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हिन्दू विरोधी नेहरुवादी रवैये ने फिर पकड़ा जोर

हिन्दू विरोधी नेहरुवादी रवैये ने फिर पकड़ा जोर

पिछले कुछ दिनों से देश में हिंदू विरोधी अभियान फिर जोर पकड़ता लग रहा है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री की अपने राज्य में गोरक्षा पर ताजा टिप्पणी उनके ताज महल दौरे में छुप-सी गई। तथाकथित उदार और सेकुलर बिरादरी कहती है कि देश के सबसे बड़े राज्य (आबादी के लिहाज से) में ”हिंदू राज’’ है जिसमें अल्पसंख्यकों और दलितों का कोई भविष्य नहीं है। फिर, तमिलनाडु में अपनी राजनैतिक पार्टी बनाने को बेताब एक लोकप्रिय फिल्मी कलाकार भी आजकल अपनी सेकुलर छवि पुख्ता करने के लिए हिंदू विरोधी कारवे में जा मिले हैं। वे हमें यकीन दिला कर रहेंगे कि ”हिंदू आतंक’’ कोई मिथक नहीं, हकीकत है।

मैं इसी स्तंभ में जिक्र कर चुका हूं कि एक बार अपनी विदाई पार्टी में एक पश्चिमी कूटनयिक ने अपने भारतीय मित्रों और सहयोगियों से कहा था कि जिस देश में करीब 80 प्रतिशत हिंदू रहते हों, उसमें नेता, बुद्धिजीवी, अफसरशाह, वकील और न्यायाधीश हिंदू धर्म के बदले इस्लाम और ईसाइयत के हितों के लिए अधिक मुखर हैं। यही नहीं, वे यह देखकर सबसे अधिक हैरान थे कि हिंदू धर्म पर सबसे तीखा हमला हिंदू एलिट की ओर से ही होता है। उनके लिए हिंदू धर्म दुनिया का सबसे बेतुका, अवैज्ञानिक और क्रूर धर्म है जिसने जातिवाद, गैर-बराबरी और शोषण को प्रश्रय दिया है।

ये हिंदू विरोधी यह नहीं मानते हैं कि हर महान धर्म या सभ्यता की अपनी अच्छाई और बुराई होती है और कालक्रम में गड़बडिय़ों में सुधार होता रहता है। आखिरकार हिंदू धर्म में स्त्रियां देवी की तरह पूजी जाती हैं जबकि इस्लाम में औरतें मर्दों के बराबर नहीं मानी जातीं और अभी हाल तक कई विकसित ईसाई देशों में महिलाओं को वोट देने का अधिकार नहीं था। जाति की अवधारणा बेहद वैज्ञानिक है क्योंकि यह श्रम विभाजन के सिद्धांत पर आधारित है। यह सिद्धांत समाज में हर वर्ग की ”जरूरत’’ पर बल देता है। हां, यह सिद्धांत बेशक भ्रष्ट हो उठता है जब जीवन की धारा किसी की क्षमता से नहीं, बल्कि जन्म से तय होने लगती है। इसलिए इस सिद्धांत से भ्रष्टाचार को दूर करने की दरकार है। लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि हिंदू धर्म को हिंद महासागर में फेंकने के बाद ही कुछ भला होगा। दरअसल दुनिया में किसी भी दूसरे धर्म के उलट हिंदू धर्म ने देवी-देवताओं की विविधता के रूप मे बहुलतावाद को बढ़ावा दिया। हिंदुओं के लिए किसी एक देवी-देवता को ही पूजने की मजबूरी नहीं है, न ही खास देवी-देवता की पूजा विशेष तरह से करने की अनिवार्यता है। हिंदू धर्म में उनका भी उतना ही सम्मान है, जो किसी तरह की पूजा करते ही नहीं। हिंदू धर्म समावेशी और अंतरमन पर केंद्रीत है। वह अपने अनुयायियों पर कोई शर्त नहीं थोपता तो दूसरों पर खुद को थोपने का सवाल ही कहां पैदा होता है।

यह देखा जा सकता है कि भारत में ज्यादातर हिंदू विरोधी कांग्रेस और कम्युनिस्ट पार्टियों के दिग्गज और समर्थक हैं और उनके हीरो आजाद भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू हैं। संयोगवश नेहरू ने 1949 में कहा था कि ‘हिंदू सभ्यता की बात करने से भारत के हितों को ठेस पहुंचेगी।’ उन्होंने एकाधिक बार यह स्वीकार किया कि वे शिक्षा से अंग्रेज, विचारों में अंतरराष्ट्रीयतावादी, सभ्यता-संस्कृति से मुसलमान और हिंदू तो जन्म की दुर्घटना भर से हैं। नेहरू ने 1953 में कैलाशनाथ काटजू को लिखा, ”व्यवहार में एक हिंदू देश के बाकी लोगों से ज्यादा असहिष्णु और संकीर्ण दिमाग का होता है।’’

