नक्सलबाड़ी में आज क्रांति की कथा भी नदारद

नक्सलबाड़ी में आज क्रांति की  कथा भी नदारद

नक्सलबाड़ी से अनिल धीर


 

नक्सलबाड़ी आंदोलन से देश के तमाम प्रबुद्ध नौजवान और छात्र जुड़ गए थे। देश में बाकी राजनैतिक नेता सत्ता और निजी संपत्ति जुटाने में लगे थे, लेकिन नौजवान क्रांतिकारी पढ़ाई-लिखाई, संपत्ति, परिवार आदि सब कुछ छोड़कर वंचित लोगों के लिए अपना जीवन न्यौछावर कर रहे थे। हजारों नौजवान अदम्य साहस के साथ गोलियों और अमानवीय अत्याचार झेलकर भूमिहीन और गरीब किसानों की लड़ाई लड़ रहे थे,उन्हें क्रांति के लिए तैयार कर रहे थे। पाइपगन और बम नक्सलियों के मुख्य औजार बन चुके थे। कई बार किसी सिपाही से छिने गए .303राइफल भी उनके तरकश में शामिल हो जाया करती थी। 

राष्ट्रीय राजमार्ग 31 पर सिलिगुड़ी से नक्सलबाड़ी की बढ़ते हुए हरे-भरे चाय बागानों में कतारबद्ध औरत-मर्दों के गीत गाते पत्तियां तोडऩे का नजारा मंत्रमुग्ध कर देता है। बादलों से होड़ लेती पहाडिय़ों की तराई में ये चाय बागान दार्जिलिंग खुशबू के लिए प्रसिद्ध हैं। इन पत्तियों को स्थानीय कारखानों में नया आकार देकर दुनिया भर में भेजा जाता है। लेकिन सुंदर, सुहाने परिदृश्य और मनमोहक शांति के पीछे एक हिंसक क्रांति का इतिहास छुपा हुआ है। भारत में वर्ग संघर्ष की महागाथा की यही जन्मस्थली है जिससे आज भी हर साल करीब 5,000 लोग मारे जा रहे हैं।

मैं नक्सलबाड़ी उथल-पुथल के उस दौर को जानने-समझने पहुंचा हूं जिसने आधुनिक भारत में किसान संघर्ष को सबसे ज्यादा प्रभावित किया। स्थानीय स्तर पर उभरा विद्रोह 1967-77 के दौर में पूरे देश में छा गया था।  छोटे, शांत-से कस्बे नक्सलबाड़ी की ओर बढ़ते हुए उसके विशाल असर से मन को मुक्त कर पाना असंभव-सा है। आखिर यही नक्सल और नक्सलवादी शब्दों की जन्मभूमि जो है।

इस इलाके के ज्यादातर चाय बागान के मालिक कोलकाता के मोटे-मोटे मारवाड़ी हैं। ये लोग चाय का कारोबार भी वैसे ही कर रहे हैं जैसा उन्होंने जूट व्यवसाय के साथ किया। यानी एक भी पाई निवेश किए बिना एक-एक पैसा बटोर लो। नई पौधे लगाने पर एक पैसा भी खर्च नहीं किया जाता। चाय बागानों में पौधे करीब 90 साल पुराने हैं। मजदूरों के अधिकार तो सिर्फ कागजों में ही शोभा देते हैं। कारखाने और चाय की प्रसंस्करण इकाइयां पचास साल पुरानी हैं। न्यूनतम मजदूरी भी नहीं दी जाती हैं। भविष्य निधि तो बस छलावा है। मजदूरों को पांच साल पूरे करने के पहले ही निकाल देने की रवायत आम है, ताकि वे ग्रेच्युटी के हकदार न हो जाएं। असल में पत्तियां तोडऩे वालों के गीत भी विरह की कथा ही कहते हैं।

नक्सलबाड़ी कस्बे में प्रवेश करने पर कहीं कोई उस विद्रोह का स्मारक नहीं, बल्कि करगिल में शहीद सुनील छेत्री की मूर्ति और लायन्स क्लब का साइनबोर्ड आपकी आगवानी करता है। मुझे ‘ब्लॉक जमीन और भूमि सुधार अधिकारी’ की इकलौती इमारत जरूर दिखी, जिसका उस भूमि संघर्ष से कोई नाता हो सकता है। असल में, 25 मई 1967 को नक्सलबाड़ी में कोई घटना नहीं हुई थी। गरीब ग्रामीणों पर पुलिस फायरिंग तो सीमावर्ती पानीटंकी कस्बे की ओर एक छोटे-से गांव प्रसादुजोत में हुई थी। उस इलाके में तनाव और झड़पें उस साल मार्च से जारी थीं। 24 मई 1967 को एक आदिवासी की तीर से एक पुलिस अधिकारी की मौत हो गई। अगले दिन भारी संख्या में पुलिस बल ने निहत्थे लोगों पर गोलियां बरसाईं। इस घटना में 8 औरतें और 2 बच्चे सहित 11 लोग मारे गए थे।

मैं नक्सलबाड़ी कस्बे से प्रसादुजोत गांव की ओर बढ़ा तो मुझे माक्र्सवादी-लेनिनवादी समूह का कोई दफ्तर या झंडा तक नहीं दिखा। माकपा, कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस और भाजपा के झंडे तो जहां-तहां दिख रहे थे, जो हाल में संपन्न लोकसभा चुनावों की याद दिला रहे थे। दीवारों पर लाल रंग सिर्फ एयरटेल, वोडाफोन, वाई-वाई नूडल्स और सुप्रीम प्लास्टिक चेयर्स के विज्ञापनों में ही दिख रहे थे। कहीं वे नारे ‘आमार नाम, तोमार नाम, विएतनाम विएतनाम’ या ‘बंदूक की नोंक से सत्ता निकलती है’ या ‘चीन के चेयरमैन, हमारे चेयरमैन’ (माओ त्से तुंग समझिए) दिखाई नहीं दिए। आंदोलन के उस दौर में रात में घरों से निकल कर नौजवान लड़के-लड़कियों के झुंड हर दीवार पर क्रांतिकारी नारे लिखा करते थे।

