शीतलहर से कैसे बचें

शीतलहर से कैसे बचें

शीतलहर से प्रभावित होनेवाली जनसंख्या को तीन श्रेणी में बांटा जा सकता है। पहली श्रेणी में वे लोग आते हैं जो सर्व संपन्न हैं, समाज के ऊंचे तबके के लोग जिन्हें सभी भौतिक साधन उपलब्ध हैं वे अपने शरीर व आसपास के वातावरण को एक निश्चित तापमान पर रखने के लिए वातानुकूलित उपकरणों का सहारा लेते हैं। इन्हें न गर्मी सताती है और न ही इन लोगों को शीत का भय! सभी मौसमों में ये लोग चैन की जिंदगी बसर कर सकते हैं।

दूसरी श्रेणी में मध्यम वर्ग के लोग हैं जिनके पास तन की सुरक्षा के लिए ऊनी कपड़े हैं तथा घरों में कोयला व लकड़ी जलाकर अथवा बिजली के हीटर द्वारा वातावरण गर्म रखते हैं।

अंतिम श्रेणी के वे लोग हैं जिनके पास न अपना घर है और न ही ये लोग वस्त्रों से अपने शरीर को ढंक पाते हैं। फुटपाथ ही इनका बिस्तर है और आसमान ही इनकी अपनी चादर। ये ही बेचारे ठंड का शिकार अधिक होते हैं। इनके आहार में न तो इतनी अधिक कैलोरी ही होती है कि शरीर को ऊर्जा मिल सके और न ही ठंड से बचने के लिए इनके पास कपड़े होते हैं।

हमारे शरीर का तापमान लगभग 98.2 ̊F पर स्थिर रहता है। सर्दी और गर्मी का नियंत्रण मस्तिष्क में स्थित तापमान केन्द्र से नियंत्रित होता है। इसके अतिरिक्त त्वचा भी तापमान को स्थिर रखने में सहायक होती है त्वचा हमारे शरीर को ठंड से बचाने के लिए चादर का काम करती है। त्वचा के नीचे बहुत सी सूक्ष्म रक्त नलिकाएं होती हैं जो गर्मी और ठंड महसूस कराती है। अधिक ठंड पडऩे पर ये रक्त वाहिकाएं दिखाई देती हैं। जिगर व मांसपेशी में सबसे अधिक ऊर्जा संचित रहती है। मांसपेशियों में हरकत पैदा करने से आवश्यकतानुसार ऊर्जा की मात्रा को घटाया व बढ़ाया जा सकता है। अधिक ठंड पडऩे पर मांसपेशियों में कंपन पैदा होता है जिससे कंपकंपी आने लगती है, दांत किटकिटाने लगते हैं, जिससे अधिक ऊर्जा शरीर को प्राप्त होती है। सर्दी के समय सर्दी से बचाव के लिए शरीर में अनेक रासायनिक प्रतिक्रियाएं भी तेजी से अपना काम करती है ताकि शरीर को अधिक ऊर्जा व गर्मी मिल सके। शीत लहर का प्रभाव ह्दय, रक्त वाहिनियों पर पड़ता है। दमा, खांसी के रोगी, दिल के दौरे के मरीज, नन्हें बच्चों का सर्दी के मौसम में विशेष सावधानी बरतनी चाहिए। ठंड से बचने के लिए शरीर को ऊनी वस्त्रों व रूई के कपड़ों से सुरक्षित रखें। गर्म तासीरवाले आहार व मेवे का सेवन करें। मौसम में काजू, बादाम, अखरोट मेवे आदि का प्रयोग बहुत होता है। उनसे शरीर को अधिक ऊर्जा व कैलोरी प्राप्त होती है। कैलोरी शरीर में ऊर्जा नापने की इकाई है। 8-10 बादाम से लगभग 100 कैलोरी मिलती है, इतनी ही कैलोरी 8-10 काजू व अखरोट से प्राप्त होती है। गरीब लोगों के लिए मूंगफली गर्मी का उत्तम स्त्रोत है। लगभग 100 ग्राम मूंगफली के सेवन से  आप चैन की नींद सो सकते हैं। और ठंड आपसे दूर भागेगी।

सारे उत्तर भारत में कड़ाके की सर्दी पड़ रही है। 14 दिसम्बर सबसे ठंडा दिन पिछले सात वर्षों में देखा गया अधिकतम तापमान में सामान्य से 4.4 डिग्री की कमी मापी गई। जाड़े के मौसम में सर्दी, जुकाम, फ्लू के साथ ही श्वास के रोगियों विशेषकर दमा के रोगियों, उनके रक्तचाप एवं दिल के दौरों के रोगियों की संख्या में अभूतपूर्व वृद्धि हो जाती है।

