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फल ही पाप-पुण्य का मापदंड

फल ही पाप-पुण्य का मापदंड

इस पीढ़ी में रहने वाला हर कोई अपना कर्म और धर्म का निर्णय खुद करता है। उसी प्रकार वह अपना पाप और पुण्य का निर्णय  भी करता है। वह कोई भी कार्य करता है, वह सही या गलत किसी और से सुनने की आदत नहीं रखता है। अपने जीवन का हर निर्णय वह खुद ही लेना पसंद करता है। यहां तक कि अपना खुद का भाग्य भी खुद बनाने का प्रयास करता है। अपने उपर विश्वास रखना जितनी अच्छी बात है, अपने ऊपर जरूरत से ज्यादा विश्वास रखना उतनी अधिक भयंकर बात है। वह विश्व में परमात्मा, परब्रह्म की सत्ता को ही भूल जाते हैं। जिन महान व्यक्तियों की साधना के उपरांत महान ग्रंथ, पुराणों एवं वेद-वेदान्तों की उत्पत्ति हुई उन्हें हम कैसे अनदेखा, अनसुना कर सकते हैं? उन लोगों की कठिन तपस्या और साधना के महत्व को हम नहीं रख पाते हैं। हमारे पुराणों और ग्रंथों के अनुसार हमारे पाप और पुण्य हमारे कर्म फल को बनाते हैं। इसीलिए हमारे कार्य में पाप और पुण्य का हमारे जीवन के ऊपर सम्पूर्ण प्रभाव होता है, लेकिन हमें इस बात का ज्ञान नहीं होता कि कौन से कार्य करने से पाप और कौन से कार्य करने से पुण्य मिलेगा। कभी-कभी हम कुछ स्वलप ज्ञान का लाभ करते हंै लेकिन कभी-कभी वह भी हमें निर्णय करने में बाधा डालता है।

हम कोई भी कार्य करते हैं, हमारे सामने हमेशा सही और गलत दो रास्ते आते हैं। जब  सही रास्ते को चुनना आसान होता है तो कोई  चिंता की बात नहीं होती, लेकिन जब सही रास्ता चुनने में थोड़ी भी मुश्किल होती है, तब हम गलत रास्ता चुन लेते हैं और सबके सामने उसके चुनने की लाखों वजह बताते हंै। गलत कार्य करना पाप होता है, और पाप के परिणाम को हम सहज नजर से नहीं देख पाते हैं। हमारे पूर्वजों ने जिस पाप और पुण्य से हमें अवगत कराया था उसे हम धीरे-धीरे भुलने लगे हैं। इसी पीढ़ी में जीने वाले लोगों को अपने कार्य के बारे में सोचने का समय नहीं होता है, नाही  वो जानबूझकर उसे दिमाग में लाना चाहते हैं। आजकल सभी वही कार्य करते है जिसे करने में उन्हें आनन्द मिलता है। वह यह जान ही नहीं पाते है कि उनका क्षणिक आनन्द उन्हें भविष्य में एक बड़ा कष्ट का सामना कराता है। नए युग के सभी लोग अपनी खुशी के लिए सदा चेष्टारत रहते हैं फिर भी उन्हें संतुष्टि नहीं मिल पाती है। अधिकांश लोग मानसिक रोग से पीडि़त है। देखा जाए तो हमारे कर्म इन सभी चीजों के लिए जिम्मेवार हैं।

हमारे कार्य जितने अधिक गलत होते हैं, हमें उतने अधिक दुखों का सामना करना पड़ता है। यहां तक कि गलत कार्य करने की मानसिकता भी उन सभी दुखों का कारण बनती है। हमारे करने वाले कार्य में पाप और पुण्य की पहचान करने हो तब हमें परमात्मा का स्मरण करना चाहिए। वे हमारे अन्दर छुपे बैठै विवेक-रूपी गुरू के माध्यम से हमें रास्ता बताते हैं। कोई भी कार्य हमें थोड़ा सा भी गलत लगे तो तुरन्त अपने विवेक से पूछना चाहिए। कुछ समय सोचने के बाद कार्य करने का निर्णय लें। हम यह भले भांति जान लें कि समय बदलने से पाप और पुण्य नहीं बदलते हैं। और उनका परिणाम भी नहीं बदलता है।

उपाली अपराजिता रथ

 

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