शहीद पीठ पर बेंगुईजोत प्राथमिक विद्यालय के छात्र फोटोग्राफ के लिए मेरे चारों तरफ खड़े हैं। इससे बड़ी विडंबना और क्या हो सकती है कि उनकी कक्षाओं से महज 10 गज की दूरी पर, छोटी-सी चारदीवारी के पार नक्सलवादी नेता तथा विचारक चारु मजूमदार की मूर्ति के साथ कॉमरेड लेनिन, स्टालिन, माओ, लिन पियाओ और सरोज दत्त की मूर्तियां लगी हैं। मेरे जोर देने पर मास्टर महादेव पाल छात्रों से पूछते हैं कि चारु मजूदार कौन थे? लेकिन एक भी छात्र बता नहीं पाया। वे कानू सान्याल या माओ या स्टालिन के बारे में भी नहीं बता पाते। मूर्तियों के बगल में एक स्मारक 11 शहीदों का भी है जिनमें आठ औरतें और दो बच्चे थे, जो 25 मई 1967 को पुलिस फायरिंग में मारे गए थे। हालांकि पुराने लोग बताते हैं कि नक्सलबाड़ी किसान विद्रोह अचानक नहीं हुआ था,

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बल्कि 1950 के दशक से ही किसान आंदोलन जारी था। लेकिन उस दिन नक्सलबाड़ी में विस्फोट हुआ और वह देश भर की सुर्खियों में छा गया। कुछ ही साल में नक्सल शब्द लाल उग्रवादियों का पर्याय बन गया, जिससे जमींदारों और पुलिसवालों में दहशत पैदा हो जाती थी।

वह तब की बात थी, लेकिन आज असलियत कुछ और है। हालांकि उस किसान विद्रोह के 47 साल बाद, आज भी नक्सलबाड़ी में किसानों और चाय बागान के मजदूरों में बगावत के बुलबुले उभरते दिख जाते हैं और माओवादियों तथा अलग-अलग तरह के लाल गुटों के लिए नक्सलबाड़ी प्रेरणास्रोत बना हुआ है, लेकिन नक्सलबाड़ी के आसपास के गांवों में क्रांति कल की बात हो चुकी है। आज नक्सलबाड़ी गांव नहीं रहा, वह छोटा-मोटा शहर है और सुविधाओं से वंचित नहीं है। वहां सड़कें, स्कूल और कॉलेज भी हंै, लेकिन 1967 के उस दौर में यह गांव था, जहां बिमल किसान नाम के आदिवासी नौजवान को अपना खेत जोतने का न्यायिक आदेश मिल गया था। लेकिन उस पर जमींदार और उसके गुंडों ने हमला कर दिया। मार्च से लेकर मई 1967 तक आदिवासियों की जमीन के सवाल पर तनाव बढ़ता रहा। लेकिन चिंगारी 25 मई 1967 को प्रसादुजोत गांव में भड़की, न कि नक्सलबाड़ी में। इस मामले में ‘नक्सल आंदोलन’ नाम एक प्रतीक भर है। 24 मई को एक पुलिसवाले की मौत के बाद पुलिस ने निहत्थे लोगों पर गोली चलाई और 11 लोग मारे गए थे।

नक्सलबाड़ी ने भारतीय क्रांति के एजेंडे में हिंसक संघर्ष की अवधारणा की पुख्ता जगह तैयार कर दी। तबसे भारतीय राजनैतिक परिदृश्य पूरी तरह बदल गया। नक्सलबाड़ी आंदोलन ऐसे वक्त हुआ जब सिर्फ बीस बरस की नकली आजादी से भारतीय जनता का ही मोहभंग नहीं हुआ था, बल्कि दुनिया भर में उथल-पुथल मची हुई थी। विएतनाम, लाओस, और कंपूचिया (कंबोडिया) जैसे छोटे-छोटे देश अमेरिकी फौज की ताकत को चुनौती दे रहे थे। अनेक अविकसित देशों में राष्ट्रीय मुक्ति के आंदोलन चल रहे थे। यूरोप और अमेरिका में विएतनाम में अमेरिकी फौज की कार्रवाइयों के खिलाफ साम्राज्यवाद विरोधी प्रदर्शन हो रहे थे। अमेरिका में अश्वेत और स्त्री आंदोलन भी चरम पर था। इस मायने में नक्सलबाड़ी आंदोलन पूरी दुनिया में चल रहे वैचारिक-राजनैतिक आंदोलन का ही एक रूप था।

दो साल बाद 1969 में लेनिन की जन्मशती पर एक विशाल रैली में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माक्र्सवादी-लेनिनवाद)के गठन की औपचारिक घोषणा की गई। सभा को संबोधित करते हुए कानू सान्या

ल ने चारु मजूमदार की तुलना माओ से की और लोगों से हिंसक संघर्ष में हिस्सा लेने का आह्वान किया। यह ‘बुर्जुआ व्यवस्था’ के खिलाफ बगावत करने की भावुक अपील थी, जिससे पुलिसवालों, जमींदारों और छोटे व्यापारियों की हत्या का सिसिला शुरू हो गया। चारु मजूमदार ने ‘वर्ग शत्रुओं’ के सफाए के नाम पर व्यक्तियों की हत्याओं पर जोर दिया, जबकि सान्याल का फोकस किसानों के लिए जमीन हासिल करने पर था। चारु मजूमदार विचारक थे, जबकि सान्याल जननेता।  मजूमदार को बंदूक पर भरोसा था और चुनावों तथा दूसरे लोकतांत्रिक तरीकों के वे विरोधी थे। इसके विपरीत सान्याल चुनावों के खिलाफ नहीं थे, बल्कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया में उनकी दिलचस्पी नहीं रह गई थी, क्योंकि उससे गरीबों को बुनियादी अधिकार हासिल नहीं हो रहे थे।

