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जम्मू-कश्मीर के इतिहास का एक भूला हुआ अध्याय

जम्मू-कश्मीर के इतिहास का एक भूला हुआ अध्याय

पंडित जवाहर लाल नेहरु 1949 में लद्दाख आए थे। लद्दाख में उनकी मुलाकात उन्नीसवें कुशोक बकुला से मुलाकात हुई। नेहरु ने बकुला को प्रदेश की राजनीति में सक्रिय होने के लिए कहा। बकुला अवतारी पुरुष अर्थात टुलकु थे। वे राजनीति में आना नहीं चाहते थे लेकिन वे लद्दाख क्षेत्र के पिछड़ेपन को लेकर बहुत दुखी भी रहते थे। लद्दाख के लोग व्यापक अर्थों में उनके परिवार के ही लोग थे। इनके दुख दर्द को दूर करना भी उनका धर्म था। इसलिए वे नेहरु के प्रस्ताव को ठुकरा नहीं सकते थे। नेहरु के कहने पर ही बकुला ने शेख मोहम्मद अब्दुल्ला की नैशनल कान्फ्रेंस की लद्दाख शाखा का अध्यक्ष बनना स्वीकार कर लिया। जम्मू-कश्मीर संविधान सभा के लिए 1951 के अन्त तक चुनाव सम्पन्न हो चुके थे। इस संविधान सभा की सौ सीटें थीं लेकिन चुनाव केवल पचहत्तर में ही करवाए जा सके क्योंकि 25 सीटें उन इलाकों में पड़तीं थीं जिन पर पाकिस्तान ने अधिकार कर लिया था। इन सभी सीटों पर मोटे तौर पर शेख मोहम्मद अब्दुल्ला कि नैशनल कान्फ्रेंस ने बिना चुनाव लड़े ही अधिकार जमा लिया था क्योंकि रियासत के चुनाव आयोग ने बाकी सभी प्रत्याशियों के नामांकन पत्र ही रद्द कर दिए थे। नामांकन पत्रों को इस प्रकार थोक के भाव रद्द होते देख कर बहुत से स्थानों पर किसी ने नामांकन पत्र भरना ही उचित नहीं समझा। जम्मू संभाग की प्रजा परिषद ने तो यह हालत देख कर चुनाव का बहिष्कार ही कर दिया। लेकिन पूरे जम्मू कश्मीर में एक सीट ऐसी भी थी जिस पर चुनाव को लेकर कोई विवाद सोचा भी नहीं जा सकता था। वह थी लद्दाख संभाग की लेह सीट। जैसे ही चुनावों की घोषणा हुई , सभी ने एक स्वर से कहा कि कुशोक बकुला ही हमारे प्रतिनिधि हो सकते हैं। वे संविधान सभा के सदस्य बन गए।

लेकिन सदस्य बनने से क्या होता है। लद्दाख की ओर शेख अब्दुल्ला सरकार का कोई ध्यान नहीं था।

उसका भी विकास होना चाहिए, ऐसा उस समय की सरकार मानने को तैयार ही नहीं थे। शेख अब्दुल्ला ने नेहरु की सहायता से महाराजा हरि सिंह से सरकार एक प्रकार से छीनी ही थी। इसलिए उन दिनों शेख अब्दुल्ला को आईना दिखाने की स्थिति में कोई नहीं था। वह एक निरंकुश शासक की तरह व्यवहार कर रहा था। नेहरु भी उसके आगे कहीं न कहीं अपने आप को विवश समझने लगे थे। उसका कारण साफ था। राज्य की संविधान सभा में शेख का पूरा अधिकार था। नेहरु भी अपनी विवशता छिपाने के लिए शेख़ की मांगों को औचित्य के आधार पर सही सिद्ध करने का प्रयास करते नजर आते थे। ऐसे समय में किशोर बकुला ने शेख अब्दुल्ला से पंजा लड़ाने का निर्णय किया। वे शेख के अहंकार, लद्दाख को लेकर सरकार की उपेक्षा  को चुनौती देने का निर्णय कर बैठे थे।

