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सरकार, समाज और स्वच्छता

सरकार, समाज और स्वच्छता

11 नवम्बर को दिल्ली से पटना जा रहा था। हवाई अड्डे पर भी वही स्थिति थी जो कई दिनों से सारी दिल्ली और उसके आस-पास लोगों के ऊपर आकाश मार्ग से आकर छा गई थी। सोचा था पटना  जाने का अवसर कुछ राहत देगा। वहां उतरने पर लगभग वैसा ही दृश्य था जो लोगों की दिनचर्या को दिल्ली में अस्तव्यस्त किये हुए था। वहां भी कोहरा, धुंध, स्मोग, एलर्जी, सांस फूलना, जैसे शब्द भी लोगों के वार्तालाप में चिंताजनक स्वर में लगातार प्रस्फुटित हो रहे थे। संभव है कि आसमान में दृश्य उभरा है उसके कारण तथा संरचना में दोनों स्थानों में अंतर हो, मगर  सामान्य व्यक्ति को तो अपनी कठिनाई के दूर हो सकने में ही रूचि होती है, आरोप-प्रत्यारोप, सरकारों के बहाने, नियामक संस्थाओं के अनगिनत आदेश, इत्यादि की बहस में पडऩे के लिए उसके पास न तो समय होता है, न ही  उस ओर ध्यान देता है। पटना में प्रोफेसर मुरारीलाल भी पहले से उपस्थित थे।  उन्होंने याद दिलाया कि दिल्ली में डीजल की बसें बंद करानें के लिए सर्वोच्य न्यायालय को कितनी सख्ती करनी पड़ी थी, सरकार हर प्रकार से ताल-मटोल कर रही थी मगर अंतत उसे झुकना पड़ा। भारतीय राजनीति की यह बलिहारी है कि अगले चुनावों में सत्तासीन राजनीतिक दल के नेताओं नें सारा श्रेय स्वयं को आवंटित कर लोगों को अपनी और आकर्षित करनें में कोई कोताही नहीं की!  अगर उस समय से आगे आने वाली परिस्थितियों की संकल्पना कर ली गई होती तो आज यह स्थिति नहीं होती। मैंने उन्हें याद दिलाया कि 1916 में बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी के स्थापना समारोह में मोहनदास करमचंद गांधी ने – जो 1915 में दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटे थे- एक ऐतिहासिक भाषण दिया था। उन्होंने काशी विश्वनाथ मंदिर के आसपास की स्थिति वर्णित की थी, क्या हमारे मंदिर और उसके आस-पास स्वच्छता की ऐसी स्थित  होनी चाहिए जो उन्होंने वहां पहली बार देखी थी? उन्होंने प्रश्न उठाया कि क्या अंग्रेजों के जाने के बाद हम अपने मंदिरों को स्वच्छता, शांति तथा पवित्रता में आदर्श स्थान बना सकेंगे? यदि हमारे मंदिर स्वच्छता तथा खुलेपन के स्थान नहीं हैं तो क्या हम स्वशासन चलाने लायक है? उस भाषण में गांधी जी ने रेल यात्रा तथा उसमें यात्रियों द्वारा स्वच्छता को लगभग पूर्ण-रूपेण नकारना भी लोगों के समक्ष रखा था। आज 101 वर्ष बाद इन स्थितियों में कहीं कोई सुधार हुआ हो तो जानकार प्रसन्नता होगी, मगर स्वयं ऐसा देख देश भ्रमण में देख पाने का अवसर तो मिला नहीं है।

