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श्री देवकी नंदन ठाकुर जी महाराज विलक्षण कथावाचक और प्रभावी शांतिदूत

श्री देवकी नंदन ठाकुर जी महाराज  विलक्षण कथावाचक और प्रभावी शांतिदूत

भारतीय संस्कृति में अनेक मनीषियों, महापुरुषों एवं संतपुरुषों ने देश, काल और परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए, मानव जीवन में श्रेष्ठताओं के संवर्द्धन के लिए, विराट ईश्वरीय तत्व को पाने के लिए एवं आध्यात्मिक विकास के लिए अनेक उल्लेखनीय उपक्रम किए हैं, सिद्धांतों और आध्यात्मिक विचारधाराओं का निरूपण किया है। ऐसे ही महापुरुषों की श्रेणी में एक चमकता नाम हैं दिव्य आध्यात्मिक ज्ञान व प्रज्ञा के धनी श्री देवकीनंदनजी, जो ठाकुर जी महाराज के नाम से ख्यातिलब्ध हैं।

देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज का जन्म उत्तर प्रदेश के मथुरा के मॉट क्षेत्र में ओहवा गांव में 12 सितम्बर 1978 में हुआ था। वे एक ब्राह्मण परिवार से हैं। ग्रामीण पृष्ठभूमि के माताजी श्रीमती अनसुईया देवी एवं पिताजी श्री राजवीरजी शर्मा से बृज की महत्ता और श्रीकृष्ण भगवान की लोक कथाओं का वर्णन सुनते हुये आपका बालजीवन व्यतीत हुआ। राम-कृष्ण की कथाओं का प्रभाव आप पर इस कदर पड़ा कि प्रारम्भिक शिक्षा पूरी करने से पहले ही वृन्दावन की कृष्णलीला मण्डली में शामिल हो गये। यहां श्रीकृष्ण का स्वरूप निभाते कृष्णमय होकर आत्मिक शान्ति का अनुभव करने लगे। छोटी उम्र में ही उनकी संकल्प शक्ति को देखकर उनके सद्गुरु श्री वृन्दावन भागवत पीठाधीश्वर श्री पुरूषोत्तम शरण शास्त्री जी महाराज ने इन्हें शिष्य रूप में स्वीकार किया और उन्हें प्राचीन शास्त्र ग्रंथों की शिक्षा प्रदत्त की। उन्होंने ही उन्हें देवकीनंदन ठाकुरजी महाराज नाम दिया।

आज के तनावभरे जीवन में मानव मात्र शान्ति की खोज में व्याकुल है। वह विचार जो हमारे अन्तर्मन को शुकून और आत्मीयता का अनुभव कराते हैं, हमारे लिये शान्ति के कारक बनते हैं। यही बात देवकीनंदनजी की कथाओं की प्रमुख विशेषता है। वह बड़ी से बड़ी बात को भी इतनी सहजता से परिभाषित कर देते हैं कि सामान्य व्यक्ति को भी वह अपने काम की लगती हैं और छोटी से छोटी बात को इतनी आत्मीयता से वर्णित करते हैं कि प्रत्येक व्यक्ति को अपनी बात लगती है और वह उनसे हृदय से जुड़ जाता है। जब व्यक्तियों के हृदय आपस में जुड़ जाते हैं तो प्रेम और सद्भाव के विचार तेजी से फैलते हैं। कथाओं की इसी ‘शान्तिकारी’ शैली से प्रभावित होकर सन् 2007 में निम्बार्काचार्य जगतगुरू श्री श्रीजी महाराज ने आपको ‘शान्तिदूत’ की उपाधि प्रदान की। इसकी गरिमा के अनुरूप आप विभिन्न सेवा कार्यों को सम्पादित कर रहे हैं।

देवकीनंदनजी की भाषाशैली और व्यवहारिक प्रवचनों से प्रभावित होकर हजारों की संख्या में लोग कथा पाण्डालों में पहुंचते हैं। हिन्दु, मुस्लिम, सिंख, ईसाई, जैन आदि सभी धर्मों को मानने वाले लोग आपके कार्यक्रमों में सम्मिलित होकर आपके विचारों से शक्ति प्राप्त करते हैं। विनम्र, मृदुभाषी ठाकुरजी जब अपनी मृदुवाणी में भगवान की विभिन्न लीलाओं का मार्मिक वर्णन करते हैं तो श्रोता मंत्रमुग्ध हो जाते हैं। वहीं सामाजिक कुरूतियों और विसंगतियों पर आपकी ओजस्वी वाणी में कटाक्ष लोगों में जोश और साहस का संचार करते हैं।

