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भारत को श्रेष्ठ बनाने में गुरू गोविन्द सिंह जी की भूमिका

भारत को श्रेष्ठ बनाने में गुरू गोविन्द सिंह जी की भूमिका

श्री गुरू गोबिन्द सिंह जी महराज को भारत के सर्वगुरू के रूप में सभी मानते एवं जानते हैं। भारत का बच्चा-बच्चा गुरू गोबिंद सिंह जी महराज को अपना आर्दश एवं सर्वगुरू मानता है। हमारे देश के विद्वान लोग उतना गुरू महराज को जानते या समझते नहीं हैं जितना कि इस देश का बच्चा-बच्चा जानता,मानता और समझता है। देश के विद्वान लोगों से गुरू महराज के जीवन से जुड़ी बातों, घटनाओं व इनके द्वारा कही गयी अमृतवाणियों के बारे में पूछोगे तो वे उतना नहीं बता पायेंगे पर इस देश का बच्चा-बच्चा से पूछोगे तो इन विद्वानों से ज्यादा 10 वें गुरू गोङ्क्षबद सिंह महराज के बारे में आपको बता देगा। ज्यादा विस्तार से तो बच्चें नहीं जानते पर जानते जरूर हैं। यह बात देश की सभी जगहों पर एक समान सत्य है। गुरू महराज की सर्वव्यापिता देश में सर्वत्र है। मोहन भागवत ने कहा कि जब मैं तमिलनाडु जाता हूं तो यह देखता हूं कि वहां बच्चों के नाम महापुरूषों के नाम पर रखने का प्रचलन है। जैसे कि एस. सुब्रमण्यिम, सुभाष चन्द्र बोस आदि ठीक ऐसे ही गुरू गोविंद सिह जी के नाम से भी कई लोगों ने वहां पर अपने बच्चों का नाम रख रखा है। ऐसा क्यों है? किसी भी विषय के बारे में ठीक से जानने के लिए अध्ययन करना पड़ता है और हमें करना भी चाहिए। तब जाकर ही हम किसी भी विषय में गहरी जानकारी हासिल कर सकते हैं। भारत देश को बाहर में भारत  की अपनी संस्कृति अपनी परंपराओं के प्रति अटूट प्रतिबद्धताओं के चलते और देशों से अलग देशों क े तौर पर जाना जाता है। हमारा देश भारत क्या है, कैसा है और भविष्य में इसका क्या योगदान पूरी दुनिया के प्रति रहेगा, इन सारी बातों से परिचय सर्वप्रथम सारी दुनिया से कराने का श्रेय स्वामी विवेकानंद को जाता है। स्वामी विवेकानंद पहली विदेश यात्रा से जब लौटें तो भारत में उनका जोरदार स्वागत किया गया। इसका कारण था स्वामी जी द्वारा अमेरिका के शिकागो में विश्व धर्म सम्मेलन में भारत देश की संस्कृति, धार्मिक आस्था, परिवारों के बीच अटूट प्यार, समाज में सभी धर्मों के लिए एक दूसरे के प्रति सम्मान, वेद-वेदांत के बारे में जब पूरी गहराई के साथ दुनिया को परिचय कराया तो सारी दुनिया स्वामी जी के चरणों में नतमस्तक हो गयी थी। वापस अपने देश लौटने पर स्वामी जी का जगह-जगह जोरदार स्वागत किया गया,इसके बाद उन्होंने पूरे देश की यात्रा की। स्वामी विवेकानंद ने लाहौर में चार धार्मिक सम्मेलनों को संबोधित किया, जिसमें स्वामी जी ने चार विषयों – वेद, वेदांत, भारत का भविष्य व आगे भारत को क्या करना चाहिए आदि चार विषयों पर भाषण दिया। लाहौर के बाद पंजाब और कई दूसरी जगहों पर भी स्वामी जी ने खासकर युवकों को संबोधित करते हुए बोला कि यदि हमें भारत देश को विश्व गुरू बनाना है, आगे बढाना है तो हम लोगों को गुरू गोविंद सिंह के जैसा बनना होगा। इनकी बतायी हुई रास्तों पर, इनके आदर्शों पर चलकर ही हम भारत को विश्व गुरू बना सकते हैं। केवल लाहौर व पंजाब ही नहीं बल्कि देश के कई अन्य हिस्सों में भी अपने भाषणों में स्वामी जी ने नवयुवकों को संबोधित करते हुए बोलते थें कि आपलोगों को सिखों के 10 वें गुरू गोविंद सिंह के  जैसा बनना होगा तब जाकर ही हम अपने भारत देश को विश्व में सबसे उंचे स्थान पर विराजमान कर सकने में कामयाब हो पायेंगे। गुरू गोविंद सिंह जी के बाद कितनी पीढी-दर-पीढी आई और चली गई परंतु इतना समय गुजरने के बावजूद आज भी गुरू गोविंद सिंह जी के आदर्शों को मानने वाले करोड़ो लोग केवल सिख धर्म में ही नहीं बल्कि दूसरे दूसरे धर्मों में भी लाखों-करोड़ो मानने वाले हैं और इन सबका कारण गुरू गोविंद सिंह जी की बताई, उनके आदर्शों को लोग पहले भी उतना ही मानते थे और आज भी उनके आदर्श लोगों के जेहन में जिंदा हैं। और इसी लोकप्रियता के कारण हमारे देश का बच्चा-बच्चा गुरू गोविंद सिंह जी महाराज को सर्वगुरू के रूप में अपना आर्दश मानता है। सिख धर्म के संस्थापक और सिखों के प्रथम गुरू गुरूनानक जी ने जो परंपरा आदर्श संस्कृति अपने पंथ सिखों में कायम की उस परंपरा को सिखों के 10 वें और अंतिम गुरू गोविंद सिंह जी ने बढाने के साथ-साथ उसके मूल्यों को विश्वस्तरीय पहचान दिलायी। गुरू गोविंद सिंह जी त्याग व बलिदान के प्रतीक थे।

