न्यायतंत्र में विद्रोह

न्यायतंत्र में विद्रोह

यह काफी निराशाजनक बात है कि माननीय सर्वोच्च न्यायालय के चार न्यायाधीश मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा के साथ सामूहिक रूप से लड़ रहे हैं। यह कुछ और नहीं बल्कि उनका अहंकार ही है। लेकिन कुछ भी हो यह एक बड़ा गंभीर मामला है। क्योंकि इस मामले ने नेताओं के हस्तक्षेप को हवा दे दी है। यह मामला तो अब इतना आगे बढ़ चुका है कि अब इसे माननीय सर्वोच्च न्यायालय के अंदर नहीं सुलझाया जा सकता है। राहुल गांधी, जिन्होंने हाल ही में कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष पद की कमान संभाली है, वह इस मामले में विपक्षी दल की ओर से नेतृत्व कर रहे हैं। न्यायाधीश रंजन गगोई, मदन लोकुर, चेलमेश्वर और कुरियन जोसेफ के द्वारा आयोजित प्रेस कान्फ्रेंस के बाद राहुल ने भी अपने पार्टी के प्रमुख नेता कपिल सिब्बल, पी चिदंबरम जैसे कानून के जानकार नेताओं से परामर्श लेकर प्रेस कान्फ्रेंस का आयोजन कर यह बिल्कुल साफ कर दिया कि वह इन चार न्यायाधीशों की बातों से बिल्कुल सहमत हैं।

मजेदार बात तो यह है कि  देश के कई तथाकथित सेक्यूलर, बुद्धिजीवियों और वकीलों ने भी इस युद्ध में भाग लेते हुए माननीय मुख्य न्यायाधीश का विरोध किया है। केवल यही नहीं, इस पूरे मामले को नरेन्द्र मोदी सरकार का विरोध करने कारूप दिया जा रहा है। एक वरिष्ठ राजनायिक की माने तो इस मामले के सहारे नरेंद्र मोदी की सरकार को तितर-बितर करने का प्रयास किया जा रहा है। गुजरात विधानसभा चुनाव से पूर्व मोदी के विरूद्ध सोशल मीडिया का प्रयोग किया जाना, हार्दिक, जिग्नेश और अल्पेश को उकसाये जाना तथा हाल ही में महाराष्ट्र में जिग्नेश मेवानी और उमर खालीद की उपस्थिति में तथाकथित दलित आंदोलन को भड़काये जाना, आदि मोदी के खिलाफ एक षड्यंत्र का हिस्सा है। ऐसा लगता है कि वर्ष 2018 और 2019 में बहुत कम शान्ति देखने को मिलेगी। सरकार का विरोध करने के  लिए हर प्रकार के षडयंत्र रचे जायेंगे ताकि 2019 के चुनाव के पहले एक सरकार विरोधी हवा तैयार की जा सके।

मुझे नहीं लगता कि इन जजों को अपने इस एक्शन का इस प्रकार से राजनीतिकरण होने का अंदेशा होगा। यहां तक कि सीपीएम के वरिष्ठ नेता डी. राजा तो न्यायाधीश चलमेश्वर के घर पर भी गये। वैसे देखे तो इन चारों मुख्य न्यायाधीशों का इतिहास कभी भी एक जैसा नहीं रहा हैं।

23 जून 1997 को आंध्र प्रदेश कोर्ट में संयुक्त न्यायाधीश का पद संभालने से पहले न्यायाधीश चेलमेश्वर 13 अक्टूबर 1995 तक एन चन्द्रबाबू नायडू की नेतृत्व वाली राज्य सरकार में संयुक्त एडवोकेट जनरल के पद पर थे। यह तेलगु देशम पार्टी की सरकार थी, जिसके विपक्ष में कांग्रेस पार्टी थी।

न्यायाधीश गगोई 28 फरवरी 2001 में न्यायाधीश बनने से पहले गुवाहाटी हाई कोर्ट में वकील थे। हालांकि उन्होंने अपने इस कार्यकाल में कभी भी राज्य सरकार के लिए काम नहीं किया। लेकिन हमें यह नहीं भुलना चाहिए कि  वह कांग्रेस के वरिष्ठ नेता केशव चन्द्र गगोई के पुत्र हैं, जो 1982 में असम के मुख्यमंत्री रह चुके हैं।

