉर डेवलपमेंट एंड कम्युनिकेशंस द्वारा मादक पदार्थों के दुरुपयोग पर एक अध्ययन किया था। इसमें उसने राज्य के सीमावर्ती जिलों से लिए गए मादक पदार्थों के सेवन करने वालों के 1527 नमूने लिए थे, जिनमें से अधिकांश यानी करीब 55.8 प्रतिशत लोगों की आयु 15 से 35 वर्ष के बीच की थी। इसी प्रकार, सोसाइटी फॉर प्रमोशन ऑफ यूथ एंड मासेस यानी एसपीवाईएम और अखिल भारतीय आयुर्वेद विज्ञान संस्थान नई दिल्ली के राष्ट्रीय औषधि निर्भरता उपचार केंद्र द्वारा किए गए पंजाब ओपिओइड निर्भरता सर्वेक्षण से पता चला कि पंजाब में ओपिओइड वाले नशे लेने के आदी लोगों की संख्या के करीब 76 प्रतिशत हिस्सा 18 से 35 वर्ष की आयु वर्ग का था। राज्य के डॉक्टरों का अनुभव है कि यहां के नौ से 16 वर्ष की आयु के बच्चे भी तंबाकू, अफीम की भूसी और मारिजुआना जैसे नशीले पदार्थों के आदी हो चुके हैं। पुलिस के अधिकारी भी दबी जुबान से स्वीकार करते हैं कि इसी नशाखोरी की वजह से राज्य में चोरी और झपटमारी की वारदात बढ़ गई है। जिसमें ज्यादातर युवा ही शामिल हैं। इसके साथ ही राज्य में रोजगार की कमी के चलते आर्थिक रूप से कमजोर क्षेत्रों की महिलाएं भी ड्रग पेडलिंग यानी नशे के व्यापार में शामिल होती नजर आ रही हैं।

केजरीवाल की अगुआई वाली आम आदमी पार्टी ने इन्हीं सब बुराइयों को दूर करने के वादे के चलते सत्ता के शिखर तक पहुंची थी। राज्य की नशाखोरी की समस्या को उभारने के लिए आम आदमी पार्टी की शह पर एक चर्चित फिल्म ‘उड़ता पंजाब’ बनाई गई थी। इसके जरिए भी पंजाब के उत्साही, परिश्रमी और संस्कृति प्रेमी लोगों को सपना दिखाया गया था कि अगर आम आदमी पार्टी की सरकार बनी तो राज्य से नशाखोरी का समूल नाश किया जाएगा। बेशक इस लेख में उल्लिखित आंकड़े पहले के हैं, लेकिन उनमें खास बदलाव अभी तक नहीं आया है। अगर ऐसा होता तो गुलजार सिंह को आत्महत्या नहीं करनी पड़ती।

हालांकि एक सकारात्मक पहलू यह है कि नशे से परेशान लोग अब खुद सुधार की ओर भी कदम बढ़ा रहे हैं। जबकि सरकार की ओर से ऐसी कोशिश होती नहीं दिख रही। साल 2025-26 के सरकारी आंकड़ों के अनुसार, पंजाब के सरकारी नशा मुक्ति केंद्रों में दाखिला लेने वाले मरीजों की संख्या में 164 प्रतिशत से ज्यादा का उछाल आना इसी बदलाव का नतीजा है। इससे भी इनकार नहीं किया जा सकता कि पुलिस और सुरक्षा बल लगातार हर साल हजारों किलोग्राम ड्रग्स और हेरोइन जब्त कर रहे हैं। जानकारों का कहना है कि  सिर्फ सख्ती से काम नहीं चलने वाला। जब तक युवाओं को पर्याप्त रोजगार नहीं मिलेगा और उनके मानसिक स्वास्थ्य व पुनर्वास पर ध्यान नहीं दिया जाएगा, तब तक इस समस्या को जड़ से मिटाना मुश्किल है। कहना न होगा कि भगवंत मान सरकार नशा रोकने और पुनर्वास के सभी मोर्चों पर नाकाम नजर आ रही है। जिसे लेकर भारतीय जनता पार्टी भी गाहे-बगाहे आम आदमी पार्टी की सरकार को कठघरे में खड़ी करती रहती हैं। जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आएंगे, कांग्रेस के साथ बीजेपी ही नहीं, अकाली दल भी केजलीवाल पर हमलावर होंगे। उड़ता पंजाब के जरिए पंजाब को नशा मुक्त बनाने के सपने की हकीकत जितना ही मुद्दा बनेगी, आम आदमी पार्टी की सियासी कठिनाइयां उतनी ही बढ़ती जाएंगी।


(आलेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं। उनसे संपादक व प्रकाशक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है। किसी भी विवाद की स्थिति में हमारा न्याय क्षेत्र दिल्ली होगा।)

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