12 अप्रैल 1952 को संविधान सभा में बजट प्रस्तुत किया गया। पूरे बजट में कहीं एक बार भी लद्दाख का नाम नहीं था। बकुला, सरकार द्वारा लद्दाख की अवहेलना किए जाने से बहुत व्यथित थे। शेख अब्दुल्ला द्वारा सत्ता संभाल लेने के बाद तो मानों कश्मीर वालों के लिए लद्दाख का अस्तित्व ही न रहा हो। इसलिए बकुला ने विधानसभा में इस विषय को जोरदार तरीके से उठाने का निर्णय किया। लेकिन वे यह भी जानते थे कि शेख अब्दुल्ला को चुनौती देने का क्या अर्थ है। उन दिनों शेख अब्दुल्ला अपनी ताकत की चरम सीमा पर थे। वे चारों ओर से नेहरु द्वारा संरक्षित प्राणी की श्रेणी के जीव थे। नेहरु लोकसभा में उसके खिलाफ एक शब्द भी सुनने को तैयार नहीं होते थे। ऐसे वातावरण में शेख अब्दुल्ला को चुनौती देना सत्ता के दो दो केन्द्रों से भिडऩा था। लेकिन बकुला भी तो उस महात्मा बुद्ध के उपासक थे जिन्होंने जन जन के दुख दर्द को दूर करने के लिए अपने राजपाट को भी लात मार दी थी। अब जब लद्दाख के जन जन ने उन्हें अपना प्रतिनिधि चुना था, उन पर अपना अबाध विश्वास जताया था तो उनको भी विकास का सुफल मिले यह देखना बकुला का ही तो धर्म था। शेख अब्दुल्ला ने तो लद्दाख के लोगों को गूंगे-बहरे निरीह प्राणी मान लिया था, जो किसी प्रकार के अन्याय होने पर भी चुप बैठे रहेंगे। शेख का बजट इसका पुख्ता सबूत था।

बकुला ने लेह में कार्य कर रहे अपने एक मित्र श्रीधर कौल से सलाह की। विधानसभा में बोलने के लिए भाषण तैयार किया गया। लद्दाख को लेकर सरकार के सौतेले व्यवहार को परत दर परत उघाड़ा गया। बकुला जब किसी काम को हाथ में लेते थे तो पूरे मनोयोग से करते थे। उन्होंने तिब्बत के गांदेन विश्वविद्यालय से गेशे की उपाधि प्राप्त की थी। गेशे के लिए सर्वाधिक अभ्यास तत्व मीमांसा के लिए तर्क पर ही होता है। इसलिए बकुला ने अपना भाषण केवल भावनाओं पर केन्द्रित नहीं किया बल्कि तर्क सम्मत विवेचना पर आधारित किया। बकुला लद्दाखियों की मातृभाषा भोटी में बोलने वाले थे। वर्तमान रियासत का दो तिहाई क्षेत्रफल लद्दाख का ही है।  क्षेत्रफल के हिसाब से तो लद्दाख रियासत के पांचों संभागों में से सबसे बड़ा संभाग है। इस संभाग में दो भाषाएं बोली जाती हैं। लेह के इलाके में भोटी और कारगिल के इलाके में बल्ती। लेकिन उनको आशंका थी कि शायद राज्य की संविधान सभा में उन्हें भोटी में बोलने की अनुमति न दी जाए। क्योंकि सभा में तो शेष सभी सदस्य कश्मीर घाटी और जम्मू संभाग के रहने वाले थे। वे भोटी का एक शब्द तक नहीं जानते थे।  गिलगित और बल्तीस्तान के लोग कुछ सीमा तक भोटी समझ लेते थे लेकिन उन क्षेत्रों में चुनाव न हो पाने की बजह से वहां का कोई प्रतिनिधि सभा में नहीं था। इसलिए बकुला ने अपने भाषण का अंग्रेजी अनुवाद भी तैयार करवाया। अन्तत: 12 मई को वह क्षण आ गया। बकुला बजट भाषण पर बोलने के लिए खड़े हुए। अधिकांश सदस्य उर्दू या  अंग्रेज़ी में भाषण कर चुके थे। बकुला ने सभा के अध्यक्ष  से कहा कि वे अपनी मातृभाषा भोटी में बोलेंगे। गुलाम मोहम्मद सादिक, जो बाद में जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री भी बने, उस समय संविधान सभा के अध्यक्ष थे। उन्होंने अनुमति तो दे दी लेकिन पूरी सभा में भोटी समझने वाला कोई नहीं था। इसलिए यह निर्णय हुआ कि बकुला अपने भाषण की अंग्रेजी प्रति सभा के पास जमा करवा दें। बकुला तो पहले ही अपने भाषण के अंग्रेजी अनुवाद की प्रति लेकर आए थे। जैसे ही बकुला का भाषण समाप्त हो, संविधान सभा के सचिव उसका अंग्रेजी अनुवाद पढ़ कर सुनाएंगे ताकि सभी को पता चल जाए कि उन्होंने क्या कहा है। फिर इस अंग्रेजी भाषण को ही संविधान सभा की कार्यवाही में रिकार्ड किया जाए।

