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मिलावट है भारत के सपनों पर विषनुमा दाग

Adulteration is a venomous stain on India's dreams.

भारत आज विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की दिशा में अग्रसर है। वर्ष 2047 तक विकसित भारत का संकल्प राष्ट्रीय चेतना का हिस्सा बन चुका है। आधुनिक राजमार्ग, बुलेट ट्रेन, डिजिटल क्रांति, अंतरिक्ष में नई उपलब्धियां और कृत्रिम बुद्धिमत्ता की प्रगति निश्चय ही गौरव का विषय हैं। लेकिन इन सबके बीच एक ऐसा कलंक है, जो इस समस्त प्रगति के माथे पर काले धब्बे की तरह दिखाई देता है-मिलावट। यह केवल खाद्य पदार्थों में मिलावट नहीं, बल्कि मनुष्य की आत्मा, नैतिकता और सामाजिक उत्तरदायित्व में आई मिलावट का भी प्रतीक है। यह किसी भी सभ्य समाज के लिए अत्यंत शर्मनाक स्थिति है कि एक ओर चिकित्सक रोगियों को स्वास्थ्य लाभ के लिए दूध, घी, फल, पनीर और पौष्टिक आहार लेने की सलाह देते हैं, वहीं दूसरी ओर बाजार में वही दूध डिटर्जेंट और यूरिया से भरा मिलता है, घी में जानलेवा रसायन मिलते हैं, फलों को जहरीले रसायनों से पकाया जाता है और दवाइयों तक में नकलीपन प्रवेश कर चुका है। ऐसे में प्रश्न उठता है कि आखिर स्वस्थ जीवन की आशा किससे की जाए? नये भारत, विकसित भारत एवं मजबूत भारत का सबसे बड़ा हो- मिलावट-मुक्त भारत।

यह विडंबना केवल उपभोक्ता की नहीं, पूरे राष्ट्र की है। जिस देश की संस्कृति ‘अन्नं ब्रह्म’ और ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ का संदेश देती हो, वहां भोजन ही यदि विष बन जाए तो इससे बड़ी त्रासदी और क्या हो सकती है? हाल के ही दिनों में देश के विभिन्न भागों से मिलावट के अनेक भयावह मामले सामने आए हैं। कहीं हजारों लीटर नकली दूध पकड़ा जाता है, कहीं करोड़ों रुपये का नकली शहद, कहीं मिलावटी घी, मावा और मसाले बरामद होते हैं। सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि जीवन बचाने वाली दवाइयों में भी नकली और घटिया सामग्री का उपयोग पाया गया। यह केवल कानून का उल्लंघन नहीं, बल्कि मानवता के विरुद्ध अपराध है। जो व्यक्ति लाभ कमाने के लिए किसी बच्चे, गर्भवती महिला, वृद्ध या बीमार व्यक्ति के भोजन और दवा में जहर घोल देता है, वह केवल व्यापारी नहीं, समाज का अपराधी है।

दरअसल, मिलावट का सबसे बड़ा कारण केवल आर्थिक लालच नहीं, बल्कि नैतिक पतन है। पहले समाज में यह भावना थी कि दूसरों को कष्ट देकर कभी सुख नहीं मिल सकता। लोग ईश्वर, धर्म और समाज की नैतिक मर्यादाओं से डरते थे। आज परिस्थितियां बदल गई हैं। त्वरित धन अर्जित करने की अंधी दौड़ ने संवेदनाओं को कुचल दिया है। अब कुछ लोगों के लिए मुनाफा ही धर्म बन गया है, चाहे उसकी कीमत किसी की जान क्यों न हो। यह स्थिति केवल स्वास्थ्य संकट नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा और आर्थिक विकास का भी प्रश्न है। मिलावटी खाद्य पदार्थ कैंसर, किडनी, लीवर, हृदय रोग, हार्माेन असंतुलन और बच्चों में कुपोषण जैसी गंभीर बीमारियों को जन्म देते हैं। इससे स्वास्थ्य सेवाओं पर भारी बोझ बढ़ता है, परिवार आर्थिक संकट में फंसते हैं और राष्ट्र की उत्पादक क्षमता प्रभावित होती है। दूसरी ओर, जब भारतीय खाद्य उत्पादों की गुणवत्ता पर प्रश्नचिह्न लगते हैं, तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में हमारी विश्वसनीयता भी कमजोर होती है। विकसित भारत का सपना केवल ऊंची इमारतों और तेज आर्थिक विकास से पूरा नहीं होगा; उसके लिए स्वस्थ नागरिक और शुद्ध खाद्य व्यवस्था अनिवार्य है।

