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फिल्म पद्मावती: जी का जंजाल

फिल्म पद्मावती: जी का जंजाल

ऐतिहासिक चित्तौडग़ढ़ में वर्ष 1967 का एक दृष्य। उदयपुर में सम्पन्न एक शिविर से लौट रहे युवाओं की टोली दुर्ग स्थित जौहर स्थल का अवलोकन कर रही है। युवाओं ने जौहर स्थल की राख अपने माथे पर लगाई और यह टोली में शामिल यह लेखक मु_ीभर राख अपने साथ ले आया। वर्ष 1958-59 मे विजय स्तम्भ के निकट जौहर के सबूत जुटाने के लिए की गई खुदाई में राख हड्डियां तथा चूडिय़ां मिलने पर राज्य के पुरातत्व विभाग ने इसे जौहर स्थली घोषित किया। खुदाई के समय परिसर स्थित प्राचीन सिद्धेष्वर महादेव मन्दिर लगभग पन्द्रह फ ीट मिट्टी से दबा हुआ था। वरिष्ठ फोटोग्राफर और दुर्ग में गाइड के. के. शर्मा के अनुसार उनके स्वर्गीय पिता बंशीधर शर्मा ने सबूत जुटाने सम्बन्धी प्रक्रिया के आधिकारिक फोटो लिए थे। वह मन्दिर में सेवा पूजा करते थे।

जौहर स्मृति संस्थान चित्तौडग़ढ़ के महामंत्री भंवर सिंह, कोषाध्यक्ष नरपत सिंह भाटी ने उदय इंडिया को बताया कि वर्ष 1948 से जौहर स्थल पर चैत्र कृष्णा एकादशी (मार्च अप्रैल माह में तिथि के अनुसार) के दिन श्रद्धांजलि सभा का आयोजन किया जाता रहा। यह तिथि मुगल शासक अकबर के समय रानी फूल कंवर की अगुवाई में दुर्ग में हुए तीसरे व अंतिम जौहर की स्मृति में निर्धारित की गई। इससे पहले अलाउदीन खिलजी के आक्रमण के समय रानी पद्मिनी तथा गुजरात के शासक बहादुरशाह के हमले के वक्त राजमाता कर्णवती के नेतृत्व में क्षत्राणियों ने जौहर किया था। वर्ष 1983 में ठाकुर उम्मेद सिंह राठौड़ की अध्यक्षता में जौहर स्मृति संस्थान चित्तौडग़ढ़ की स्थापना की गई। उदयपुर के महाराणा स्व.भगवत सिंह संस्थान के संरक्षक थे। तब से जौहर स्थल पर निर्मित हवन कुण्ड में आहुतियों के साथ बड़े पैमाने पर जौहर मेले का आयोजन किया जा रहा है। पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय चन्द्रशेखर, लालकृष्ण आडवाणी, भैरोसिंह शेखावत, प्रतिभा पाटिल, राजनाथ सिंह, अशोक गहलोत, वसुंधरा राजे इत्यादि हस्तियां जौहर मेले में शामिल होती रही है। चित्तौडग़ढ़ के विधायक रहे नरपतसिंह राजवी के प्रयास से संस्थान को उपलब्ध कराये गये भूखण्ड पर जौहर भवन बनाया गया। दुर्ग के नीचे गांधी नगर इलाके में स्थित इस भवन में निर्मित मन्दिर में तीनो जौहर नेत्रियों की प्रतिमा के समक्ष 2002 से अखण्ड ज्योति जल रही है। संस्थान में कन्या छात्रावास पुस्तकालय भी बनाया गया है।