इस व्यवस्था पर सहमति बन जाने के बाद बकुला ने बोलना शुरु किया। शेख मोहम्मद अब्दुल्ला भी उस समय सदन में बैठे थे। वे सरकार चला रही नैशनल कान्फेंरस के मुखिया भी थे। अब्दुल्ला की पार्टी के लोग उन्हें अपने सम्बोधन में प्राय कायदे आजम कहा करते थे। उस समय मुसलमानों में जिन्ना को कायदे आजम कहने का प्रचलन था। शेख अब्दुल्ला भी अपने आप को कायदे आजम से कम नहीं समझते थे। दरअसल दोनों में भारत के मुसलमानों का नेतृत्व हथियाने का विवाद चलता रहता था। जिन्ना इसमें बाजी मार ले गए थे और शेख अब्दुल्ला केवल कश्मीर घाटी तक महदूद होकर रह गए थे। इसकी कमी वे अपनी पार्टी के लोगों से स्वयं को कायदे आजम कहलवा कर पूरा करते थे।

अब संविधान सभा के सरकारी रिकार्ड में तो बकुला भी नैशनल कान्फ्रेंस के सदस्य के तौर पर ही दर्ज थे। सभी सदस्य आम तौर पर विरुदावली ही गाते थे। जम्मू संभाग के कुछ सदस्य बीच बीच में कुछ लीक से हट कर बोलते थे लेकिन बोलने की शैली इस प्रकार की होती थी के वे लीक से हटे हुए भी लीक पर चलते ही दिखाई दें। वैसे भी नेहरु जी के कारण शेख अब्दुल्ला की तूती बोलती थी। आम कश्मीरी समझ गया था कि भारत सरकार कश्मीरियों के साथ है या नहीं, इस पर कुछ कहना तो मुश्किल था लेकिन वह शेख मोहम्मद अब्दुल्ला के साथ थी, इसे सभी जान गए थे। इसलिए वे देखते देखते शेर-ए-कश्मीर से कायदे आजम बन गए थे। इस प्रकार के वातावरण में उस लद्दाख का प्रतिनिधि, जिसके कुल सदस्यों की संख्या ही सभा में दो थी, भला प्रशंसा और समर्थन के सिवा क्या बोलेगा, नैशनल कान्फ्रेंस के सभी सदस्य यही सोच रहे थे। उधर जम्मू में वहां के प्रमुख राजनैतिक दल प्रजा परिषद ने जम्मू संभाग से हो रहे भेदभाव को लेकर नैशनल कान्फ्रेंस की सरकार के खिलाफ जबरदस्त जन आन्दोलन छेड़ा हुआ था। इसलिए ऐसे कठिन समय में शेख मोहम्मद अब्दुल्ला को लद्दाख संभाग के समर्थन की बहुत सख्त जरुरत भी थी।