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अपना सबकुछ त्याग कर देश समाज की सेवा के लिए इन्होंने अपना संपूर्ण जीवन लगा दिया। ये जो परंपरा चली देश को बाहरी हमलावरों खासकर मुगलों से अपनी देश की संपति संस्कृति व सता को बचाने की वो गुरूनानक देव से लेकर गुरू अर्जुन देव सिंह जी से लेकर छठे गुरू हरगोविंद सिंह जी महाराज ने पूरी वीरता के साथ संघर्ष किया जिसे अंतिम दम तक 10 वें गुरू गोविंद सिंह जी ने पूरा किया। 1898 के बाद बंगाल में गर्मी के दिनों में छत पर टहलते हुए स्वामी विवेकानंद ने अपने शिष्यों को बताया कि फिर से यदि हमें भारत के पुराने गौरव व वैभव को पाना है तो हमें गुरू गोविंद सिंह के जैसा बनना होगा। गुरू गोविंद सिंह जी के आदर्शों पर चलने उनके जैसा बनने पर ही हम अपनी देश की पुरानी गौरवशाली सांस्कृतिक परंपरा को वापस पा सकते हैं। समाज में भेद न करते हुए हम सभी को इंसानियत व मानवता की परंपरा के अनुसार धर्म व जाति में भेद न करते हुए स्नेह भाईचारा के साथ रहें। स्वामी विवेकानंद जो कि नवयुवकों के सर्वश्रेष्ठ आदर्श के रूप में आज भी मनोमस्तिष्क में विराजमान हैं, वो स्वामी जी भी अपने आदर्श के रूप में युवकों अपने शिष्यों को हमेशा गुरू गोविंद सिंह जी के जैसा बनने का सुझाव देते थे। गुरू गोविंद सिंह जी के राष्ट्र के प्रति असाधारण बलिदान, उनके द्वारा बाहरी आक्रमणकारियों से पूरी बहादुरी के साथ लड़कर अपनी राष्ट्र की संपति,सता, मां-बहनों की आबरू की रक्षा करना व मानवता के सामने उच्च कोटि के आदर्श स्थापित करने के लिए स्वामी विवेकानंद अपने सभी धार्मिक भाषणों में प्राय: इनके उच्च आदर्शों के तौर पर गुरू महाराज जी का नाम लिया करते थे। धर्म-देश की रक्षा के लिए गुरू गोविंद सिंह जी महाराज ने अपना सबकुछ दान कर दिया, कुछ भी अपना नहीं रखा। गुरू महाराज ने अपनी सारी संपति अपने पिताजी व पुत्रों में दान कर दी, यहां तक कि अपनी किर्ती वाणी व प्रतिष्ठा भी अपनी नहीं रखी। सबकुछ धर्म व राष्ट्र की सुरक्षा के लिए दूसरों में दान कर दिया। 1857 के बाद भारत धीरे-धीरे पुर्नजागरण के दौर से गुजर कर एक नए विकास के पथ पर अग्रसर हुआ। इसी काल के बाद हमारा देश अपने अधिकारों के प्रति ज्यादा सचेत होकर अपनी सांस्कृतिक विरासत के लिए पश्चिमी आक्रमण के खिलाफ जोरदार आंदोलन का बगुल फंूक दिया। मुगल सल्तनत जाने के बहुत समय के बाद तक खालसा पंथ व खालसा गांव के अगल-बगल बसने वाले कई गांवों की सुरक्षा के ऐसे कवच का निर्माण गुरू गोविंद सिंह महाराज ने किया जिसे तोडऩे की साहस फिर कोई नहीं कर पाया। सिकंदर का आक्रमण हो या फिर मुगलों के द्वारा किया गया आक्रमण हो या पश्चिमा आक्रमण, इन सबका मकसद यही था भारत देश की अमूल्य सांस्कृतिक विरासत को छिन्न-भिन्न करके संपति सता व प्रतिष्ठा को लूट कर गुलाम बनाना। इनके नापाक इरादों को गुरू गोविंद सिंह जी महाराज ने अपनी बुद्धिमानी व वीरतापूर्वक राष्ट्र को यह समझाया कि पहले हमसब एक राष्ट्र एक भाई के नाते हम भी सही-तुम भी सही के अनुसार मिलकर चलें, तब ही हम अपने राष्ट्र की अनेकता में एकता की गौरवशाली परंपरा को कायम रख पाने में कामयाब हो पायेंगे।