दूसरा दृश्य-फिल्मकार संजय लीला भंसाली की रिलीज होने वाली बहुचर्चित फिल्म पद्मावती के खिलाफ देशव्यापी उग्र विरोध के चलते 17 नवम्बर को चित्तौडग़ढ़ दुर्ग के सात प्रवेश द्वारों में प्रथम द्वार पाडनपोल को सुबह आठ बजे से शाम पांच बजे तक बंद करके किलाबंदी की गई। वहां गत नौ नवम्बर से सर्व समाज का धरना प्रदर्शन का क्रम जारी है। सांकेतिक रूप से दुर्ग का द्वार बंद किये जाने के कारण शुक्रवार को चित्तौडग़ढ़ आने वाली शाही ट्रेन पैलेस ऑन व्हील्स को सीधे उदयपुर ले जाया गया। दिल्ली के सुल्तान अलाउदीन खिलजी ने सात सौ बरस पहले 1303 में इसी चित्तौडग़ढ़ दुर्ग की लगभग आठ माह तक घेराबंदी की थी। वह चित्तौडग़ढ़ दुर्ग का अष्टधातु द्वार अपने साथ दिल्ली ले गया था। पूर्वी राजस्थान के सिंहद्वार भरतपुर के संस्थापक पराक्रमी योद्वा महाराजा सूरजमल के यशस्वी पुत्र जवाहर सिंह ने दिल्ली पर चढ़ाई के दौरान लालकिले पर लगाये इस अष्ट धातु द्वार को भरतपुर लाकर इस अपमान का बदला लिया। यह द्वार लोहागढ़ दुर्ग के उत्तरी द्वार पर लगाया गया। चित्तौडग़ढ़ के बाद 18 नवम्बर को कुम्भलगढ़ का प्रवेश द्वार भी बंद रखा गया।

अपने अप्रतिम सौंदर्य की प्रतीक चित्तौडग़ढ़ की महारानी पद्मिनी महाराणा रतन सिंह और सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी के चरित्र चित्रण के आधार पर बनी फिल्म पद्मावती शुरू से ही विवादो के घेरे मे आ गई। जयपुर की पुरानी राजधानी आमेर के महलो में वर्ष 2017 के शुरू में फिल्म की शूटिंग के दौरान ही विरोध का सिलसिला शुरू हो गया। राजपूत करणी सेना के संस्थापक संरक्षक लोकेन्द्र सिंह कालवी की रहनुमाई में शूटिंग के कड़े विरोध के बीच फिल्मकार भंसाली से बदसलूकी की गई। शूटिंग बंद होने के बाद तीस जनवरी को दोनो पक्षो में लिखित समझौते में राजपूत समाज को विश्वास में लेकर फिल्म चलाने की बात कही गई थी। भंसाली ने कोल्हापुर में फिल्म का सेट लगाकर शूटिंग की। इस सेट को भी तोड़ा गया। कई बाधाओं के बावजूद फिल्म पूरी की गई और इसके साथ ही युद्व स्तर पर फिल्म के प्रचार प्रसार का सिलसिला शुरू हुआ। फिल्म के गीत यू टयूब प्रोमो पोस्टर जारी करने के साथ फिल्म का ट्रेलर सिनेमाघरो में दिखाये जाने पर विरोध प्रदर्शन में तेजी आ गई। राजपूत समाज और करणी सेना ने फिल्मकार भंसाली पर वायदा खिलाफी का आरोप लगाते हुए विरोध का झंडा बुलंद किया। कोटा मे एक सिनेमाघर में तोड़ फोड़ की गई तो बीकानेर में एक सिनेमाघर संचालक ने फिल्म के कथित विवादास्पद दृश्यों को हटाये जाने पर फिल्म दिखाने की घोषणा कर दी। विरोध प्रदर्शन मे समाज के सभी वर्गो की साझेदारी से इसके विस्तार तथा मीडिया की सक्रियता से आंदोलन ने देशव्यापी रूप ले लिया।

राजस्थान के राजघराने एक जुट होकर फिल्म के विरोध में आ गये। जयपुर की राजकुमारी और भाजपा विधायक दीया कुमारी ने फिल्म के विवादास्पद दृश्यों को हटाये जाने के विरोध मे हस्ताक्षर अभियान की शुरूआत की गई। जयपुर के पूर्व राजपरिवार की प्रमुख पद्मिनी देवी ने करणी सेना के राष्ट्रीय अध्यक्ष महिपाल सिंह मकराना के साथ प्रेस कांफ्रेंस में स्पष्ट चेतावनी दी कि वायदे के मुताबिक इस फिल्म को रिलीज करने से पहले समाज के प्रतिनिधियों को दिखाया जाये। फिल्म में ऐतिहासिक तथ्यों से छेड़छाड़ किये जाने पर इस फिल्म को राजस्थान में प्रदर्शित नहीं होने दिया जायेगा। फिल्म पर रोक की मांग के साथ तीस नवम्बर को राजस्थान बंद तथा फिल्म रिलीज होने की प्रस्तावित तिथि एक दिसम्बर को भारत बंद की चेतावनी दी गई थी। अब चूंकि सैंसर बोर्ड द्वारा तकनीकी कारणों से फिल्म को वापिस किये जाने की सूरत में बंद के आहवान की आवश्यकता नही होगी।