देवकीनंदनजी महाराज देश के अलावा विदेशों में भी भारतीय संस्कृति और श्रीकृष्ण को महिमामंडित कर रहे हैं। उनके विचारों एवं भक्ति संगीत में इतना प्रवाह और आवाज में इतनी मधुरता कि जो सुने बस सुनता रह जाए। जब वे श्रीकृष्ण भक्ति में डूबकर भजन सुनाते हैं तो सुनने वाले सुध-बुध खो बैठते हैं। उन्होंने यहां लंबी साधना की और 18 साल की उम्र में पहली बार भजन संध्या में भाग लिया। इसके बाद तो वे लाखों भक्तों के मन में बस गए। देश के तमाम शहरों में उन्होंने भजन सुनाए, प्रवचन दिए तो उनकी कीर्ति देश और विदेश में फैल गयी। उन्होंने अमरीका, हांगकांग, स्वीडन, डेनमार्क, नार्वे, हालैंड जैसे देशों में धर्म और अध्यात्म की अलख जगाई। श्रीकृष्ण और राधा के परम भक्त ठाकुर जी महाराज सिर्फ अध्यात्म का प्रचार-प्रसार ही नहीं कर रहे हैं, जनजागरण की मुहिम भी चला रहे हैं।

देवकीनंदनजी व्यक्ति नहीं, वे धर्म, दर्शन, कला, साहित्य और संस्कृति के ऋषिपुरुष हैं। उनका संवाद, संगीत, शैली, साहित्य, साधना, सोच, सपने और संकल्प सभी कुछ श्रीकृष्ण की भक्ति में रमे हुए एवं मानवीय मूल्यों से ओतप्रोत हैं। मानवता को एक नया जीवनदर्शन एवं भक्ति का दर्शन देने के लिए वे आबद्ध है। उन्होंने पुरुषार्थ से भाग्य रचा अपना, कृष्ण भक्तों का, समाज का और उन सभी का जिनके भीतर थोड़ी भी आस्था और आत्माविश्वास है कि हमारा जीवन बदल सकता है। जिस तरह श्रीकृष्ण युद्ध से पहले दुर्योधन के पास शांतिदूत बनकर गए थे, उसी तरह ठाकुरजी दुनिया के सामने शांतिदूत बनकर अहिंसा, अमनचैन, भाईचारे एवं शांति की अलख जगा रहे हैं। उनके सार्वभौम व्यक्तित्व की अभ्यर्थना भारतीय संस्कृत का गौरव है। उनकी सफलता का सफरनामा भी यही है कि दिशा और दायरों के चुनाव में उनका विवेकी निर्णय हर मोड़ पर जागृत रहा है। प्रसिद्धि में अहं उन्हें कभी छू नहीं सका, आलोचनाओं के बीच वे कभी आहत नहीं हुए। उनकी निष्काम, निस्पृह जीवनयात्रा सबके लिए पे्ररणा है।