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गुरू तेगबहादुर महाराज ने हिंद की चादर बनकर अपना शीश देकर अपने राष्ट्र की सांस्कृतिक वैभव की रक्षा की थी। ऐसा बलिदान शायद ही आपको कहीं और देखने को मिले। ऐसा सिर्फ अपनी मातृभूमि के लिए प्राण न्यौछावर करने का अभूतपूर्व उदाहरण हमारे देश में ही देखने को मिलेगा और कहीं नहीं। अभी जो यह कार्यक्रम यहां तालकटोरा स्टेडियम में हो रहा है यदि यही कार्यक्रम 1950 से पहले इसी तालकटोरा में होता तो उस समय की वेशभूषा कुछ और होती और आज कुछ और है। उस समय के लोग अपने समय के अनुसार वेशभूषा धारण करते थे और आज जो उस समय के लोग अभी जिंदा हैं वे लोग आज के इस समय की वेशभूषा धारण कर रहे हैं। इसका मतलब यह हुआ कि आदमी नहीं बदला बल्कि परिस्थिति के अनुसार लोगों को अपना रूप बदलना पड़ा। यह जरूरी भी है, क्योंकि यदि हम समय के अनुसार नहीं बदले तो हम दूसरे आगे बढ रहे राष्ट्रों से पिछड़ जाएंगे। हमें समय की मांग के अनुसार खुद में बदलाव लाना होगा परंतु अपने भारत देश की गौरवशाली सास्ंकृतिक परंपरा को कायम रखते हुए ही ऐसा करना होगा। यही अंतर हमें और राष्ट्रों से अलग स्थान दिलाता है। ऐसा सिर्फ हम तभी कर सकते हैं जब हम गुरू गोविंद सिंह जी महाराज के आदर्शो पर कुछ कदम चल पाने में भी कामयाब हो सके तो ही हम एक बार फिर से अपनी खोई हुयी वैभवशाली सांस्कृतिक धरोहर को पाने में कामयाब हो पायेंगे। जो बोले सो निहाल सत्य श्री काल।

(यह लेख श्री मोहन भागवत के द्वारा श्री गुरू गोबिंद सिंह जी के 350 वें प्रकाश वर्ष पर दिल्ली में आयोजित विशेष समागम पर दिये गए भाषण पर आधारित है)

मोहन भागवत

 

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