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मुरारीलाल जी ने बोझिल होते जा रहे वार्तालाप को सहज बनाते हुए कहा की दक्षिण भारत के मंदिरों में स्थिति सुधारी है। वहां पहले भी स्वच्छता की समझ संभवत: अधिक रही होगी। ऐसा नहीं है कि सुधार असंभव है मगर उसके लिए हर स्तर पर गहन इच्छाशक्ति, दृष्टि, तथा कर्मठता चाहिए। जम्मू में वैष्णो देवी परिसर में जो सुधार किये जा सके। वे आज भी सराहे जाते हैं, उनसे वहां जाने वाले यात्रियों तथा पर्यटकों की संख्या बढ़ी है, लोगों की आर्थिक स्थिति सुधरी है, और यह मथुरा, काशी, तथा अनेक अन्य स्थानों पर भी संभव होना चाहिए। इसका भी अध्ययन होना लाभकारी होगा  कि उत्तर भारत में ही मंदिरों की स्वच्छता पर इतना कम ध्यान क्यों दिया जाता है जबकि दक्षिण भारत के  मंदिरों में जाने पर अंतर स्पष्ट दिखाई देता है?  तिरुमाला-तिरुपति में जाने पर न तो अस्वच्छता मिलती है, न ही वहां वाहन चालकों, या पंडों और भिक्षा मांगने वालों के अनावश्यक दवाव को झेलना पड़ता है। आज एक सौ एक वर्ष बाद अस्वच्छता की समस्या भी इतनी जटिल इसलिए ही हुई है कि गांधी जी की स्वास्थ्य और स्वच्छता पर चिंतन को भी हमने वैसे ही नकार दिया जैसे उनके ग्राम स्वराज की अवधारणा को उनके जीवनकाल में ही उन्ही के शिष्यों ने अस्वीकार कर दिया था। मैंने इसमें जोड़ते हुए याद दिलाया कि सुधार तो हर शहर को स्वच्छ बनाने में भी संभव है यदि सरकार, अधिकारी  तथा समाज के लोग एकसाथ बैठकर निर्णय लें। अब तो यह परंपरा अब लगभग ठप्प हो गई है क्योंकि ऐसी हर बैठक में दलगत राजनीति के हावी हो जाने का कारण कोई ठोस परिणाम निकल ही नहीं पाता है। उन्होंने आगे कह कि फिर भी, अपवाद स्वरूप ही सही, आशाजनक उदाहरण मिल ही जाते हैं। सूरत के एक कर्मठ नगरपालिका अधिकारी नें समाज के सहयोग से उस शहर में सफाई की दिन-प्रतिदिन की एक सजग तथा समर्थ व्यवस्था की जिसकी प्रशंसा अक्सर सुनने में आती है। अगर यह दो सफल उदाहरण सामने हैं तो इन्हें प्रचारित और प्रसारित क्यों नहीं किया जा सकता है? मैंने उन्हें कहा कि दिल्ली के एक चर्चा-परिचर्चा के लिए जाने वाले केंद्र में जब इस पर चर्चा हो रही थी तो एक सेवानिवृत वरिष्ठ नौकरशाह नें मुझे कहा: प्रोफेसर साहेब, इस समय दिल्ली की समस्या स्वच्छता या कूड़े के ढेरों के कारण नहीं है। उसका कारण पंजाब और हरियाणा में पराली जलना है। इसके लिए किसान जिम्मेवार हैं? उनके अनुसार  कारों या वाहनों पर किसी प्रतिबन्ध की आवश्यकता नहीं है; ‘यह तो आज की दैनंदिन आवश्यकता है’! किसी सैद्धांतिक बहस में न पड़कर मैंने जानना चाहा कि क्या केवल किसान ही जिम्मेवार हैं, अधिकारी या सरकारें नहीं? समाचार पत्रों में खबर छपी थी कि केंद्र द्वारा पंजाब सरकार को दो सौ करोड़ की राशि आवनठित की गई थी ताकि उससे वे मशीनें खरीदी जाये जो किसानों को पराली जलाने के विकल्प के रूप में उसका उपयोग करनें में  सहायता करें। उस पैसे का उपयोग ही