यूं तो आपके नेतृत्व में अनेक राष्ट्रीय एवं अंतराष्ट्रीय सेवा एवं अध्यात्म के विशिष्ट उपक्रम संचालित हो रहे हैं लेकिन 20 अप्रैल 2006 में विश्व शान्ति सेवा चैररिटेबल ट्रस्ट की स्थापना उनमें प्रमुख हैं, जिसके माध्यम से भारत के विभिन्न स्थानों पर कथाओं एवं शान्ति संदेश यात्राओं का आयोजन किया जाता है। इस नये समाज के निर्माण के प्रकल्प को लेकर वे आगे बढ़ रहे हैं। उनका ट्रस्ट गरीब बच्चों के लिए इंटरमीडियट तक की शिक्षा के लिए आवासीय स्कूल बनवा रहा है, जो दस एकड़ जमीन में फैला हुआ है। वे अभावग्रस्तों, विकलांगों व गरीबों की मदद करते हंै। संस्कृत छात्र विकास, गौशाला, वृद्धाश्रम, अनाथ बच्चों की मदद, सभी समुदायों में शांति इत्यादि उनके ट्रस्ट की गतिविधियां हैं। पर हमारे सामने समस्या यह है कि हम कैसे मांपे उस आकाश को, कैसे बांधे उस समंदर को, कैसे गिने बरसात की बूंदों को? ठाकुरजी आध्यात्मिकता एवं मानवीयता की रचनात्मक उपलब्धियां उम्र के पैमानों से इतनी ज्यादा है कि उनके आकलन में गणित का हर फार्मूला छोटा पड़ जाता है। उन्हीं के द्वारा वृंदावन में श्री प्रियाकांत जू मंदिर एक विशिष्ट उपलब्धि है जो न केवल वृंदावन की बल्कि हिन्दू धार्मिक संस्कृति की एक उत्कृष्ट प्रस्तुति है। कमल के आकार का यह मंदिर हर दर्शक को अपनी ओर आकर्षित करता है।

देवकीनंदजी और उनके ट्रस्ट के द्वारा अनेक सेवा, परोपकार एवं संस्कृति उत्थान के कार्यक्रम संचालित किये जा रहे हैं जिनमें गौ रक्षा अभियान के अंतर्गत देश के विभिन्न भागों में गौ रक्षा रैलिया निकाली जा चुकी है। गंगा-यमुना हमारी आस्था का केन्द्र ही नहीं बल्कि हमारे लिये जीवनदायिनी भी हैं। यह आज इतनी प्रदूषित हो चुकी हैं कि कई स्थानों पर यह आचमन लायक भी नहीं बचीं हैं। इस प्रदूषण के प्रति जागरूकता लाने के उद्देश्य से गंगा-यमुना पदयात्राएं ठाकुरजी के सानिध्य में निकाली जाती हैं। वे दहेज प्रथा के खिलाफ भी आंदोलन रत हैं। उन्होंने सभी वर्गो के बीच दहेज रहित विवाह कराए हैं। उनके जल एवं पर्यावरण को लेकर अनेक कार्यक्रम चल रहे हैं। वे युवापीढ़ी को भारतीय संस्कारों एवं संस्कृति की शिक्षा देकर उन्हें अपने परिवार, समाज और देश की सेवा के लिए जागरूक कर रहे हैं। उनके द्वारा छूआछूत, ऊंच- नींच और धनी-निर्धन जैसी विसंगतियों का भी प्रतिकार किया जा रहा है। उनके द्वारा सुधारगृहों (जेल) में कैदियों के सुधार कार्य चल रहे हैं। जबलपुर, झारसूखड़ा उड़ीसा, लखीमपुर खीरी, आदि स्थानों की कारागारों में जाकर वहां बन्दियों को प्रवचन प्रदान कर आपराधिक भावनाओं को सद्भावनाओं में परिवर्तित करने का कार्य किया हैं। विश्व शान्ति सेवा चेरिटेबल ट्रस्ट के माध्यम से देवकीनंदनजी के नेतृत्व में असहाय, आपदा पीड़ित, रोग पीड़ित की सहायता के अन्य सेवा कार्य भी किये जा रहे हैं। विभिन्न अनाथालयों, महिला आश्रम एवं वृद्धाश्रम में समय व्यतीत कर उन्हें स्नेह और आर्थिक मदद प्रदान की जाती रही है।

अपनी उल्लेखनीय वक्तव्य कला, क्षमता, मधुर आवाज के अतिरिक्त स्नेह, सत्य, ईमानदारी, सेवा व आध्यात्मिक ज्ञान से उन्होंने लोगों के हृदय में एक विशेष स्थान बना लिया है। आध्यात्मिकता एवं धार्मिकता के साथ-साथ राजनीति, विज्ञान, शिक्षा, कानून, स्वास्थ्य आदि विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञ लोगों का उनके साथ विचार-विनिमय होता रहता है। उसकी एक लंबी तालिका है। सागर को गागर में भरने की क्षमता मुझमें नहीं है। यहां मैंने केवल दिशासूचन मात्र किया है।

ललित गर्ग

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