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भारत का मुक्त व्यापार समझौता और कृषि संरक्षण: एक व्यक्तिगत दृष्टिकोण

From deprivation to self-reliance: Transforming agriculture in Odisha

जब मैं भारत के वर्तमान व्यापार परिदृश्य को देखता हूँ, तो मुझे उस सावधानीपूर्वक बनाए गए संतुलन की याद आती है जिसे हमने हमेशा आर्थिक विकास और अपनी कृषि आधारभूत संरचना के संरक्षण के बीच बनाए रखने का प्रयास किया है। आज तक, भारत के 14 देशों के साथ मुक्त व्यापार समझौते (FTA) हैं। हमने हाल ही में यूनाइटेड किंगडम के साथ मुक्त व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं।

जब भी हम ऐसे समझौतों पर बातचीत करते हैं, तो हम कई कारकों पर विचार करते हैं। व्यापार केवल वस्तुओं का आदान-प्रदान नहीं है; यह राष्ट्रीय हितों की रक्षा के साथ-साथ विकास के अवसर पैदा करने के बारे में भी है। स्वतंत्रता के बाद के शुरुआती वर्षों यानी 1947- 1950 से लेकर अबत तक, भारत एक सिद्धांत द्वारा निर्देशित रहा है कि हम आयात और निर्यात दोनों सहित विभिन्न प्रकार के व्यापार में संलग्न रहेंगे, लेकिन हम अपनी कृषि स्थिरता से कभी समझौता नहीं करेंगे। शुरू से ही, हमने यह संकल्प लिया था कि हम कृषि उत्पादों का ऐसे आयात नहीं करेंगे, जिससे हमारे किसानों को नुकसान पहुँचे या हमारे कृषि क्षेत्र में असंतुलन पैदा हो। यह केवल एक नीति नहीं थी बल्कि यह एक लोकाचार था।  जो हमारे सांस्कृतिक मूल्यों के अनुरूप था। प्राचीन काल में जब ऋषि-मुनि राजाओं से मिलने आते थे, तो उनका आशीर्वाद अधिक भूमि या बड़ी सेना के लिए नहीं, बल्कि उपजाऊ खेतों, समय पर बारिश और भरपूर फसल के लिए होता था। कृषि को हमेशा समृद्धि का केंद्र माना जाता था।

मैं केवल एक नीति निर्माता के रूप में नहीं बल्कि खेती से गहराई से जुड़े व्यक्ति के रूप में भी बोल रहा हूँ। क्योंकि मेरा अधिकांश जीवन शहरों में बीता है, मेरे परिवार की जड़ें पीढ़ियों से कृषि में रही हैं। कभी हमारे पास बड़ी जोत थी, लेकिन सरकारी नियमों और बदलती नीतियों के कारण, हमने अपनी ज़मीन का एक बड़ा हिस्सा छोड़ दिया ताकि उस पर दूसरे किसान खेती कर सकें। आज मेरे पास कम ज़मीनें बची हैं, लेकिन मैं अभी भी खुद को एक किसान मानता हूँ। शायद इस नीतिगत बैठक के दायरे में बैठा सबसे छोटा किसान मैं ही हूं। इस व्यक्तिगत पृष्ठभूमि ने व्यापार समझौतों और कृषि नीति पर मेरे विचारों को आकार दिया है। मैं खेती के संघर्षों को समझता हूँ- मौसम की अनिश्चितताएँ, उत्पादन की चुनौतियाँ और उपज के भंडारण और बिक्री में आने वाली कठिनाइयाँ सभी किसान झेलते हैं।

पिछले कुछ वर्षों में, हम विभिन्न प्रकार के अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में शामिल रहे हैं—द्विपक्षीय समझौते, बहुपक्षीय व्यवस्थाएँ और व्यापक आर्थिक साझेदारियाँ। चार दशकों से भी अधिक समय से, मैं अनुसंधान और सूचना प्रणाली (आरआईएस) के माध्यम से नीतिगत चर्चाओं में शामिल रहा हूँ, जो भारत के व्यापार संबंधों का अध्ययन करने और सरकार को सलाह देने के लिए समर्पित एक संस्था है।

