स्वामी कर्मवीर जी महाराज: योग एवं आयुर्वेद के  प्रयोक्ता एवं प्रवक्ता संत

स्वामी कर्मवीर जी महाराज: योग एवं आयुर्वेद के  प्रयोक्ता एवं प्रवक्ता संत

भारतभूमि अनादिकाल से आयुर्वेद, वेद एवं योग के लिए विख्यात रही है। यहां का कण-कण, अणु-अणु न जाने कितने योगियों और साधकों की योगसाधना से आप्लावित हुआ है। तपस्वियों और योगियों ने जहां इस माटी के कण-कण में व्याप्त गुणवत्ता को बहुगुणित किया वहीं अपनी तपस्या से इसके परमाणुओं को अभिषिक्त किया। इस देश की हवाएं, माटी, जल, वनस्पति अपने आप में औषधि है। इसी भूमि पर कभी वैदिक ऋषियों एवं महर्षियों की तपस्या साकार हुई थी तो कभी महावीर, बुद्ध, शंकराचार्य की साधना ने इस माटी को तिलक किया। यह धरा कभी रामकृष्ण परमहंस की साधना की साक्षी बनी तो कभी यहां का कण-कण विवेकानंद की विवेक साधना से उपकृत हुआ। यहां कभी श्री अरविंद की ज्ञानसाधना तो कभी महात्मा गांधी की कर्मयोग साधना ने इस धरा के महत्व को बहुगुणित किया। योगसाधना की यह मंदाकिनी न कभी यहां अवरूद्ध हुई है और न कभी अवरूद्ध होगी। साधना की यह गंगा 21वीं सदी के भाल पर भी प्रकाशवान है। इस सदी को जिन योगियों और महर्षियों ने विशेष प्रेरित किया है उनमें एक नाम है स्वामी कर्मवीर जी महाराज। जिन्होंने न केवल आध्यात्मिकता के नये उन्मेष उद्घाटित किये हैं बल्कि योग और आयुर्वेद को जीवंतता देकर देश और दुनिया में उसे महिमामंडित किया।

योगनिष्ठ स्वामी कर्मवीरजी महाराज ‘महर्षि पतंजलि अंतर्राष्ट्रीय योग विद्यापीठ’ के संस्थापक हैं। वे विश्व के प्रथम व्यक्ति हैं जिन्हें गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय, हरिद्वार द्वारा योग में मास्टर्स डिग्री से सम्मानित किया गया। उन्होंने आध्यात्मिकता और सत्य की खोज में हिमालय में भी पन्द्रह से अधिक वर्ष व्यतीत किये हैं। उनका जन्म मुजफ्फरनगर के टिटौडा ग्राम में मोतला गोत्र के एक सभ्य और सुशिक्षित किसान परिवार में हुआ था। बचपन से ही उनका झुकाव आध्यात्मिक जीवन की ओर था। उन्होंने विभिन्न संतों और योगियों, विशेष रूप से महर्षि स्वामी दयानंद सरस्वती के जीवन और शिक्षाओं से प्रेरणा प्राप्त की और बहुत कम उम्र में संन्यास आश्रम में दाखिल हो गए। हरिद्वार में पवित्र गंगा के किनारे पर स्थित गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय द्वारा उन्होंने वेद, दर्शन तथा योग में पोस्ट ग्रेजुएट डिग्री प्राप्त की।

