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आर्थिक सेहत के लिए मुफ्तिया योजनाओं पर लगाम जरूरी

Controlling freebie schemes is essential for economic health

 

 


उमेश
चतुर्वेदी

  भी मानसून के आने में देर है, लेकिन हालिया विधानसभा चुनाव वाले राज्यों में मुफ्तिया वायदों को पूरा करने की बरसात शुरू हो चुकी है। इसके साथ ही राज्यों के खजाने पर भारी बोझ बढ़ने की आशंका बढ़ने लगी है। आर्थिक जानकारों का मानना है कि अकेले इन्हीं राज्यों में मुफ्तिया योजनाओं पर आने वाले दिनों में एक लाख करोड़ का खर्च आने वाला है। जाहिर है कि इससे राज्यों की अर्थव्यवस्था पर बुरा असर पड़ेगा। जिससे इन राज्यों की आने वाले दिनों में आर्थिक सेहत गड़बड़ होगी।

मुफ्तिया योजनाओं यानी फ्रीबीज से होने वाले नफा-नुकसान की चर्चा से पहले जान लेते हैं कि जिन राज्यों में अभी चुनाव हुए हैं, उनके यहां मोटे तौर कौन-सी योजनाएं चलाई जाने वाली हैं या शुरू की जा चुकी है। हाल के वर्षों में महिलाएं अलग से वोट बैंक के रूप में उभरी हैं, इसलिए इन दिनों हर राजनीतिक दल चुनावों से पहले महिलाओं को लुभाने के लिए सौगातों का चुनावी वायदा जरूर करता है। सबसे पहले चर्चा करते हैं तमिलनाडु की। राज्य की सी. जोसेफ विजय की सरकार महिलाओं को 'कलाइग्नार मगलीर उरिमाई थोगई' योजना के तहत 1,000 रुपये मासिक की आर्थिक सहायता देने का ऐलान कर चुकी है। साथ ही, वह राज्य की सरकारी बसों में उन्हें मुफ्त यात्रा की सहूलियत दे चुकी है। याद रखना चाहिए कि तमिलनाडु ही पहला राज्य है, जहां दो रूपए किलो चावल देने के रूप में मुफ्तिया योजना की शुरूआत हुई थी। मोटे तौर पर इस राज्य में या तो डीएमके या फिर एआईडीएमके की सरकारें रही हैं। हर सरकार ने बेटी की शादी में गहने और आर्थिक सहायता के साथ ही कई सहूलियतें दी हैं। यहां याद किया जाना चाहिए कि विजय ने चुनावी वायदा किया है कि महिलाओं को मासिक रूपए से मिलने वाली हजार रूपए की रकम को चरणबद्ध तरीके से ढाई हजार रूपए किया जाएगा। इसके साथ ही  राज्य के हर पात्र परिवार को "अन्नपूर्णि सुपर सिक्स" योजना के तहत साल में 6 रसोई गैस सिलेंडर मुफ्त देने का भी प्रावधान किया गया है। विजय सरकार इसके साथ ही अन्नन सिर थिट्टा योजना के तहत राज्य के पात्र गरीब परिवारों की बेटियों की शादी के समय सरकार की ओर से 8 ग्राम सोना और रेशमी साड़ी देने का भी प्रावधान करने जा रही है। इसके साथ ही पहली से 12वीं तक के छात्रों की माताओं को सालाना 15,000 रुपये की छात्रवृत्ति और नवजात शिशुओं के लिए वेलकम किट देने की विजय सरकार की योजना है।

अब बात करते हैं तमिलनाडु के पड़ोसी राज्य केरल की। जहां कांग्रेस की अगुआई वाली संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा यानी यूडीएफ की सरकार ने वीडी सतीशन की अगुआई में कामकाज संभाल लिया है। इस सरकार ने अपनी पहली कैबिनेट बैठक में महिलाओं के लिए कई सौगातें देने का ऐलान किया है। इसके तहत राज्य की सरकारी बसों में 15 जून से महिलाओं को मुफ्त यात्रा की सुविधा देने की तैयारी है। इसके साथ ही राज्य की आशा कार्यकर्ताओं के मानदेय में ₹3000 प्रति माह और आंगनवाड़ी सहायिकाओं, रसोइयों एवं प्री-प्राइमरी शिक्षकों के मानदेय में ₹1000 प्रति माह की बढ़ोतरी को मंजूरी दे दी गई है।