जब हम व्यापार सौदों पर बातचीत करते हैं, तो कृषि उत्पादों को बाहर रखा जाता है। इस रुख के कारण कभी-कभी टकराव की स्थिति पैदा हुई है, खासकर संयुक्त राज्य अमेरिका के साथ। उनकी मुख्य चिंता यह है कि भारत अपने कृषि बाज़ार को अमेरिकी उत्पादों के लिए खोलने से इनकार कर रहा है। अमेरिकी चाहते हैं कि उनकी आनुवंशिक रूप से संशोधित फसलें और सब्सिडी वाली उपज हमारे बाज़ार में आए, जिससे अमेरिकी किसानों को फ़ायदा हो लेकिन भारतीय किसानों को नुकसान हो।

 लेकिन हम अड़े रहे हैं। हमने उन्हें साफ़-साफ़ बता दिया है कि हम अन्य क्षेत्रों में व्यापार पर चर्चा करने को तैयार हैं, लेकिन कृषि उत्पादों पर बातचीत नहीं होगी। चाहे जितना दबाव बनाया जाए—चाहे 200% टैरिफ़ लगाने की धमकी के रूप में हो या अन्य आर्थिक उपाय—हमने पूर्ववर्ती रुख़ बनाए रखा है। हमने आनुवंशिक रूप से संशोधित (जीएम) फसलों को अपने बाज़ारों में स्वीकार करने से भी इनकार कर दिया है, जिससे हमारे किसानों की आजीविका और उपभोक्ताओं के स्वास्थ्य दोनों की रक्षा हो रही है।

कृषि नीति में, तीन पहलू महत्वपूर्ण हैं: खेती, भंडारण और बिक्री। उपर से देखने में ये भले ही सरल लगें, लेकिन ये जटिल और आपस में जुड़े हुए हैं। खेती के लिए ज्ञान, लचीलेपन और पर्यावरणीय चुनौतियों के अनुकूलन की आवश्यकता होती है। किसानों को न केवल आर्थिक दबावों से, बल्कि प्रकृति की अप्रत्याशितता यथा- सूखा, बाढ़, बेमौसम बारिश से भी जूझना पड़ता है।

भंडारण भी उतना ही महत्वपूर्ण है, क्योंकि अपर्याप्त भंडारण से फसल कटाई के बाद नुकसान होता है। उचित सुविधाओं के अभाव में, किसान अक्सर कम कीमतों पर बेचने को मजबूर होते हैं। बिक्री में उचित बाजार पहुँच सुनिश्चित करना, शोषण को रोकना और कुशल आपूर्ति श्रृंखलाएँ बनाना शामिल है। आजकल, जैविक खेती पर बहुत चर्चा हो रही है। ऐतिहासिक रूप से, भारतीय कृषि पूरी तरह से जैविक थी। हालाँकि रासायनिक उर्वरकों के लगातार अत्यधिक उपयोग ने हमारी मिट्टी को खराब कर दिया और हमारी उपज के पोषक मूल्य को कम कर दिया। जैविक तरीकों की ओर लौटना आवश्यक है—न केवल स्वास्थ्य और पर्यावरणीय कारणों से, बल्कि इसलिए भी कि पोषक तत्वों से भरपूर फसलें बौद्धिक और सामाजिक विकास में योगदान देती हैं।

हालाँकि, यह मानना अवास्तविक है कि भारत अल्पावधि में केवल जैविक खेती के माध्यम से पूरी तरह आत्मनिर्भर हो सकता है। हमें एक संतुलित दृष्टिकोण की आवश्यकता है-  धीरे-धीरे मिट्टी की गुणवत्ता को बहाल करते हुए, अपनी 1.4 अरब की आबादी के लिए पर्याप्त उत्पादन सुनिश्चित करना और यहाँ तक कि अधिशेष उपज का निर्यात भी करना। अपनी सीमाओं के बावजूद, हम पहले से ही अपनी विशाल आबादी का भरण-पोषण करते हैं और कृषि उत्पादों का निर्यात करते हैं। दिलचस्प बात यह है कि चीन, संयुक्त राज्य अमेरिका और यूरोपीय देश—अपनी जीएम फसलों की खेती के बावजूद—कृषि उत्पादों के सबसे बड़े आयातकों में से हैं। इससे पता चलता है कि जीएम फसलें खाद्य सुरक्षा के लिए कोई रामबाण उपाय नहीं हैं।

