३ तलाक बिल: कांग्रेस ने दिए मोदी के दोनों हाथों में लड्डू

३ तलाक बिल: कांग्रेस ने दिए मोदी के दोनों हाथों में लड्डू

बार-बार कांग्रेस के बदलते रुख ने तीन तलाक के बिल की चर्चा घर- घर करवा दी। सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बाद जो आसानी से हो जाता, उसकी सारी वाहवाही अब भाजपा और नरेंद्र मोदी के खाते में चली गयी। चूंकि तीन तलाक प्रथा लगभग सभी मुस्लिम देशों में समाप्त है यहां तक कि पाकिस्तान में भी नहीं है, ऐसे में उस बिल का पास होना, वह भी सुप्रीम कोर्ट के फैसले के मद्देनजर लगभग एक सामान्य बात होती। कांग्रेस ने उसे राजनैतिक लड़ाई का मैदान बना दिया जिसमें मोदी ने उसे चारोंखाने चित्त कर दिया।

मर्दों के अमानवीय जुल्म को सहती आ रहीं मुस्लिम महिलायें, जिन्हें टेलीफोन तक पर तलाक कह कर घर से बाहर निकाल दिया जाता है उन्हें तलाक पर बनाए जा रहे नए कानून से एक आशा की किरण दिखाई दी थी। कांग्रेस पार्टी ने उसे रोक कर इस कमजोर वर्ग के साथ भारी अन्याय किया है। कांग्रेस का अपने आप को प्रगतिशील कहने का दावा खोखला साबित हो गया। जिस भाजपा को ये लोग दकियानूसी पुराने ख्यालों का कहते आये है उसमें प्रगतिशीलता की झलक स्पष्ट रूप से दिखाई दी।

कांग्रेस ने यही बिल लोकसभा में सहयोग देकर पास कराया, वहां कोई विरोध नही किया और न ही किसी संशोधन की मांग की। यकायक राज्यसभा में उसे अटका कर देश भर में अपनी किरकिरी करवा ली। पार्टी के जिन सलाहकारों ने पहले समर्थन फिर विरोध करवाया, वे अवश्य ही राहुल गांधी के अध्यक्ष बनने से खुश नहीं है। राहुल को सिर मुंड़ाते ही ओले पड़ गए। उनके उभरते हुये नेतृत्व पर सवालिया निशान लगवा दिया।

इतना बड़ा मुद्दा जिस पर सुप्रीम कोर्ट की मुहर लगी हो जिसे पूरा देश देख रहा हो, जिस पर शिक्षित उन्नतिशील मुस्लिम समाज, खासतौर से युवा वर्ग की आंखें जमी हों, उस को गुड्डा गुड्डी के खेल की तरह पहले समर्थन देकर तथा फिर विरोध कर के कांग्रेस ने फजीहत करवा ली।

नरेंद्र मोदी, युवा मुस्लिम समुदाय में अपनी पैठ बनाने में सफल रहे। कांग्रेस ने उनके दोनों हाथों में लड्डू थमा दिए। अब बिल जब भी पास होगा तो मोदी की जीत है यदि पास नही होता तो भी जीत मोदी ही की।

सिद्धांतविहीन तो राजनीति होती ही है और  पार्टियां भी, पर कांग्रेस दिशाविहीन हो गई है। आपराधिक छवि की पार्टियों, लालू की राष्ट्रीय जनता दल और अखिलेश की समाजवादी पार्टी के साथ समझौता कर कांग्रेस ने गांधीवाद का अहिंसक रास्ता छोड़ दिया था। आज उसने कट्टरपंथी मुल्लो का साथ देकर अपने आप को फासिस्टवादी भी साबित कर दिया है। हो सकता है अमित शाह की तिकड़मी टीम के ताने- बाने में फंस कर कांग्रेस ये आत्मघाती निर्णय ले बैठी हो। अब जो भी हो कांग्रेस का इस मकड़ जाल से निकल पाना संभव नहीं होगा।

