फिर से क्यों जाग उठा राष्ट्रविरोधी आन्दोलन

फिर से क्यों जाग उठा राष्ट्रविरोधी आन्दोलन

क्या दो साल पहले हुए कथित असहिष्णुता विरोधी आंदोलन और हालिया दलित उभार के आंदोलन में कोई समानता है। असहिष्णुता विरोधी आंदोलन की शुरूआत उत्तर प्रदेश के गौतमबुद्ध नगर के दादरी कस्बे में हुई अखलाक की हत्या के विरोध के बहाने शुरू हुई थी, वहीं भीमा कोरेगांव की घटना करीब दो सौ साल पहले महाराष्ट्र में पेशवाओं की अंग्रेजों के सामने हुई हार की जीत के जश्न के बहाने हुई है। दोनों ही आंदोलनों के बीच वक्त और जमीनी दूरी लंबी है। इसलिए इन दोनों आंदोलनों में समानता ढूंढऩा कई राजनीतिक और सामाजिक समीक्षकों की नजर में दूर की कौड़ी ही माना जाएगा। लेकिन जैसे ही होने जा रहे विधानसभा चुनावों के संदर्भ में देखें तो दोनों ही आंदोलनों में समानता अपने-आप दिखने लगती है। याद कीजिए असहिष्णुता विरोधी आंदोलन को, जिसे प्रगतिशील और धर्मनिरपेक्ष कहे जाने वाले तबके ने शुरू किया था। कायदे से दादरी में जब अखलाक की हत्या भीड़ के हाथों हुई, तब अयोध्या आंदोलन के दौरान धर्मनिरपेक्षता के सबसे बड़े पोस्टर ब्वॉय के तौर पर उभरे मुलायम सिंह यादव की समाजवादी पार्टी उत्तर प्रदेश की सत्ता में थी। कायदे से असहिष्णुता विरोधी प्रगतिशील आंदोलन को धर्मनिरपेक्षता के पोस्टर ब्वॉय के खिलाफ ही होना था। लेकिन ऐसा नहीं हुआ, बल्कि उस मोदी सरकार के खिलाफ हुआ, जिसके हाथ में सही मायने में कानून और व्यवस्था को संभालने की संविधान प्रदत्त जिम्मेदारी ही नहीं है। संविधान के मुताबिक कानून और व्यवस्था राज्यों का विषय है और केंद्र सरकार उसमें दखल ही नहीं दे सकती। राज्य में कहीं हत्या होती है या लूट-डकैती होती है तो वह शुद्ध रूप से कानून और व्यवस्था का ही मामला है और इसकी जिम्मेदारी राज्य की ही है। ऐसा नहीं कि असहिष्णुता विरोधी आंदोलनकारियों के अगुआ प्रबुद्ध जनों को यह पता नहीं था कि अखलाक की हत्या न रोक पाना राज्य सरकार की नाकामी है। लेकिन उन्होंने जानबूझकर इसे मोदी सरकार के खिलाफ वैचारिक हथियार की तरह इस्तेमाल किया। इसका फायदा किसे हुआ। यह देखना दिलचस्प होगा और इसके साथ ही पता चलेगा कि मौजूदा दलित आंदोलन का मकसद क्या है।

असहिष्णुता विरोधी आंदोलन ने बिहार में विधानसभा चुनावों के मद्देनजर धर्मनिरपेक्षता के दूसरे बड़े पोस्टर ब्वॉय लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार को नजदीक आने में मदद की। इसका असर यह हुआ कि बिहार का करीब 8.2 प्रतिशत दलित और करीब 16.8 प्रतिशत मुस्लिम मतदाता गोलबंद हो गए। इसमें करीब 16 प्रतिशत यादव और करीब दो प्रतिशत कुर्मी मतदाताओं ने बिहार की राजनीतिक गोलबंदी को मजूबत किले में तब्दील कर दिया। इसका असर यह हुआ कि राज्य की 243 सदस्यीय विधानसभा में लालू प्रसाद यादव के राष्ट्रीय जनता दल को 80 और नीतीश कुमार के जनता दल यू को 78 सीटों पर जीत मिली। इस तरह बिहार की सत्ता में गैर सांप्रदायिक और कथित धर्मनिरपेक्ष दलों के साझे की सरकार बन गई। इसके पीछे निश्चित तौर पर सांप्रदायिकता और असहिष्णुता के खिलाफ फैलाए गए अभियान का ही योगदान रहा।

