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राहुल गांधी का फ्लॉप शो गठबंधन में गांठें ही गांठें

Rahul Gandhi's flop show knots in alliance

बड़े जोर शोर से जुटे विपक्ष ने जनता को भरमाने के लिये अपने गठबंधन का एक अजीब सा नाम अंग्रेजी के शब्दों को जोड़ तोड़ कर रखा था जिसको संक्षिप्त में इंडिया नाम दिया। उन्हें उम्मीद थी कि इंडि एलायंस या इंडी गठबंधन को इंडिया बोलने से उसमें जान आ जायेगी। यहां तक कि मीडिया ने उसे इंडिया लिख लिख कर विपक्ष में थोड़ी बहुत जान फूंकने की कोशिश की । पर राजनीति के मंजे खिलाड़ी नरेन्द्र मोदी जी ने क्विट इंडिया की याद दिला कर जी 20 सम्मेलन में ही सभी जगह भारत का नाम उपयोग कर इंडिया के नाम से बने विपक्षी गठबंधन को धूमिल कर दिया। खैर जो नाम धोखा देने के लिये या जनता की आंखों में धूल झांेकने के लिये रखा था वो रखा का रखा रह गया और भारत नाम की दुदंुभि बज गयी। भारत नाम ही लोगों के सिर चढ़ कर बोलने लगा।

जैसे विपक्षी दलों के लिये यही काफी नहीं था तो उसमें कुर्सी की खींचातानी को लेकर अंदरूनी लड़ाई और शुरू हो गयी। बिहार के मुख्यमंत्री नितीश कुमार को जब राष्ट्रीय संयोजक नहीं बनाया और प्रधानमंत्री के लिये बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे का नाम उछाल दिया तो नितीश की छाती पर सांप लोट गया। यहां तक कि रा.ज.द. के अध्यक्ष     लालू प्रसाद यादव और बिहार की सरकार के उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव ने भी चुप्पी साध ली। नितीश कुमार ने बगावत कर दी और विपक्षी संगठन को पलीता लगा दिया।

सच कहा जाये तो ममता बनर्जी का कांग्रेस अध्यक्ष खड़गे को प्रधानमंत्री के रूप में अग्रसर करना राजनीतिक रूप से एकदम सही प्रस्ताव था। संसद में और सदस्यता में सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस का सभी प्रदेशों में संगठन है, कुछ प्रदेशों में सरकारें भी हैं। खड़गे जी वरिष्ठतम नेता और दलित समाज से भी आते हैं। ऐसे में ममता की सूझ-बूझ की प्रशंसा होना चाहिये। नितीश कुमार जो सपना संजोकर बैठे थे जिसके लिये उन्होंने भाजपा गठबंधन छोड़ कर रा.ज.द. के साथ सरकार बनायी थी वो सपना टूट गया था। जिसके लिये नितीश ने सीने पर पत्थर रख कर अपराधिक मामले में सजा पाये लालू यादव से भी समझौता कर लिया था। जब जदयू के नेता नितीश का नाम संयोजक के लिये प्रस्तावित नहीं किया गया तो उन्होंने सीने से लालू यादव का बोझ हटाया और भाजपा के साथ आ गये। ये बात भी थी कि राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा के बाद यकायक नरेन्द्र मोदी की और अधिक बढ़ती लोकप्रियता साफ दिखाई दे रही थी। उन्होंने पलक झपकते ही पलटी लगायी। बिहार में रा.ज.द. को एैसा झटका दिया कि अगले साल होने वाले बिहार विधान सभा चुनाव तक भी संभल नहीं पायेगी।

दूसरी ओर ममता बनर्जी का खड़गे वाला दाव फेल हो गया क्योंकि किसी ने उस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी यानि सहमति नही भरी। इस समय ममता को अपनी सीटों की चिंता सता रही थी इसलिये उन्होंने सोचा खड़गे का नाम आगे करके दलितों को लुभा लेंगे और कांग्रेस के समर्थन से कम से कम फिर आधी सीटें जीत लेंगे। अभी उन्हें वर्तमान की लगभग आधी सीटें जीतने पर भी खतरा मड़रा रहा है।