नक्सलबाड़ी विद्रोह पर चीन के पीपुल्स डेली ने अपने 5 जुलाई 1967 के अंक में संपादकीय लिखा, ”भारत भूमि पर वसंती तूफान का बवंडर उठा है। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के क्रांतिकारी समूह के नेतृत्व में ग्रामीण सशस्त्र क्रांति का एक इलाका स्थापित हो गया है…दार्जिलिंग से उठी चिंगारी जल्दी ही दावानल में बदल जाएगी और समूचे भारत को अपने आगोश में ले लेगी।’’

कानू सान्याल: लाल महात्मा

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हथिघिसा गांव में मिट्टी की झोपड़ी में नया रंग-रोगन किया गया है। एकमात्र बंद दरवाजे के बाहर एक लकड़ी की बेंच और छोटी-सी लोहे की स्टूल पड़ी है। झोपड़ी के बाहर एक लंबे डंडे पर पुराना-सा बेरंग लाल झंडा लहरा रहा है। मैंने छोटी-सी खिड़की से झांक कर देखा तो मिट्टी की दीवाल पर माक्र्स, एंगल्स, लेनिन, स्टालिन और माओ की सफेद-श्याम तस्वीरों के नीचे कानू सान्याल का बड़ा-सा पोस्टर लटक रहा है। शांति मुंडा चाबी लेकर आईं और दरवाजा खुला।

इसी झोपड़ी की छत की पटिया से 23 मार्च 2010 को कानू सान्याल ने फांसी लगा ली थी। संयोग से, इसी तारीख को 1931 में भारतीय क्रांतिकारी स्वतंत्रता सेनानियों भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फांसी दी गई थी।

झोपड़ी के भीतर उनके कुछ सामान, किताबें, कपड़े और बरतन वगैरह हैं। चटाई बिछे फर्श पर एक पुराना टाइपराइटर रखा है, जो अब जाम हो चुका है। मैंने उसका ढक्कन उठाया तो टाइपराइटर पर उनका चश्मा करीने से रखा हुआ था। कानू सान्याल इस प्राचीन मशीन से जरूर गरीबों के अनेक आवेदन वगैरह टाइप कर चुके होंगे। दूर की दीवाल पर उनके और उनके कुछ कामरेडों की फ्रेम की हुई तस्वीरें टंगी हैं। एक कोने में उनकी किताबें और फाइलें रखी हुई हैं। उनके कुछ बरतन, बिस्तर और कागज फोल्डिंग खाट पर रखे हुए हैं। खाट बोझ से दबी-सी लगती है। एक छोटी घड़ी की सुइयां सुबह के चार बजे पर रुकी हुई हैं। पुरानी ब्लैक ऐंड ह्वाइट टीवी बरसों से बंद है। मैंने खाट पर रखी गठरी से एक छोटी पुस्तिका ‘प्रोग्राम ऑफ इंडियन रेवोल्यूशन ऐंड द पाथ ऑफ इंडियन रेवोल्युशन’ निकाली। आलमारी में उनके दो सेट कपड़े रखे हैं, लेकिन वह खुल नहीं सकी। उसके दरवाजे जाम हो गए हैं। घर को देख भारी निराशा मन में भरने लगती है।

कानू सान्याल भारत ही नहीं, दुनिया भर में उन विरले नेताओं में थे जिन्होंने अपना पूरा जीवन गरीबों और शोषितों के मकसद के लिए न्योछावर कर दिया। उन्होंने शादी नहीं की और आदिवासी चाय मजदूरों और किसानों के बीच बेहद सादी जिंदगी जी। जिन वंचित लोगों की लड़ाई लड़ी, उन्हीं की तरह एक कमरे की मिट्टी की झोपड़ी में जीवन बिताया। वही उनका पार्टी ऑफिस और कम्यून भी था। हाल में छपी किताब ‘द फस्र्ट नक्सल’ में लेखक बप्पादित्य पॉल ने उनकी तुलना गांधी से की, जिनका ”जीवन ही उनका संदेश था।’’ झोपड़ी के एक कोने में कुछ लाल बैनर और प्लेकार्ड रखे हैं। शांति मुंडा एक प्लेकार्ड लेकर कानू सान्याल के पोस्टर के आगे खड़ी होती हैं।

नक्सलबाड़ी विद्रोह के निर्विवाद नेता, 72 साल की उम्र में ब्रेन हेमरेज के बाद इतने कमजोर हो गए थे कि घर से बाहर भी नहीं निकल पाते थे। उन्होंने कभी किसी सरकारी अस्पताल की सेवाएं भी नहीं लीं। उनकी दलील थी कि जिस राज्य से वे लड़ रहे हैं, उसकी सेवाएं कैसे ले सकते हैं। उनकी आत्महत्या की वजहें आज भी पहेली बनी हुई हैं। जो भी वजहें बताई गईं (खराब सेहत, पैसे की कमी, माओवादी आंदोलन की निराशा), वे पर्याप्त नहीं लगतीं। शायद वे मानसिक संतुलन खो बैठे होंगे! असल में कानू सान्याल का साहस और क्रांतिकारी जीवट जो अदम्य था। तो, क्या बीमारी की तकलीफों से तंग आकर उन्होंने जीवन लीला समाप्त करने का कदम उठा लिया होगा? क्या वे देश में मौजूदा क्रांतिकारी अतिवाद से हताश-निराश थे? हम चाहे कितने ही कयास लगा लें, असलियत कभी नहीं जान पाएंगे। कानू सान्याल अपनी मृत्यु से भी एक संदेश दे गए।
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आखिर, उन्हींने कभी देश के शासकों की नींद उड़ा दी थी। उनमें लाखों लोगों को जोड़ लेने की क्षमता थी। वे जब जवान थे, उनकी बातें लोगों के खून खौला देती थीं, लोग उनके कहने पर जान की बाजी लगाने को तैयार हो जाते थे। अपने 60 साल के लंबे राजनैतिक जीवन में वे आठ साल भूमिगत रहे। 16 साल जेल में बिताए। कुछ ही क्रांतिकारी उनकी तरह सादा और पारदर्शी जीवन बिता पाए।

