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वैश्विक संकट के दौर में भारत की नई आर्थिक कूटनीति

India's new economic diplomacy in times of global crisis

 

क्यों पीएम मोदी का यह विदेश दौरा केवल कूटनीति नहीं, बल्कि भारत के आर्थिक भविष्य की पुनर्संरचना है

  


बिंदिया कुमारी

भारत की राजनीति में एक दिलचस्प प्रवृत्ति लंबे समय से दिखाई देती रही है। जैसे ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी किसी विदेश यात्रा पर निकलते हैं, विपक्ष का एक वर्ग उसे “इवेंट मैनेजमेंट” या “छवि निर्माण” कहकर खारिज करने की कोशिश करता है। लेकिन समस्या यह है कि विपक्ष आज भी 1990 और 2000 के दशक की उस सोच में अटका हुआ है, जहां विदेश नीति का अर्थ केवल औपचारिक मुलाकातें, संयुक्त बयान और कैमरों के सामने मुस्कुराहट तक सीमित था। वह यह समझने में असफल रहा है कि 21वीं सदी की दुनिया में विदेश नीति अब केवल कूटनीति नहीं, बल्कि राष्ट्रीय आर्थिक सुरक्षा का सबसे महत्वपूर्ण उपकरण बन चुकी है।

यही कारण है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की 15 से 20 मई तक की पांच देशों—संयुक्त अरब अमीरात, नीदरलैंड, स्वीडन, नॉर्वे और इटली—की यात्रा को केवल एक सामान्य राजनयिक दौरे के रूप में देखना एक गंभीर भूल होगी। यह यात्रा उस समय हो रही है जब दुनिया एक नए भू-आर्थिक संकट के मुहाने पर खड़ी है। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के आसपास बढ़ता तनाव वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति को अस्थिर कर रहा है। रेड सी और पश्चिम एशिया के समुद्री मार्गों में बढ़ती असुरक्षा ने सप्लाई चेन को झकझोर दिया है। यूरोप रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद अपनी औद्योगिक संरचना को दोबारा गढ़ने में लगा है। चीन के साथ बढ़ती रणनीतिक प्रतिस्पर्धा ने टेक्नोलॉजी और चिप सप्लाई चेन को भू-राजनीतिक हथियार बना दिया है। ऐसे समय में भारत अब केवल घटनाओं पर प्रतिक्रिया देने वाला राष्ट्र नहीं रहना चाहता। वह बदलती वैश्विक व्यवस्था के भीतर अपनी नई जगह सुनिश्चित करना चाहता है।

यही इस यात्रा का वास्तविक अर्थ है। यह पारंपरिक विदेश नीति नहीं, बल्कि संकट के समय की आर्थिक कूटनीति है।

इस यात्रा की शुरुआत संयुक्त अरब अमीरात से होना अपने आप में एक बड़ा रणनीतिक संकेत है। वर्तमान वैश्विक परिस्थितियों में भारत के सामने सबसे बड़ा प्रश्न ऊर्जा सुरक्षा का है। भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक देश है और उसकी आर्थिक वृद्धि ऊर्जा आपूर्ति की स्थिरता पर निर्भर करती है। होर्मुज क्षेत्र में किसी भी प्रकार की अस्थिरता सीधे भारतीय अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर सकती है। ऐसे में यूएई भारत के लिए केवल एक खाड़ी सहयोगी नहीं, बल्कि ऊर्जा सुरक्षा का प्रमुख स्तंभ बन चुका है।

पिछले दस वर्षों में भारत और यूएई के संबंधों में जिस प्रकार का परिवर्तन आया है, वह अभूतपूर्व है। दोनों देशों के बीच व्यापार तेजी से बढ़ा है और 200 अरब डॉलर के लक्ष्य की दिशा में काम हो रहा है। यूएई पहले ही भारत का तीसरा सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार बन चुका है। वहां रहने वाले लगभग 45 लाख भारतीय इस रिश्ते को केवल आर्थिक नहीं, बल्कि सामाजिक और रणनीतिक गहराई भी देते हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यूएई अब पारंपरिक OPEC+ ढांचे से आगे बढ़कर अधिक लचीली ऊर्जा नीति की ओर बढ़ रहा है। भारत के लिए यह बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि आने वाले वर्षों में ऊर्जा बाजार केवल कीमतों का नहीं, बल्कि भू-राजनीतिक नियंत्रण का भी केंद्र बनने वाला है।

दरअसल, मोदी सरकार यह समझ चुकी है कि यदि भारत को 5 ट्रिलियन डॉलर और उससे आगे की अर्थव्यवस्था बनना है, तो केवल घरेलू उत्पादन बढ़ाना पर्याप्त नहीं होगा। उसे वैश्विक ऊर्जा मार्गों, बंदरगाहों और सप्लाई चेन में अपनी रणनीतिक उपस्थिति भी मजबूत करनी होगी। यूएई इस पूरी रणनीति का केंद्रीय बिंदु बन चुका है।