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बकुला अपने स्थान से खड़े हुए। उन्होंने उड़ती नजर से वहां बैठे सभी सदस्यों की ओर देखा। अन्त में उनकी नजर शेख मोहम्मद अब्दुल्ला पर जाकर ठहर गई। दोनों ने एक दूसरे की ओर देखा और बकुला ने बोलना शुरु किया। शेख मोहम्मद अब्दुल्ला मुस्कुराने लगे। बकुला ने बीच में शेख अब्दुल्ला का नाम लिया। पूरा वाक्य तो किसी को क्या समझ में आता लेकिन शेख अब्दुल्ला का नाम तो नैशनल कान्फ्रेंस के लोग कितना भी धीमा क्यों न लिया गया हो, सुन ही लेते थे। सत्ता पक्ष के सदस्यों ने शेख का नाम सुनने पर जम कर मेजें थपथपाईं। अब तो जब भी शेर-ए-कश्मीर शेख अब्दुल्ला का नाम बकुला के भाषण में आता तो सत्ता पक्ष के सदस्य मेजें थपथपा कर उसका स्वागत करते। यह मंजर तब तक चलता रहा जब तक बकुला भाषण करते रहे। समझ बकुला भी गए थे कि ये लोग मेज थपथपा कर किस लिए अपनी खुशी का इजहार कर रहे हैं। उनकी समझ में  अब लद्दाख भी शेख अब्दुल्ला और नैशनल कान्फ्रेंस के समर्थन में आ खड़ा हुआ है। फिर  बकुला कोई साधारण पुरुष नहीं थे। वे टुलकु थे। हिमालयी क्षेत्र में टुलकु उसे कहते हैं जो किसी का अवतार हो। टुलकु बोधिसत्व होता है। बकुला, भगवान बुद्ध के सोलह अर्हतों में से एक थे। वह बुद्ध के समकालीन थे। लद्दाख के वर्तमान बकुला को उन्हीं अर्हत बकुला का उन्नीसवां अवतार माना जाता है। वही कशुक बकुला आज जम्मू-कश्मीर की संविधान सभा में बजट पर व्याख्यान दे रहे थे और अब्दुल्ला कम्पनी तालियां बजा रही थी। लेकिन ये तालियां कुछ समय के लिये ही थीं और शेख साहिब का मुस्कुराता चेहरा भी कुछ समय के लिए ही था।

बकुला के वक्तव्य के बाद, विधानसभा के सचिव ने अंग्रेजी अनुवाद का पाठ शुरु किया तो धीरे-धीरे सभी के चेहरे का रंग बदलना शुरु हो गया। बकुला आश्चर्य प्रकट कर रहे थे कि वित्त मंत्री ने अपने लम्बे भाषण में लद्दाख की आर्थिक व अन्य समस्याओं को हल करने की बात तो दूर, उन्होंने तो अपने पूरे भाषण में एक बार भी लद्दाख का नाम नहीं लिया। लद्दाख के अभागी लोगों के लिए यह बजट सचमुच निराशाजनक है। वित्त मंत्री के इस भाषण को सुन कर तो कोई भी यह अनुमान लगा लेगा कि शायद लद्दाख, जम्मू कश्मीर राज्य का हिस्सा ही नहीं है। पूरे बजट में सभी योजनाएं अन्य संभागों के लिए ही बनाई गई हैं लद्दाख के लिए किसी एक भी योजना का जिक्र नहीं है। जैसे-जैसे अंग्रेजी में भाषण पढ़ा जा रहा था, वैसे-वैसे नैशनल कान्फ्रेंस के सदस्यों के चेहरे पर हवाईयां उड़ रही थीं। शेख अब्दुल्ला को तो यह विश्वास ही नहीं हो रहा था कि लद्दाख का सदस्य, जो कायदे से नैशनल कान्फ्रेंस का ही सदस्य है, इतनी हिम्मत दिखाए कि कायदे आजम के सामने ही उसकी आलोचना करे। कायदे आजम का नाम तो अंग्रेजी भाषण में भी बार-बार आ रहा था लेकिन अब कोई उस पर तालियां नहीं बजा रहा था। उधर आलोचना का स्वर तीव्र से तीव्रतर होता जा रहा था। बकुला ने कहा, लद्दाख में शिक्षा को लेकर सरकार मौन है। पूर्ववर्ती सरकार (महाराजा हरि सिंह की सरकार) इस सीमान्त जिला के प्राथमिक, सैकेण्डरी और कॉलेज दर्जे के छात्रों को छात्रवृत्ति प्रदान करती थी लेकिन इस नई सरकार ने तो एक ही झटके से उसे भी समाप्त कर दिया।

महाराजा हरि सिंह की सरकार लद्दाख में शिया, सुन्नी और बौद्ध समाज द्वारा चलाए जा रहे तीन विद्यालयों को अनुदान देती थी, वर्तमान सरकार ने उसे भी बन्द कर दिया। लद्दाख में जो थोड़ी बहुत स्कूली व्यवस्था थी भी उसकी दयनीय स्थिति की ओर संकेत करते हुए उन्होंने कहा सरकार नाम लेने के लिए तो लद्दाख के स्कूलों में भोटी भाषा के अध्ययन की व्यवस्था करती है लेकिन वह छात्रों के लिए भोटी भाषा में किताबें नहीं छापती। बिना किताब के पढ़ाई कैसी? सरकार ने बजट में भोटी के विकास के लिए कोई प्रावधान नहीं किया। सबसे आश्चर्यजनक बात तो यह है कि सरकार ने लद्दाख के स्कूलों में पढ़ाई का माध्यम अनिवार्य रूप से उर्दू बना दिया है। लद्दाखी बच्चों के लिए तो उर्दू एक विदेशी भाषा से ज्यादा कुछ नहीं। दरअसल सरकार उर्दू को लाद कर लद्दाख में पढ़ाई लिखाई को खत्म करने पर तुल गई है। बकुला ने भाषा को लेकर यह मौलिक प्रश्न उठाया था। सरकार लद्दाख के लोगों की मातृभाषा भोटी को शिक्षा व्यवस्था में से समाप्त करने के एक गहरे षड्यंत्र में जुटी हुई थी। लेकिन मामला केवल भोटी का ही नहीं था।