बंगाल में सत्ताधारी पार्टी तृणमूल कांग्रेस और कम्युनिस्टोंं में सांप नेवले जैसा बैर है कांग्रेस काफी लम्बे समय से कम्युनिस्टोंं के हाथ में खेल रही है। कम्युनिस्ट पार्टियों का प्रभाव थोड़ा बहुत बंगाल और केरल में ही बचा है। ममता कम्युनिस्ट के साथ मिल कर बंगाल में कैसे चुनाव लड़ सकती है लेकिन कांग्रेस के गले में लटका कम्युनिस्ट सांप और तेजी से उसे जकड़ता जा रहा है। उसका सीधा प्रमाण है कन्हैया कुमार को कांग्रेस में सम्मान के साथ लाकर उन्हें पदाधिकारी बना देना। उन्हें पार्टी की सर्वोच्च शक्तिशाली कमेटी केन्द्रीय वर्किंग कमेटी का सदस्य बनाया गया। कांग्रेस उन्हें पार्टी में लाकर लोकसभा का टिकट दे देती यहां तक ठीक था। उन्हें पार्टी की शीर्ष कमेटी का सदस्य बनाया। पार्टी ये भूल गयी कि कन्हैया को वो अपने सिर पर बैठा रही है जो बेगूसराय बिहार से सांसद का चुनाव केन्द्रीय मंत्री गिरिराज सिंह से 4 लाख से अधिक वोटों से चुनाव हारे हैं। कांग्रेस के लिये कम्युनिस्ट तो बोझ बने सो बने ऊपर से इंडी गठबंधन के सबसे शक्तिशाली साथी ममता को भी गंवा दिया। वैसे भी कम्युनिस्टों की पूरे विश्व में सफाई हो गयी है। कांग्रेस की ये गलती चुनाव में भारी पड़ेगी। अभी ही ममता ने घोषणा कर दी कि बंगाल की सभी सीटों पर उनकी पार्टी चुनाव लड़़ेगी और कांग्रेस से कोई समझौता नहीं होगा। प्रधानमंत्री बनाने का प्रस्ताव और कम्यूनिष्टों से गठबंधन कम्युनिस्ट कन्हैया को पार्टी में उच्च स्थान देकर कांग्रेस ने बंगाल में गठबंधन खो दिया।

बिहार में कांग्रेस ने भारी गलती की नितीश कुमार को संयोजक बना देते और प्रधानमंत्री का फैसला चुनाव के बाद तय करनें पर छोड़ देते तो नितीश कुमार एन डी ए में नहीं जाते क्योंकि या वे प्रधानमंत्री बनते या फिर संयोजक होने के नाते यदि चुनाव बाद यू पी ए आती तो वे सोनिया गांधी की तरह उसके अध्यक्ष बन जाते। पर कांग्रेस यहां मुंह की खा गयी। नितीश कुमार ने पाला पलटा और भाजपा का दामन थाम लिया इस तरह राजनैतिक दिवालियेपन से कांग्रेस ने बिहार और बंगाल दोनों में अपने आपको अकेला कर लिया। इंडी गठबंधन का तीसरा घटक आप पार्टी ने भी घोषित कर दिया कि पंजाब में अकेले ही चुनाव लड़ेगी। पंजाब में कांग्रेस की हालत दिन पर दिन पतली होती जा रही है। ऐसे में आप ने उसे सहारा देना ठीक नहीं समझा। अब आप जैसी छोटी, कल की पार्टी भी कांग्रेस से समझौता नहीं कर रही। मतलब साफ है कांग्रेस को विपक्ष की कोई पार्टी उसे जिंदा होते नहीं देखना चाहती।