ऊर्जा सुरक्षा के बाद इस यात्रा का दूसरा बड़ा आयाम है तकनीकी संप्रभुता। यही कारण है कि नीदरलैंड इस दौरे का अत्यंत महत्वपूर्ण पड़ाव बनकर उभरा है। आम तौर पर भारतीय राजनीतिक विमर्श में नीदरलैंड को उतना महत्व नहीं दिया जाता, लेकिन वास्तविकता यह है कि आज यूरोप की हाई-टेक और सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम में उसकी भूमिका निर्णायक है। दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण चिप मशीन निर्माण कंपनियों में शामिल ASML जैसी संस्थाएं इसी क्षेत्र में स्थित हैं। वैश्विक चिप उद्योग का नियंत्रण अब केवल व्यापारिक प्रश्न नहीं रह गया है, यह राष्ट्रीय सुरक्षा और आर्थिक प्रभुत्व का मुद्दा बन चुका है।

भारत और नीदरलैंड के बीच व्यापार 27 अरब डॉलर से आगे निकल चुका है, जबकि डच निवेश लगातार बढ़ रहा है। लेकिन इन आंकड़ों से कहीं अधिक महत्वपूर्ण वह टेक्नोलॉजिकल नेटवर्क है, जिसमें भारत प्रवेश करने की कोशिश कर रहा है। पिछले कुछ वर्षों में भारत ने सेमीकंडक्टर क्षेत्र में अभूतपूर्व सक्रियता दिखाई है। टाटा समूह और वैश्विक टेक कंपनियों के साथ हुए समझौते इसी दिशा का हिस्सा हैं। 27 से अधिक सेमीकंडक्टर-संबंधित समझौतों का उद्देश्य स्पष्ट है—भारत केवल दुनिया का उपभोक्ता बाजार बनकर नहीं रहना चाहता, बल्कि वह वैश्विक तकनीकी उत्पादन श्रृंखला का एक निर्णायक केंद्र बनना चाहता है।

यह बदलाव इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि कोविड महामारी और चीन पर अत्यधिक निर्भरता ने पश्चिमी देशों को यह एहसास करा दिया कि भविष्य की अर्थव्यवस्था को “China Plus One” मॉडल की आवश्यकता होगी। भारत इसी अवसर को पकड़ने की कोशिश कर रहा है। मोदी सरकार यह समझती है कि आने वाले दशकों में वही देश वैश्विक शक्ति बनेगा, जो ऊर्जा और डेटा दोनों की सप्लाई चेन को नियंत्रित करेगा।

इस यात्रा का तीसरा महत्वपूर्ण पड़ाव स्वीडन है। पहली नजर में यह दौरा सामान्य औद्योगिक साझेदारी जैसा दिखाई दे सकता है, लेकिन इसके पीछे कहीं अधिक गहरी रणनीति छिपी हुई है। प्रधानमंत्री मोदी, स्वीडन के प्रधानमंत्री उल्फ क्रिस्टर्सन और यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन का एक साथ यूरोप के शीर्ष औद्योगिक नेतृत्व को संबोधित करना एक स्पष्ट संकेत है कि भारत अब यूरोप के साथ केवल व्यापार नहीं करना चाहता। वह यूरोप की भविष्य की औद्योगिक संरचना का हिस्सा बनना चाहता है।

स्वीडन लंबे समय से Innovation Economy, Green Technology और Advanced Manufacturing का वैश्विक केंद्र रहा है। भारत-स्वीडन व्यापार लगातार बढ़ रहा है और स्वीडिश कंपनियां भारत को केवल एक बाजार के रूप में नहीं, बल्कि उत्पादन और अनुसंधान के नए केंद्र के रूप में देखने लगी हैं। यह वही परिवर्तन है जिसकी नींव “मेक इन इंडिया”, “पीएलआई स्कीम” और विनिर्माण सुधारों के माध्यम से पिछले दस वर्षों में रखी गई।

दरअसल, यूरोप इस समय अपनी “ग्रीन इंडस्ट्रियल ट्रांसफॉर्मेशन” की प्रक्रिया से गुजर रहा है। उसे ऐसे साझेदारों की आवश्यकता है जो बड़े पैमाने पर उत्पादन, तकनीकी सहयोग और स्थिर बाजार उपलब्ध करा सकें। भारत इसी रिक्त स्थान को भरने की कोशिश कर रहा है। यही कारण है कि मोदी सरकार केवल व्यापारिक समझौतों पर नहीं, बल्कि इंडस्ट्रियल इंटीग्रेशन पर जोर दे रही है।

यदि इस यात्रा का सबसे कम चर्चित लेकिन सबसे दूरगामी प्रभाव वाला हिस्सा खोजा जाए, तो वह नॉर्वे है। 43 वर्षों बाद किसी भारतीय प्रधानमंत्री का नॉर्वे दौरा यह दिखाता है कि भारत अब नॉर्डिक क्षेत्र को केवल यूरोप का छोटा समूह नहीं, बल्कि भविष्य की रणनीतिक शक्ति के रूप में देख रहा है। आर्कटिक समुद्री मार्ग आने वाले दशकों में वैश्विक व्यापार की दिशा बदल सकते हैं। जलवायु परिवर्तन के कारण नए समुद्री मार्ग खुल रहे हैं और जो देश समय रहते इन मार्गों में रणनीतिक उपस्थिति बना लेंगे, वे भविष्य की वैश्विक अर्थव्यवस्था में बढ़त हासिल करेंगे।

