लगा ‘काले कोट’ पर दाग

लगा ‘काले कोट’ पर दाग

देश की स्वतंत्रता के पश्चात यह पहला मौका होगा, जब जनता को न्याय देने वाली न्यायपालिका को स्वयं जनता के बीच आना पड़ा। इसके पीछे किसका हाथ है, यह सभी को पता है। खैर जो भी हो, लेकिन जनता इन संविधान के रखवाले कहे जाने वाले जजों द्वारा लिए गये कदमों का जवाब स्वयं देना चाहेगी। न्यायाधीश चलमेश्वर, रंजन गगोई, एम. बी. लोकुर और कुरियन जोसेफ की प्रेस वार्ता के बाद जनता और मीडिया ने तो चुप्पी साध ली थी। लेकिन धीरे-धीरे इस निष्पक्ष न्यायपालिका को राजनीतिक रंगों से रंग दिया। उस समय जिस प्रकार की अप्रत्याशित स्थिति पैदा की गई और उससे जो क्षति हुई उसको भरने के लिए एक गहन चिंतन की आवश्यकता है। कोर्ट में चल रहे विभिन्न गंभीर मामलों के आवंटन के प्रशासनिक अधिकार का मामला, जो माननीय मुख्य न्यायाधीश और इन माननीय चार जजों के टकराव का कारण बन चुका है, अब यह जनता के बीच भी वार्तालाप का रूप ले चुका है। माननीय राष्ट्रपति, बार काउन्सल ऑफ इंडिया, बार एसोसिएशन ऑफ अपेक्स कोर्ट की सलाह से भी इस विषय का हल निकाला जा सकता था, लेकिन इन जजों ने इस मामले को जानबूझकर उछाला जिसके कारण भारतीय न्यायपालिका एक मजाक का रूप बन गई है। लगभग देश के अधिकतर लोगों का भी यही मानना है। कुछ लोगों का तो यह भी मानना हैं कि यह कोर्ट का आंतरिक मामला था, जिसे मीडिया में नहीं लाना चाहिए था। ऐसे ही कदम न्यायपालिका से लोगों का विश्वास खत्म कर, अपनी ही कमियों को उजागर करते हैं।

हमें यह नहीं भूलना चाहिये कि न्यायपालिका सारे राजनीतिक हस्तक्षेपों से ऊपर होती हैं। यहां यह याद रखना होगा कि यदि न्यायपालिका खतरे में आती है तो देश भी खतरे में होगा। अब यह देखना होगा कि किस प्रकार माननीय सर्वोच्च न्यायालय अपनी छवि को सुधारने का काम करता है। यह सब एक स्वतंत्र संस्था को किसी भी प्रकार की जांच से बाहर रखने के कारण है, जिससे संस्था के आत्मसुधार प्रणाली कमजोर हो चुकी है। अन्यथा यदि कोई जांच प्रणाली होती तो इस प्रकार के विषयों पर ध्यान दिया जा सकता था और ये चारों जज भी अपनी-अपनी बातों को किसी उचित स्थान व समय पर रखते। यह आम राय है कि न्यायपालिका से संबन्धित किसी भी गंभीर मामले को जजों के ऊपर ही छोड़ देना चाहिए। सभी प्रणाली में अच्छे और बुरे लोग होते हैं और उनके मामले में हमेशा सतर्कता बरतना जरुरी है। भारतीय न्यायपालिका में अच्छे लोगों की कोई कमी नहीं है, अत: एक योग्य संस्था की आशा करना कोई गलत नहीं होगा। न्यायपालिका को अभी हाल में सुप्रीम कोर्ट में हुई सारी घटनाओं को अपने कंधे पर लेना होगा। यह कि सी भी व्यक्ति को सोचने पर विवश करता है कि मुख्य न्यायाधीश द्वारा अलग बेंच को सौंपे गये मामलों को न्यायपालिका द्वारा भी हल नहीं किया जा सका।

यदि केवल वरिष्ठ जज ही देश के गंभीर मामलों को देखने की योग्यता रखते है तो क्या जूनियर जजों को अयोग्य मान लेना चाहिये? आखिर कैसे किसी भी मामले को गंभीर व अति-गंभीर ठहराया जा सकता है? आखिर कौन यह तय करता है कि केवल वरिष्ठ जज ही गंभीर मामलों पर फैसला दे सकते हैं, क्योंकि वे निष्पक्ष होते हैं। यह सभी के संज्ञान में है कि निचली अदालतों में भ्रष्टाचार है, यदि सर्वाच्च न्यायालय ही संदेह के घेरे में बंधा हो तो एक आम नागरिक अपने कानूनी मामलों को निपटाने के लिए कानून का दरवाजा कैसे खटखटा सकता हैं? यह मुख्य न्यायाधीश का अपना अधिकार है कि वह किस बेंच को कैसा मामला सौंपना चाहते हैं। यदि हम मुख्य न्यायाधीश के इस अधिकार पर ही प्रश्न खड़ा करते हैं तो यह अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मारने जैसा होगा। फिर ये चार न्यायाधीश चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया का विरोध क्यों कर रहे हैं? क्या यह जस्टिस लोया के मामले के कारण है या फिर दीपक मिश्रा के द्वारा 1984 के सिख दंगो के मामलों को दोबारा जांच के आदेश देने के कारण है? लेकिन ऐसे प्रश्नों से हमें कोई भी जवाब नहीं मिलने वाला है।

चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया दीपक मिश्रा को लिखे पत्र में ये चारों जज उनको फस्र्ट अमंग इक्वल (सभी समान जजों में प्रथम) स्थान पर मानते हैं, तो सीजेआई और अन्य जजों में कोई सर्वश्रेष्ठता की लड़ाई नहीं होनी चाहिए। वे इस पत्र में लिखते हैं कि मुख्य न्यायाधीश  किसी भी प्रकार का निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र है, तो फिर प्रश्न यह खड़ा होता है कि ये जज उनका विरोध क्यों कर रहे हैं? अभी बहुत कुछ है जो देखना बाकी है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार तो ऐसा ही प्रतीत होता है कि ये सारी कलह जस्टिस लोया मामले को आधार बनाकर मोदी सरकार का विरोध करने के लिए ही हैं।

दीपक कुमार रथ

दीपक कुमार रथ

 

 

 

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