उत्तर प्रदेश में इंडी गठबंधन या बिना ब.स.पा. के सम्मिलित हुये कभी ताकतवर नहीं बन सकता क्योंकि बसपा के पास अपना कोर वोटर है जो उन्हें मिलता है। पार्टी सुप्रीमो मायावती की अपील पर दलित वोट काफी कुछ ट्रांसफर भी होता है और संसद के चुनाव में निश्चित तौर पर। मायावती के पास मुस्लिम वोट भी है। यदि ब.स.पा. इस गठबंधन में आ जाती तो मुस्लिम वोट के बंटने की संभावना न के बराबर होती। अब मुस्लिम वोट बंटेगा। मायावती का अकेले चुनाव लड़ना     भाजपा के लिये फायदेमंद रहेगा क्योंकि ब.स.पा. हमेशा मुसलमानों को काफी टिकट देती है। ब.स.पा. चन्दा लेकर टिकट देती है ऐसी चर्चा रहती है अधिकांश टिकट पर अमीर मुसलमानों को टिकट मिलने से वे चुनाव भी दमदारी से लड़ते हैं। मायावती की पार्टी के चुनाव संघर्ष में रहने के कारण चुनाव त्रिकोणीय होगा। कांग्रेस और सपा में टिकटों के तालमेल को लेकर अभी भी संशय बना हुआ है। समाजवादी पार्टी अपना हिस्सा चाहती है उसकी दलील है कि कांग्रेस पार्टी विधान सभा और लोकसभा में हिस्सेदारी के हिसाब से ही टिकट की हकदार है वोटों के प्रतिशत से भी कांग्रेस की हिस्सेदारी बहुत कम बनती है। सपा केवल 11 टिकट कांग्रेस को देने की बात कह रही है। कांग्रेस 21 टिकटों पर संतुष्ट है। कांग्रेस के लिये इतने कम टिकटों पर लड़ना उसकी  यूपी से पूरी विदाई तय कर देगी। कांग्रेस को कम से कम आधी सीटों पर अपनी दावेदारी करना चाहिये थी और किसी भी सूरत में 80 में से 40 के आस पास सीटों पर लड़ना चाहिये। लोकसभा में कांग्रेस के पास केवल 1 सीट है तो सपा उप चुनावों में लगातार हारी है यानि संसद के चुनाव में उसकी लगातार दुर्गति हो रही है। केवल रायबरेली और अमेठी की सीट जीतने के लिये कांग्रेस इतनी बड़ी कुर्बानी दे रही है। अपनी राजनैतिक गलतियों से एमपी, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में पहले ही दुर्गति करा चुकी है। अब उ.प्र. में पहले जैसा ही हाल होगा। कांग्रेस को उ.प्र. में दो चार सीटों को छोड़ कर सभी सीटों पर चुनाव लड़ना चाहिये। कम से कम जिन्दा रहेगी और आगे विधान सभा के चुनाव में उसकी स्थिति सपा से बेहतर भी हो सकती है। आज के हालात में भाजपा का 80 नहीं तो कम से कम 75 सीटों पर चुनाव जीतना तय है। दो चार सीटें ही इंडी गठबंधन और बसपा को मिल सकती है।

गठबंधन की रस्सी में गांठे ही गांठे बची हैं। उ.प्र., बिहार, बंगाल, पंजाब अकेले में 175 सीटों में गठबंधन नहीं होगा। हिमाचल, उत्तराखंड, मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ आदि में 70 सीटों में कांग्रेस के अलावा कोई पार्टी कांग्रेस के साथ गठबंधन लायक नहीं है। यानि आधी सीटों पर इंडी का केवल नाम है। दक्षिण भारत में कोई अकेली ऐसी पार्टी नहीं जिसका प्रभाव सभी दक्षिणी प्रदेशों में हो। हर प्रदेश में अलग अलग पार्टी का वर्चस्व है। गुजरात में इंडी गठबंधन को कुछ मिलना नहीं। नार्थ, ईस्ट में असम बिना कोई बड़ा महत्व नहीं रखता। उसमें भी त्रिपुरा, अरूणाचल भी असम के साथ भाजपा के गढ़ बन चुके हैं। केवल महाराष्ट्र में इंडी गठबंधन दिखाई दे रहा है। उसमें भी सीटों के तालमेल में झगड़ा हो रहा होगा। देश का राममय होना, हिन्दू वोटों का एकजुट होना, इंडी गठबंधन का बिखरना और राहुल गांधी के फ्लॉप शो ने भाजपा के 400 सीटों के सपनों का रास्ता आसान कर दिया है।





डॉ. विजय खैरा
(आलेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं। उनसे संपादक व प्रकाशक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है। किसी भी विवाद की स्थिति में हमारा न्याय क्षेत्र दिल्ली होगा।)

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