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बिहार में नितीश का पलटना या जनादेश का सम्मान?

Nitish's reversal in Bihar or respect for the mandate?

बिहार में एक बार फिर से नितीश कुमार और भारतीय जनता पार्टी की सरकार बन गयी है। नितीश कुमार ने एक बार फिर से भारतीय जनता पार्टी के साथ सत्ता की राह तय की है। इस बार नितीश कुमार के मुख्यमंत्री बनने पर बहुत प्रश्न उठ रहे हैं। कई प्रश्न वाजिब भी प्रतीत होते हैं। परन्तु यह कहना कि बिहार की जनता के साथ धोखा है, दरअसल जनादेश का अपमान करना है।

वर्ष 2021 में सम्पन्न हुए विधानसभा चुनावों में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन को जनता ने बहुमत प्रदान किया था। भारतीय जनता पार्टी की 74 सीटें आई थीं एवं जनता दल यूनाइटेड की 43 सीटें आई थीं। हालांकि एक सीट अधिक पाकर राजद सबसे बड़े दल के रूप में उभरा था। परन्तु जनता का मत पूरी तरह से भारतीय जनता पार्टी और जनतादल यूनाईटेड के पक्ष में था, इसलिए यह नहीं कहा जा सकता है कि नीतीश कुमार ने भारतीय जनता पार्टी के साथ दोबारा हाथ मिलाकर जनता के मत का अपमान किया है।

अपमान तो तब हुआ था, जब वह किसी मुद्दे पर असहमत होकर उस दल के साथ सरकार बनाने के लिए गए थे, जिसे जनता ने नकार दिया था। जनता ने भारतीय जनता पार्टी और जनता दल यूनाइटेड के पक्ष में ही मतदान करके स्पष्ट आदेश दिया था कि वही सरकार चलाएं। इतना ही नहीं भारतीय जनता पार्टी को अधिक सीटें भी जिताई थीं, तो नैतिक रूप से भी यही उचित है कि भारतीय जनता पार्टी के साथ ही नीतीश कुमार अपनी सरकार चलाते।

भाजपा और नीतीश का सात

भाजपा और नीतीश कुमार का साथ आज का नहीं है। वह लोग एक साथ वर्ष 1998 में आए थे और अब उन्हें साथ चलते-चलते 26 वर्ष हो गए हैं। जिनमें से गौर करने वाली बात यही है कि वह मात्र 3 वर्ष ही विरोधी दलों के साथ रहे हैं और शेष 23 वर्षों में वह भारतीय जनता पार्टी के साथ रहे हैं। भारतीय जनता पार्टी के साथ रहते हुए उन्होंने कई उतार चढ़ाव भी देखे हैं। जब केंद्र में भारतीय जनता पार्टी की सरकार नहीं थी, तब भी जनता दल यूनाइटेड का गठबंधन भारतीय जनता पार्टी के साथ था।

आपातकाल के आन्दोलन से उपजे हुए भारतीय जनता पार्टी और जनता दल यूनाईटेड के नेतृत्व हैं। इन्होनें कांग्रेस की आपातकालवाली सोच का विरोध करते हुए और उस दौरान अपने और अपने साथियों पर हुए अत्याचारों को महसूस करते हुए अपनी राजनीति को आकार दिया है।

हालांकि यह भी सच है कि लालू प्रसाद यादव भी आपातकाल की नीति के विरोध में जेल गए थे और उसी दौरान उनकी बेटी का जन्म हुआ था। मीसा एक्ट के नाम पर ही उनकी बेटी का नाम मीसा है, परन्तु यह भी बात पूरी तरह से सच है कि यह लालू प्रसाद यादव ही हैं, जो आपातकाल लगाने वाली कांग्रेस के साथी बने हुए हैं। राजद कभी भी जनता दल यूनाईटेड का स्वाभाविक साथी नहीं हो सकता है क्योंकि राजद ने अपने मूल विरोधी के साथ समझौता किया हुआ है। इसलिए यह स्पष्ट कहा और समझा जा सकता है कि क्यों एक ही आन्दोलन से निकलीं एक ही उद्देश्य का नारा लगाने वाली दो पार्टियां स्वाभाविक सहयोगी नहीं हो सकती हैं।

नीतीश कुमार और राजद इसलिए भी स्वाभाविक सहयोगी नहीं हैं क्योंकि नीतीश का राजनीतिक जीवन दरअसल राजद के कुशासन के कारण ही जीवित है। बिहार में लालू प्रसाद यादव के शासनकाल को बिहार की जनता याद भी नहीं करना चाहती है। जहां पूरा देश विकास के क्रम में किसी न किसी तरह आगे बढ़ रहा था तो वहीं बिहार अपने सबसे पिछड़े दौर में था, जहां पर क़ानून और व्यवस्था नामकी कोई चीज थी ही नहीं।