भारतीय नक्सलवादियों में वे अकेले थे जिनकी चेयरमैन माओ से मुलाकात हुई थी। 1967 से 1972 तक जब वे भूमिगत थे, सितंबर 1967 में वे तीन महीने के लिए चीन गए थे। वे एक छोटे दल के साथ काठमांडू गए और वहां चीनी उन्हें जीप से बीजिंग ले गए थे। रास्ते में वे तिब्बत में भी रुके थे। वे 30 सितंबर को बीजिंग पहुंचे और 1 अक्टूबर को राष्ट्रीय दिवस के आयोजनों में शामिल हुए। उन्होंने देखा कि लोग माओ को देख आंसू बहा रहे हैं।

बाद में वे बताते थे, ”माओर संगे आमार देखा होलो’’ (माओ के साथ मेरी मुलाकात हुई)। माओ के साथ बात करने और भारत की स्थिति की चर्चा करने पर सान्याल को यह शिद्दत से एहसास हो गया कि उन लोगों का रास्ता सही नहीं है। माओ ने उन्हें बताया कि चीन में आंदोलन की शुरुआत कैसे सिर्फ 150 पुराने किस्म की रायफलों से हुई। लेकिन उन्होंने लोगों को संगठित किया, जन समर्थन जुटाया। माओ ने सान्याल से कहा, ”अगर आपके पास जनसमर्थन है तो आपको बाहर से किसी की मदद की दरकार नहीं है।’’

माओ ने उनसे यह भी कहा कि चीन के दौरे में उन्होंने जो देखा-सुना है, उसे भुला दें। माओ बोले, ”जाओ अपने देश और वहां की विशेष स्थितियों को समझो और क्रांति को आगे बढ़ाओ।’’

दरअसल, कानू सान्याल ने ही जंगल सांथाल के साथ 1967 के विद्रोह का नेतृत्व किया था, जिसकी आग देश भर में फैली। गांवों में हथियारबंद जत्थे जमींदारों की हत्या करने लगे और ‘वर्ग शत्रुओं’ का सफाया करने लगे। नक्सलवादी आंदोलन के शुरुआती वर्षों में उन्होंने ही किसानों को अपने अधिकारों की मांग करने के लिए जागरूक किया। आंदोलन के लिए चिंगारी का काम किया जमींदारों के दो हाथियों के आतंक ने। ये हाथी गरीब किसानों की फसल चौपट कर देते और उनकी झोपडिय़ां उजाड़ देते थे। परेशान किसान सान्याल के पास आए और शिकायत की कि जमींदार उनकी सुन नहीं रहे हैं। सान्याल ने किसानों से कहा कि हाथियों को मार दो। किसानों ने वैसा ही किया। इससे किसान विद्रोह का बिगुल बज उठा। बाद में सान्याल ने बताया कि उन्होंने सोचा कि अगर दो हाथियों को मारने से ऐसा विद्रोह हो सकता है तो समाज के असली शोषकों के सफाए के बाद क्या होगा?

कानू सान्याल 1970 में गिरफ्तार कर लिए गए। उन्हें पार्वतीपुरम साजिश के मामले में सजा हुई। उन्होंने सात साल बंगाल और आंध्र प्रदेश की जेलों में बिताए। 1977 में वाम मोर्चे के सत्ता में आने के बाद ज्योति बसु ने सान्याल की रिहाई में व्यक्तिगत रुचि दिखाई। विशाखापत्तनम जेल से रिहाई के बाद सान्याल ने टुकड़ों में बंटे नक्सल गुटों को एक करने के लिए ऑर्गेनाइजिंग कमेटी ऑफ कम्युनिस्ट रिवोल्युशनरीज (ओसीसीआर) बनाने की पहल की। तब तक और खासकर चारु मजूमदार की मृत्यु के बाद ही वे हिंसा का रास्ता छोड़ चुके थे और संसदीय राजनीति में यकीन करने लगे थे। 1985 में ओसीसीआर का विलय कम्युनिस्ट ऑर्गेनाइजेशन ऑफ इंडिया (माक्र्सिस्ट-लेनिनिस्ट)में हो गया। 2003 में उन्होंने नई सीपीआई (एमएल) बनाई और अपनी राजनैतिक गतिविधियां उत्तर बंगाल तक ही सीमित कर लीं। उन्होंने बंगाल के चाय बागानों में मजदूर यूनियन बनाई। लेकिन शांतिपूर्ण नक्सल नेता का करिश्मा पुराने जैसा नहीं हो पाया। वे स्थानीय मुद्दों के साथ किसानों और मजदूरों के बीच चुपचाप काम करते रहे। वे वाम मोर्चा सरकार की औद्योगिक नीति के कट्टर आलोचक थे। उनका मानना था कि यह नीति सिर्फ साम्राज्यवादियों के फायदे के लिए है। उन्होंने सिंगूर और नंदीग्राम में भूमि अधिग्रहण के तरीकों का भी खुलकर विरोध किया।

बेशक, सान्याल पर ‘60 और ‘70 के दशक में माओवादी विचारधारा अपनाने वाले सैकड़ों नौजवानों की मौत का दोषी कहा जाता है, क्योंकि हिंसक क्रांति में उन्होंने अपनी जान गंवा दी, लेकिन आज लोकतांत्रिक प्रक्रिया के तहत जो चल रहा है, वह तो उससे भी क्रूर और जानलेवा है।

सवाल यह है कि क्या नक्सलबाड़ी के किसान विद्रोह से कुछ हासिल हुआ, तो जवाब है कि हां, जरूर हुआ। वह संघर्ष बेजा नहीं गया। उसके बाद से काफी विकास हुआ। अब हर किसी के पास अपनी जमीन की मिल्कियत है। जमींदार डर के मारे कांपते हैं और चाय बागान के मजदूरों को समय पर पगार मिलता है। किसान अब अपने अधिकारों के प्रति जागरूक हैं।