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शेख अब्दुल्ला की सरकार तो अपनी मातृभाषा कश्मीरी को भी समाप्त करने  के गहरे षड्यन्त्र में लगी हुई थी। कश्मीर घाटी के स्कूलों में भी शिक्षा का माध्यम कश्मीरी के स्थान पर उर्दू किया गया था। भाषा का समाप्त होना यानि पीढिय़ों की विरासत का जीवन्त रूप में समाप्त हो जाना। कहीं शेख अब्दुल्ला कश्मीरियत को समाप्त करने की नींव तो तैयार नहीं कर रहे थे? इसका उत्तर तो वे स्वयं ही जानते होंगे लेकिन इतना निश्चित था भोटी भाषा उनके आक्रमण का शिकार हो रही थी। जो अपनी भाषा को ही कश्मीर घाटी से समाप्त करने के अभियान चला रहा हो उसके लिए भोटी की क्या विसात थी। बकुला ने कहा कि जम्मू और कश्मीर संभाग में तकनीकी शिक्षा के प्रसार के लिए कितना कुछ किया जा रहा है लेकिन लद्दाख में तकनीकी शिक्षा का अस्तित्व ही नहीं है। तकनीकी प्रशिक्षण की व्यवस्था नहीं होगी तो लद्दाख की युवा पीढ़ी को रोजगार के अवसर कैसे प्राप्त होंगे?

अब  बकुला ने लद्दाख में शरणार्थियों की समस्या का प्रश्न उठाया। उन्होंने कहा कि 1948 में जम्मू-कश्मीर पर पाकिस्तानी हमले के कारण जंस्कार घाटी से निकल कर शरणार्थी बनने के लिए विवश हो  गए लोगों के पुनर्वास के लिए बजट में कोई प्रावधान नहीं है। ये बदकिस्मत शरणार्थी अभी भी कुल्लु घाटी में मारे मारे फिर रहे हैं। इनमें से कई तो मृत्यु का शिकार भी हो गए हैं। लेकिन सरकार को इनके पुनर्वास की तनिक भी चिन्ता नहीं है। इस हमले के कारण अनेक मठों को हमलावरों ने नष्ट कर दिया था। नष्ट हुए मठों की मरम्मत करवाने की ओर सरकार का ध्यान जाने का तो खैर प्रश्न ही नहीं है। बकुला के इस वक्तव्य के पीछे छिपे व्यंग्य को शेख अब्दुल्ला से बेहतर भला कौन समझ सकता था? लद्दाख के आर्थिक विकास का, सरकार को ख्याल आए, यह आशा करना तो आकाश कुसुम के समान ही होगा। दुख का विषय तो यह है कि हमें यकीन दिलवाया गया था कि इस क्षेत्र का भी विकास होगा। यह बात हमें स्वयं जवाहर लाल ने कही थी। लेकिन यह सब झूठा सिद्ध हुआ। पंचायती राज, सहकारिता और ग्रामीण विकास, ये सभी योजनांए लद्दाख में भी लागू की जानी चाहिए। लेकिन बजट में इसका कहीं जिक्र तक नहीं है। बल्कि इसके विपरीत विकास के जो काम पुरानी सरकार के समय में चालू थे, उन्हें भी नई सरकार ने बन्द करवा दिया। जम्मू और कश्मीर में नई नहरें खुदवाने के लिए पच्चीस लाख का प्रावधान बजट में किया गया है। इन इलाक़ों में नहरें पहले ही हैं। लेकिन लद्दाख के सूखे रेगिस्तान के लिए किसी एक छोटी से छोटी नहर के लिए भी बजट में फूटी कौड़ी नहीं है। कारगिल में खुरबाथांग नहर का सर्वेक्षण करवाया था लेकिन वर्तमान सरकार उससे एक कदम भी आगे नहीं बढ़ पाई।