नहीं किया गया! बताया तो यह भी गया था कि इनका उपयोग कर किसान को अतिरिक्त आमदनी भी होगी और अगली फसल के कटने के पहले ही यह व्यवस्था पूरी तरह लागू कर दी जायेगी। फाइल शयद धूल फांकती रही, वह उसी प्रदूषण का शिकार हुई जो आज दिल्ली के आसपास लोगों की सांसों को जकडे हुए है। भारत की प्रशासन व्यवस्था अद्भुत है, मशीनें खरीदनें में देरी के लिए न तो कोई मंत्री जिम्मेवार माना जाएगा, न ही कोई अधिकारी! सभी निश्चिंत हैं। प्रोफेसर मुरारीलाल ने याद दिलाया इस प्रकार की हवा में सांस लेनें का सबसे घातक प्रभाव तो बच्चों पर पड़ता है, जिनमे सभी के बच्चे शामिल हैं। फिर हम इतने निष्क्रिय और संवेदनहीन क्यों हो गएं हैं? जबकि प्राचीन भारतीय संस्कृति में प्रकृति और मनुष्य के संबंधों की संवेदनशील कड़ी को बचाए रखने के मनुष्य के उत्तरदायित्व की पूरी समझ विकसित हो चुकी थी,  पशु, पक्षी, पेड़, पौधों,  वनस्पतियों तक में देवत्व देखा गया था, प्रकृति से उतना ही लेना था जितना मनुष्य के जीवन यापन के लिए आवश्यक था, उसका शोषण करना सोचा ही नहीं जा सकता था, न ही अकूत लाभ और लालच की पूर्ति के लिए प्रकृति पर अत्याचार किया जा सकता था। यह अपरिग्रह की  संस्कृति थी, अनावश्यक संग्रह की नहीं। हमनें अपनी भावी पीढिय़ों को अपनी संस्कृति और प्राचीन ज्ञानकोष से भी ‘सेकुलरिज्म’ की राजनीति-प्रेरित अवधारणा के नाम पर गीता  तथा शांति-मन्त्र तक में निहित सार्वभौमिक दर्शन से दूर रखा। पश्चिम की नकल करनें में हम अग्रणी माने जाते हैं लेकिन स्वच्छता ऐसा क्षेत्र है जिसमें हम पश्चिम के देशों की नकल नहीं करते हैं। इस क्षेत्र में हम न तो अपने ज्ञान और दर्शन का उपयोग कर रहे है और न पश्चिम के देशों का! दक्षिण अफ्रीका में प्लेग फैलाने के समय के  सम्बन्ध में गांधी जी नें जो लिखा था वह याद आया: ‘वहां रहनेवाले हिन्दुस्तानियों पर लगाए जाने वाले आइजक आरोप का, जिसमें कुछ तथ्य था, इलाज करने का काम मैंने वहां के अपने निवास काल में ही सोच लिया था। हिन्दुस्तानियों पर जब-तब यह आरोप लगाया जाता था कि वे अपने घरबार साफ नहीं रखते और बहुत गंदे रहते हैं।’ गांधी जी ने सबका सहयोग लेकर घर-घर जाकर लोगों को समझाया। वे इसमें सफल भी हुए। आज भारत में निष्क्रियता और उत्तरदायित्व-हीनता के कारण वातावरण, पर्यावरण, नदी तालाब, प्रदूषित हो रहे है, समाप्त हो रहें हैं, हम से प्रत्येक यह जानता है, मगर मान लेता है की यह किसी और की जिम्मेवारी है, मेरी नहीं!

अगले दिन हम दोनों पटना से बेगुसराय गए उस शहर में जगह-जगह पर कूड़े के ऐसे ढेर देखे जो साल छह महीने से केवल बढ़ते रहे होंगे, और शायद आगे भी में बढ़ते जायेंगे! ऐसा लगभग हर जिला स्तर पर देखा जाता है। आशा तो यही करनी चाहिए कि कुछ नौजवान समस्या के समाधान के लिए सहयोग की राह बनाकर उसे सफलता किके पथ में परिवर्तित कर देंगे।

जगमोहन सिंह राजपूत

 

 

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