बिहार में राजनीति ने एक बार फिर करवट बदली है। जिसके साथ ही नीतीश कुमार ने फिर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के साथ जुड़कर अपनी कुर्सी बचा ली। हालांकि सत्ता में उनकी वापसी ने कई सवाल जरुर खड़े किये हैं। बिहार की राजनीति के इन नए परिप्रेक्ष्य को समझने के लिए उस माहौल को समझना जरूरी है जिसने बिहार के राजनीतिक परिदृश्य को इन नए मोड़ तक पहुंचाया है। साल 2021 में जब राज्य में विधानसभा चुनाव हुए थे, तब जनादेश राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के पक्ष में था। जिसमें भाजपा को 74 और जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) को 43 सीटों पर जीत मिली थी। हालाँकि उस चुनाव में राष्ट्रीय जनता दल (राजद) 75 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरा था। लेकिन जनादेश भाजपा-जदयू गठबंधन को मिला था। जिन्होंने साथ मिलकर चुनाव लड़ा था। जिसे देखते हुए भाजपा के साथ दोबारा गठबंधन करने के नीतीश कुमार के फैसले को जनता के साथ विश्वासघात नहीं कहा जा सकता। नीतीश कुमार की 26 वर्षों से अधिक की राजनीतिक यात्रा भाजपा के साथ गहराई से जुड़ी हुई है। हालांकि उन दोनों के गठबंधन में उतार-चढ़ाव तो बहुत से आए, लेकिन दोनों के बीच संबंध बने रहे। नीतीश कुमार आपातकाल विरोधी आंदोलन से उभरे हैं। ऐसे में उनकी राजनीतिक विचारधारा कांग्रेस और उसके सहयोगियों से बिल्कुल विपरीत है। भाजपा-जदयू गठबंधन का फिर से उभरना सुशासन और विकास के प्रति दोनों पार्टियों की साझा प्रतिबद्धता को दर्शाता है, जो राष्ट्रीय जनता दल के जंगलराज की विरासत से अलग है। बिहार में लालू प्रसाद यादव और उनके परिवार का शासनकाल प्रशासनिक विफलताओं, आर्थिक स्थिरता और घोर अराजकता से भरा था। मुख्यमंत्री के रूप में नीतीश कुमार ने अपने कार्यकाल में उस स्याह अतीत से हटकर बुनियादी ढांचे के विकास, कानून और व्यवस्था और निवेश को आकर्षित करने पर ध्यान केंद्रित किया। भाजपा-जदयू गठबंधन के दौरान बिहार में नक्सलवाद जैसी गंभीर चुनौती से सफलतापूर्वक निपटा गया। जो कि लालू यादव के शासनकाल की देन थी। जदयू और राजद के बीच जो मतभेद हैं, वह उनके बीच की वैचारिक मतभिन्नता को दर्शाता है। हालाँकि दोनों एक ही राजनीतिक आंदोलन से उभरे, लेकिन बाद में चलकर उनके रास्ते बिल्कुल अलग हो गए। इंदिरा गांधी के आपातकाल के विरोध में जन्मी राजद ने हमेशा से कांग्रेस का पल्लू थामे रखा। जबकि नीतीश ने कांग्रेस को कभी महत्व नहीं दिया। यह नीतीश और लालू के बीच का मुख्य फर्क है। इसके अलावा लालू ने अपने परिवार के आगे कुछ नहीं सोचा, जबकि नीतीश कभी भी अपने परिवार के किसी सदस्य को राजनीति में नहीं लाए।
भाजपा-जदयू गठबंधन के संबंधों की गहराई की एक यह भी वजह है, कि दोनों ही अलग-अलग पृष्ठभूमि के व्यक्तियों को राजनीति और शासन में भाग लेने के अवसर प्रदान करते हैं। यह वंशवादी राजनीति के बिल्कुल विपरीत है, जो योग्यता को दबाती है और भाई-भतीजावाद को कायम रखती है। महिलाओं और युवाओं को सशक्त बनाने पर एनडीए गठबंधन का जोर समावेशी विकास के लिए बिहार की आकांक्षाओं को दर्शाता है। बिहार में हालिया घटनाक्रम भी कांग्रेस की आंतरिक चुनौतियों और वंशवाद की राजनीति के प्रति उसकी प्रतिबद्धता को दिखाता है। परिवर्तन को स्वीकार करने में कांग्रेस पार्टी की अनिच्छा और गांधी परिवार पर उसकी निर्भरता दिखाती है कि कांग्रेस का जमीनी हकीकतों से कोई वास्ता नहीं रह गया है। बिहार की जनता ऐसे स्थापित वंशवादी पदानुक्रमों से तंग आ चुकी है। नीतीश कुमार की एनडीए में वापसी आत्म-सम्मान और स्वाभिमान से प्रेरित घर वापसी का प्रतीक है। एनडीए के साथ फिर से जुड़ने का नीतीश कुमार का निर्णय उनके मूल वैचारिक सिद्धांतों के अनुसरण और बिहार के विकास के प्रति उनकी प्रतिबद्धता को दर्शाता है। लोकतंत्र में, राजनीतिक गठबंधन व्यक्तिगत अहंकार और वंशवादी महत्वाकांक्षाओं से परे, साझा मूल्यों और आकांक्षाओं के आधार पर विकसित होते हैं। बिहार राज्य नीतीश कुमार के नेतृत्व में एक नए अध्याय की शुरुआत कर रहा है। जिसकी आकांक्षा सुशासन, प्रगति और समावेशी विकास पर टिकी हुई है। आगे की चुनौतियों को सामना करने के लिए पक्षपात और व्यक्तिगत एजेंडे को परे हटाना जरुरी है। नीतीश कुमार का नया राजनीतिक कदम उनके लचीलेपन और समय की मांग को भांपने की क्षमता का प्रतीक है। उनके पास बिहार के जटिल राजनीतिक समीकरणों को सुलझाने की पर्याप्त क्षमता मौजूद है। बिहार की जनता एनडीए में नीतीश कुमार की वापसी का स्वागत करते हुए राज्य के लोकतांत्रिक मूल्यों और नागरिकों के उज्जवल भविष्य के लिए आकुल है। इस बदले हुए परिदृश्य में बिहार अपनी नई यात्रा शुरु कर रहा है। आइए हम भी इस समय को न्याय, समानता और प्रगति के सिद्धांतों द्वारा निर्देशित नवीनीकरण और परिवर्तन के अवसर के रूप में स्वीकार करें।

दीपक कुमार रथ
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