नक्सलबाड़ी आंदोलन की तेज धारा में कई कम्युनिस्टों ने अपनी भूमिका निभाई, लेकिन सरकार के अत्याचारों से पस्त होकर वे अपने आरामदायक मध्यवर्गीय जीवन में लौट आए। मगर कानू सान्याल असाधारण कम्युनिस्ट थे। वे अंत तक विद्रोही बने रहे। सान्याल की मृत्यु पर तब के विदेश राज्यमंत्री शशि थरूर ने ट्विट किया कि ”उनका जीवन नाकाम था, उन्होंने कुछ नहीं बदला।’’ हां, सान्याल नाकाम विचारक थे। मृत्यु के वक्त उनका कोई घर नहीं था, कोई बैंक खाता नहीं था, उनके पास एक भी पाई नहीं थी, वे बीमार और कमजोर थे तो वे हार ही तो गए थे। कांग्रेसी नेताओं के मुकाबले उनके पास स्विस बैंक का खाता नहीं था, अकूत संपत्ति नहीं थी, न ही आइपीएल टीम और बड़े कॉर्पोरेट घरानों में शेयर थे।

नाथुराम विश्वास: मोहभंग के शिकार

11-10-2014

मैंने उन्हें नक्सलबाड़ी के मुख्य बाजार में उनकी दुकान पर पाया। नाटे कद, चश्मा लगाए, गंजे सिर के नाथुराम विश्वास की उम्र उतनी नहीं लगती कि कोई यह कहे कि वे नक्सल आंदोलन में रहे होंगे। बाजार में फर्नीचर, मॉल्डेड प्लास्टिक की कुर्सियां, आलमारी वगैरह की उनकी दुकान सबसे बड़ी है। लेकिन नाथुराम विश्वास 1970 के दौर के नक्सलवादी हैं, जो अब समृद्ध कारोबारी बन गए हैं। इसके बावजूद वे आज भी भाकपा (माले)लिबरेशन गुट के कार्डहोल्डर हैं और रैलियों तथा किसानों के प्रदर्शनों में जाते हैं।

वे बातचीत करने से परहेज करते हैं और सीधे सवालों से बचते हैं। उन्होंने 1968 में चारु मजूमदार का एक लेख पढ़ा कि छात्रों को गर्मियों की छुट्टियों में गांवों में जाकर गरीब किसानों के बीच काम करना चाहिए। वे इतना प्रभावित हुए कि कॉलेज की पढ़ाई ही छोड़ दी। वे कहते हैं कि पढ़ाई छोडऩा कठिन नहीं था, क्योंकि उन्हें पूरा यकीन हो गया था कि यह ”बुर्जुआ शिक्षा’’ नहीं चाहिए। वे गांवों में गए और किसानों की हालत देखी तो उनके लिए ”लडऩे’’ का संकल्प मन में पैदा हो गया।

विश्वास उदार नक्सल रहे हैं और हिंसक गतिविधियों में शिरकत के सवालों को टाल जाते हैं। वे बताते हैं कि वे तब छोटे थे इसलिए कार्रवाइयों के लिए नहीं भेजे जाते थे, बल्कि सामान लाने-ले जाने और प्रचार विभाग का ही काम करते थे। कुछ ही दिनों में उन्हें भूमिगत होना पड़ा। विश्वास कंधा उचकाते हुए कहते हैं, ”एक बार काम में जुट गए तो भूमिगत हो जाना पड़ता था।’’ वे कुछ समय नेपाल और बांग्लादेश में रहे। वे भूमिगत प्रिंटिंग प्रेस में काम करते और पर्चे-पोस्टर और क्रांतिकारी पुस्तिकाएं तैयार किया करते थे। कानू सान्याल के जेल से रिहा होने के बाद वे बाहर आए लेकिन आंदोलन के टुकड़ों में बंट जाने से निराश और मोहभंग के शिकार हो गए। कानू सान्याल की आत्महत्या के बारे में पूछने पर वे मौन लगा जाते हैं। मैंने उनसे पूछा कि क्या वे दोबारा आंदोलन करना चाहेंगे तो उनका जवाब था, ”क्यों नहीं? हम एक मकसद के लिए लड़ रहे थे, अपने स्वार्थ के लिए नहीं।’’ मुझे पूरा यकीन है कि नाथुराम फिर हथियार नहीं उठाएंगे। यह सवाल बड़ा दिलचस्प है कि अनेक क्रांतिकारी इतिहास को लेकर कई मायने में अनजान हैं चाहे वे सोशलिस्ट हों, या कम्युनिस्ट, या लोकतांत्रिक, धार्मिक या सेकुलर विचारों के।

नक्सलबाड़ी आंदोलन में वाकई देश के तमाम प्रबुद्ध नौजवान और छात्र जुड़ गए थे। देश में बाकी राजनैतिक नेता सत्ता और निजी संपत्ति जुटाने में लगे थे, लेकिन नौजवान क्रांतिकारी सब कुछ-पढ़ाई-लिखाई, संपत्ति, परिवार-छोड़कर वंचित लोगों के लिए अपना जीवन न्यौछावर कर रहे थे। हजारों नौजवान अदम्य साहस के साथ गोलियों और अमानवीय अत्याचार झेलकर भूमिहीन और गरीब किसानों की लड़ाई लड़ रहे थे, उन्हें क्रांति के लिए तैयार कर रहे थे। पाइपगन और बम नक्सलियों के मुख्य औजार बन गए थे। कई बार किसी सिपाही से छिने गए .303 राइफल भी उनके तरकश में शामिल हो जाया करती थी।

जमींदारों और उनके समर्थकों की निर्मम हत्या की जाने लगी तो स्थानीय लोगों के जेहन में नक्सलियों से डर बैठने लगा। अनेक जमींदारों ने अपने इलाके छोड़ दिए और गांववाले पुलिस की मदद से साफ इनकार कर दिया करते। अनेक इलाके ”मुक्त क्षेत्र’’ बन गए, जहां पुलिस के लिए यह पता करना मुश्किल था कि कौन नक्सल है और कौन नहीं, कौन अपना खेत जोत रहा है, कौन जमींदारों का। नक्सली ”वर्ग शत्रुओं’’ की परिभाषा व्यापक पैमाने पर करते। कोलकाता में ”वर्ग शत्रुओं’’ के सफाए के नाम पर सरकारी कर्मचारी, जज और कुलपति तक मारे गए। आंदोलन के चरम दौर में कोलकाता की सड़कों पर ट्रैफिक पुलिसवालों तक की छूरा भोंक कर हत्या की गई।