विडंबना यह भी है कि हमारे यहां कानून तो हैं, लेकिन उनका प्रभावी क्रियान्वयन नहीं है। खाद्य सुरक्षा एवं मानक अधिनियम, निरीक्षण तंत्र और विभिन्न एजेंसियां मौजूद हैं, फिर भी मिलावट का कारोबार फल-फूल रहा है। इसका सबसे बड़ा कारण भ्रष्टाचार, निरीक्षण व्यवस्था की कमजोरी, मुकदमों में देरी और दंड का अभाव है। त्योहारों पर कुछ छोटे दुकानदारों पर कार्रवाई करके प्रशासन अपनी जिम्मेदारी पूरी मान लेता है, जबकि बड़े नेटवर्क अक्सर बच निकलते हैं। जब तक दोषियों को त्वरित और कठोर दंड नहीं मिलेगा, तब तक यह विषैला कारोबार समाप्त नहीं होगा। आज आवश्यकता केवल कानूनों की नहीं, बल्कि कठोर राजनीतिक इच्छाशक्ति की है। हर जिले में आधुनिक खाद्य परीक्षण प्रयोगशालाएं स्थापित हों। मोबाइल फूड टेस्टिंग लैब गांव-गांव और शहर-शहर पहुंचें। कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई), ब्लॉकचेन आधारित आपूर्ति श्रृंखला और डिजिटल ट्रैकिंग जैसी आधुनिक तकनीकों का उपयोग करके उत्पादन से लेकर उपभोक्ता तक हर स्तर पर निगरानी सुनिश्चित की जाए। नकली दवाइयों और मिलावटी खाद्य पदार्थों के मामलों के लिए विशेष फास्ट ट्रैक अदालतें बनाई जाएं, ताकि कुछ महीनों के भीतर दोषियों को सजा मिल सके। ऐसे अपराधों को सामान्य आर्थिक अपराध नहीं, बल्कि ‘जनस्वास्थ्य के विरुद्ध जघन्य अपराध’ घोषित किया जाना चाहिए। लेकिन केवल सरकार सब कुछ नहीं कर सकती। समाज की भी उतनी ही बड़ी जिम्मेदारी है। उपभोक्ताओं को जागरूक बनना होगा। प्रमाणित उत्पादों का उपयोग, संदिग्ध वस्तुओं की शिकायत, स्थानीय स्तर पर जन-जागरण अभियान और विद्यालयों, महाविद्यालयों, सामाजिक एवं धार्मिक संस्थाओं द्वारा नैतिक शिक्षा का प्रसार अत्यंत आवश्यक है। यदि समाज मिलावट को केवल अपराध नहीं, बल्कि सामाजिक बहिष्कार योग्य कृत्य मानने लगे, तो इस बुराई पर प्रभावी अंकुश लगाया जा सकता है।