बकुला ने लद्दाख की भोगौलिक स्थिति की चर्चा की। उन्होंने कहा क्षेत्र की सबसे बड़ी समस्या परिवहन और संचार को लेकर है। दुर्गम पहाड़ी इलाका है। न सडकें हैं और न ही पगडंडियां। बस्तियां दूर-दूर हैं। इसलिए इलाके के विकास के लिए लद्दाख के दूर दराज की बस्तियों को जोडऩे के लिए कच्ची पक्की सड़कों के निर्माण की जरुरत है। लेकिन बजट में इसके प्रावधान की बात तो दूर, इसका कहीं संकेत भी नहीं किया गया है। हम तो भारतीय सेना के आभारी हैं कि उन्होंने कारगिल तक जाने के लिए कम से कम जीप चलने लायक पक्की सड़क तो बनाई है। पूरे लद्दाख में डाकतार विभाग के केवल दो कार्यालय हैं। लेह और कारगिल में। जंस्कार घाटी के लोगों को डाक या तार की जरुरतों के लिए कारगिल जाना पड़ता है।

जंस्कार से कारगिल की दूरी 150 मील है और रास्ते में 4400 मीटर की ऊंचाई वाली दो पर्वत चोटियां आती हैं। जरुरत थी कि सरकार लद्दाख में संचार व्यवस्था स्थापित करने की कोई योजना बनाती लेकिन वित्त मंत्री के पूरे बजट में लद्दाख का तो मानो अस्तित्व ही नहीं है। सरकार चाहे तो कह सकती है कि हम फिलहाल लद्दाख पर नौ लाख रुपया खर्च करते हैं। यह सच है लेकिन मैं स्पष्ट कर दूं यह सारा पैसा सरकारी कर्मचारियों के वेतन पर खर्च हो जाता है, विकास के लिए एक पैसा नहीं बचता। हमें आशा थी कि लद्दाख के प्राकृतिक स्रोतों का दोहन करने के लिए विशेषज्ञों की समिति का गठन किया जाएगा और हमारी इस प्राकृतिक सम्पदा का आकलन कर विकास की योजनाएं बनाई जाएंगी लेकिन बजट में इसका दूर दूर तक जिक्रनहीं है।

लगता है हमारे संभाग को यह सरकार विजित प्रदेश मान कर चल रही है। आज हम से जिस दर पर लगान बसूला जा रहा है, उतना तो शोषण की चरम स्थिति के दिनों में भी नहीं बसूला जाता था। इस समय बकुला ने एक और स्पष्टीकरण दिया। उन्होंने कहा कि मैं जानता हूं कि यहां कुछ मंत्री लोग कह रहे हैं कि जो मैं कह रहा हूं, वह आम लद्दाखी नहीं कह रहे बल्कि उनको आगे करके कोई और बोल रहा है। बकुला ने कहा हमारा पेट भूखा है, यह बताने के लिए भी हमें कोई बाहर से ही आएगा? बिना कपड़ों के हम शीत से मरे जा रहे हैं, यह हमें कोई बाहर से बताने आएगा? फिर उन्होंने व्यंग्य से कहा, जब 1931 में शेख अब्दुल्ला ने महाराजा हरि सिंह के खिलाफ मोर्चा लगाया था तो सरकारी क्षेत्रों में यह चर्चा थी कि वे विदेशी ताकतों के इशारे पर यह सब कर रहे हैं। ताज्जुब है आज कुछ सरकारी मंत्री हमारे बारे में यह कह रहे हैं। बकुला ने शेख अब्दुल्ला के प्रशासन में व्याप्त भ्रष्टाचार पर तंज कसा। उन्होंने कहा श्रीनगर से हमारे लिए लेह में कपड़ा भेजा जाता है लेकिन उसका एक टुकड़ा तक लद्दाखियों को नहीं मिल पाता। आखिर वह सारा कपड़ा कौन पहन रहा है? मिट्टी का तेल हमारे लिए श्रीनगर से भेजा जाता है लेकिन उसकी एक बूंद भी हम तक नहीं पहुंचती। आखिर वह सारा तेल कहां चला जाता है? इतिहास में पहली बार, उस सरकार द्वारा जो अपने आप को लोगों की अपनी सरकार कहती है, लद्दाख में बाहर से पुलिस बल तैनात कर दिए गए। हमने कभी सपने में भी ऐसी कल्पना नहीं की थी। जमीन पर रेंगते निरीह कीड़े पर जब कोई पैर रख देता है तो वह भी प्रतिकार करता है, हम तो आखिर मनुष्य हैं। हम लद्दाखियों का धैर्य अब जवाब देने लगा है। हमारी परीक्षा मत लीजिए। मुझे आशा है सरकार मेरी बातों पर गौर करेगी और उनका समाधान करेगी।