बंगाल के विश्वविद्यालय परिसर क्रांतिकारी राजनीति के ठिकाने बन गए थे। 1967-70 के दौर में प्रतिष्ठित प्रेसिडेंसी कॉलेज और हिंदू कॉलेज का होस्टल माओवादी राजनीति के केन्द्र बन गए थे। आंध्र प्रदेश में सबसे पहले गुंटूर मेडिकल कॉलेज के छात्र नक्सलबाड़ी के समर्थन में आगे आए और नक्सलबाड़ी सोलिडारिटी कमेटी का गठन किया। पंजाब, बिहार, उत्तर प्रदेश, तमिलनाडु, केरल और दिल्ली तथा मुंबई के शिक्षा परिसरों में भी हजारों छात्र माओवाद की ओर आकर्षित हुए और नक्सलबाड़ी की राजनीति से जुड़े। भ्रष्टाचार, लालच और छल-प्रपंच से भरी संसदीय राजनीति से भारी मोहभंग के कारण आदर्शवादी युवकों के लिए अपने जीवन को सार्थक करने का एक मकसद मिल गया था। नक्सलबाड़ी शब्द युवाओं के लिए न्याय, सच्चाई, समानता, मानवता और गरीबों के आत्म-सम्मान का प्रतीक बन गया था। उसी दौर में पुलिस ने ”मुठभेड़’’ हत्याओं का तरीका अपनाया।

11-10-2014

1970-71 के दौर में फर्जी मुठभेड़ आम बात हो गई। पुलिस प्रभावित इलाकों से 17 से 25 वर्ष उम्र के तमाम लड़के-लड़कियों को माओवादी आंदोलन से जुड़े होने के संदेह में उठा ले जाती और उन पर अमानवीय अत्याचार करती। अत्याचार करने का मकसद सिर्फ सूचनाएं जुटाना नहीं होता, बल्कि उनके इरादे तोड़ देना, आत्म-सम्मान नष्ट कर देना भी था, ताकि वे व्यवस्था और यथास्थिति को चुनोती न दें। 1969-70 में सरकार ने पुलिस के साथ अद्र्धसैनिक बलों और यहां तक कि कई इलाकों में सेना को भी नक्सल विरोधी अभियान का हिस्सा बनाया। 1971 तक नक्सलबाड़ी और उसके तर्ज पर हो रहे तमाम विद्रोहों को कुचल दिया गया।

कोलकाता में 1971-72 में कांग्रेस की अगुआई वाले चौकसी दस्ते ने सैकड़ों युवकों को सुनियोजित ढंग से मौत के घाट उतारा। इन हत्यारे दस्तों की अगुआई प्रियरंजन दास मुंशी, सुब्रत मुखर्जी जैसे युवक कांग्रेस के नेता कर रहे थे। ये दस्ते मुख्यमंत्री सिद्धार्थ शंकर राय और पुलिस प्रमुख रंजीत गुप्ता की योजनाओं पर अमल करते थे। अगस्त 1971 में कांग्रेस और माकपा के गुंडों ने मिलकर बारानगर और हावड़ा में सैकड़ों माओवादियों की सरेआम हत्या की। सबसे कुख्यात काशीपुर-बारानगर हत्याकांड है। कांग्रेस और माकपा के हथियारबंद कार्यकर्ताओं ने घर-घर की तलाशी ली, महिलाओं के साथ बलात्कार किया, घर जला डाले और माओवाद से थोड़ी-सी भी सहानुभूति रखने वाले लड़कों को सरेआम पीटकर मार डाला। युवाओं की हत्या की गई तो बुजुर्गों पर मिट्टी का तेल छिड़क कर जिंदा जला दिया गया। उस दौर में करीब 10,000 माओवादी और उनके समर्थक मारे गए। नक्सलियों का ज्यादातर नेतृत्व का सफाया कर दिया गया और हजारों को जेल में डाल दिया गया। केंद्रीय समिति के दो नेता सरोज दत्त और अप्पू का तो ‘पता ही नहीं चला।’ आंदोलन के बीमार नेता चारु मजूमदार अभी भी आजाद थे। वे, कानू सान्याल और जंगल सांथल भारत सरकार के सबसे वांछित व्यक्ति थे।

मुजीबुर्रहमान : जज्बा कायम

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कुछेक वर्ष पहले तक वे नक्सलबाड़ी बाजार में अपने बेटे की मोमो शॉप पर बैठा करते थे। आज भी, जीवन की सांध्य बेला में उनका मानना है कि आंदोलन नाकाम नहीं रहा, उसने वंचितों में उम्मीद जगाई और उनका हक दिलवाया। अगर आंदोलन ”आंतरिक कलह’’ और टुकड़ों में नहीं बंटा होता तो उसके नतीजे और सकारात्मक होते।

मुजीबुर्रहमान ने मुझे बताया कि वे 105 साल के हैं। उनसे मिलने मैं नक्सलबाड़ी के उत्तर कटियाजोत में उनके घर गया। संघर्ष और भूमिगत आंदोलन के दौर या जेल में बिताए वर्षों से उनका साहस कम नहीं हुआ। उम्र भी उनके क्रांतिकारी जज्बे पर असर नहीं डाल पाई है। वे अपने अतीत की बातें बताते हैं, ”मुझे जिंदा या मुर्दा पकडऩे पर पचास हजार का ईनाम था, फिर भी मैं बेखौफ यहां-वहां जाया करता था। कोई पुलिस या सीआरपीएफ वाला मुझे छूने की साहस नहीं जुटा पाता था। एक बार मैं दोनों हाथों में पिस्तौल लेकर जंगल से निकला और गोलियां दागनी शुरू कीं तो पुलिसवाले भाग खड़े हुए।’’ वे आज भी चारु मजूमदार की कसम खाते हैं लेकिन कानू सान्याल के बारे में पूछने पर मौन हो जाते हैं। उन्होंने मुझे बताया कि भूमिगत दौर में पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) और नेपाल की ओर चले गए थे।

