दलित राजनीति पर सवार नेतागण

दलित राजनीति पर सवार नेतागण

2019 के लोकसभा चुनाव से पहले कर्नाटक, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में होने वाले विधानसभा चुनावों में दलित वोटों की दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं, जहां दलितों की अच्छी-खासी आबादी है। यहां यह ध्यान रखने वाली बात है कि 2014 के लोकसभा चुनाव और पिछले साल के हुए उतर प्रदेश विधानसभा चुनाव में भाजपा की भारी जीत और बसपा के सफाए से दलित वोटों के करवट बदलने की संभावना ने भी राजनीतिक हलचलों को बढ़ाया है। हैदराबाद में रोहित वेमुला की खुदकुशी, गुजरात के ऊना में दलितों पर कथित गोरक्षकों के हमले और उत्तर प्रदेश के सहारनपुर में शब्बीर कांड के बाद युवा नेतृत्व भी नई बेचैनी का प्रतीक बनकर उभरा है। भले ही अभी ये लोग चुनावी राजनीति से दूर हैं पर दलित एजेंडे को नए तेवर में पेश कर रहे हैं। यही तेवर शायद मुख्यधारा की पार्टियों को अपनी रणनीतियां बदलने को मजबूर कर रहा है। इन सब में यदि चुनावी गणित को जोड़ दें तो दलित वोटों को समेटने तथा गवां बैठने की बेचैनी और तीखी नजर आएगी। अभी हाल तक भाजपा गैर-जाटव दलित जातियों को अपने पाले में करने की कोशिश करती नजर आई है। राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद भी उतर प्रदेश की गैर-जाटव दलित कोरी जाति के हैं।

दलित वोटों की इसी वोट बैंक पर नजर रखते हुए ही देश में पहली बार राष्ट्रपति पद पर दलित उम्मीदवार को उतारने की दिशा तय की। यह बात और है कि राष्ट्रपति कोविंद से पहले दलित समुदाय के ही के आर नारायणन राष्ट्रपति रह चुके हैं। मगर नारायणन ने कभी भी अपनी पहचान सिर्फ एक जाति विशेष तक नहीं रखी और न ही उस समय उन्हें समर्थन देने वाले दलों ने कोशिश ही की। लेकिन इस बार के हुए राष्ट्रपति चुनाव में रामनाथ कोविंद भी अपने खुद के संघर्षपूर्ण जीवन का जिक्र करने से नहीं चूके और भाजपाअध्यक्ष ने उनकी उम्मीदवारी का ऐलान करते वक्त करीब पांच मिनट में पांच बार दलित शब्द का जिक्र किया। अमित शाह ने कहा कि, ‘रामनाथ कोविंद दलित समाज से संघर्ष करके राजनैतिक कैरियर में इतने उंचे मुकाम तक पहुंचे हैं।’ दलित हितैषी होने का यह संदेश आज कितना अहम है, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि कांग्रेस नेतृत्व वाले विपक्ष को भी राष्ट्रपति पद के लिए दलित पहचान वाली पूर्व लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार को उम्मीदवार बनाने पर मजबूर होना पड़ा। बसपा सुप्रीमो मायावती भी रामनाथ कोविंद का खुलकर विरोध नहीं कर सकीं। राष्ट्रपति चुनाव के मतदान के दिन मायावती ने कहा कि ‘दोनों ओर से दलित उम्मीदवार हैं। दलित उम्मीदवार बसपा की देन है। बाबा साहेब की देन है कि आज राष्ट्रपति चुनाव कोई भी जीते, लेकिन देश का अगला राष्ट्रपति दलित ही होगा।