दरअसल यह कहना गलत नहीं है कि नेहरू हिंदू धर्म, हिंदू सभ्यता, हिंदू समाज और औसत हिंदू आदमी के प्रति घृणा रखते थे। नेहरू ने हिंदू (हिंदुओं के विभिन्न रस्म-रिवाज और प्रथाओं से संबंधित) संहिता 1956 में तैयार कराया लेकिन वे मुसिलम पर्सनल लॉ बनाने से पीछे हट गए। सो, आश्चर्य नहीं कि दिग्गज समाजवादी नेता जे.बी. कृपलानी ने हिंदू संहिता विधेयक का इस आधार पर विरोध किया था कि नेहरू सरकार ”सांप्रदायिक’’ है। कृपलानी ने नेहरू से कहा था, ”अगर आप हिंदू समुदाय के लिए तलाक की व्यवस्था करना चाहते हैं तो करिए, लेकिन ऐसी व्यवस्था कैथोलिक समुदाय के लिए भी करिए। मैं आपसे कहता हूं कि यही लोकतांत्रिक तरीका है, दूसरा तो सांप्रदायिक तरीका है। महासभा वाले ही अकेले सांप्रदायिक नहीं हैं, यह सरकार भी सांप्रदायिक है, चाहे वह जो भी कहे। मैं आप पर सांप्रदायिकता का आरोप लगाता है क्योंकि आप एक विवाह प्रथा सिर्फ हिंदू समाज के लिए ला रहे हैं। आप इसे मुस्लिम समुदाय के लिए भी लाइए। मेरी मानिए कि मुस्लिम समुदाय इसके लिए तैयार है लेकिन आपमें वह करने का साहस नहीं है।’’

नेहरूवादी सेकुलरवाद के तहत ही सरकार ने विश्वनाथ, तिरुपति, पुरी, नाथद्वारा और गुरुवायुर हिंदू मंदिरों (और मठों) के लिए ट्रस्टी नियुक्त किया। केरल में मंत्री सबरीमाला मंदिर की संपत्ति खंगालने में मशरूफ थे। लेकिन वही सरकार मस्जिदों, चर्चों और गुरुद्वारा के मामले में ऐसा करने को ”सांप्रदायिक’’ करार देती है। नेहरूवादी सेकलरवाद के मुताबिक अपने अनुयायियों को प्रभावित करने वाले किसी हिंदू स्वामी की निंदा करना ”प्रगतिशील’’ कदम है, लेकिन फतवा और हुकुमनामा जारी करने वालों पर उंगली उठाना ”सांप्रदायिक’’ है।

 

 

इस पृष्ठभूमि में यह महज संयोग नहीं है कि ”हिंदू आतंक’’ या ”भगवा आतंक’’ शब्द सार्वजनिक बहस में कांग्रेस की अगुआई वाली यूपीए सरकार के दौर में 2004-14 में आया। इस पद को ”लोकप्रिय’’ बनाया तत्कालीन केंद्रीय गृह मंत्री पी. चिदंबरम और दिग्विजय सिंह जैसे वरिष्ठ कांग्रेस नेताओं ने। हम सभी जानते हैं कि बतौर गृह मंत्री चिदंबरम ने इशरत जहां के मामले की मूल हलफनामे को बदलवा दिया था जिसमें कहा गया था कि 2004 में पुलिस मुठभेड़ में मारी गई इशरत जहां पाकिस्तान स्थित आतंकी गुट लश्कर की मॉड्यूल थी। उन्होंने कहा कि इशरत के खिलाफ ”कोई पुख्ता सबूत नहीं है।’’

इशरत और उसके तीन दूसरे दोस्तों को जम्मू-कश्मीर पुलिस की सूचना पर गुजरात पुलिस ने 2004 में मुठभेड़ में मार गिराया था। कहा गया था कि ये गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को मारने की साजिश रच रहे थे। जुलाई 2004 में लश्करे तैयबा ने जमात-उद-दावा की वेबसाइट पर एक लेख में दावा किया कि इशरत जहां उसकी मॉड्यूल थी। लेकिन तभी कांग्रेस की अगुआई वाली यूपीए सरकार सत्ता में आ गई। कांग्रेस और कई मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को यह घटना मुख्यमंत्री की हत्या की साजिश की नहीं, बल्कि ”फर्जी मुठभेड़’’ लगी। उन्होंने दलील दी कि लोकतांत्रिक देश में किसी अपराधी को सजा देना न्यायपालिका का काम है, पुलिस का नहीं। जब विवाद बढ़ा तो लश्कर ने 2007 में (तीन साल बाद) सफाई दी कि उसने गलती से इशरत को भारत में अपना कार्यकर्ता बता दिया था!