लेकिन इधर यह सब सुनते सुनते शेख़ मोहम्मद अब्दुल्ला का धैर्य भी अब जवाब देने लगा था। वे गुस्से में उठ कर खड़े हो गए और अध्यक्ष को सम्बोधित कर अत्यन्त आश्चर्यजनक व्यवस्था का प्रश्न उठाने लगे। उन्होंने कहा, यह अनुवाद सही नहीं है। भोटी का भाषण छोटा था तो अंग्रेजी का भाषण लम्बा कैसे हो सकता है। दोनों भाषणों की पृष्ठ संख्या देखी जाए। भोटी के पृष्ठ कम हैं और अंग्रेजी के ज्यादा हैं। यह सही अनुवाद नहीं है। बकुला ऐसा नहीं कह सकते। अध्यक्ष के आसन पर गुलाम मोहम्मद सादिक विराजमान थे। वे भी नैशनल कान्फ्रेंस से ही ताल्लुक रखते थे और शेख मोहम्मद अब्दुल्ला के नजदीकी साथी थे। उनके लिए भी शेख अब्दुल्ला कायदे आजम ही थे। लेकिन इस समय वे अध्यक्ष के आसन पर थे। अजीब धर्मसंकट में फंस गए थे।

इधर शेख अब्दुल्ला बार बार चिल्ला रहे थे कि विधानसभा के सचिव को यह भाषण पढऩे से रोका जाए। सादिक ने इसे मंजूर नहीं किया और शेख अब्दुल्ला ने टोका टोकी जारी रखी। शेख अब्दुल्ला के एक दूसरे मंत्री दुर्गा प्रसाद धर तो उससे भी एक कदम आगे चले गए। उन्होंने कहा विधान सभा की कार्यवाही के लिए केवल दो ही अधिकृत भाषाएं हैं, उर्दू और अंग्रेजी। क्योंकि बकुला ने अपना भाषण भोटी भाषा में दिया है इसलिए उन का यह भाषण  सभा की कार्यवाही में शामिल न किया जाए। दुर्गा प्रसाद धर भूल गए थे के जम्मू-कश्मीर के तीन संभागों की भाषाएं कश्मीरी, डोगरी और भोटी है। उर्दू और अंग्रेजी किसी भी संभाग की भाषा नहीं है। वैसे भी विधानसभा के किसी सदस्य द्वारा बजट पर दिया गया भाषण कार्यवाही से कैसे निकाला जा सकता है? यह तो तभी संभव है जब किसी सदस्य ने अपने भाषण में असंसदीय भाषा का प्रयोग किया हो। उस समय तक शेख अब्दुल्ला की आलोचना को असंसदीय करार नहीं दिया गया था। सादिक ने कहा कि यह अंग्रेजी अनुवाद बकुला ने स्वयं दिया है, इसलिए उसके सही होने पर कोई तीसरा व्यक्ति आपत्ति कैसे कर सकता है। तकनीकी दृष्टि से इसे ही सही मानना होगा। लेकिन शेख अब्दुल्ला और उसके साथी अपने व्यवस्था के प्रश्न पर अड़े रहे। तब सादिक ने बीच का रास्ता निकाला। शेख की बात भी रह जाए और नियमों के विपरीत भी न चलना पड़े। उन्होंने व्यवस्था दी कि बकुला जी के भाषण के अंग्रेजी अनुवाद की किसी तीसरे भाषाविद से जांच करवा ली जाए  और उसके निर्णय के अनुसार ही आगे निर्णय लिया जाए। किसी ने शेख अब्दुल्ला को यह कहने का साहस नहीं किया कि यदि बकुला के भाषण में सरकार की आलोचना की गई है तो इससे क्रोधित होकर इतनी चिल्ल-पौं मचाने की क्या जरुरत है? लोकतंत्र का मूल स्तम्भ तो आलोचना पर ही टिका हुआ है। नैशनल कान्फ्रेंस तो आज तक यही चिल्लाती रही थी कि पार्टी बोलने के अधिकार, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए ही संघर्ष करती रही है। आज बकुला ने अपनी पहली आलोचना से ही शेख अब्दुल्ला का पूरा रंग एक ही झटके में उतार कर रख दिया।

