ऐसा कोई सगा नहीं जिसे ‘आप’ ने ठगा नहीं

ऐसा कोई सगा नहीं जिसे ‘आप’ ने ठगा नहीं

कोई भी राजनीतिक दल किसे अपना उम्मीदवार बनाता है या किसको किस पद पर बिठाता है यह उसका अंदरूनी मामला है। लेकिन आम आदमी पार्टी ने जिस तरह से राज्यसभा के उम्मीदवारों का चयन किया है उसका रायता सड़क तक फैल गया है। हर तरफ इसी बात की चर्चा है कि आखिर किस आधार पर और किस तरह से पार्टी ने ऐसे लोगों को राज्यसभा का टिकट दे दिया जिसे पार्टी के लोग भी पहचान नहीं रहे हैं। हालांकि यह बात किसी से छिपी हुई नहीं है कि क्यों पार्टी ने उन लोगों को टिकट नहीं दिया जो वाकई इसके हकदार थे और क्यों ऐसे लोगों को टिकट दे दिया जिन्हें पार्टी के कुछ गिने-चुने शीर्ष नेताओं के अलावा कोई नहीं पहचानता है। आप पार्टी ने अपने जिन तीन उम्मीदवारों की सूची जारी की उसे देखकर यह साफ पता चलता है कि पार्टी-संगठन ने ये नाम तय करते समय ना तो शुचिता व पारदर्शिता का ध्यान रखा है और ना ही नैतिकता या वैचारिकता का।

सूची का सबसे पहला नाम ही केजरीवाल के पुराने सखा कहे जाने वाले उन संजय सिंह का है जिन पर पंजाब विधानसभा चुनाव के समय पैसे लेने से लेकर तमाम तरह के गंभीर आरोप लगे जिसके चलते पार्टी ने उन्हें बीच अभियान में प्रदेश इंचार्ज के पद से किनारे कर दिया था। दूसरा नाम दिल्ली के एक बड़े व्यवसायी सुशील गुप्ता का है जो पिछले कुछ माह तक कांग्रेस में थे और वर्ष 2013 में मोतीनगर से कांग्रेस के टिकट पर विधानसभा का चुनाव भी लड़ चुके हैं। इसी प्रकार तीसरा नाम चार्टर्ड एकाउंटेंट नारायण दास गुप्ता का है जो अब तक आम आदमी पार्टी की खाता-बही संभालते रहे हैं और पार्टी पर चंदे व फंड की गडबडिय़ों के जितने भी आरोप लगे उस सबका कत्र्ता-धत्र्ता उन्हें ही बताया जाता है।

Layout 1यानि तीनों नाम ऐसे ही सामने आए हैं जिन पर बवाल कटना ही था। लेकिन लाख टके का सवाल है कि आखिर इन तीनों को ही राज्यसभा में भेजने का फैसला क्यों लिया गया? इस सवाल का ठोस जवाब जानने के लिए कहीं दूर जाने की भी जरूरत नहीं है। पार्टी के इस फैसले के पीछे की वजह तो टिकट वितरण के फैसले पर निर्णायक मुहर लगाने के लिए बुलाई गई बैठक से ठीक पहले पूर्व उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया के साथ हुई विधायकों की बातचीत में ही स्पष्ट हो गई। विधायकों से बातचीत की शुरूआत ही सिसोदिया ने रूपए-पैसे के मसले की चर्चा के साथ की। पार्टी में फंड की कमी होने की दलील देते हुए उन्होंने विधायकों के साथ यह व्यथा भी साझा की कि कोई आजकल पांच हजार रूपया देने के लिए भी तैयार नहीं हो रहा है। यानि इशारों में सिसोदिया ने विधायकों को वह वजह बता दी जिसके कारण पार्टी को ऐसे नामों को राज्यसभा में भेजने के लिए मजबूर होना पड़ा है जिसकी संगठन में टिकट पर दावेदारी करने की हैसियत भी नहीं थी। हालांकि यह कहा जा सकता है कि अगर आप के शीर्ष नेतृत्व ने ऐसा किया तो इसमें गलत क्या है? ऐसा तो कई पार्टियों में होता है।

खास तौर से कई क्षेत्रीय पार्टियां पैसे के बदले अपना टिकट बेचने के लिए पहले से ही बदनाम हैं। इस लिहाज से निश्चित ही ‘आप’ के शीर्ष नेतृत्व ने वही किया है जिसकी परंपरा काफी पुरानी है। लेकिन बात अगर सामान्य राजनीतिक पार्टी के तौर पर खुद को प्रस्तुत करने वाले दल की होती तो इतना बवाल नहीं होता। दरअसल इस मसले पर उंगलियां उठ ही इस वजह से रही है क्योंकि यह वही आप है जिसने अलग तरह की राजनीति करने का वायदा करके सार्वजनिक जीवन में पदार्पण किया था। बात-बात में जनादेश लेने, हर काम पारदर्शिता से करने, जनता की सहभागिता से सरकार ही नहीं बल्कि संगठन भी चलाने, सत्ता मिलने पर सरकारी बंगला, गाड़ी व अन्य सुख-सुविधाएं नहीं लेने, साप्ताहिक तौर पर जनता दरबार लगाने, जनता को राजा बनाने और खुद सेवक बनकर काम करने सरीखे ना जाने कितने ऐसे वायदे किए थे अरविंद केजरीवाल ने उस वक्त जब उन्होंने अन्ना हजारे के जनलोकपाल आंदोलन की जमीन कब्जा करते हुए आप का गठन करके सक्रिय राजनीति में कदम रखा था। ऐसे में स्वाभाविक है कि जिन लोगों ने केजरीवाल की उन बातों पर भरोसा करके उनके साथ जुडऩे या उन्हें अपना सहयोग व समर्थन देने की पहल की थी वे आज अपने को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं।