गुजरात में कांग्रेस के सहयोग से जीते दलित नेता जिग्नेश मेवानी की अगुआई में जिस तरह भीमा-कोरेगांव की लड़ाई में दलितों की जीत के बहाने दलितों को गोलबंद करने की कोशिश हुई, उसका भी मकसद साफ नजर आ रहा है। जिग्नेश को जिस तरह जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय की छात्र नेता शेहला राशिद, कन्हैया कुमार और उमर खालिद का सहयोग मिला है, उसके राजनीतिक स्पष्ट राजनीतिक निहितार्थ हैं। पेशवाओं पर अंग्रेजों की जीत की दो सौंवी सालगिरह मनाना एक तरह से देशविरोधी कार्य ही है। क्योंकि 1818 की लड़ाई में पेशवा पर अंग्रेजी सेना को जीत मिली थी। लेकिन इस जीत का जश्न दलितों की जीत के तौर पर मनाया गया। इसका जरिया बनाया गया दलितों को, क्योंकि दलितों यानी महाराष्ट्र के महार सैनिकों ने तब की लड़ाई में अंग्रेजी सेना का साथ दिया था। इस बहाने आजादी के आंदोलन के गढ़ रहे महाराष्ट्र की राष्ट्रवादी सोच और उसके जरिए बने सामाजिक समीकरण को चोट पहुंचाने की कोशिश की गई है। इसका मकसद महाराष्ट्र ही नहीं, बल्कि उन आठ राज्यों के चुनावों में दलित-मुस्लिम गठजोड़ को तैयार करना है, जहां इसी साल कुछ महीनों के अंतराल पर चुनाव होने हैं। अगर यह गठजोड़ बन गया तो इन राज्यों में कथित अगड़ों की प्रतिनिधि भारतीय जनता पार्टी की चुनावी जीत के रथ को रोकना आसान होगा।


 

फेल होती अम्बेडकर दलित राजनीति


 

अम्बेडकर के नाम पर उनके विचारों को आगे कर मायावती एकमात्र नेता हैं जो दलित वोटों को इकट्ठा कर देश के सबसे बड़े प्रदेश उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बार-बार बैठती रही हैं। लेकिन अंत में वो भी जमीन पर आ गईं।

महाराष्ट्र जहां अम्बेडकर पैदा हुए, उनके अपनी जाति महार के 10 प्रतिशत से अधिक वोट होते हुए भी वो वहां पैर नहीं जमा सके। आज भी दलितों को वो सम्मान नहीं मिल सका जो गांधी चाहते थे, जिस सम्मान की कल्पना उन्होंने आजाद भारत में की थी। क्या कारण है कि अम्बेडकर के नाम पर कोई पार्टी नहीं चल पाई और अब उनके नाम पर वोट भी नहीं मिल पा रहे। उत्तर प्रदेश में 18 प्रतिशत दलित होने पर भी मायावती हाल के चुनावों में चारों खाने चित्त हो गईं। उत्तर प्रदेश में मायावती के नेतृत्व को दलित आज भी दमदार मानते हैं पर उनका अम्बेडकर के नाम पर लोगों को बौद्ध धर्म की ओर ले जाना पसंद नहीं आया हालांकि ये बात और थी कि मोदी की तरफ भी उनका रुझान बढ़ रहा था।

जहां गांधी दलितों को हिन्दू मानते थे उन्हें मुख्यधारा से जोडऩा चाहते थे। उनके सामाजिक और धार्मिक अधिकारों के लिये लड़ रहे थे तो वहीं अम्बेडकर उनको हिंदुओं से अलग कर बौद्ध धर्म अपनाने को कहते रहे और उनके लिये अलग से जगह दिए जाने की बात कर रहे थे।

अम्बेडकर के पिता अंग्रेजों की आर्मी में नौकरी करते थे। अंग्रेज सरकार, दलितों को सरकारी नौकरियों का लालच दे कर उन्हें ईसाई बना कर हिन्दू धर्म से दूर कर रही थी। गांधी किसी भी कीमत पर ये नहीं होना देना चाहते थे। अम्बेडकर के दलितों को अलग से जगह दिलाने के खिलाफ वो पुणे में अनशन पर भी बैठ गए थे। अन्तत: गांधी की ही बात मानी गई। यानी दलितों की राजनीति जो अम्बेडकर शुरू कर चुके थे वो गांधी के यथार्थवादी दलितों के उत्थान के आगे नहीं टिक सकी थी।