बकुला का भोटी में दिया गया भाषण और उसका अंग्रेजी अनुवाद श्रीनगर में राजस्व विभाग में कार्य कर रहे एक लद्दाखी श्री देचेन साहब को दिया गया जो मजहब से ईसाई था। देचेन भोटी और अंग्रेजी दोनों भाषाएं जानता था। उसने भोटी भाषा के भाषण के एक एक शब्द का अंग्रेजी अनुवाद के शब्दों के साथ मिलान किया और अपना निर्णय दे दिया। भाषण का अंग्रेजी अनुवाद सही था। जो अंग्रेजी में लिखा गया था वही बकुला ने कहा था। यह रपट विधान सभा सचिव को दी गई और बकुला रिम्पोछे का पूरा भाषण विधानसभा की कार्यवाही में दर्ज किया गया। बकुला के इस भाषण ने जम्मू-कश्मीर राज्य की भीतर की हालत को सबके सामने नंगा कर दिया। दूसरे दिन सभी समाचार पत्रों ने बकुला के इस भाषण की चर्चा की। दिल्ली से प्रकाशित होने वाले अंग्रेजी दैनिक Hindustan Times Evening News ने 13 मई को  बकुला को उद्धृत करते हुए छापा कि लद्दाख को एक पाई तक नहीं दी गई। लेकिन जब बाद में वित्त मंत्री ने बजट की आलोचनाओं का उत्तर दिया तो बकुला के उठाए गए प्रश्नों का वे भी कोई समाधान वाला उत्तर नहीं दे सके।

लेकिन दिल्ली में इसकी प्रतिक्रिया हुई। प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरु के सहायक सचिव मोहम्मद मथाई ने दूसरे ही दिन प्रधानमंत्री को बकुला द्वारा उठाए गए मुद्दों के सम्बंध में एक नोट भेजा। मथाई ने लिखा, ‘मैं यह सुझाव नहीं दे रहा कि प्रधानमंत्री शेख अब्दुल्ला से इसका स्पष्टीकरण मांगे। लेकिन मैं समझता हूं कि सभी चीजों को ध्यान में रखते हुए, केन्द्रीय सरकार को इस भुला दिए गए क्षेत्र की ओर विशेष ध्यान देना चाहिए। मैंने विश्वसनीय लोगों से सुना है कि लद्दाख में सूखे से प्रभावित लोगों की सहायता के लिए प्रधानमंत्री ने शेख साहिब को जो दस हजार रूपए भेजें थे, वे उन गरीबों तक पहुंचे ही नहीं। यकीनन शेख साहिब ने तो वे रूपए उस आदमी को भेजें ही होंगे जो लद्दाख का प्रभारी है। मैं नहीं जानता यह लद्दाख वाला अजीब आदमी किस प्रकार की प्रकृति का है। मेरी समझ में हर लिहाज से यह ठीक होगा कि यदि सम्भव हो तो लद्दाख को एक साम्प्रदायिक विकास प्रकल्प दिया जाना चाहिए।’

मथाई के इस नोट में इतना तो स्वीकार कर ही लिया गया कि प्रशासन भ्रष्टाचार में धंसा हुआ है। यदि प्रधानमंत्री द्वारा प्रदेश के मुख्यमंत्री के माध्यम से लद्दाख की राहत के लिए भेजें गए दस हजार रूपए कोई बीच में डकार गया तो प्रशासन की हालत का सहज ही अनुमान लगाया जा सकता था। लेकिन जैसा कि मथाई ख़ुद ही लिख रहे हैं, शेख अब्दुल्ला से उत्तर मांगने का साहस कोई नहीं कर रहा था। बकुला यही उत्तर शेख अब्दुल्ला से प्रदेश की संविधान सभा में मांग रहे थे और शेख उत्तर देने की बजाए व्यवस्था के प्रश्नों की ढाल तलाश रहे थे।

डॉ. कुलदीप चन्द अग्निहोत्री

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