रहमान ढाका जेल से 1942 में छूटने के बाद कम्युनिस्ट पार्टी में शामिल हुए थे। वे बताते हैं कि सोमेन टैगोर और जय प्रकाश नारायण दोनों ही कम्युनिस्ट पार्टी में शामिल होने आए थे। वे लोग पद की फिराक में थे, जबकि कम्युनिस्ट पार्टी में सब बराबर थे। टैगोर ने अपना क्रांतिकार संगठन बनाया और जय प्रकाश नारायण ने सोशलिस्ट पार्टी का गठन किया। कभी सरकार के लिए चुनौती बने नक्सलवादी नेता अब अपने अतीत की छाया भर रह गए हैं लेकिन उनमें जज्बा वही दिखता है। वे स्वीकार करते हैं कि कई ‘वर्ग शत्रुओं’ की खुद हत्या की लेकिन यह भी मानते हैं कि वह नहीं होना चाहिए था। उन्होंने कहा, ”जिन लोगों ने आंदोलन शुरू किया, वे अब खत्म हो चुके हैं, कई मर चुके हैं और कुछ बूढ़े हो चले हैं। आज आंदोलन बुरी तरह बिखर गया है।’’

शांति मुंडा: संघर्ष की लौ आज भी जिंदा

सैंतालिस साल पहले 24 मई 1967 की गर्मियों में किसानों की भीड़ से निकले एक तीर से एक पुलिस इंस्पेक्टर की मौत हो जाती है। अगले दिन पुलिस ने जवाबी कार्रवाई की और किसानों की दूसरी भीड़ पर गोलियां बरसाईं जिसमें 11 लोग मारे गए। इनमें आठ औरतें और दो बच्चे थे। शांति मुंडा उस भीड़ में शामिल थीं और किसी तरह बच गई थीं। आज, हथिघिसा गांव में कानू सान्याल की तस्वीर के नीचे बैठकर वे कहती हैं, ”उसके बाद भगदड़ मच गई। जोतदार और पुलिस हमें पकडऩे को दौड़े। हमने खुलकर लडऩे का फैसला किया। आखिर हम चुपचाप रहकर वर्षों से सहते जो आए थे।’’

शांति मुंडा नक्सलबाड़ी की उन घटनाओं की गवाह हैं जिनकी छाप आज के भारत पर बदस्तूर कायम है। वे बारह बरस की उम्र से ही सान्याल के साथ जुड़ गई थीं और दो चुनाव भी लड़ चुकी हैं। उन्होंने ही सान्याल के शव को छत से लटकते सबसे पहले देखा था। वे कुछ ही घंटे पहले उन्हें भोजन परोस गई थीं। अब वे उस छोटी-सी झोपड़ी की रखवाली करती हैं। झोपड़ी के बाहर लाल झंडे को लहराने का फैसला उनका ही है। वे हर रोज झोपड़ी की पूरी सफाई करती हैं।

सान्याल के साथ अपने साठ बरसों को याद कर वे सान्याल के निर्देश में अपनी विभिन्न गतिविधियों के बारे में बताती हैं। वे कई साल भूमिगत रहीं और कभी गिरफ्तार नहीं हो पाईं। वे कोलकाता की गलियों में आंदोलन के दिनों में आमने-सामने संघर्ष को याद करती हैं। नक्सलवाद की शुरुआती पैरोकारों में एक, शांति के पास अब अपनी छोटी-सी जमीन है, जो पूर्व सरकार के जमीन बंटवारे के कार्यक्रम के तहत मिली है। लेकिन इसके अलावा उनकी दुनिया में ज्यादा बदलाव नहीं आया है। फसल आज भी भगवान भरोसे है और सड़क या शिक्षा जैसी सुविधाएं तो आज भी नदारद है। किसान और चाय बागान के मजदूर पचास साल पहले की तुलना में बेहतर तो हैं लेकिन ज्यादा अच्छी हालत में नहीं हैं। बकौल शांति मुंडा, अब यहां एक नया शत्रु आ रहा है। वे कहती हैं, ”पहले हमारा शोषण सामंती जमींदार किया करते थे। अब हमें डर है कि बड़ी कंपनियां आएंगी और हमारी जमीनें ले लेंगी।’’ वे बताती हैं कि हाल में सरकारी अधिकारी एक सिंचाई परियोजना के जिए जमीन अधिग्रहण करने आए तो पूरा गांव विरोध में खड़ा हो गया। ”हमें अपनी जमीन से लगाव है। नक्सलबाड़ी की दिनों की तरह हम इसके लिए लड़ मरेंगे। जान दे दूंगी, जमीन नहीं दूंगी।’’

16 जुलाई 1972 को चारु मजूमदार को कोलकाता के एक पोशीदा ठिकाने से पकड़ा गया। गिरफ्तारी के वक्त वे दमा से गंभीर रूप से पीडि़त थे। पुलिस हिरासत में दस दिनों तक उन्हें किसी से मिलने नहीं दिया गया, न उनके वकील, न परिवार के सदस्यों, न किसी डॉक्टर से। आखिर, 28 जुलाई 1972 को सुबह 4 बजे पुलिस हिरासत में ही उन्होंने अंतिम सांस ली। उनका शव भी परिवार के सदस्यों को नहीं दिया गया।

1950 में तेलंगाना विद्रोह के वक्त नेहरू सरकार ने हजारों आदिवासियों की हत्या की और कम्युनिस्टों को मारकर पेड़ों पर लटका दिया। उन्हीं नेहरू ने बाद में ‘कम्युनिस्टों’ को अपना करीबी सहयोगी बताया और दो साल बाद उनका प्रवेश संसद में हुआ। मिस्र के तत्कालीन राष्ट्रपति नासिर जब भारत दौरे पर आए तो कम्युनिस्टों की इतनी आजादी देखकर हैरान रह गए। उन्होंने नेहरू से कहा, ”हमने तो कम्युनिस्टों को जेल में डाल दिया है।’’ नेहरू हंसकर बोले, ”एक ही बात है, आप उन्हें जेल में रखते हो, हम संसद में, दोनों हालत में वे नुकसानदेह नहीं रह जाते।’’

