जिग्नेश की नेतागिरी दलित के नाम

जिग्नेश की नेतागिरी दलित के नाम

लगभग दो साल पहले गुजरात के ऊना में मरी गाय की चमड़ी उतार रहे कुछ दलित युवकों की पिटाई के बाद हजारों की संख्या में दलित समुदाय के लोग सड़कों पर उतरे। इस आंदोलन के केंद्र में जो नाम उभर कर सामने आया, वह था जिग्नेश मेवाणी।

इस दलित आंदोलन के दौरान जिग्नेश ने सरकार को घेरते हुए तीखे सवाल पूछे। दरअसल युवकों पर हुए अत्याचार के बाद जिग्नेश सक्रिय हुए और दलित समुदाय के लोगों को इस बात के लिए राजी करने की कोशिश करते हुए दिखे कि अब वे न तो मैला ढोएं और न ही मरे हुए पशुओं की चमड़ी उतारने का काम करें।

ऊना की घटना के बाद जिग्नेश मेवाणी ने अहमदाबाद से ऊना तक दलित अस्मिता यात्रा की थी, जो 15 अगस्त 2016 को खत्म हुई थी और दलित महिलाओं सहित कुछ  20,000 दलितों ने इस में भाग लिया था, जिन्होंने गोरों के शव हटाने के अपने पारंपरिक नौकरियों को छोडऩे की प्रतिज्ञा ली थी। उन्होंने दलितों के उत्थान के लिए भूमि की मांग की।

वे भाजपा को अपना एकमात्र शत्रु मान कर निशाना बना रहे हैं और इसके आधार पर दूसरों से तालमेल बिठा रहे हैं। उनमें कुछ कमजोरियां भी हैं। उन पर वामपंथी झुकाव का ठप्पा है, जो जेएनयू और कुछ दूसरे केंद्रीय विश्वविद्यालयों के बाहर मुख्यधारा में कारगर नहीं होता। लेकिन एक छोटे राज्य से उभरकर भारत के विशाल क्षेत्र में अपनी जबरदस्त राजनीति का सिक्का जमाने वाले दलित नेता हो चुके हैं- कांशीराम। चंडीगढ़ के पास रापेड़ जिले के पंजाबी कांशीराम एक अप्रत्याशित जगह से उभरकर पूरे मंच पर छा गए थे लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह साधारण नहीं है। क्योंकि कई सालों बाद कोई दलित समुदाय से आया नेता सत्ता से टकरा रहा है न सिर्फ अधिकारों के लिए बल्कि अपने समुदाय के लोगों के लिए भी। सवाल है कि क्या जिग्नेश मेवाणी के अंदर ‘कांशीराम’ बनने की क्षमता है? दलित देश के प्रमुख राज्यों में काफी हद तक बंटे हुए हैं। इसलिए केंद्रीय स्तर पर इनके नेतृत्व की जरूरत महसूस होती रहती है।

मायावती, रामविलास पासवान, मल्लिकार्जुन खडग़े, थावरचंद गहलोत आदि अलग-अलग नेता समय-समय पर इस कमी को पूरा करने की कोशिश करते रहते हैं लेकिन जगजीवन राम और कांशीराम के बाद यह जगह खाली ही रही है।

बाबासाहेब आंबेडकर के पश्चात दलित नेताओं को खरीदने की प्रथा लगातार चल रही है। शायद इसी वजह से युवाओं ने पहले दलित पंथर (1970 के दशक में) और अब जिग्नेश का साथ निभाने का फैसला किया है। जिग्नेश को भी खरीदने का प्रयास हो सकता है। वह उसे किस प्रकार जबाब देगा, यह देखना होगा। कुछ वरिष्ठ पत्रकार जिग्नेश की तुलना कांशीराम से कर रहे है। लेकिन यह जल्दबाजी होगी।

कांशीराम जी ने राजनीति मे आने से पहले बामसेफ संघटन मजबूत किया था। जिग्नेश के पास फिलहाल ऐसा राष्ट्रीय स्तर का संघटन नहीं है। अगर उसे राष्ट्रव्यापी नेतृत्व करना है, तो उसे पहले संघटन बनाना पड़ेगा या किसी बड़ी पार्टी का आधार लेना होगा। वरना यह चक्रवात आया और गया, या फिर वह गुजरात तक ही सीमित था ऐसा कहना पड़ेगा।

गुजरात में हुए हालिया विधानसभा चुनाव में मिली जीत के बाद उनमें संभावनाओं की तलाश करने वालों की संख्या बढ़ गई। लेकिन क्या जिग्नेश मेवाणी देश की दलित राजनीति को कोई नई दिशा दे पाएंगे?

