शिक्षा, समाज और परिवर्तन

शिक्षा, समाज और परिवर्तन

डॉ. उमराव सिंह चौधरी के द्वारा लिखित पुस्तक ‘शिक्षा, समाज और परिवर्तन’ में लेखक ने बहुत ही सुन्दर ढंग से शिक्षा, समाज और परिवर्तन के पारस्परिक संबंध को उजागर किया है। परिवर्तन और भविष्योन्मुखता वर्तमान समय के दो प्रमुख लक्षण हैं। इन्हें निरंकुश छोडऩा व्यक्ति और समाज के हित में नहीं है। परिवर्तन को पीठ दिखाने के बजाए उससे मित्रवत हाथ मिलाना चाहिए ताकि शिक्षा की प्रक्रिया द्वारा इसे मानव समाज के केंद्रीय मूल्य, मान्यताओं और विश्वासों के अनुरूप ढाला जा सके। प्रजनन और पोषाहार का जो संबंध शारीरिक जीवन से होता है, वही शिक्षा का सामाजिक जीवन से होता है। शिक्षा सांस्कृतिक, आर्थिक एवं राजनैतिक प्रणालियों को प्रभावित करती है तथा इनसे प्रभावित भी होती है। शिक्षा को दो विरोधी भूमिकाओं का निर्वाह भी करना पड़ता है। पहली भूमिका संरक्षण की है और दूसरी परिवर्तन की है। एक ओर तो शिक्षा को सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण करना पड़ता है तथा दूसरी ओर सांस्कृतिक संपदा का समय-समय पर परीक्षण करके उसे युगानुकूल बनाना पड़ता है। इस प्रक्रिया में पहले अतीत का मूल्य और सीमा जानना जरूरी है। फिर वर्तमान और भविष्य की मांग के अनुसार सांस्कृतिक विरासत के उपयोगी अंशों का संरक्षण और अनुपयोगी का त्याग किया जाता है। पूर्ण और उदार शिक्षा मनुष्य को निजी और सामाजिक जीवन की समस्त भूमिकाएँ निभाने के लिए तैयार करती है। वह एक अभिभावक की तरह तीव्र सामाजिक परिवर्तन को नियमित करने, प्रौधौगिकी को मानवीय बनाने तथा भविष्य का आकलन करने में सहायक होती है।

शिक्षा, समाज और परिवर्तन

लेखक                    : डॉ. उमराव सिंह चौधरी

प्रकाशक                : कल्पाज पब्लिकेशन

मूल्य                      : १५७५ रु.

पृष्ठ                        : ४३८

इस पुस्तक के माध्यम से डॉ. चौधरी ने यह बताने की कोशिश की है कि शिक्षा न केवल हमें जीवन-यापन के लिए कुशल और प्रशिक्षित करती है बल्कि हमारी लगभग सभी क्षमताओं और योग्यताओं को विकसित करके दुनिया को समझने, सराहने और अनुशासित करने की दृष्टि तथा प्रवीणता प्रदान करती है। प्रस्तुत पुस्तक सामयिक आवश्यकताओं और समस्याओं के समाधान के लिए शिक्षा की उपादेयता पर लिखे गए लेखों का संकलन है। यह लेख शिक्षा के विविध आयामों और उनके सामाजिक प्रणालियों से संबंध पर आधारित है। इनमें उदार उच्च शिक्षा, शिक्षा की गुणवता, मूल्याधारित उच्च शिक्षा, सामाजिक परिवर्तन और शिक्षा, सामाजिक न्याय और शैक्षणिक योग्यता, अध्यापन, अनुसंधान, सृजनशीलता, परीक्षा, निजी विश्वधिालय, बेरोजगारी, उच्च शिक्षा में भ्रष्टाचार, सार्वजनिक जीवन में सदाचार, संवाद की शिक्षा, शिक्षा और अभिव्यक्ति की आजादी आदि के अतिरिक्त शिक्षा से जुड़े हुए कुछ अन्य विषयों से संबंधित लेख भी सम्मिलित हैं।

परिवर्तन के दौर में समाज में विकृतियाँ और विसंगतियाँ पैदा होना स्वाभाविक है। नई पीढी में इन्हें पहचानने की

सामथ्र्य पैदा करना आवश्यक है। सच्ची शिक्षा रचनात्मक असहमति, प्रतिकारी शक्ति और नैतिक आक्रोश की जन्मदात्री होती है। मुझे यह आशा है कि डॉ. उमराव सिंह चौधरी की पुस्तक ‘शिक्षा, समाज और परिवर्तन’ पढ़कर पाठक नैतिक संघर्ष और नैतिक निर्मलता की ओर अग्रसर होने में समर्थ हो सकेंगे। मुझे यह भी विश्वास है कि इस पुस्तक में पाठकों को शिक्षा, साहित्य तथा दर्शन का अनुभव और आनंद एक साथ मिल सकेगा।

 

 

आशुतोष कुमार

 

 

Leave a Reply

Your email address will not be published.