फिल्म पदमावती के तीन प्रमुख पात्र है। हमलावर अलाउदीन खिलजी, मेवाड़ चित्तौडग़ढ़ के महाराणा रतन सिंह और उनकी रानी पद्मिनी। ऐतिहासिक तथ्यों के अनुसार अलाउदीन खिलजी ने जनवरी 1303 में चित्तौडग़ढ़ पर आक्रमण किया था और अगस्त माह के आस-पास इस घटनाक्रम का पटाक्षेप हुआ। दिल्ली में खिलजी वंष के शासक जलालुद्दीन खिलजी ने सवाईमाधोपुर के रणंथम्भौर दुर्ग के शासक हम्मीर देव की बढ़ती हुई ताकत पर अंकुश के मकसद से दिल्ली से प्रयाण किया। किले की सुदृढ़ सुरक्षा व्यवस्था से भयभीत जलालुद्दीन 2 जून 1291 को वापिस लौट गया। जलालुद्दीन के भतीजे 24 वर्षाय अलाउदीन ने 1296 में चाचा को मारकर दिल्ली की गद्दी हथियायी और अपनी चचेरी बहन से निकाह किया। रणथम्भौर विजय करने के लिए अलाउदीन ने कई आक्रमण किये लेकिन उसे सफलता नही मिली। वर्ष 1300 में अंतिम आक्रमण में किले की घेराबंदी करते हुए उसने किले के भीतर रसद आने का मार्ग रोकने तथा हमीर के कुछ सेनानायकों को अपने साथ मिला लेने की रणनीति अपनायी। इस घटनाक्रम में किले में जौहर हुआ तथा हमीर ने 11 जुलाई 1301 को अपने आराध्य शिव को अपना सिर काटकर अर्पित किया और इतिहास में हमीर हठ के नाते प्रसिद्वि पायी। अलाउदीन खिलजी ने दो वर्ष बाद चित्तौडग़ढ़ की घेराबंदी में भी यही रणनीति अपनायी।

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मेवाड़ राजवंश के संस्थापक बप्पा रावल की चालीसवी पीढ़ी में राणा रतन सिंह चित्तौड़ की राजगद्दी पर बैठे। उनकी रानी पद्मिनी थी जिसके सौंदर्य का वर्णन एक दरबारी राघव चेतन ने अलाउद्दीन खिलजी से किया। चित्तौडग़ढ़ दुर्ग में अलाउद्दीन खिलजी को दर्पण में रानी पद्मिनी की छवि दिखाने के मिथक को लेकर अलग-अलग मत है। प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू की यात्रा के समय पद्मिनी महल में दर्पण लगाया गया था। इस कारण आने वाले वर्षो में दर्पण से छवि दिखाने का मिथक लोकप्रिय हो गया। आमेर महल में शूटिंग रूकवाने के घटनाक्रम के बाद किसी अज्ञात व्यक्ति द्वारा इस दर्पण को तोड़ दिया गया। राजपूत समाज का यह भी तर्क है कि अलाउदीन के हमले के समय दर्पण का प्रचलन नही था। करीब ढाई सौ वर्षो बाद जर्मनी में इसका प्रचलन शुरू हुआ। पद्मावती फिल्म में स्वप्न दृश्य के बढाने अलाउदीन खिलजी और रानी पद्मिनी के प्रणय प्रसंग तथा पर पुरूषों के समक्ष रानी के घूमर नृत्य एवं उनकी वेशभूषा से जुड़े संभावित दृश्यों को लेकर विशेषकर राजपूत समाज उद्धेलित हुआ। विरोध प्रदर्शन में सर्व समाज के जुडऩे से इसे राजस्थान की आन-बान-शान रानी पद्मिनी एवं क्षत्राणियों के जौहर बलिदान के साथ देश की अस्मिता के रूप में समझा गया है। इसके समर्थन में राजस्थान सहित विभिन्न राज्यो में विरोध प्रदर्शन जारी है।