8

सर्दी-जुकाम

यह एक वायरस संक्रमण है जो कि श्वास संस्थान के ऊपरी भाग नाक गले का विशेष रूप से प्रभावित करता है। लगभग 200 वायरस द्वारा सर्दी-जुकाम हो सकता है। लेकिन राइके वायरस आमतौर पर हमारे देश में जुकाम का मुख्य कारण है। एक सामान्य वयस्क को प्रति वर्ष 2-4 बार सर्दी-जुकाम हो सकता है लेकिन बरसात में लगभग 8 से 12 बार इसका प्रकोप देखा जा जाता है। रोग की प्रभाव की दशा में खांसी गले में खराश, नाक बहना, मांसपेशियों में जकडऩ, सिर दर्द तथा कम भूख आदि लगना देखा गया है। आमतौर पर 40 प्रतिशत रोगियों में गले की खराश तथा 50 प्रतिशत रोगियों को खांसी का 50 प्रतिशत रोगी मांसपेशियों में जकडऩ की शिकायत करते हैं। वयस्क लोगों में बुखार बच्चों की अपेक्षा कम देखा जाता है। आमतौर पर सर्दी-जुकाम छींकें आना बार-बार जुकाम के रोगी के संपर्क में आने के लगभग 16 घंटे बाद लक्षण शुरू हो जाते हैं। रायनो वायरस द्वारा संक्रमण 80 प्रतिशत पहले तीन दिन अधिक प्रभावी रूप से संक्रमण उत्पन्न करता है। आमतौर पर सर्दी-जुकाम जाड़े के मौसम में अधिक देखा जाता है जबकि तापमान कम होने की वजह से रोग- प्रतिरोधी क्षमता कम हो जाती है। आद्र्रता कम होने से वायरस शुष्क हवा में वायरस के छोटे विषाणु वायुमंडल में अधिक समय तक व्याप्त रहते हैं। इस मौसम में कम नींद आना तथा कुपोषण के कारण भी सर्दी-जुकाम जल्द ही अपना शिकंजा कस लेता हैं।

उपचार

सर्दी-जुकाम में गर्म पानी का सेवन, लैमन टी, ब्लैक टी वायरल को नष्ट करने में सहायक है साथ ही ऐंटी हिस्टैमिन तथा पैरा सिटौमौरा दर्द एवं नाक वहन में सहायक है। ध्यान रहे जुकाम-खांसी में एंटी वायरिक औषधियों का सेवन कोई औचित्य नहीं है व्यक्ति  स्वत: ही 7 दिन या एक हफ्ते में ठीक हो जाता है, विटामिन सी का सेवन भी लाभदायक माना गया है–

फ्लू आमतौर पर लोग सर्दी-जुकाम तथा फ्लू को एक जैसा समझते हैं, लेकिन फ्लू इन्फलूऐंजा वायरस के संक्रमण से होने वाला रोग है। फ्लू के रोगी के लक्षण लगभग सर्दी-जुकाम के समान ही होते हैं लेकिन फ्लू के लक्षण अधिक उग्र होते हैं अचानक ही ज्वर, कंपकंपी, सिर दर्द मांसपेशियों में जकडऩ सूखी खांसी तथा शारीरिक कमजोरी एवं उल्टी भी हो जाती है-

यदि रोग उग्र रूप ले अथवा तीव्र लक्षण जैसे ज्वर 102 से अधिक कंपकंपी गर्दन एवं सिर दर्द, सांस लेने में तकलीफ हो तो  अविलंब चिकित्सक से परामर्श करना चाहिए।

उपचार से बचाव उत्तम है यह कहावत सर्दी-जुकाम एवं फ्लू के रोगियों के लिए सार्थक है। चूंकि यह रोग रोगी के छींकने से एक-दूसरे में फैलता है । फ्लू रोग से बचने के लिए 60 वर्ष से अधिक वय के लोग ह्दय के रोगी, दमा रोगी, मधुमेह तथा वे रोगी जिनकी रोग- प्रतिरोधक क्षमता कम हो गई है। उन्हें एन्फ्लूऐंजा वैक्सीन अपने डॉक्टर से परामर्श क बाद लेना चाहिए ताकि रोग से बचाव हो सकें, साथ ही निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना जरूरी है।

  • सबसे जरूरी तो यह है कि सर्दी-जुकाम के मरीज से दूरी बनाए रखें।
  • बार-बार अच्छी तरह हाथ साफ करें जिससे सतह (दरवाजे, मेज, लिफ्ट) पर वायरस नष्ट हो जाएं।
  • रोगी के अतिगत परिधान वस्त्र, तौलिया, चादर, रुमाल का इस्तेमाल न करें बल्कि इन्हें संक्रमण रहित रखें।
  • रोगियों को यह सलाह देनी चाहिए कि अपनी नाक एवं मुंह पर रुमाल रखें खांसी एवं छींक आने के समय ताकि वायरस वातावरण में न फैल सके।
  • जीवनशैली स्वस्थ एवं ध्रूमपान त्यागना, तनाव से मुक्ति, शराब का सेवन कम करने से बचाव किया जा सकता है।
  • ध्यान रहे जाड़े के मौसम में हम सावधानी बरतकर सर्दी-जुकाम से ही नहीं बच सकते बल्कि स्वस्थ, सुखी और निरोग जीवन भी व्यतीत कर सकते हैं।

 

डॉ. अनिल चतुर्वेदी

 

Leave a Reply

Your email address will not be published.