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यदि 25 प्रतिशत भी महिला वोट भाजपा को चले गए तो लोकसभा में अंतिम सांसें ले रही कांग्रेस का सूपड़ा साफ हो जाएगा जब कि भारी संख्या में नवयुवक भी इस बिल के समर्थन में खड़े दिखाई दे रहे हैं जो अन्तत: भाजपा को वोट भी दे सकते हैं। हाल ही में हुए उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में भाजपा को मुस्लिम वोट मिले भी थे जो शायद हिन्दुस्तान के चुनावी इतिहास में पहली बार हुआ हो, जब केसरिया कही जाने वाली किसी पार्टी की तरफ उनका रुझान बना। इसे मोदी की गांधीवादी नीतियों की ओर सफल कदम भी माना जा सकता है। जब पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी अपनी लोकप्रियता की चरम सीमा पर थे तब शाह बानो के केस में सुप्रीम कोर्ट की मुहर के बाद भी उसके खिलाफ कानून बना कर, ऐसा ही विरोध कर के मुंह की खाये थे। केंद्रीय मंत्री आरिफ मोहम्मद खान के इस्तीफे का भी असर उन पर नही हुआ था। आज राहुल गांधी ने वही गलती दुहरा दी। इन तीन दशकों में प्रगति और शिक्षा की बयार मुस्लिम के घरों तक पहुंच गई है। दबी, कुचली, अन्याय सहती महिलायें अपने अधिकारों के प्रति जागरूक हो गई हैं। शिक्षित मुस्लिम युवा वर्ग चाहे महिला हो या पुरूष तीन तलाक के खिलाफ कानून बनाने के हक में भाजपा के साथ खड़ा हुआ है।

बिल का अगले सेशन में या शरदकालीन सेशन में पास होना भाजपा को अधिक फायदेमंद भी हो सकता है उस समय तक राज्यसभा में और भी भी सदस्य भाजपा के चुन कर आ जाएंगे। तब लोकसभा चुनाव नजदीक होंगे और महिलाओं की  हक की लड़ाई के लिए मोदी का नाम तरोताजा होगा।

कांग्रेस का ये कहना कि शौहर के जेल जाने पर कौन खिलायेगा, देखभाल करेगा अजीब सा लगता है वैसे भी तो पल भर में अपनी मर्जी से जानवर की तरह पत्नी को बेसहारा कर घर से निकाल देने पर कौन ख्याल करता।

पार्लियामेंट में महिलाओं को आरक्षण मांगने वाली कांग्रेस का असली चेहरा सामने आ गया उसने मुस्लिम महिलाओं को मिलने वाला तथा चैन से जीने का बुनियादी हक उनसे छीन लिया। लगता है राहुल गांधी के ठीक से स्थापित होने से पहले ही उनकी चमचा चौकड़ी उन्हें उखाड़ देगी जिसमे विद्वान वकील भी है और दर्जा दो- तीन पास कांग्रेस खजाने के मालिक, वरिष्ठ नेता भी।

ये भी अजीब है कि लोकसभा में समर्थन और राज्यसभा में विरोध। क्या दोनों जगह अलग- अलग सलाहकार थे या हाईकमाण्ड जिसने जो कहा उसी को ओके कर देता है। राज्यसभा में गुलाम नबी आजाद की बात मान ली गई होगी और लोकसभा में चौकड़ी की। इस तरह का फैसला लालू या मुलायम सिंह यादव ने लिया होता तो शायद बहस का मुद्दा न होता। एक महत्वपूर्ण राष्ट्रीय मुद्दे को बेहद हल्के रूप में लिया गया, इस का पोस्टमार्टम तो राहुल कर ही रहे हैं। इससे पहले की राहुल के नेतृत्व पर बट्टा लगे, पुरानी परिपाटी के अनुसार पार्टी के कुछ पुराने सिरमौर धाराशायी हो जाएंगे।

डॉ. विजय खैरा

 

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