अम्बेडकर यहां भूल गए कि दलितों में  हिन्दू धर्म की जड़ें बहुत गहरी हैं और जब अंग्रेज नौकरियां देकर भी उन्हें नहीं लुभा सके तो वो उन्हें बौद्ध कैसे बना पाएंगे? यहां कांग्रेस सच साबित हुई जो दलितों के हक की लड़ाई लड़ रही थी। और उनके अधिकारों की भी। गांधी ने एक बार नारा दिया था कि वही सच्चा कांग्रेसी है जो हरिजन (दलित) बस्ती और उनके घर में झाड़ू लगा कर आएगा।

लाखों कांग्रेसी गए, इस अभियान में सम्मलित हुए और दलितों को एक रोशनी की किरण दिखाई देने लगी। उन्हें ऐसा आजाद भारत मंजूर नहीं था जिसमें कमजोर वर्ग दलित या महिलाओं के साथ किसी तरह का भेद भाव हो। अम्बेडकर दलित वर्ग को अलग रहने का स्थान दिला कर उन्हें बौद्ध धर्मी बनाना चाहते थे। अम्बेडकर ने यहीं से दलित राजनीति की शुरूआत की जो अंग्रेजो को माफिक भी आती थी कि किसी तरह हिन्दू धर्म के अनुयायी विभाजित हो जाएं। गांधी के जिंदा रहते ये हो न सका। उनके जाने के बाद अम्बेडकर द्वारा बौद्ध धर्म की मुहिम चलाये जाने के कारण फिर दलित राजनीति गरमा गयी।

आजादी के कुछ समय के बाद ही अम्बेडकर को संविधान निर्माता, आरक्षण का जनक आदि कह कर नेता दलितों का वोट बैंक बनाने के चक्कर में लग गए जबकि पूरी की पूरी कांग्रेस ही आरक्षण के मुद्दे पर एक थी। नतीजतन दलित कांग्रेस से ही जुड़े रहे। यहां अम्बेडकर अलग-थलग पड़े, चुनाव भी हारे। कोई भी पार्टी दलितों को कांग्रेस से अलग नहीं कर सकी।

कांशीराम के राजनीति में आने के बाद दलित राजनीति का रुख बदला क्योंकि तब तक उनकी दशा में कोई आमूल परिवर्तन नहीं हो सका था, सिवाय इसके कि वो सरकारी नौकरी में भर्ती हो गए थे। पर हिन्दू धर्म में उनको वो जगह नहीं मिल सकी थी जिसके वो अधिकारी थे और जमींदारों का अत्याचार अभी भी था। कांशीराम की राजनीति रंग लाई और बहुजन समाज पार्टी के पैर जमने लगे। कांशीराम के बाद मायावती ने दलितों को वोट बैंक बना कर इसका भरपूर लाभ उठाया।

मोदी के राजनैतिक आकाश में उभरने के बाद दलितों को, जिन्हें जाति से ज्यादा अपने भविष्य और भरण-पोषण की चिंता हो रही थी एक उम्मीद दिखाई देने लगी थी, उनका अप्रत्याशित झुकाव भाजपा की तरफ हुआ। एक के बाद एक चुनाव मोदी जीतते चले गए।

यहां कांग्रेस ने कई कारणों से मुंह की खाई। कांग्रेस पार्टी में नेतृत्व का अभाव तो  था ही, साथ में मनमोहन सिंह एक कमजोर जीहजूरी फिसड्डी प्रधानमंत्री के रूप में मशहूर हो गए थे जो दलितों के लिये एक भी आकर्षक स्कीम नहीं ला सके। ऊपर से हवन में घी डालने के काम किया कांग्रेस के- लालू यादव और अखिलेश यादव की माफिया गुंडा पार्टी के साथ गठबंधन ने। कांग्रेस फिर से भूल गयी कि यही वो लोग हैं जिनके घुरगे गांवों में दलितों को सताते हैं उनकी जमीनों पर कब्जा करते हैं। यहां राहुल गांधी का दलितों के घर खाना, ठहरना कुछ काम नहीं आया।

गांधी से मोदी तक दलित राजनीति कई बार इधर उधर होती रही। अम्बेडकर उन्हें हिन्दू धर्म से अलग नही कर सके और  आजादी के बाद दलितों के सब से बड़े नेता बाबू जगजीवन राम दलितों में भी अहिरवार और जाटव की ओर ज्यादा ध्यान देते रहे। दलितों में बाल्मीकि को कुछ ज्यादा नहीं मिल सका हालांकि वो कांग्रेस का वोट बैंक बना रहा। वो लोग मायवती के साथ गए पर उनका वहां भी मोहभंग हो गया। जाटवों के बढ़ते प्रभाव से अन्य दलित जैसे कोरी पासी खटीक अपने को अनदेखा समझने लगे और उसका भरपूर फायदा भाजपा के मंजे हुए राजनैतिक खिलाड़ी अमित शाह ने उठाया। आज दलितो का एक बड़ा हिस्सा खुलकर भाजपा के साथ है।

