पवित्रता  की अनिवार्यता

पवित्रता  की अनिवार्यता

रोग जितना प्रबल हो, औषध को भी उतना ही प्रबल होना चाहिए। ‘काम और कांचन’ का रोग आज सर्वत्र भयानक रूप धारण कर रहा है। अत: रोगियों को स्वस्थ बनाने के लिए बड़े-बड़े इंजेक्शनों की आवश्यकता है। तभी उनमें थोड़ा होश आ सकेगा। आज के युग में दवा की थोड़ी मात्रा से काम नहीं चलता। शुरू शुरू में उपचार की पूर्व-तैयारी के रूप में थोड़ी मात्रा दी जा सकती है, पर किसी न किसी दिन हम सभी को कड़ी से कड़ी मात्रा अवश्य लेनी चाहिए। और यदि हम रोग के कीटाणुओं को पूरी तरह नष्ट कर देना चाहते हैं, तो यह कड़ी मात्रा हमें लम्बे समय तक लेनी पड़ेगी। इस बीच कई नाजुक वक्त आएंगे। हर रोग के निदानक्रम में ऐसे नाजुक वक्त आते हैं। पर यह नाजुक वक्त भी पूर्ण उपचार की दिशा में एक आवश्यक सोपान है। न जाने हम अतीत में कितने जीवन जी चुके हैं और उन सभी जीवनों में हमने संसार के विषय-भोग भोगे हैं; हम माता, पिता, बन्धु और बच्चे रहे हैं; जन्म और मृत्यु के चक्कर में पड़ते रहे हैं। अत: इस बार, प्रयोग के लिए ही सही, हम यह क्यों न देख ले कि त्याग का सच्चा जीवन कैसा होता है? और इस तरह दोनों प्रकार के जीवनों को तुलना करके देख लें। महज उत्सुकता के लिए ही सही, हम यह क्यों न देख लें कि पूर्ण पवित्रता का उच्चतर जीवन कैसा होता है? जिससे हमारा चित्त शुद्ध हो, हृदय पवित्र हो और हम लक्ष्य को प्राप्त कर सकें, वही नैतिक और आध्यात्मिक है। इससे भिन्न जो भी है, वह नैतिक नहीं है। पवित्रता ही प्रभु की कृपा की एकमात्र शर्त है। आध्यात्मिक जीवन की नींव है त्याग – शरीर और मन सेे त्याग। यह त्याग सभी महापुरूषों की धुरी रहा है। जब साधक के जीवन में धन और लोभ का त्याग, सब प्रकार के मैथुन का त्याग तथा अहंभाव का त्याग – ये तीन त्याग प्रतिष्ठित हो जाते हैं, तब आध्यात्मिक जीवन सहज और बाधारहित हो जाता है और तब ईश्वर-दर्शन एक सहज घटना के रूप में साधक के जीवन में उपस्थित हो जाता है।

लोगों से खुलकर मत मिलो

तुम्हें लोगों से बहुत खुलकर मिलना-जुलना नहीं चाहिए। एक बार श्रीरामकृष्ण ने नरेन्द्रनाथ (स्वामी विवेकानन्द) को प्रसिद्ध बंगाली नाटककार एवं कलाकार गिरिशचन्द्र घोष के साथ बहुत अधिक से मना किया। उन्होंने कहा, ‘जिस कटोरी में लहसुन बहुत समय तक रखी हो, उसे अच्छी तरह धो डालने पर भी लहसुन की थोड़ी-बहुत गन्ध बनी ही रहती है।’ दूसरे भक्तों से यह बात सुनकर गिरिश बड़े दु:खित हुए और श्रीरामकृष्ण के पास जाकर इस सम्बन्ध में चर्चा की। उन्होंने पूछा, ‘इस गन्ध को दूर करने के लिए मैं क्या करूं?’ श्रीरामकृष्ण ने उत्तर दिया, ‘तुमने भगवदभक्ति की प्रचण्ड अग्नि प्रज्वलित कर रखी है, उसमें सब कुछ जलकर भस्म होता जा रहा है।’ गिरिश ने कहा, ‘मैंने सुना है कि आपने इस सम्बन्ध में कुछ कहा है, लेकिन आर्शीवाद दीजिए कि लहसुन की यह दुर्गन्ध दूर हो जाए।’ श्रीरामकृष्ण- ‘तुमने भक्ति की ऐसी ज्वाला रखी है कि वही सारी दुर्गन्ध दूर कर देगी। तुम्हारे पूर्वजीवन की बू तक नहीं रहेगी।’ बाद में गिरिशचन्द्र घोष ने कहा था, ”प्रभु ने मेरे समस्त दुर्गुण हर लिये।’’

                साभार: धर्मजीवन तथा साधना

स्वामी यतीश्वरानन्द

 

Leave a Reply

Your email address will not be published.