मूलभूत संरचनाएं नहीं थीं, जैसे बिजली, सड़क पानी! अपराधों में बिहार का कोई मुकाबला ही नहीं था और तत्कालीन अराजकता का ही परिणाम है कि लोगों ने अपना घर बार सब छोड़ दिया था। नीतीश कुमार ने जब भारतीय जनता पार्टी के साथ सरकार बनी और मुख्यमंत्री रहते हुए जनता की अपेक्षाओं को पूरा किया तो जनता भी कुशासन के उस दौर से बाहर निकली, जो लालू प्रसाद यादव ने उसे दे रखा था। बिजली, पानी, सड़क, स्वास्थ्य जैसी मूलभूत सुविधाओं पर कार्य करना आरम्भ किया और बिहार में निवेश लाना आरम्भ किया। एक समय था जब बिहार में नक्सलवाद की समस्या थी। जनता ने नक्सलियों के हमलों का आतंक भी बरसों झेला था और केंद्र में वर्ष 2014 में भारतीय जनता पार्टी की सरकार आने के बाद बिहार की एनडीए सरकार और केंद्र की एनडीए सरकार ने मिलकर इस समस्या से और बेहतर तरीके से लड़ाई की और इस समस्या को समेटने के लिए काफी कार्य किया।

नक्सलवाद की समस्या तब उभरती है जब भ्रष्टाचार एवं परिवारवाद अपने चरम पर होता है। कांग्रेस और लालू प्रसाद यादव दोनों ही दल इस मामले में एक ही थैली के चट्टे बट्टे हैं। या कहा जाए कि चोर चोर मौसेरे भाई हैं। जब संसाधनों पर आम जनता का कोई अधिकार नहीं होगा, जब व्यवस्था में उसका कोई स्थान नहीं होगा तो वह उसे जबरन छीनकर उसे हसिल करने का प्रयास करेगा। जब उसे व्यवस्था नहीं अपनाएगी तो वह अपनी व्यवस्था स्वयं बनाएगा।

लालू प्रसाद यादव और कांग्रेस के रहते आम लोगों को यह विश्वास ही नहीं था कि कोई आम व्यक्ति भी राजनीति या व्यवस्था में स्थान पा सकता है। मगर नीतीश कुमार और भारतीय जनता पार्टी दोनों ने आम जनता को अपने उदाहरणों के माध्यम से यह विश्वास दिलाया कि एक आम परिवार का व्यक्ति भी प्रदेश और देश की राजनीति में बड़ा स्थान पा सकता है। उसे भी सरकारी नौकरी मिल सकती है, वह भी व्यवस्था का हिस्सा बन सकता है।

परिवारवाद और भ्रष्टाचार से जैसे ही प्रदेश और देश बाहर निकलने लगा वैसे ही नक्सलवाद की समस्या का समाधान अपने आप होने लगा। जिस समस्या के कारण बिहार में कोई सहज रह नहीं सकता था, परिवारवाद का खात्मा होते ही यह समस्या भी अब अपने अंत की ओर है। हालांकि यह भी सच है कि परिवार चलाने वाले ही नक्सली आन्दोलन के समर्थक भी होते हैं, जिससे उनकी व्यवस्था पर असर न पड़े और गुनाहों की वैकल्पिक व्यवस्था में फंसकर आम नागरिक बर्बाद होता रहे। यही कारण है कि जहां नीतीश कुमार और केंद्र की एनडीए सरकार इस समस्या से बहुत कड़ाई और सूझबूझ से मुकाबला कर रही है तो वहीं लालू प्रसाद यादव नक्सलियों के खिलाफ कड़े कदम उठाने से भी बचते थे।

यदि इस मुद्दे को देखा जाए तो भी भारतीय जनता पार्टी और जनता दल यूनाइटेड स्वाभाविक सहयोगी हैं और परस्पर एक दूसरे के निकट हैं। यही कारण है कि नीतीश कुमार की जनता दल यूनाइटेड और  भारतीय जनता पार्टी की जोड़ी जब-जब एक साथ चुनावों में जनता से आशीर्वाद मांगने गयी तो मतदाताओं ने उनकी झोली मतों से भर दी। फिर चाहे लोकसभा का चुनाव हो या फिर विधानसभा का। यह पिछले विधानसभा चुनावों में भी देखा था जब इस गठबंधन को ही सरकार चलाने का आदेश जनता ने दिया था। मतों के लिए जहां एक ओर परिवारवादी पार्टियां तरसती रहीं हैं तो वहीं भारतीय जनता पार्टी और जनता दल यूनाइटेड की झोली जनता ने अपने वोटों से लगातार भरी है।
 

