बदलते परिवेश में कम न हो रिश्तों की महक

बदलते परिवेश में कम न हो रिश्तों की महक

01-08-2015जिंदगी में इंसान जहां बहुत कुछ हासिल करता है वहीं उसे बहुत कुछ गवाना भी पड़ता है। हासिल करने और गवाने के बीच में बहुत सी चीजें ऐसी भी होती है, जिन्हें हर कोई सहेज कर रखना चाहता है। क्योंकि एक बार किसी चीज के खो जाने के बाद उसे दुबारा उसी स्वरूप में पाना मुश्किल हो जाता है। ‘अकेली’ उपन्यास में लेखक मनोहर पोतदार ‘अबोध’ ने खोने-पाने की इसी उलझन को समझाने की कोशिश की है। जीवन में रिश्तें एक ऐसी पूंजी हैं, जो एक बार बिखर जाएं तो दुबारा हासिल करना बहुत मुश्किल होता है। इंसान फिर भी किसी खोई हुई वस्तु को दुबारा पा सकता है लेकिन खोए हुए या बिखरे हुए रिश्तों में मधुरता, विश्वास ला पाना बड़ा मुश्किल होता है। आज के आधुनिक दौर में रिश्तें निस्तेज होकर दम तोड़ रहे हैं। अपने उपन्यास ‘अकेली’ में लेखक ने टूटते रिश्तों को दर्शाने की कोशिश की है। मनोहर पोतदार ‘अबोध’ ने इस उपन्यास में मनु और मंजू की निस्वार्थ प्रेम भावना को एक संवेदनशील कलाकार की हैसियत से चित्रित किया है। किसी भी रिश्ते का आधार प्रेम, आदर, विश्वास, आत्मीयता, सदाचार, दया ये सभी मानवीय भावनाएं होती हैं। जिनमें रिश्तों की पवित्रता को बनाएं रखने की ताकत है।

रिश्ता चाहे पति-पत्नी का हो या भाई-बहन का, पिता-पुत्र का हो या कोई अन्य। सभी रिश्तें मानवीय मूल्यों की नींव ही नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति की पहचान भी हैं। आज के युग में रिश्तों में मजबूती और संवेदना नहीं बल्कि, निस्तेजता नजर आती है। ‘अकेली’ के द्वारा लेखक ने इन्हीं बिखरते रिश्तों को एक धागे से जोडऩे की सार्थक कोशिश की है। अपने उपन्यास के माध्यम से लेखक ने रिश्तों की गर्माहट बरकरार रखने का भरसक प्रयास किया है। आज भौतिकता की चकाचौंध में बढ़ोतरी हो रही है, वहीं दूसरी तरफ मानवीयता का सतत हृास होता जा रहा है। सभी व्यवहार, आचरण, कर्म अमानवीयता की पराकाष्ठा पर पहुंचते जा रहे हैं। डॉ. मनोहर पोतदार ‘अबोध’ जैसे संवेदनशील रचनाकार अपनी लेखनी के जरिए समाज के बदलते हुए परिवेश में रिश्तों को तार-तार होने से बचाना अपना दायित्व समझते है। अपनी इसी कोशिश को पूर्ण आकृति देने के लिए ही ‘अकेली’ जैसे उपन्यास की रचना की, जिसमें उन्होंने रिश्तों की संवेदनशीलता को बखूबी दर्शाया है।

उपन्यास में लेखक ने दो चरित्र मनु और मंजू के जरिए रिश्तों की निस्वार्थता और पवित्रता को दर्शाने की कोशिश की है। उपन्यास में पति-पत्नी के रिश्ते को दूध में घुली शक्कर की तरह बताया गया है, जो वक्त के साथ-साथ मधुर होता जाता है। एक वक्त ऐसा आता है जब दोनों में भेद करना नामुमकिन हो जाता है। ऐसा ही सुंदर रिश्ता पति-पत्नी का है, दुर्भाग्यवश इसमें से कोई एक बिछड़ जाए तो दूसरा अपने आप ही अकेला और अपाहिज सा महसूस करने लगता है। उपन्यास में अपने पति विद्याधर की अचानक मृत्यु से मंजू ऐसे ही अकेलेपन का शिकार हो जाती है। अपने इस अकेलेपन को वह मनु के साथ बांटती है। मनु भी उसका निस्वार्थ भाव से साथ देता है। दोनों ही अपनी-अपनी जगह सहीं होते हुए भी, अपने इस निस्वार्थ रिश्तें पर सवालियां नजरे उठते हुए देखते हैं, जो उनके मन को कुंठा से भर देता है। उपन्यास में सवालों का उठना अपने आप में अत्यंत रोचक है और कहीं न कहीं इससे पाठक विचलित भी हो सकता है। ‘अकेली’ उपन्यास लेखक की संवेदनशीलता, मनवीयता और मूल्यों के प्रति प्रामणिकता को रेखांकित करता है। उपन्यास के अंतिम मोड़ तक पहुंचते-पहुंचते, विचलित मन हमदर्दी से भर जाता है और आंखें आंसुओं से। पूरे उपन्यास में लेखक ने रिश्तों के मूल्य को और रिश्तों की संवेदनशीलता पर जोर दिया है। जो काफी प्रशंसनीय है।

प्रीति ठाकुर

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