विशेष महिला सुरक्षा कोष: राज्य में यौन अपराधों, घरेलू हिंसा और एसिड अटैक की पीड़ित इसके साथ ही विधवा, परित्यक्त, और जरूरतमंद महिलाओं को प्रतिमाह ₹1000 की वित्तीय सहायता देने का ऐलान हो चुका है।

इसी तरह पश्चिम बंगाल की नई शुभेंदु अधिकारी सरकार ने महिलाओं के लिए 'अन्नपूर्णा योजना' को मंजूरी दे दी है, जिसके तहत 25 से 60 वर्ष के बीच की पात्र महिलाओं को हर महीने ₹3,000 सीधे उनके आधार-लिंक बैंक खातों में ट्रांसफर किए जाएंगे। यह नई योजना ममता सरकार की पुरानी 'लखबीर भंडार' योजना की तुलना में काफी बड़ी वित्तीय सहायता है। इसके साथ ही एक जून से राज्य की महिलाएं सरकारी बसों में पूरी तरह से मुफ्त सफर कर सकेंगी। ममता सरकार के दौरान लखबीर योजना के तहत जहां सामान्य वर्ग की महिलाओं को  1,500 और एससी एवं एसटी वर्ग की महिलाओं को 1,700 रूपए प्रतिमाह मिलते थे। इस योजना के लाभार्थियों को भी अन्नपूर्णा योजना में शामिल कर लिया गया है। इसके तहत उन्हें बढ़ी हुई रकम मिलेगी।

पश्चिम बंगाल के पड़ोसी असम में मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा की सरकार महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण के लिए पहले से ही 'ओरुनोदोई' जैसी प्रमुख योजना चला रही है। इस योजना के तहत राज्य की 40 लाख महिलाओं को वित्तीय सहायता मिल रही है।  ओरुनोदोई योजना के तहत महिलाओं के बैंक खातों में सीधे नकद ट्रांसफर किए जाते हैं। इसके तहत बिहू बोनस और बकाया राशि मिलाकर करीब नौ हजार रूपए तक दिए गए हैं। पिछले साल के आखिरी दिनों में बिहार में विधानसभा चुनाव हुए थे। ऐन चुनावों से पहले राज्य में भी इसी तरह महिलाओं को सीधे 38,000 करोड़ रुपये का भुगतान किया गया।

कुछ साल पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मुफ्तिया योजनओं पर राष्ट्रीय स्तर पर बहस की शुरूआत की थी, लेकिन इसे राजनीतिक दलों ने एक तरह से नकार दिया था। मुफ्तिया योजना हर राज्य की आर्थिक सेहत के लिए खराब है। इन योजनाओं ने राज्यों में काम करने वाली प्रवृत्ति को भी बढ़ावा दिया है। लेकिन चुनावी हार की आशंका के चलते कोई भी राजनीतिक दल इससे किनारा करने की सोच भी नहीं रहा। मुफ्तिया योजनाओं से बिगड़ती आर्थिक सेहत की जानकारी हर राज्य को है, इसलिए फ्लेमिंगों पक्षी की तरह हर दल एक तरह से सामूहिक तौर पर आर्थिक आत्महत्या कर रहे हैं। इसे रोकने के लिए आगे आने की कोशिश कोई नहीं कर रहा है। उल्टे पिछले दो-तीन बरसों में देश में मुफ्त कल्याणकारी योजनाएं तेजी से बढ़ी हैं।