न्यायाधीश कुरियन जोसेफ ने 1979 में केरल हाई कोर्ट में अपनी वकालत का आरम्भ किया और वे 12 जुलाई 2000 को केरल हाई कोर्ट के जज बने । लेकिन इसके बीच में उन्होंने राज्य की कांग्रेस सरकार के लिए भी कार्य किया। 1987 में जब के करूनाकरन राज्य के मुख्यमंत्री थे, उस समय वह सरकार की तरफ से सरकारी वकील भी रहे। 1994 में के करूनाकरन ने तो उन्हें केरल का एडिशनल एडवोकेट जनरल बनाया, जिस पर वे ए . के. एंटनी के कार्यकाल तक बने रहें।

न्यायाधीश मदन बी. लोकुर ने अपनी वकालत की शुरूआत 1977 में सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट से की। वे वाजपेयी सरकार के कार्यकाल में एडिशनल सोलिसीटर जनरल चुने गये, जिस पर वह तब तक रहे जब तक वे 19 फरवरी 1999 में दिल्ली हाई कोर्ट के एडिशनल जज नहीं चुन लिए गये।

जहां तक बात मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा की करें तो उन्होंने 1977 में अपनी वकालत ओडिशा हाई कोर्ट से शुरू की। वह 1996 में ओडिशा हाई कोर्ट में संयुक्त जज के पद पर भी रहे। उसके अगले ही वर्ष उनका मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में तबादला हो गया।  सबसे मुख्य बात यह है कि उन्होंने अपने कार्यकाल में  दूसरे न्यायाधीशों की भांति कभी भी किसी राज्य सरकार के लिए कार्य नहीं किया। हां, यह अवश्य है कि उनके चाचा रंगनाथ मिश्रा देश के मुख्य न्यायाधीश रह चुके हंै। हालांकि सेवानिवृत होने के पश्चात रंगनाथ मिश्रा ने कांग्रेस में प्रवेश कर ओडिशा से राज्यसभा के लिए चुने गये। न्यायाधीश दीपक मिश्रा के ही दूसरे चाचा लोकनाथ मिश्रा (असम के पूर्व गवर्नर) के पुत्र पीनाकी मिश्रा ओडीशा के पुरी सीट से लगातार तीन बार से सांसद चुने जाते रहे हैं। पीनाकी मिश्रा यहां पिछले दो बार कांग्रेस तो इस बार राज्य में शासन कर रही बीजू जनता दल से सांसद चुने गये हैं। माननीय मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा के पिता रघुनाथ मिश्रा भी अपने गृहनगर बानपुर से कांग्रेस की ओर से ओडिशा में विधायक रह चुके हैं। अत: हम यह आसानी से कह सकते है कि सबसे अधिक न्यायाधीश दीपक मिश्रा ही कांग्रेस के निकट रहे हैं।

जैसा हमें देखने को मिला, इन सभी जजों के मिश्रित राजनीतिक संबन्ध रहे हैं। दो जजों के संबन्ध कांग्रेस के साथ तो बचे दो जजों के संबन्ध भाजपा और इसके ही सहयोगी दल तेलगु देशम पार्टी से संबन्ध हंै। और ये चारों लोग उस व्यक्ति से लड़ रहें है, जिसका कांग्रेस से सबसे अधिक संबन्ध है। दूसरे शब्दों में कहे तो यह किसी भी प्रकार से राजनीतिक मामला है ही नहीं। इन जजों द्वारा पिछले कुछ वर्षों में जिस प्रकार के निर्णय दिये गये हंै, उससे भी यह साफ होता है कि इनका कोई राजनीतिक झुकाव नहीं रहा है। हां यह सत्य है कि माननीय न्यायाधीश कुरियन ने 2014 में गुड फ्राईडे के दिन ऑल इंडिया चीफ जस्टीस कांफ्रेस का आयोजन करने के मोदी सरकार के निर्णय का विरोध किया था। फिर भी वह कोई राजनीतिक विरोध नहीं था।

फिर ऐसा क्या है, जिससे इस प्रकार का विवाद पैदा हुआ? इन न्यायाधीशों के द्वारा लिखे गये पत्रों को पढऩे के पश्चात मैंने यह पाया कि इन न्यायाधीशों को ऐसा लगता है कि  मुख्य न्यायाधीश द्वारा इन जजों को अन्य प्रमुख मामलों की सुनवाई करने के लिए मौका नहीं दिया जा रहा है। उनका यह भी मानना है कि मुख्य न्यायाधीश कई मौकों पर कुछ महत्वपूर्ण मामलों पर जूनियर जजों द्वारा दिये गये फैसलों पर चुप रहे हैं।