जंगल सांथाल: आदिवासी महानायक

जंगल सांथाल नक्सल विद्रोह की अगुआई करने वाली त्रिमूर्ति में एक हैं लेकिन उनकी स्मृति में न कोई स्मारक है, न उनके जन्म-मृत्यु की कोई पक्की तारीख तय है। मैंने उनकी एक तस्वीर हासिल करने की पूरी कोशिश की लेकिन नहीं पा सका। दार्जिलिंग जिले के सांथाल आदिवासियों में जंगल काफी सम्मानजनक शख्सियत हैं। वे 18 मई 1967 की उस किसान परिषद में शामिल थे, जिसमें तय किया गया कि सशस्त्र संघर्ष के जरिए बंटाईदारों के बीच जमीन का बंटवारा किया जाए। वे उस भीड़ में भी शामिल थे जिसने इंस्पेक्टर सोनम वांगडी को घेर लिया था और तीर मारकर मौत के घाट उतार दिया था जिससे नक्सल आंदोलन का जन्म हुआ।

जंगल सांथाल वर्षों तक भूमिगत रहे। सरकार की सूची में सबसे वांछित व्यक्ति थे। उनकी ताकत और जनता में पकड़ इतनी मजबूत थी कि पुलिसवाले भी उनको सम्मान करते थे। उनके बारे में ढेरों किंबदंतियां और चमत्कारिक किस्से हैं, जो नक्सल आंदोलन के ऐतिहासिक कथानकों और बंगाल के ग्रामीण तथा आदिवासी अंचलों में सुनाई पड़ते हैं। उनके महान विद्रोह, हिरासत में अत्याचार-उत्पीडऩ, त्रासदी और दर्द की अनेक कहानियां यहां-वहां बिखरी पड़ी हैं। जंगल आखिरकार पकड़े गए थे। ‘60 और ‘70 के दशक में कोलकाता की सड़कों और नक्सलबाड़ी के धान के खेतों में नारा गंजा करता था, ”जेल का ताला टूटेगा, कानू जंगल छूटेगा।’’

नक्सल विद्रोह कुचल दिए जाने के बाद उन्हें 1979 में जेल से रिहा किया गया लेकिन तब वे बेहद अकेला महसूस कर रहे थे। जेल से बाहर आकर हताश-निराश जंगल सांथाल को शराब की लत लग गई। उन्होंने चार शादियां कीं, एक कार भी खरीदी और जिंदगी को पटरी पर लाने की कोशिश की लेकिन निराशा नहीं टूटी। जब कानू सान्याल जेल से बाहर आए तब तक काफी देर हो चुकी थी। उन्होंने अपने कामरेड को संभालने की काफी कोशिश की मगर सांथाल पीने की आदत और हताशा से नहीं उबर पाए। आखिर, उन्हें सिलीगुड़ी के अस्पताल में भर्ती कराया गया लेकिन डॉक्टरों के मना करने के बावजूद वे अस्पताल से निकल आए। गांव पहुंचकर फिर पीनी शुरू की और मौत को गले लगा लिया, शायद उसी रात।

जंगल सांथाल की मौत 1987 में हुई। उनके आखिरी कुछ दिन लाइलाज शराब के नशे में गुजरे। मुझे बताया गया कि उनकी एक पत्नी आज भी जिंदा हैं और कानू सान्याल की झोपड़ी की बगल में एक झोपड़ी में रहती हैं। मैं उन वृद्धा से मिला पर वे कुछ भी बता नहीं पाईं। बांग्ला के प्रसिद्ध उपन्यासकार समरेश बसु ने ‘महाकालेर रथेर घोड़ा’ में जंगल सांथाल का चित्रण आदिवासी नायक के रूप में किया है। कानू सान्याल ने खुद स्वीकार किया था कि वे तो संगठन का काम करते थे, चारु विचारक थे लेकिन कार्यक्रमों पर अमल तो सांथाल ही किया करते थे। आखिरी वक्त तक जंगल सांथाल उम्मीद से भरे थे कि वे देश में बेहतर बदलाव अपनी आंखों के सामने देखेंगे लेकिन बाद में जब लगा कि मामला हाथ से निकल गया है तो उन्होंने अपने को हताशा में डुबो लिया।

11-10-2014

अब नक्सलबाड़ी के वे ज्यादातर क्रांतिकारी 70 वर्ष पार की उम्र में पहुंच गए हैं। नौजवान भाकपा (माले)के कार्यकर्ता बमुश्किल ही मिलते हैं। काडरों से अधिक तो माक्र्सवादी-लेनिनवादी पार्टियां हो गई हैं। मसलन, जनशक्ति, कानू सान्याल ग्रुप, महादेब मुखर्जी ग्रुप वगैरह। नक्सलबाड़ी की स्थानीय सुब्रोती साना लाइब्रेरी में 1967 के किसान विद्रोह पर एक भी किताब नहीं है, जबकि बांग्ला और अंग्रेजी में दर्जनों किताबें लिखी गई हैं। नक्सलबाड़ी के नौजवानों के बीच विद्रोह की अब चर्चा भी नदारद है। उन्हें बस उसकी तिथी याद आती है जब 25 मई को बरसी मनाने कोलकाता से राजनैतिक नेता यहां उतर आते हैं। उनके लिए नक्सलबाड़ी विद्रोह एक कथा भर है, जिंदगीनामा नहीं।

रामायण में दंडकारण्य, दंडक वन का जिक्र आता है, जहां भगवान राम ने 14 साल वनवास पूरा किया था। आज, दंडकारण्य करीब 92,000 वर्ग किमी. में आंध्र प्रदेश, ओडीशा, छत्तीसगढ़, झारखंड, पश्चिम बंगाल और महाराष्ट्र तक में फैला है। अब यह नए दौर के नक्सलवादियों का नया ठिकाना है, जो अब माओवादी कहलाते हैं।

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