इसी पृष्ठभूमि में चिदंबरम ने हलफनामा बदल दिया। चिदंबरम गलत थे क्योंकि हाल ही में लश्करे तैयबा के लिए 26/11 (2008) के मुंबई हमले के साजिश रचने वाला डेविड हेडली ने हाल ही में पहले अमेरिकी फेडरल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेश के सामने और फिर भारतीय अदालत के सामने कबूल किया कि इशरत जहां वाकई एक ”फिदायीन’’ थी जो मोदी को निशाना बनाने के लिए किसी मुजामिल भट या मुजामिल बट के इशारे पर काम कर रही थी। इससे घिर गए चिदंबरम और कांग्रेस पार्टी ने अब फिर ”मूल मुद्दे’’ पर लौट आए हैं, जो उनके मुताबिक ”फर्जी मुठभेड़’’ था।

चिदंबरम के इशरत मामले में फैसले को गुजरात की गद्दी से मोदी को बाहर करने का इकलौता मामले के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए। ऐसा हो भी सकता है और नहीं भी हो सकता है लेकिन इसे ‘भगवा आतंकवाद’ के मनगढंत घटनाक्रम को जायज ठहराने की एक अहम रणनीति तो माना ही जाना चाहिए। यह रणनीति 2008 के बाद खुलकर आई, जिसकी दरकार कांग्रेस को 26/11 की त्रासदी के असर को शांत करने और पाकिस्तान के साथ रिश्ते सुधारने के काम आई। इस प्रक्रिया में इशरत जहां मामला ही नहीं, समझौता एक्सप्रेस, मालेगांव, अजमेर शरीफ और मक्का मस्जिद (हैदराबाद) के मामलों भी ”हिंदू कट्टरपंथियों’’ को फंसाने के लिए खोले गए।

ऐसा लगेगा कि अगर 26/11 हमले के दौरान पाकिस्तानी आतंकी कसाब जिंदा नहीं पकड़ा जाता तो कांग्रेस पार्टी उसे भी ”भगवा आतंक’’ का मामला बता देती। दरअसल इंटरनेट ह्विसिलब्लोअर संगठन विकीलीक्स ने अमेरिकी दूतावास के केबल का खुलासा किया जिसमें भारत में तत्कालीन अमेरिकी राजदूत को एक वरिष्ठ भारतीय मंत्री ने बताया था कि 2008 में मुंबई हमले में मारे गए वरिष्ठ आतंकरोधी जांचकर्ता हेमंत करकरे की हत्या की साजिश किसी तरह हिंदू कट्टरवादियों ने रची थी क्योंकि वे ‘भगवा आतंक’ की पड़ताल में लगे थे। संयोगवश, राहुल गांधी ने अमेरिकी कूटनयिकों से कहा था कि भारत में असली खतरा ”हिंदू आतंक’’ का है।

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अहम यह है कि कांग्रेस के 2009 में राजस्थान और हरियाणा चुनाव जीतने के साथ यह रणनीति पूरे शबाब पर पहुंच गई। उस समय केंद्र में ही नहीं, राजस्थान, हरियाणा, आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र में भी कांग्रेस की सरकारें थीं। इन्हीं राज्यों में उपर बताई गई आतंकी घटनाओं की ”पुनर्जांच’’ चल रही थी और इनमें ”हिंदू आतंकियों’’ का हाथ बताया जा रहा था। इनमें पहले प्रतिबंधित मुस्लिम संगठन सीमी के सदस्य पगड़े गए थे। लेकिन नए घटनाक्रम से इशरत जहां के मामले को जोडऩा आसान हो गया।

यह सब शुरू हुआ समझौता एक्सप्रेस धमाके से। बता दें कि दिल्ली और लाहौर के बीच हफ्ते में दो बार जाने वाली समझौता एक्सप्रेस में 18 फरवरी 2007 को आधी रात के आसपास धमाका हुआ। गाड़ी जैसे ही पानीपत के पास दिवाना स्टेशन से आगे बढ़ी दो बोगियों में धमाके हुए। दोनों में यात्री भरे हुए थे। धमाके से लगी आग में 68 लोग मारे गए और दर्जनों घायल हो गए। इन धमाकों के एक दिन बाद ही पाकिस्तानी विदेश मंत्री खुर्शीद अहमद कसूरी नई दिल्ली में शांति वार्ता की बहाली की बातचीत करने आने वाले थे।