इस विवादास्पद फिल्म को लेकर बॉलीवुड तथा राजपूत समाज सहित विभिन्न सामाजिक संास्कृतिक संगठन आमने सामने आ गये है। राजपूत समाज की महिलायें तलवारे लेकर सड़को पर उतरी। फिल्मी और सियासी सितारों के बीच तीखे शब्दो में बयानबाजी तेज होने के साथ मर्यादाये तार-तार हो रही है। फिल्म की नायिका दीपिका पादुकोण द्वारा हर हाल में फिल्म रिलीज किये जाने की टिप्पणी से बवाल मच गया है। अभिनेत्री की नाक और फिल्मकार संजय भंसाली की गर्दन काटने पर कई करोड़ रूपयो के नकद पुरस्कार देने और देशद्रोह का मुकदमा दर्ज करने सम्बन्धी बयान जारी किये जा रहे है। अत्यंत तीखी भाषा में कहा गया कि आन के लिए पुरखो ने सिर कटाये उस पर आंच नही आने देंगे वही राजनीतिक दलों के नेता भी इस दौड़ में पीछे नही है। भाजपा कांग्रेस नेताओं का कमोवेष एक ही स्वर है कि ऐतिहासिक तथ्यों के साथ कोई छेड़छाड़ नही हो तथा नारी सम्मान तथा अस्मिता की रक्षा की जानी चाहिए। इतिहासकार भी इसी मत के है। फिल्म निर्माण और इतिहास को लेकर बहस भी शुरू हो गई है। सेंसर बोर्ड के पूर्व चेयरमेन पहलाज निहलानी का कहना है कि किसी कल्पना के आधार पर फिल्मी पात्रों को गढा जाता है। इसलिए फिल्मे मनोरंजन के लिए बनाई जाती है इतिहास पढ़ाने के लिए नही। गीतकार जावेद अख्तर ने पद्मिनी को काल्पनिक बताकर नया विवाद छेडऩे के साथ कहा कि फिल्मों को इतिहास नहीं समझा जाये। जाने माने रंगकर्मी इप्टा के नेशनल चेयरमेन रणबीर सिंह का मानना है कि इतिहास के दृष्टिकोण से फिल्म गलत है। भंसाली ने इतिहास की अनदेखी कर दौ सौ वर्ष बाद सूफी कवि मलिक मोहम्मद जायसी की रचना पद्यावत के आधार पर फिल्म बनाई है जो पूरी तरह काल्पनिक है। इंडियन फिल्म एण्ड टेलीविजन डायरेक्टर्स एसोसियेशन के संयोजक अशोक पंडित ने फिल्म के विरोध को सांस्कृतिक आतंक की संज्ञा दी है। इस विवाद के लिए भाजपा के वरिष्ठ विधायक एवं दीनदयान वाहिनी के प्रदेष अध्यक्ष घनश्याम तिवारी ने राजस्थान सरकार को जिम्मेदार ठहराते हुए आरोप लगाया है कि इतिहास से छेड़छाड़ कर बोस्टन कंसलटिंग कम्पनी (फिल्म के वित्तीय संसाधन उपलब्ध कराने वाली संस्था) के जरिये पर्यटन विभाग के आधिकारिक ट्विटर एकाउंट पर रानी पद्मिनी को अलाउदीन खिलजी की प्रेमिका बताया था। प्रतिपक्ष के नेता रामेश्वर डूडी का कहना है कि रानी पद्मिनी राष्ट्रीय अस्मिता स्वाभिमान, शौर्य एवं बलिदान की प्रतीक है। राजस्थान मुस्लिम महासभा के प्रदेश अध्यक्ष अब्दुल सलाम सांखला, महासचिव एडवोकेट शकील अहमद ने फिल्म को सांप्रदायिक सद्भावना के लिए खतरा बताया है। उन्होने कहा कि फिल्म ट्रेलर देखने से लगता है कि इसका मुस्लिम किरदार क्रूर और दुर्दांत है जो परायी स्त्री को पाने के लिए सामाजिक मर्यादाओं का कत्ल करने पर अमादा है।