बाबा साहिब अम्बेडकर का दलितों को बौद्ध बनाने का सपना, पहले लठिया वाले गांधी बाबा ने तोड़ा था। तो अब एक चमत्कारी बाबा नरेंद्र मोदी ने दलित बैंक में सेंध लगा कर कांग्रेस और मायावती दोनों को ही घर का रास्ता दिखा दिया। ऊपर से एक सरल, विद्वान, शिक्षित- दलित को हिंदुस्तान के सर्वोच्च राष्ट्रपति के पद पर बैठा कर इन लोगों की सत्ता वापसी का रास्ता भी अगले आने वाले चुनाव में बंद सा ही कर दिया है।

 डॉ. विजय खैरा


Layout 1

कुछ महीनों बाद दक्षिण भारत के राज्य कर्नाटक में चुनाव होना है। यहां माना जा रहा है कि भारतीय जनता पार्टी को जीत हासिल हो सकती है। महाराष्ट्र से यह राज्य सटा हुआ है। इसलिए दलित और मुस्लिम गठजोड़ के इस प्रयोग का टेस्ट इस राज्य में करने की कोशिश होगी। इस राज्य की जनसंख्या करीब 6.11 करोड़ है, जिसमें करीब 1.05 करोड़ दलित आबादी है। यानी यह आबादी करीब 16 फीसद बैठती है। इसी तरह राज्य में करीब 79 लाख यानी 12.9 प्रतिशत मुस्लिम आबादी बसती है। अगर दोनों मिल जाते हैं तो यह करीब 29 फीसद का वोट बैंक बनता है। इस राज्य में सक्रिय जनता दल सेक्युलर और कांग्रेस के बाकी दूसरे समुदायों के वोटबैंक को भी जोड़ दिया जाय तो निश्चित मानिए कि राज्य में भारतीय जनता पार्टी की जीत के सपने को दरकाया जा सकता है। भीमा-कोरेगांव से उठी दलित आंदोलन की हुंकार को जिस तरह जिग्नेश मेवानी और जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के उनके सहयोगियों ने दिल्ली तक पहुंचाया है, उससे साफ है कि दादरी के बहाने बिहार को दोहराये जाने की उनकी तैयारी पक्की है। इसी तरह दूसरा राज्य राजस्थान है, जहां की करीब सात करोड़ की आबादी में 1.05 करोड़  यानी करीब 13 प्रतिशत दलित और करीब 62 लाख 44 हजार यानी करीब 9.1 प्रतिशत मुस्लिम मतदाता हैं। यहां हाल के दिनों में गोरक्षा के नाम पर कुछ मारपीट की घटनाएं भी हुई हैं। इसलिए आने वाले दिनों में दलित-मुस्लिम गठजोड़ को साथ लाकर 22 प्रतिशत के वोटबैंक को साधने के लिए भीमा-कोरेगांव का मॉडल राजस्थान में भी अपनाया जाए तो हैरत नहीं होनी चाहिए। इससे निश्चित तौर पर वसुंधरा से नाराज माने जा रहे वोटरों को भी खींचने में मदद मिलेगी। गौरतलब है कि राजस्थान में इस साल के अंत में विधानसभा चुनाव होने हैं। इसी तरह मध्य प्रदेश की करीब सवा सात करोड़ की जनसंख्या में करीब 94 लाख यानी करीब 12.5 प्रतिशत दलित और करीब 48 लाख यानी करीब 6.6 प्रतिशत मुस्लिम आबादी है। इस तरह यहां भी दलित-मुस्लिम वोट बैंक उन्नीस प्रतिशत के आसपास बैठता है। जो राज्य में जारी पंद्रह साल की भारतीय जनता पार्टी की सरकार के सत्ता विरोधी रूझान में बड़ी ताकत बन सकती है। मध्य प्रदेश के साथ ही इस साल के अंत में राज्य से सटे छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनाव होने हैं। जहां की 2.55 करोड़ की आबादी में करीब 49 लाख आबादी यानी 20 फीसद दलित और करीब 5 लाख 11 हजार यानी करीब  2.0 आबादी मुस्लिम है। यहां भी यह मिलकर करीब 22 फीसद का वोट बैंक बनता है। इसी तरह त्रिपुरा की करीब 37 लाख की आबादी में करीब 23 लाख यानी 33 फीसद दलित और करीब 3 लाख 15 हजार यानी करीब 8.6 प्रतिशत आबादी मुस्लिम है। कुछ महीनों बाद होने जा रहे यहां के विधानसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी को सत्ता का प्रबल दावेदार माना जा रहा है। लेकिन इस गठजोड़ के बहाने जिग्नेश-जेएनयू टीम त्रिपुरा में भारतीय जनता पार्टी के सपने में सेंध लगाने की कोशिश करे तो हैरत नहीं होनी चाहिए। कुछ महीनों में इसी तरह नागालैंड में भी विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं। यहां की करीब 20 लाख की आबादी में करीब 12 लाख यानी साठ फीसदी दलित या अनुसूचित जाति के मतदाता है, जबकि मुस्लिम आबादी करीब 50 हजार यानी करीब 2.5 प्रतिशत है। इसी तरह इसी साल मिजोरम में भी विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं, जहां की 11 लाख की आबादी में करीब  7 लाख यानी 62 प्रतिशत अनुसूचित जाति की आबादी और करीब 15 हजार यानी लगभग 1.4 फीसद आबादी मुस्लिम है। जो कुल मिलकर करीब 63 प्रतिशत बैठती है। इसी तरह इस साल होने जा रहे विधानसभा चुनाव वाले राज्य मेघालय की करीब 30 लाख की आबादी में दो तिहाई यानी 20 लाख आबादी अनुसूचित जातियों और करीब 13 हजार यानी 4.4 फीसद आबादी मुस्लिमों की है। जो मिलकर बड़ा वोट बैंक बनता है। जिग्नेश और उनकी जेएनयू टीम का मकसद पुणे के नजदीक भीमा कोरेगांव में दलितों की पेशवाओं पर जीत के बहाने हुए आयोजन के जरिए इन राज्यों में दलित- मुस्लिम गठजोड़ को उभारने की है। हालांकि उत्तर पूर्व के राज्य मिजोरम, नगालैंड और मेघालय को छोड़ दें, क्योंकि वहां विधानसभा ही नहीं, राष्ट्रीय चुनाव भी स्थानीय मुद्दों पर होते हैं, बाकी राज्यों में जिग्नेश और उनकी जेएनयू टीम के लिए बड़ा मैदान खाली है। इसलिए आने वाले दिनों में अगर राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और कर्नाटक में दलितों पर अत्याचार की घटनाएं खोज-खोजकर लाई जाने लगें तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए।