विकसित भारत का अर्थ केवल आर्थिक समृद्धि नहीं होता। विकसित राष्ट्र वह है जहां नागरिक बिना भय के भोजन कर सकें, जहां दवा जीवन बचाए, जहां व्यापार विश्वास पर आधारित हो और जहां ईमानदारी आर्थिक सफलता का आधार बने। जापान, जर्मनी और अनेक विकसित देशों की सफलता का रहस्य केवल तकनीक नहीं, बल्कि गुणवत्ता और नैतिक अनुशासन भी है। भारत यदि विश्वगुरु बनने का स्वप्न देखता है, तो उसे सबसे पहले अपने बाजार को विश्वास का बाजार बनाना होगा। आज आवश्यकता एक नए राष्ट्रीय अभियान की है-‘मिलावट-मुक्त भारत अभियान’। जिस प्रकार स्वच्छ भारत अभियान ने जनभागीदारी से व्यापक परिवर्तन की शुरुआत की, उसी प्रकार मिलावट के विरुद्ध भी राष्ट्रीय आंदोलन खड़ा किया जाना चाहिए। यह केवल सरकारी योजना नहीं, बल्कि जनचेतना का अभियान बने। प्रत्येक नागरिक यह संकल्प ले कि वह न मिलावट करेगा, न मिलावट को बढ़ावा देगा और न ही मिलावट करने वालों को सामाजिक सम्मान देगा।

हमें यह भी समझना होगा कि मिलावट केवल किसी दूसरे के परिवार को नहीं, अंततः पूरे समाज को नुकसान पहुंचाती है। जो व्यापारी आज मिलावट कर रहा है, उसका अपना परिवार भी इसी समाज में रहता है। उसके बच्चे भी इसी हवा में सांस लेते हैं, इसी बाजार से वस्तुएं खरीदते हैं। इसलिए मिलावट वास्तव में दूसरों के लिए नहीं, अपने ही भविष्य के लिए जहर तैयार करना है। स्वतंत्रता के 100 वर्ष पूरे होने पर वर्ष 2047 का भारत तभी वास्तव में विकसित कहलाएगा, जब उसकी पहचान केवल आर्थिक शक्ति से नहीं, बल्कि शुद्धता, विश्वसनीयता और नैतिकता से होगी। हमें ऐसा भारत बनाना है जहां दूध में दूध हो, दवा में दवा हो, भोजन में जीवन हो और व्यापार में विश्वास हो। यही सच्चे अर्थों में आत्मनिर्भर, समृद्ध और विकसित भारत की पहचान होगी।

भारत की पहचान योग, आयुर्वेद, शुद्ध आहार, नैतिक जीवन-मूल्यों और “सर्वे भवन्तु सुखिनः” की संस्कृति से रही है। यह पहचान तभी सार्थक होगी जब हमारे भोजन, दवाइयों और उपभोग की वस्तुओं में शुद्धता और विश्वसनीयता सुनिश्चित हो। एक ऐसा भारत, जहां भोजन विश्वास का प्रतीक हो, जहां दवा जीवन का संरक्षण करे, जहां व्यापार नैतिकता पर आधारित हो और जहां उपभोक्ता निश्चिंत होकर बाजार से वस्तुएं खरीद सके-वही विकसित भारत का वास्तविक स्वरूप होगा। आज समय हमें पुकार रहा है कि हम विकास की ऊंची इमारतों के साथ चरित्र की मजबूत नींव भी रखें। यदि मिलावट समाप्त नहीं हुई, तो हमारी सारी प्रगति खोखली सिद्ध होगी। इसलिए सरकार कठोर कानून बनाए, प्रशासन निर्भीक कार्रवाई करे, न्यायपालिका त्वरित दंड सुनिश्चित करे और समाज नैतिक जागरण का बिगुल फूंके। आइए, आज ही संकल्प लें-‘शुद्ध आहार, स्वस्थ परिवार। मिलावट-मुक्त भारत, विकसित भारत का आधार।’ यही संकल्प 2047 के भारत को केवल आर्थिक महाशक्ति ही नहीं, बल्कि नैतिक, स्वस्थ और विश्वसनीय राष्ट्र भी बनाएगा।

ललित गर्ग
(आलेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं। उनसे संपादक व प्रकाशक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है। किसी भी विवाद की स्थिति में हमारा न्याय क्षेत्र दिल्ली होगा।)

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