बिहार सरकार ने जब पिछले विधान सभा चुनावों के दौरान मोटी रकम कल्याणकारी योजना में खर्च की, इसके बाद सरकार के पास जरूरी खर्चों के लिए रकम ही नहीं बची। नतीजतन,राज्य में नई सरकार को बिजली दरें बढ़ाना पड़ा और बुनियादी ढांचे से जुड़े कामकाज ठप पड़ गए। राज्य के सामने वित्तीय संकट से निपटने के लिए शराबबंदी हटाने का विकल्प अब विचाराधीन है। इसी तरह मुफ्तिया योजना लागू करने से देवभूमि कहे जाने वाले हिमाचल में सरकारी कर्मचारियों को वेतन देने में परेशानी होने लगी है। लाडली बहना योजना के जरिए महिलाओं को साधने में अगुआ रहे मध्य प्रदेश की आर्थिक सेहत कैसी है, इसी से अंदाजा लगाया जा रहा है कि उसे लगातार कर्ज लेना पड़ रहा है। मुफ्तिया योजनाओं से तकरीबन हर राज्य की आर्थिक सेहत खराब हो रही है। केंद्र सरकार की रिपोर्ट में भी इस पर चिंता जताई गई है। 2025-26 के बजट के अनुसार, केवल महिलाओं वाली सीधे ट्रांसफर वाली स्कीमों पर राज्यों का खर्च 1,68,040 करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है। इससे वित्त वर्ष 2026 में राजस्व खर्च 7 से 9 प्रतिशत तक बढ़ सकता है। बढ़ा हुआ राजस्व खर्च विकास कार्यों पर असर डालता है। सड़क, पुल, बांध जैसे इन्फ्रा प्रॉजेक्ट पर यही पैसा लगाया जा सकता था। ऐसा नहीं होने पर नए रोजगार के सृजन पर भी प्रभाव पड़ता है। स्कूल-कॉलेज और कौशल विकास में सुस्ती से भविष्य में तरक्की धीमी हो सकती है। माना जा रहा है कि अगले साल उत्तर प्रदेश चुनाव से पहले भी ऐसी योजनाएं लागू की जा सकती हैं।

असम, केरल, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल और पुडुचेरी में विधानसभा चुनाव से पहले 37,000 करोड़ रुपये कल्याणकारी योजनाओं पर खर्च किए गए। इनमें 20,000 करोड़ सिर्फ कैश ट्रांसफर थे। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर फ्रीबीज का सिलसिला जारी रहा तो सालाना एक लाख करोड़ रुपये का खर्च होगा। वैसे मुफ्तिया योजना के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय में मामला लंबित है। भारत में अब तक हुए ज्यादातर चुनाव सुधार सुप्रीम कोर्ट के फैसलों से हुए हैं। चुनाव में हलफनामा देने की व्यवस्था सुप्रीम कोर्ट के आदेश से लागू की गई। इसके बाद से उम्मीदवारों के लिए अपने खिलाफ चल रहे मामलों, अपनी आय आदि का विवरण देना अनिवार्य हो गया है। इसे गलत पाए जाने पर चुनाव जीतने के बाद दोषी नेता की संसद या विधानमंडल की सदस्यता जा सकती है। ठीक इसी तरह चुनाव मैदान में उतरने जा रहे राजनीतिक दलों को मुफ्तिया योजनाओं की घोषणा करने से सुप्रीम कोर्ट ही रोक सकता है, राजनीतिक दल अपने सियासी फायदे के लिए खुद को संयमित करने से रहे। अव्वल तो राजनीतिक दलों को मिलकर खुद मुफ्तिया योजनाओं पर रोक लगानी चाहिए थी, लेकिन ऐसा होता नहीं दिख रहा। इसलिए उम्मीद सर्वोच्च न्यायालय से ही की जा सकती है, क्योंकि अभी जनता इतनी समझदार और परिपक्व नहीं हुई है कि वह खुद से अपने राज्य या देश की आर्थिक सेहत की चिंता कर सके और राजनीतिक दलों पर कम से कम इस लिहाज से लगाम लगा सके। देश के प्रबुद्ध तबके और सिविल सोसायटी ही इस संदर्भ में जनता को जागरूक कर सकते हैं। तभी जाकर आर्थिक सेहत के लिए बोझ बनी मुफ्तिया योजनाओं पर साझे तौर पर लगाम लगाई जा सकेगी और देश की आर्थिक सेहत को ठीक रखते हुए उसे विकसित बनाने के सपने को साकार किया जा सकेगा।

(आलेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं। उनसे संपादक प्रकाशक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है। किसी भी विवाद की स्थिति में हमारा न्याय क्षेत्र दिल्ली होगा।)

 

 

 

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