शुरुआती पड़ताल में धमाके का संदेह लश्करे तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद (पाकिस्तान का एक और आतंकी गुट) पर था। दोनों पहले भी धमाके करने के लिए जाने जाते थे। अहम यह भी था कि अमेरिकी ट्रेजरी और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने 1 जुलाई 2009 को लश्कर पर पाबंदियां लगा दीं और किसी आरिफ कसमानी को धमाके की साजिश रचने का दोषी बताया। लेकिन अचानक 2008 में महाराष्ट्र आरतंकरोधी दस्ते (एटीएस) के पुलिस अफसर हेमंत करकरे एक शगूफ लेकर आए कि लेफ्टिनेंट कर्नल प्रसाद पुरोहित ने उस आरडीएक्स की सप्लाई की थी जो समझौता एक्सप्रेस में धमाके में इस्तेमाल किया गया था। उनके मुताबिक पुरोहित ”हिंदू आतंकी संगठन’’ अभिनव भारत के प्रमुख सदस्य थे।

उसके फौरन बाद राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआइए) ने, जिसे मनमोहन सिंह सरकार ने 26/11 हमलों के बाद आतंकरोधी केंद्रीय एजेंसी की तरह बनाया था, पंकुला की अदालत में पांच लोगों नबकुमार सरकार उर्फ स्वामी असीमानंद, सुनील जोशी (अब मृत), लोकेश शर्मा, संदीप डांगे उर्फ परमानंद और रामचंद्र कलसंागर उर्फ रामजी उर्फ विष्णु पटेल के खिलाफ आरोप-पत्र दाखिल कर दिया। इसका समय इसलिए गौर करने लायक है क्योंकि अगले ही दिन विदेश सचिव निरूपमा राव पाकिस्तान रवाना हुई, ताकि दोनों देशों के विदेश मंत्रियों के बीच बातचीत का रास्ता साफ हो सके। पाकिस्तान के मुंबई हमले पर कोई कार्रवाई न करने से बातचीत अटकी हुई थी। राव की यात्रा के एक दिन पहले ”हिंदू आतंकियों’’ के खिलाफ आरो-पत्र दाखिल करके मनमोहन सिंह सरकार ने पाकिस्तान को दोनों घटनाओं में एक सूत्र पिरोने का आधार तैयार कर दिया। जैसा कि सुरक्षा विशेषज्ञ दिवंगत बी. रमन ने बताया था कि मनमोहन सिंह सरकार समझौता एक्सप्रेस पर पाकिस्तान के दबाव में आकर 26/11 पर उसे राहत देने का मौका दे बैठे।

जैसा कि पहले ही बताया गया कि खासकर 2009 के चुनावों के दौरान मुंबई हमले पर जनता की नाराजगी कम करने के लिए ”भगवा आतंक’’ का सिद्धांत गढ़ा गया। इसी के आधार पर वह प्रस्तावित विधेयक लाने की बातें हुई जिसमें हिंदुओं को सांप्रदायिक बताया जा रहा था और आरोप लगाने के बाद बेकसूर होने की जिम्मेदारी उन्हीं पर डाली जा रही थी, जो न्याय सिद्धांत के बिलकुल विपरीत है।

आत्मनिरिक्षण करने पर यूपीए सरकार की यह हिंदू विरोधी मानसिकता विचित्र लगती है। असल में अपने बहुमत और इतिहास के कटु अनुभवों के बावजूद हिंदुओं को गैर-हिंदू प्रधानमंत्री और गैर-हिंदू कांग्रेस मुखिया से कोई समस्या नहीं थी। मनमोहन सिंह जब 2004 में पहली बार जब प्रधानमंत्री बने तो उन्हें शपथ भी एक गैर-हिंदू राष्ट्रपति ने दिलाई थी। इसी से हिंदुओं की सेकुलर सोच का पता चलता है। यह वाकई संदेह का विषय है कि पश्चिमी लोकतंत्रों में क्या कभी कोई हिंदू या गैर-ईसाई सर्वोच्च राजनैतिक पद पर पहुंच सकता है।

लेकिन ऐसा लगता है कि मोदी के राज में भी कुछ नहीं बदला है। उनकी सरकार नेहरूवाद के हिंदू विरोधी रुझान को बदलने में नाकाम रही है। यह रुझान हिंदू समाज को बांटने, उसकी सभ्यता-संस्कृति को नीचा दिखाने, उसे अपमानित करने पर आमादा है। इसे इस तरह समझें कि जब तक नेहरूवाद भारत के शासक वर्ग का सिद्धांत बना रहेगा, वह हर तरह से हिंदुओं को बांटने और वोट बैंक की राजनीति से उसकी ताकत कमजोर करने की कोशिश करता रहेगा।

प्रकाश नंदा

 

 

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