Layout 1पार्टी की नीति और नीयत से जिनके विश्वास को धक्का ही नहीं बल्कि गहरा सदमा लगा है उनमें आप के कई विधायक भी हैं, पार्टी से खदेड़े जा चुके संस्थापक भी हैं, आप के वरिष्ठ-कनिष्ठ व जमीनी नेताओं की बहुत बड़ी जमात भी है और दिल्ली की वह जनता भी है जिसने बदलाव, सुधार व बेहतरी की आशा में बड़ी उम्मीदों के साथ प्रदेश की 70 में से 67 सीटों पर केजरीवाल के प्रत्याशियों को जीत दिलाई थी। वह भी तब जबकि उससे कुछ माह पूर्व हुए मतदान में त्रिशंकु विधानसभा का गठन होने के बाद महज 49 दिन तक कांग्रेस के समर्थन से सरकार चलाने में ही केजरीवाल की सांस फूल गई थी और अपनी प्रशासनिक अक्षमता व वैचारिक-सैद्धांतिक खोखलेपन का मुजाहिरा करते हुए उन्होंने दिल्ली का भविष्य दांव पर लगाकर मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया।

लेकिन दिल्ली की सत्ता पर ऐतिहासिक प्रचंड बहुमत से कब्जा करते ही केजरीवाल ने वही पुराना रंग दिखाया जिसका स्वाद अन्ना हजारे पहले ही चख चुके थे। अन्ना खुद कह चुके हैं कि अरविंद ने उन्हें धोखा दिया था लेकिन सच तो यह है कि धोखे के सिलसिले की तो वह शुरूआत ही थी। उसके बाद केजरीवाल ने ना सिर्फ भूषण पिता-पुत्र, प्रो. आनंद कुमार व योगेन्द्र यादव सरीखे पार्टी के शीर्ष संस्थापकों को बेइज्जत करके संगठन से निकाला बल्कि अमानुल्ला खान को निलंबित और कपिल मिश्रा को निष्कासित करके स्पष्ट तौर पर जता दिया कि संगठन में अरविंद की भावना ही सर्वोपरि है और पार्टी में किसी अन्य की सोच के लिए कोई संभावना नहीं है। आप में रह कर सही बात को सही और गलत को गलत कहने का अंजाम क्या होता है

उसके भुक्तभोगी विधायक देविंदर सहरावत भी हैं जिन्हें पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से इस कारण निलंबित कर दिया गया क्योंकि उन्होंने पार्टी की पंजाब इकाई के नेताओं पर टिकट के बदले महिलाओं के शोषण का आरोप लगाया था।

इसी प्रकार का विश्वासघात किया गया पंजाब में पार्टी को खड़ा करने वाले सुच्चा सिंह के साथ जिन्हें प्रदेश विधानसभा चुनाव के दौरान ही प्रदेश संयोजक के पद से हटा दिया गया। मौजूदा पैंतरे से कुमार विश्वास को भी सिर्फ इसी वजह से शहीद किया गया है क्योंकि उन्होंने सेना द्वारा पाकिस्तान में की गई सर्जिकल स्ट्राइक को सही करार देते हुए इसका सबूत मांगे जाने को गलत बताया था। यानि समग्रता में देखा जाए तो केजरीवाल ने हर किसी का सिर्फ इस्तेमाल ही किया और जब बदले में कुछ देने की नौबत आई तो उसे संगठन से बाहर खदेड़ दिया गया। अब पार्टी का जो मौजूदा स्वरूप है उसमें वही बड़े नाम बचे हैं जो शून्य से शिखर के सफर में शुरू से केजरीवाल के साथ रहे हैं और जिनके पास केजरीवाल की कमजोर नस होने की प्रबल संभावना को कतई खारिज नहीं किया जा सकता। लेकिन यह तय है कि अब तक जिस तरह से केजरीवाल अपने बराबर बैठने वालों को किनारे लगाते आए हैं उसी तर्ज पर उनका अगला बड़ा शिकार भी जल्दी ही सामने आ जाएगा और अपनों के साथ विश्वासघात का सिलसिला आगे भी चलता ही रहेगा।

(लेखक सुप्रीम कोर्ट में वरिष्ठ अधिवक्ता हैं)

सुधीर अग्रवाल

 

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