कांग्रेस का अहंकार

हाल ही में नीतीश कुमार ने जो कदम उठाया है, उसमें कांग्रेस का अहंकार सबसे बड़ा कारक है। कांग्रेस दरअसल अपनी आपातकाल वाली सोच से अभी तक बाहर नहीं आ पाई है। उसके लिए वही काल अभी तक चल रहा है जिसमें कहा गया था कि “इंदिरा इज इण्डिया”! अभी उसके लिए राहुल गांधी ही सबसे महत्वपूर्ण है। उसके लिए गांधी परिवार से बढ़कर कोई नहीं है। जहां एक दल अपने बेटे के लिए प्रदेश को दांव पर लगाए हुए है तो वहीं दूसरी ओर कांग्रेस गांधी परिवार के राहुल गांधी के हाथों में देश की बागडोर सौंपने के लिए व्याकुल है।

वह यह नहीं देख पा रही है और न ही समझ पा रही है कि क्या राहुल गांधी में देश चलाने की क्षमता है? परिवार में सत्ता की चाह करना और उसके लिए प्रयास करना बुरा नहीं है, परन्तु यह हठ कि केवल परिवार का ही व्यक्ति नेतृत्व करेगा, यह लोकतंत्र के लिए घातक है। और उस पर भी लालू प्रसाद यादव एवं कांग्रेस का नेतृत्व महिला विरोधी भी है। दोनों ही दल अपने-अपने बेटों का ही राजतिलक करने के लिए व्याकुल हैं। यह भी जनता देख रही है। जहाँ एक ओर भारतीय जनता पार्टी में महिलाओं को उचित प्रतिनिधित्व मिल रहा है तो वहीं दूसरी तरफ कांग्रेस में युवा और महिलाओं का कैरियर केवल इसलिए दबाया जा रहा है क्योंकि उनके युवराजों को प्रदेश और देश की गद्दी पर बैठाया जा सके।

वहीं इन दोनों ही कथित युवा नेताओं के अशिष्ट आचरण को जनता केवल देख ही नहीं रही है, बल्कि भर्त्सना भी कर रही है। यह भी हास्यास्पद है कि जिन राहुल गांधी को लेकर कांग्रेस इतनी भावुक है, उन्हीं राहुल गांधी को लेकर कांग्रेस के ही कई युवा नेता आश्वस्त नहीं हैं कि क्या वह जनता की अपेक्षाओं को समझ पाएँगे? और जहां जहां राहुल गांधी की न्याय यात्रा के कदम पड़ रहे हैं, वहां पर या तो कांग्रेस या फिर इंडी गठबंधन टूट रहा है। राहुल गांधी के लिए केवल उनका “मैं” अहम है और कुछ नहीं! उन्हें यह पता ही नहीं है कि आखिर गठबंधन में क्या चल रहा है? कैसे ममता बनर्जी अलग हो गईं, कैसे आम आदमी पार्टी उनके साथ खड़ा नहीं होना चाहती है, यही कारण है कि नीतीश का यह कदम न ही अस्वाभाविक है और न ही जनता को धोखा देना है।

वह अपनी श्रेष्ठता में इस हद तक डूबे हुए हैं कि उन्हें साथी दिखाई देते ही नहीं हैं। असम में जाकर उन्होंने अपने गांधी परिवार के घमंड में मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सर्मा के परिवार को भी भ्रष्ट कह दिया, जबकि यह पूरा देश जानता है कि किसकी सरकार में भ्रष्टाचार के ऐसे रिकार्ड्स बने जिन्हें कोई भी नहीं तोड़ना चाहेगा।

गांधी परिवार को यह बर्दाश्त ही नहीं होता है कि उनके अतिरिक्त कोई और सत्ता में आ भी सके, इसलिए वह हर उस व्यक्ति को अपमानित करते हैं जो उनसे योग्य होता है, जिसके भीतर नेतृत्व क्षमता होती है और वह उसे नेतृत्व करने ही नहीं देते हैं, इसके स्थान पर अपने इर्द-गिर्द चापलूसों का वह संसार बसाए रखते हैं, जो उनके झूठे अहंकार को तुष्ट करते हुए योग्य व्यक्तियों के विरुद्ध भड़काते रहते हैं।

यह नीतीश कुमार की बातों से स्पष्ट हुआ कि कैसे उनका अपमान हो रहा था और कोई भी व्यक्ति वहां नहीं रह सकता है जहां पर उसका अपमान हो और नीतीश वापस आ गए।

यह नीतीश कुमार की घर वापसी है और जिसका स्वागत किया जाना चाहिए क्योंकि अपना जब कोई किसी कारणवश दूसरी राह पर चला जाता है तो उसकी वापसी के लिए दरवाजे खुले रखना चाहिए!







अरविंद सिंह
(facebook/X handle : @arvindvnsingh
लेखक शोध पत्रिका “मंथन” के प्रबंध संपादक हैं।)

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