जिग्नेश और उनकी सहयोगी जेएनयू टीम को यह नहीं भूलना चाहिए कि गुजरात चुनावों में 52 फीसद आदिवासी राजपूतों और 47 फीसद दलित वोटरों ने भारतीय जनता पार्टी के पक्ष में मतदान किया है। पिछले विधानसभा चुनाव के दौरान उत्तर प्रदेश में गैर जाटव दलित वोटरों, जिनमें पासवान, दुसाध, कोली आदि आते हैं ने भारतीय जनता पार्टी के पक्ष में खुलकर मतदान किया था। जिग्नेश और उनकी सहयोगी जेएनयू टीम को नहीं भूलना चाहिए कि असहिष्णुता विरोधी आंदोलन के जरिए बिहार में भारी जीत हासिल करने वाले नीतीश कुमार आखिरकार उसी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन में लौट आए हैं, जिसके खिलाफ उन्होंने चुनावी जंग में कामयाब दांव आजमाया था। जिग्नेश और उनकी टीम जेएनयू को इस बात पर भी मंथन करना चाहिए कि आखिर क्या वजह रही कि उसके धर्मनिरपेक्ष चेहरे लालू यादव का साथ नीतीश कुमार को छोडऩा पड़ा। जिग्नेश और उनकी टीम जेएनयू को यह भी देखना होगा कि असहिष्णुता विरोधी तमाम आंदोलनों के बावजूद आखिर क्या वजह रही कि उत्तर प्रदेश में धर्मनिरपेक्षता के पोस्टर ब्वॉय मुलायम सिंह यादव की पार्टी की ओर मतदाताओं के बड़े वर्ग ने ध्यान देना उचित नहीं समझा। अगर वे समझ जाएंगे तो शायद भीमा कोरेगांव जैसी घटनाओं पर गर्व करने की बजाय उससे कुछ सीख लेंगे।

 

 

Leave a Reply

Your email address will not be published.