लेकिन बात तो यह है कि सुप्रीम कोर्ट में किसी न किसी के पास तो कार्य बांटने की जिम्मेदारी होनी चाहिये। यह किसी अराजकता से कम नहीं होगी जब न्यायाधीश अपने मन मुताबिक मामलों की सुनवाई करने लगे। यदि ऐसा हुआ तो मुवक्किल और उनके वकील भी कुछ दिन में अपने मनमुताबिक उनके मामलों की सुनवाई करने के लिए न्यायाधीशों की मांग करने लगेंगे। सदैव संसदीय लोकतंत्र में प्रधानमंत्री भी सबके समान एक जैसा होता है, लेकिन हमें नहीं भूलना चाहिये कि जब बात मंत्रियों को कार्य बांटने की होती है तो उसका बंटवारा प्रधानमंत्री ही करता हैं। यही बात न्यायपालिका पर लागू होती है। अत: दीपक मिश्रा अपने कार्य से कैसे पीछे हट सकते हैं?

दूसरा, सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि जहां एक तरफ ये न्यायाधीश अपने आप को मुख्य न्यायाधीश के समान मानते हैं तो दूसरी तरफ यहीं लोग अन्य मामलों को देख रहे न्यायाधीशों को जूनियर कहते हैं तथा उनके द्वारा देखे जा रहे मामलों को अपने हाथ में लेना चाहते हैं तो यह बात प्रदर्शित करती है कि ये न्यायाधीश अपना दबदबा कायम करने का प्रयास कर रहे हैं।

दूसरी शब्दों में कहे तो श्रेष्ठता के आधार पर इन न्यायाधीशों की मांग में कोई दम नहीं है। यहां यह कहना गलत नहीं होगा कि माननीय न्यायाधीश को अपने अन्य साथियों से सतर्क रहने की आवश्यकता है। हां ! ये न्यायाधीश सम्माननीय हैं लेकिन खुलेआम प्रेस कांफ्रेंस कर इन लोगों ने लक्ष्मण रेखा को पार किया है। कोई कल्पना कर सकता है, उन नैतिक अधिकारों का क्या होगा, जब आर्मी चीफ के मामले की सुनवाई लेफ्टीनेन्ट जनरल के द्वारा तथा दिल्ली पुलिस कमिश्नर के मामले की सुनवाई किसी वरिष्ठ पुलिस के द्वारा की जाएं। सबसे निराशाजनक बात तो यह है कि इन चारों न्यायाधीशों के साथ  वे लोग खड़े हो रहे हैं, न्यायालय में मुख्य न्यायाधीश को प्रभावित करने में असफल रहे हैं।  इन बागी न्यायाधीशों का मुख्य न्यायाधीश से बस इतनी ही समस्या है कि उन्होंने अमित शाह से संबन्धित मामले को उनको न सांैप कर उनसे जूनियर जज को सांैप दिया।

देश के जाने-माने वकील दुष्यंत दवे ने ठीक उसी दिन मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा पर ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ में लेख लिखा था, जिस दिन इन चारों मुख्य न्यायाधीशों ने मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ प्रेस कांफ्रेस की थी। ध्यान योग्य बात तो यह है कि दुष्यंत दवे द्वारा लिखा गया लेख भी ठीक उसी पत्र के समान था जैसा इन न्यायाधीशों ने मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा के पास अपनी बात करने के लिए लिखा था।

प्रश्न यहां यह खड़ा होता है कि आखिर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ मोर्चा क्यों खोला? हालांकि इस मामले में मैं पहले ही एक वरिष्ठ राजनैयिक की बात को रख चुका हूं। लेकिन यहां कुछ और भी अलग बात करने की आवश्यकता है। राहुल गांधी का मुख्य न्यायाधीश का विरोध इसलिए नहीं है कि दीपक मिश्रा ने 1984 के दंगे की फाईल खोली या फिर रामजन्मभूमि मामले में कपिल सिब्बल की बात नहीं सुनी। हमें यह नहीं भुलना चाहिए कि इंदिरा गांधी ने समर्पित न्यायपालिका (ए कमिटेड जुडिशयरी) के विचार का समर्थन किया था और उसके बाद इसी कांग्रेस ने सख्त जजों की नीति पर कार्य किया और नरम जजों को पुरस्कृत करने को निरूत्साहित।

प्रकाश नंदा

 

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