लेकिन दूसरों की राय इससे अलहदा है कि काफी तिकड़म करने के बाद भी भाजपा को लग रहा है कि दलित वोट अब भी उससे विमुख है। रोहित वेमुला से लेकर सहारनपुर तक दलितों पर अन्याय की घटनाएं जो घटी हैं। ऐसे में इस बेरूखी पर काबू पाने का सबसे आसान तरीका यही था कि किसी दलित को सर्वोच्च पद पर बैठा दिया जाए, लेकिन वह केवल श्रृंगारात्मक पद हो, निर्णायक न हो। हालांकि अपनी जाति पर जोर न देने वाले पूर्व राष्ट्रपति नारायणन ने बड़े मौकों पर निर्णायक भूमिका अदा की थी। वे दलितों के हक और उनके खिलाफ अत्याचार को लेकर भी काफी मुखर थे। बिहार में 1997 के चर्चित लक्ष्मणपुर बाथे नरसंहार को उन्होंने राष्ट्रीय शर्म बताया था। उन्होंने न्यायपालिका में दलितों के प्रतिनिधित्व की भी बात उठाई थी।  हैदराबाद केंद्रीय विश्वविधालय छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष तथा रोहित वेमुला के साथी डोंटा प्रशांत का यह मानना है कि ‘नारायणन जब तक राष्ट्रपति रहे तब तक उन्होंने अपनी स्वायत्तता बनाए रखी थी और संविधान तथा उसके मूल्यों को बचाए रखा था।’ हमारे देश के स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद से ही सभी सियासी दलों में भीमराव अंबेडकर की राजनैतिक विरासत को कब्जाने की होड़ मची है। दलित राजनीति के कारण ही तेलंगाना सरकार ने देश का पहली दलित यूनिवर्सिटी खोलने की घोषणा की है। पिछले साल जेएनयू में वामपंथियों ने दक्षिणपंथी हमलों से निपटने के लिए वाम-दलित एकता कायम करने के उद्देश्य से ‘जय भीम- लाल सलाम’ का नारा दिया। बसपा ने इससे पहले आंबेडकर को राष्ट्रीय परिदृश्य पर स्थापित किया था तथा भारत के सभी राष्ट्रीय राजनीतिक दलों के नायकों को चुनौती दे डाली थी। आज के समय में कांग्रेस, भाजपा और कम्युनिस्ट तीनों ही राजनीतिक पार्टियां यह दर्शाने में लगे हैं कि वे भी अंबेडकर और सामाजिक न्याय के प्रति वचनबद्ध हैं। आज विडंबना यह है कि स्वतंत्र दलित आंबेडकरवादी आंदोलन की जन्मभूमि महाराष्ट्र में ही दलित राजनीति धीमी मौत का शिकार होती जा रही है और वहीं दक्षिणपंथी हिंदुत्व की राजनीति अपने दलित एजेंडे के साथ उभर रही है। दक्षिणी राज्यों या कहें कि महाराष्ट्र में आज दलित वर्ग आज दो सामाजिक-राजनैतिक ध्रुवों के बीच फंसा हुआ है। राजनीति में ऐतिहासिक रूप से सवर्ण जातियों के नेतृत्ववाली विचारधाराओं का वर्चस्व रहा है और आज इनकी जगह हिंदुत्व की विचारधारा लेती जा रही है। ऐसा लगता है कि वे भाजपा या कांग्रेस का एक विकल्प बनाने को लेकर बहुत चिंतित नहीं हैं और ऐसा लगता है कि यहां स्वतंत्र आंबेडकरवादी राजनीति अक्सर हाशिए पर उपेक्षित पड़ी रही है। अंबेडकर ने सामाजिक न्याय, धर्मनिरपेक्ष एवं समाजवाद के विचार पर आरपीआई का गठन किया था। कांग्रेस बाद के समय में आरपीआई में गुटबाजी कर बांटने की कोशिश करती रही।

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कई भागों में बंट चुकी यह पार्टी अब अपनी नाकामियों के चलते करीब करीब महत्वहीन हो चुकी है। रामदास अठावले के साथ भाजपा ने गठजोड़ कायम करके अपना दलित प्रेमी चेहरा प्रचारित किया है जिससे भाजपा को सोलापुर,नागपुर और मुंबई जैसे क्षेत्रों में चुनावी आधार बढ़ाने में बहुत ज्यादा मदद की। आज के समय में भाजपा मध्यवर्गीय दलितों के अंदर समर्थन जुटाना शुरू कर दिया है। अब भाजपा एक नए दलित नेतृत्व को पोषित करना शुरू कर दिया है जो कि अक्सर आरएसएस की भाषा बोलता रहा है। दलित वोटों पर आजतक सिर्फ राजनीति की रोटी ही सेंकी गयी है। आजतक कोई भी दलित प्रधानमंत्री नहीं बना है सिर्फ जगजीवन राम ही उपप्रधानमंत्री के कुर्सी तक पहुंचे, मोदी कैबिनेट के 24 कैबिनेट मंत्रियों में सिर्फ 2 ही दलित कैबिनेट मंत्री हैं। कुल 543 लोकसभा सीटों में 84 सीटें दलितों के लिए आरक्षित हैं और इनमें से सिर्फ भाजपा के ही 40 दलित सांसद हैं। केंद्र सरकार के 63 मंत्रालयों व विभागों में 17.55 प्रतिशत दलित लेकिन इनमें ग्रुप ए नौकरियों में सिर्फ 13.31 प्रतिशत दलित हैं, कुल सफाई कर्मचारियों में 42.92 प्रतिशत दलित हैं। दलितों की साक्षरता दर 66 प्रतिशत है जबकि राष्ट्रीय साक्षरता दर 74 प्रतिशत है। 40 प्रतिशत दलित कभी भी किसी शिक्षण संस्थान में नहीं गए। पहली से दसवीं कक्षा तक के 50 प्रतिशत दलित बच्चों ने 2013-2014 में पढ़ाई बीच में ही छोड़ दी। केंद्रीय विश्वविद्यालयों में कुल असिस्टेंट प्रोफेसर,एसोसिएट प्रोफेसर व प्रोफेसरों में सिर्फ 8.7 प्रतिशत दलित,कुल नॉन-टीचिंग स्टाफ में सिर्फ10 प्रतिशत दलित जबकि दोनों में सवर्ण 75 प्रतिशत से भी ज्यादा हैं।

उदय इंडिया ब्यूरो

 

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