स्वामी कर्मवीरजी ने वेद, दर्शन, आयुर्वेद तथा योग में शिक्षा पूरी करने के पश्चात उत्तरी क्षेत्र की ओर असम और भूटान सीमा पर स्थित क्षेत्रों में जाकर योग और आयुर्वेद की सहायता से आदिवासियों के कल्याण में उल्लेखनीय योगदान दिया। उनके जीवन स्तर को उन्नत करने के प्रयत्न किए। उनमें व्याप्त प्रतिभा और क्षमता को उजागर किया। इससे उस क्षेत्र के आदिवासियों में आत्मविश्वास जगा। इसके पश्चात वे हिमालय पर्वत को प्रस्थान कर गए और कई वर्षों तक वहां की कंदराओं में रह कर साधना की। हिमालय की पर्वत श्रृंखलाओं में प्रवास व भ्रमण के दौरान उन्हें अनेक प्रतिष्ठित साधु-संतों व साध्वियों की संगत प्राप्त हुई। यहां पर उन्होंने जहां योग की गहन साधना की वहीं प्रकृति में व्याप्त वनस्पतियों की विशेषताओं और गुणवत्ता को गहराई से समझा। उन्होंने महसूस किया कि प्रकृति का कण-कण अपने आप में औषधि है। तदुपरांत उन्होंने अपना जीवन पूर्ण रूप से आयुर्वेद, वेद तथा योग ज्ञान के प्रचार-प्रसार व मानव जीवन के कल्याण में समर्पित कर दिया।

आज बाबा रामदेव और पतंजलि का जो देश और दुनिया में डंका बज रहा है उसका संपूर्ण श्रेय स्वामी कर्मवीरजी महाराज को जाता है। उन्हीं के मार्गदर्शन में बाबा रामदेव ने योग और औषधियों का गहन ज्ञान प्राप्त किया। किन्हीं कारणों से उनसे मतभेद होने पर उन्होंने महर्षि पतंजलि अंतर्राष्ट्रीय योगपीठ को छोड़कर महाराष्ट्र चले गए। काफी समय वहां व्यतीत करने के बाद वे इन दिनों रूड़की के निकट एक भव्य आश्रम बनाकर विभिन्न जनकल्याणकारी गतिविधियों में संलग्न है। उनके जीवन का मुख्य लक्ष्य है देश के लोगों को निरोगी और स्वस्थ बनाना, देश में बिना कैमिकल वाली आयुर्वेदिक हर्बल चीजों के प्रचलन को बढ़ावा देना, डायबिटीज मुक्त समाज का निर्माण एवं भारत के लोगों को अंग्रेजी दवाओं के दुष्प्रभाव से बचाना। वे गौमाता के कल्याण के लिए एवं देश में गौ अस्तित्व को नये आयाम देने के लिए जुटे हुए हैं। उन्होंने उन्नत गायों के वंश को बढ़ावा देने के लिए आयुर्वेद के माध्यम से कुछ नवीन खोजें की हैं। वे उन्नत मानवजाति के वंशसंवद्र्धन के लिए भी एक योजना पर कार्य कर रहे हैं जिसमें गर्भधारण से लेकर बच्चे के जन्म तक विशेष प्रशिक्षण और संस्कार देने के उपक्रम करेंगे। इस तरह के अज्ञात एवं छिपे रहस्यों को उद्घाटित कर वे मानवजाति का कल्याण करना चाहते हैं।