समाजशास्त्री और दलित राजनीति के जानकार बद्री नारायण कहते हैं, ‘जिग्नेश  मराठी दलित पैंथर राजनीति का नया संस्करण हैं। उनमें वहीं भाषा, भंगिमा और सोच दिखाई देती है। यानी ये पुरानी राजनीति की नई भाषा है। जिग्नेश उत्तर भारत की वास्तविकता के साथ कितना फिट बैठ पाएंगे यह कहना मुश्किल है। लेकिन ऐसे राज्य जहां पर दलित चेतना ज्यादा है, उनकी बात सुनी जाएगी।’

कांशीराम दलित कौटिल्य सरीखे एक समर्पित राजनीतिक प्रतिभा थे, जिनके साथ मायावती उनकी चंद्रगुप्त सरीखी थीं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि बहुजन समाज के तंबू को उन्होंने काफी विस्तार दिया, ताकि दूसरे समूह भी इसके नीचे आ सकें। इसलिए उनके नारे थे- ‘वोट हमारा राज तुम्हारा, नहीं चलेगा, नहीं चलेगा’। बाद में उन्हें और मायावती को समझ में आ गया कि सत्ता पाने के लिए मुसलमानों और कुछ ऊंची जातियों को भी जोडऩा पड़ेगा।

क्या जिग्नेश में मुख्यधारा में आने का वह कौशल, प्रतिभा, समर्पण और महत्वाकांक्षा है? हमें अभी यह नहीं पता है लेकिन भाजपा और रूढि़वादी हिंदू कुलीन तबका उनके कारण अगर चिंता में पड़ गया है, तो यह चिंता बहुत कुछ कहती है।

दलित नेता जिग्नेश मेवाणी की जंतर-मंतर पर आयोजित ‘युवा हुंकार रैली’ फ्लॉप साबित हुई है। इस रैली से युवा दलित समुदाय ने दूरी बना ली। जिग्नेश की इस रैली में बड़ी संख्या में उनके समर्थकों एवं दलित समुदाय के लोगों के पहुंचने की उम्मीद जताई गई थी। दलित नेता जिग्नेश के लिए यह बहुत बड़ा झटका है क्योंकि उन्हें एक नए दलित नेता के रूप में पेश किया जा रहा था। जंतर-मंतर पर मंगलवार को जिग्नेश की रैली की जगह पर लगाई गईं ज्यादातर कुर्सियां खाली पाई गईं।

Layout 1

भाजपा नेता अश्विनी उपाध्याय ने कहा, ‘लोगों को समझ में आ गया है कि जिग्नेश मेवाणी जैसे लोगों की मंशा क्या है। इन लोगों ने दलित बनाम हिंदू की लड़ाई छेड़ी। इन्हें समझ में नहीं आता है कि दलित हिंदू ही होता है। जिग्नेश ने ‘घटिया’ राजनीति शुरू की है।’

देश में तेजी से लोकप्रिय हो रहे दलित नेता जिग्नेश मेवाणी और जवाहर लाल नेहरू विश्व विद्यालय के छात्र उमर खालिद की युवा हुंकार रैली को दिल्ली पुलिस ने इजाजत देने से मना कर दिया। ये दोनों दिल्ली के पार्लियामेंट स्ट्रीट पर युवा हुंकार रैली का आयोजन करना चाहते थे जिसके माध्यम से वह भीम आर्मी के संस्थापक चंद्रशेखर आजाद को रिहा कराने और अन्य अधिकारों पर चर्चा करना चाहते थे। तेजी से लोकप्रिय हो रहे जिग्नेश मेवाणी और उमर खालिद की जोड़ी के बारे में यह कयास लगाया जा रहा है कि ये दोनों देश की राजनीति में दलित-मुस्लिम गठजोड़ को एक नया चेहरा देने की कोशिश कर रहे हैं। हालांकि इन दोनों पर देश को बांटने और भड़काने का आरोप भी लग रहा है। जिग्नेश मेवाणी और उमर खालिद पर महाराष्ट्र के भीमा-कोरेगांव में भड़काऊ भाषण देने का आरोप भी लगा है और दोनों के खिलाफ एफआईआर भी दर्ज कराई गई है। तेजी से लोकप्रिय हो रही इस जोड़ी को लेकर पांच सवाल खड़े किए जा रहे हैं।  गुजरात में पटेल आंदोलन और महाराष्ट्र के भीमा-कोरेगांव में हुई हिंसा के बाद ये सवाल खड़ा किया जा रहा है कि क्या जिग्नेश मेवाणी असल में ऐसे दलित नेता के तौर पर उभर रहे हैं जिन्हें पूरे देश का दलित वर्ग स्वीकार करता है। यही सवाल उमर खालिद के बारे में भी पूछा जा रहा है। हालांकि इसका असल जवाब इनकी रैलियों में आने वाली भीड़ और इस वर्ग के बीच जाने के बाद ही पता चल सकता है। क्या देश में मौजूदा दलित-मुस्लिम नेतृत्व से यह दोनों वर्ग खुश हैं? मायावती, रामविलास पासवान, उदित राज या मुस्लिम नेता आजम खान या ओवैसी बंधु को इस वर्ग का नेता माना जाता है। इन नेताओं का सीमित होता दायरा भी जिग्नेश और उमर की लोकप्रियता बढऩे का कारण माना जा रहा है।

सतीश पेडणेकर

 

Leave a Reply

Your email address will not be published.