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इस बीच 16 नवम्बर की शाम पाकिस्तान से मोबाईल पर श्री राजपूत करणी सेना के संस्थापक संरक्षक लोकेन्द्र सिंह कालवी को फिल्म का विरोध करने पर जान से मारने की धमकी के मामले ने तूल पकड़ लिया है। एस ओ जी तथा आई बी को इस बारे में सूचित किया गया है। एस ओ जी ने पाकिस्तान से कॉल आने की पुष्टि की है। इस बारे में जांच जारी है। उधर, इस फिल्म के निर्माण में विदेशी पैसा लगाने के कयास भी लगाये गये है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सचिन पायलट ने केन्द्र व राज्य सरकार से फिल्म पर रोक लगाने की मांग की है। पूर्व विधानसभा अध्यक्ष दीपेन्द्र शेखावत ने तो इस मामले की उच्च स्तरीय न्यायिक जांच की बात कही है। उग्र विरोध प्रदर्शन तथा कानून व्यवस्था के बारे में गृहमंत्री गुलाब चंद कटारिया का कहना है कि पुलिस प्रशासन अपना काम कर रहा है। उदयपुर से निर्वाचित कटारिया का भी कहना है कि इतिहास से खिलवाड़ नही हो। विरोध में प्राप्त ज्ञापनों पर सम्बन्धित विभाग द्वारा आवश्यक कार्यवाही की गई है। पदमावती राजपूत ही नही सभी समाजों के लिए गौरव का विषय है। फिल्म को सेंसर बोर्ड से बाहर आने पर ही कुछ कहा जा सकेगा। विरोधकर्ता कानून हाथ में नही ले। राजस्थान के मुख्य सचिव अषोक जैन ने भी वरिष्ठ अधिकारियों के साथ बैठक कर समीक्षा की। फिल्म को लेकर उच्चतम न्यायालय में भी सुनवाई होनी है। गौरतलब है कि दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल के जीवन पर बनी डाक्यूमेंट्री फिल्म मामले की सुनवाई में उच्चतम न्यायालय ने यह टिप्पणी की कि फिल्मकारो एवं लेखकों को अपनी बात कहने का अधिकार है। कलाकारों के अभिव्यक्ति की आजादी पर लगाम नही लगायी जा सकती।

इस बीच एक चैनल के प्रमुख ने वरिष्ठ पत्रकार वेद प्रताप वैदिक के साथ फिल्म पदमावती का अवलोकन कर यह दावा किया है कि फिल्म के बारे में फैलाई गई अफवाहे निराधार है। फिल्म में पदमावती का विलक्षण बुद्धि की धनी के नाते चित्रण किया गया है तो अलाउदीन खिलजी को धूर्त व कपटी बताया गया है जिसे देखकर दर्शक घृणा करने लगेंगे। वैदिक ने माना कि फिल्म पदमावती को लेकर गुजरात चुनाव की राजनीति में भाजपा विरोधी वातावरण बनाने का भी प्रयास किया गया है। यह फिल्म आशंका और जनरोष का प्रतीक बन गई है। यह भी जनधारणा है कि विरोध के कई लोकतांत्रिक तरीके है जिन्हे सहज रूप से अपनाया जा सकता है।

फिल्म को विवादास्पद बनाकर दर्शको में फिल्म देखने की उत्कंठा बढ़ाने का भी प्रयास माना गया है। राजपूत समुदाय का यह मानना है कि फिल्मकार भंसाली की नियत ठीक नही थी। वह समझौते की शर्तो पर कायम रहते तो विरोध की यह नौबत नही आती। रानी पद्मिनी किसी जाति विशेष की नही पूरे देश की और विशेषकर महिला जगत की अस्मिता की प्रतीक है। यदि फिल्म में तथ्य गलत है तो उसमे सुधार किये जाने चाहिए। रानी पद्मिनी की पवित्रता का ध्यान रखते हुए फिल्म में कुछ ऐसा नही दर्शाया जाये जिससे यह महसूस हो कि इतिहास के साथ छेड़छाड़ की गई है। बहरहाल फिल्म को लेकर मचा बवाल तथा फिल्म रिलीज होने की नई तिथि को लेकर हालात क्या बनते है तब तक प्रतीक्षा करनी होगी।

 

जयपुर से गुलाब बत्रा

 

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