स्वामीजी सहजयोगी एवं सिद्धपुरुष हैं। वे अध्यात्म एवं योग के प्रयोक्ता संत है। उनका सधा हुआ मन, निष्काम कर्म, दूरदर्शी सोच स्वयं में एक प्रेरणा है। वे भीड़ में भी अकेले हैं और अकेले में भी सबके कल्याण की बात सोचते हैं। उनकी अध्यात्म चेतना ने उन सबको जगाया है जो धूप चढ़ जाने के बाद भी सिर्फ यह सोचकर सोये रहते हैं कि अभी दस्तक तो किसी ने दी ही नहीं। स्वामीजी आयुर्वेद एवं योग के प्रयोक्ता एवं प्रवक्ता संत हैं। अनुभवों की भाषा में जीया गया सत्य बोलते हैं और प्रयोग किये गये सत्यों को जन-जन के लिए लागू करते हैं। वे प्रचारक हैं, स्वस्थ समाज की संरचना में विश्वास करते हैं। वे व्यक्ति नहीं स्वयं एक संस्था हैं। उनमें बालक-सी सहजता है, युवा-सी ऊर्जा, प्रौढ़-सी चिंतन प्रवणता और वृद्ध-सी अनुभवशीलता है। इसलिए वे जहां होते हैं उनकी साधना स्वयं सुरक्षा कवच बन जाती है, बुराइयों का तमस उनके आस-पास कभी प्रवेश नहीं पा सकता है। अनेक परिदृश्यों में स्वामीजी के जीवन की समीक्षा इस बात की साक्षी है कि वे निर्विशेषण संत है। अध्यात्म उनका साध्य है, आयुर्वेद-पथ्य पर संरचरण ही उनकी साधना है। उनका विश्वास उपदेश में नहीं आचरण में है। इसलिए उनके जीए गए संदर्भों में पारदर्शिता के साथ संतता झांकती है। उनकी करुणा से भीगी चेतना ने जो कुछ पाया, उसे सिर्फ बटोरा ही नहीं अपितु सबके आत्मकल्याणार्थ हर पल सब में बांटा भी।

स्वामीजी वर्तमान में तथाकथित साधु समुदाय के बीच एक उदाहरण हैं परोपकार का, सादगी का, संयम का। आज के तथाकथित साधु समुदाय के परिग्रह और ठाठबाट को देखकर साधुता शर्म से झुक जाती है। सारी सुख-सुविधाएं उपलब्ध होने पर भी, पतंजलि का एक महासाम्राज्य स्थापित हो जाने पर भी स्वामीजी न किसी स्थान से बंधे और न किसी वैभव संपदा से। उनके इस लघुता के भाव ने सहज ही सारे संसार को अपनी ओर आकृष्ट कर लिया तथा उन्हें प्रभुता संपन्न बना दिया। उनका मानना है कि साधक का मन इतना निर्लोभ होना चाहिए कि उसके सामने कितना ही बड़ा आकर्षण उपस्थित होने पर भी वह सर्वथा निराशंस और निराकुल रहे, ऐसी मनोवृत्ति वाला साधक सदा सुख शैय्या में सोता है। जिसका जीवन संसार की क्षुद्र, सारहीन वस्तु पर अवलंबित नहीं होता।

कर्मवीरजी महाराज उच्च कोटि के दूरद्रष्टा या भविष्यवक्ता हैं, जिन्हें अपने साधना बल, सूक्ष्म चिंतन एवं दूरदर्शी अनुभूति के बल पर आने वाले युग की हर आहट का ज्ञान पहले ही हो जाता हैं। उनकी निर्मल प्रतिभा के दर्पण में भविष्य में होने वाली हर घटना पहले ही प्रतिबिंबित हो जाती है। यही कारण है कि स्वामीजी कोई भी कार्य केवल वर्तमान के क्षणिक प्रभाव  से प्रेरित होकर नहीं करते, भविष्य के परिणामों का चिंतन भी उसमें निहित रहता है। प्राचीन टीकाकारों ने आचार्य के अनेक गुणों में दूरदर्शिता को प्रमुख माना है। स्वामीजी के नेतृत्व का वैशिष्ट्य है कि कालक्षेप से आने वाली समस्याओं को, कठिनाइयों को वे वर्तमान में ही पकड़ लेते हैं।

स्वामी कर्मवीरजी ने योग और आयुर्वेद के माध्यम से काफी सशक्त एवं सुखद भूमिका संरचित की है। संस्कृति, राष्ट्र, सदाचार, चिंतन में गतिशीलता, ध्यान और योग, आयुर्वेद, गंगा और गौ माता एवं पर्यावरण के क्षेत्र में नये क्षितिजों का उद्घाटन आदि कुछ ऐसी जीवंत उपलब्धियां हैं जिनके लिए स्वामीजी के अवदानों को विस्मृत नहीं किया जा सकता।

ललित गर्ग

 

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