नॉर्वे केवल तेल और गैस का देश नहीं है। वह ग्रीन शिपिंग, ब्लू इकोनॉमी, हाइड्रोजन टेक्नोलॉजी और समुद्री नवाचार का वैश्विक केंद्र बन चुका है। उसका Sover-eign Wealth Fund पहले ही भारत में लगभग 28 अरब डॉलर का निवेश कर चुका है। वहीं ईएफटीए समझौते के तहत प्रस्तावित 100 अरब डॉलर का निवेश भारत के इंफ्रास्ट्रक्चर और औद्योगिक विस्तार को नई गति दे सकता है।

इस साझेदारी का वास्तविक महत्व यह है कि भारत अब केवल विदेशी निवेश आकर्षित नहीं करना चाहता, बल्कि वह रणनीतिक पूंजी और भविष्य की प्रौद्योगिकियों तक पहुंच सुनिश्चित करना चाहता है। मोदी सरकार की विदेश नीति अब “Aid Recipient Nation” वाली मानसिकता से बहुत आगे निकल चुकी है। भारत अब साझेदारी की मेज पर बराबरी के दावेदार के रूप में बैठना चाहता है।

इस पूरी यात्रा का अंतिम और शायद सबसे निर्णायक स्तंभ है इटली। भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारा यानी IMEC आज वैश्विक भू-आर्थिक राजनीति का सबसे बड़ा प्रोजेक्ट बनता जा रहा है। यह केवल एक व्यापारिक कॉरिडोर नहीं, बल्कि चीन की बेल्ट एंड रोड परियोजना के विकल्प के रूप में देखा जा रहा है। इटली इस पूरे गलियारे का यूरोपीय प्रवेश द्वार बन सकता है।

IMEC की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह भारत और यूरोप के बीच माल ढुलाई के समय को लगभग 40 प्रतिशत तक कम कर सकता है और लॉजिस्टिक लागत में भारी गिरावट ला सकता है। वैश्विक व्यापार की दुनिया में समय ही शक्ति है। जो देश तेज और सुरक्षित सप्लाई चेन तैयार करेगा, वही भविष्य की अर्थव्यवस्था पर नियंत्रण स्थापित करेगा।

भारत और इटली के बीच व्यापार पहले ही तेजी से बढ़ रहा है। यदि भारत-यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौता आगे बढ़ता है, तो इटली केवल एक साझेदार देश नहीं रहेगा, बल्कि भारत की नई वैश्विक आर्थिक संरचना का केंद्रीय बिंदु बन जाएगा। यही कारण है कि मोदी सरकार IMEC को केवल इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट नहीं, बल्कि रणनीतिक भू-आर्थिक पुनर्संरचना के रूप में देख रही है।

पूरी यात्रा को समग्र रूप से देखें तो तस्वीर बिल्कुल स्पष्ट दिखाई देती है। भारत एक साथ चार बड़े रणनीतिक लक्ष्य साधने की कोशिश कर रहा है—यूएई के माध्यम से ऊर्जा सुरक्षा, नीदरलैंड के जरिए तकनीकी संप्रभुता, स्वीडन और इटली के माध्यम से यूरोप की औद्योगिक संरचना में एकीकृत उपस्थिति, और नॉर्वे के जरिए रणनीतिक पूंजी तथा आर्कटिक पहुंच।

यही वह बड़ा परिवर्तन है जिसे भारतीय राजनीति का एक बड़ा वर्ग अब तक समझ नहीं पाया है। आज की दुनिया में विदेश यात्राएं केवल औपचारिक कूटनीतिक कार्यक्रम नहीं होतीं। वे भविष्य की आर्थिक शक्ति-संरचना तय करती हैं। चीन ने पिछले दो दशकों में यही किया। उसने बंदरगाहों, सप्लाई चेन, ऊर्जा गलियारों और टेक्नोलॉजी नेटवर्क पर नियंत्रण बनाकर अपनी वैश्विक शक्ति तैयार की। अब भारत उसी खेल में अपने तरीके से प्रवेश कर रहा है।

नरेंद्र मोदी इस समय केवल दुनिया का दौरा नहीं कर रहे हैं। वह बदलती वैश्विक व्यवस्था के भीतर भारत की नई जगह तय करने की कोशिश कर रहे हैं। और संभवतः यही कारण है कि आज भारत पहली बार केवल वैश्विक घटनाओं का दर्शक नहीं, बल्कि उन्हें आकार देने वाले देशों की पंक्ति में खड़ा दिखाई दे

रहा है।

(आलेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं। उनसे संपादक व प्रकाशक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है। किसी भी विवाद की स्थिति में हमारा न्याय क्षेत्र दिल्ली होगा।)

 

 

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