वर्तमान युग में कृषि एक वैश्विक संघर्ष के केंद्र में है—खाद्य प्रणालियों पर नियंत्रण का एक मौन युद्ध। कई शक्तिशाली राष्ट्र और निगम कृषि व्यापार पर अपना दबदबा बनाना चाहते हैं। भारत शायद एकमात्र ऐसा देश है जिसके पास इस दबाव का विरोध करने और दुनिया को एक स्थायी मॉडल पेश करने की क्षमता और इच्छाशक्ति दोनों हैं। ऐसा करने के लिए, हमें अपनी घरेलू नीतियों को, विशेष रूप से जल प्रबंधन और भूमि उपयोग के क्षेत्र में, मजबूत करना होगा।

कृषि में सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक असमान जल वितरण है। कुछ क्षेत्रों में पानी की अधिकता है, जबकि अन्य क्षेत्रों में इसकी लगातार कमी है। नीतिगत चर्चाओं में, मैंने नदियों की बजाय जल बेसिनों को आपस में जोड़ने की वकालत की है।

नदियों को वास्तव में जोड़ा नहीं जा सकता, लेकिन बुनियादी ढाँचा परियोजनाओं के माध्यम से जल स्रोतों को आपस में जोड़ा जा सकता है। प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल के दौरान, मैं इस विचार पर शोध करने वाली एक समिति में शामिल था। दुर्भाग्य से, 2004 में हुए राजनीतिक परिवर्तनों के कारण यह कार्य रुक गया।

हालाँकि, हमारा लक्ष्य अभी भी यही है कि यह सुनिश्चित किया जाए कि कोई भी कृषि भूमि पानी की कमी के कारण बंजर न रहे। यह दृष्टिकोण हाल के दशकों में देखे गए अनियोजित शहरीकरण को भी धीमा कर सकता है। अक्सर सिंचाई रहित भूमि को "गैर-कृषि" घोषित कर दिया जाता है और शहरी उपयोग के लिए परिवर्तित कर दिया जाता है। शहर फैलते हैं, कृषि के लिए निर्धारित पानी का उपभोग करते हैं और बर्बादी बढ़ती है। अगर हम ऐसी भूमि पर सिंचाई की व्यवस्था करें, तो हम कृषि क्षेत्रों को संरक्षित कर सकते हैं और ग्रामीण आजीविका में सुधार कर सकते हैं। मध्य प्रदेश में केन-बेतवा परियोजना इस अवधारणा का एक उदाहरण है अर्थात् अतिरिक्त जल वाले क्षेत्रों से ज़रूरतमंद क्षेत्रों तक पानी पहुँचाना।

भारत को सुजलाम सुफलाम अर्थात् जल और फसलों से समृद्ध बनाए रखने के लिए, हमें नीतिगत स्तर पर तीन प्राथमिकताओं पर ध्यान देना होगा:

1. आधुनिक तकनीक और पारंपरिक ज्ञान के बीच संतुलन बनाते हुए, टिकाऊ तरीकों से उत्पादन (खेती) बढ़ाना।

2. भंडारण के बुनियादी ढांचे में सुधार करना ताकि किसानों को मजबूरन बिक्री के लिए मजबूर न होना पड़े।

3. जल बेसिनों को आपस में जोड़कर समान जल वितरण सुनिश्चित करना, जिससे कृषि योग्य भूमि की मात्रा अधिकतम हो सके।

इसके लिए किसानों, सरकार और व्यापारियों के बीच सहयोग आवश्यक है। किसान खेती का काम संभालते हैं, सरकार भंडारण और बुनियादी ढांचे का समर्थन करती है और व्यापारी उचित बाजार पहुँच सुनिश्चित करते हैं। केवल ऐसे समन्वय से ही हम भारत के कृषि भविष्य को सुरक्षित कर सकते हैं।




डॉ. शेषाद्रि रामानुजन चारी
एमेरिटस प्रोफेसर
रक्षा एवं सामरिक अध्ययन विभाग,
सावित्रीबाई फुले विश्वविद्यालय, पुणे

(यह लेख लेखक द्वारा नई दिल्ली में आयोजित वर्जिन लैंड सिक्योरिटी समिट 2025 में दिए गए भाषण पर आधारित है।)

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