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मुख, ह्दय व उदर रोग निवारक आयुर्वेदिक घटक मकोय

मुख, ह्दय व उदर रोग निवारक आयुर्वेदिक घटक मकोय

यह पौधा विश्व के उष्णकटिबंधीय तथा समशीतोष्ण क्षेत्रों के साथ समस्त श्रीलंका तथा भारत में 750 से 2100 मीटर की ऊंचाई तक सर्वत्र पाया जाता है। इसमें पूरे वर्ष पर्यन्त फूल और फल भेजे जा सकते हैं। आचार्य चरक काकमाची को शीतवीर्य एवं आचार्य सुश्रुत इसे उष्णवीर्य मानते हैं। चरकसंहिता में वातरक्त, अर्श, ऊरूस्तम्भ में काकमाची का शाक खाने से लाभदायक बताया गया है। किन्तु काकमाची का बासी शाक कभी न खाने का परामर्श भी है।

यह लगभग 0.30-1 मीटर ऊंचा, शाखा-प्रशाखायुक्त, वर्षायु, शाकीय पौधा होता है। इसका काण्ड सीधा, शाखित, किंचित् कोणयुक्त, ये हरे या बैगनी रंग की शाखाओं से युक्त होते हैं। इसके पत्र अनेक, सरल, 2.5-9 सेमी लम्बे, 2.5 सेमी व्यास के, लाल मिर्च के पत्तों के समान, अग्र भाग पर नुकीले तथा नुकीले तथा  हरित वर्ण के होते हैं। इसके पुष्प छोटे, श्वेत वर्ण के तथा फल वतुलाकार, छोटे, लगभग 5-8 मिमी. व्यास के, अपक्वास्था में हरे तथा पकने का रक्त, पीत तथा बैंगनी-कृष्ण वर्ण के सरस होते हैं जबकि बीज अनेक छोटे, चिकने, पीत वर्ण के तथा 1.5 मिमी. व्यास के होते हैं। इसका पुष्पकाल एवं फलकाल  वर्षपर्यन्त, पर मुख्यत: फरवरी से जुलाई तक होता है।

रासायनिक संघटन

इसके पत्र में प्रोटीन, वसा, खनिज, कार्बोहाइड्रेट्र, कैल्शियम, फॉस्फोरस, लौह, राईबोफ्लेबिन, निकोटिनिक अम्ल, विटामिन-सी तथा बिटा-कैरोटीन पाया जाता है। इसके फलों में चार स्टेरायडल ग्लाइको-अलकलायड, सोलामार्जिन, सोलासोडिन तथा ए और बी सोलोनाईग्रिन पाया जाता है। इसके पक्के फलों में ग्लूकोस तथा प्रक्टोस एवं बीजों में हरिताभ तैल पाया जाता है।

औघधीय प्रयोग मात्रा एवं विधि

शिरो रोग

केश कृष्णकरणार्थ- काकमाची बीज तैल को 1-2 बूंद (नस्य) नाक में डालने से बाल काले होते हैं।

नेत्र रोग-

पिल्ल रोग- काकमाची के फलों में घृत मिलाकर पिल्ल रोगी को धूपन देने से कृमियों का नाश हो पिल्ल का शमन होता है।

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कर्ण रोग

कर्णशूल- मकोय के पत्तों के किंचित् उष्ण स्वरस 2-2 बूंद कान में टपकाने से नासिका एवं कर्ण रोग में लाभ मिलता है।

मुख रोग

मुखपाक- काकमाची के 5-6 पत्तों को चबाने से मुख और जीभ के छाले मिटते हैं।

बालकों के दांत- काकमाची पत्र रस में घी या तेल समभाग मिलाकर मसूड़ों में मलने से बच्चों के दांत बिना कष्ट के निकल आते हैं।

वक्ष रोग

कास-श्वास- मकोय पुष्प एवं फल के क्वाथ (10-30 मिली) का सेवन कास, श्वसनिका शोथ आदि में लाभप्रद होता है। यह श्वास रोगियों की श्वास नलिका गत विकृत कफ को निकाल कर श्वास रोग में लाभ प्रदान करता है।

राज्यक्ष्मा- पके फल का मधु के साथ सेवन करने से राजयक्ष्मा (फेफड़ों की टी.बी.) में लाभ होता है।

हृदय रोग

हृदय रोग का जलोदर- मकोय के पत्ते, फल और डालियों का सत् निकालकर, 2 से 8 ग्राम तक की मात्रा में दिन में 2-3 बार देने से जलोदर और सब प्रकार के हृदय रोग मिटते हैं।

उदर रोग

वमन- मकोय के 10-15 मिली रस में 125-250 मिली ग्राम सुहागा मिलाकर पिलाने से उलटी बन्द होती है।

मंदाग्नि- मकोय के 20-30 मिली क्वाथ में 2 ग्राम पीपल का चूर्ण डालकर प्रात:- सायं भोजनोपरान्त पिलाने से मंदाग्नि मिटती है तथा आखों को धोने से नेत्र की ज्योति बढ़ती है।

यकृत्प्लीहा रोग

यकृत् वृद्धि- 10-15 मिली पंचांग स्वरस को नियमित रूप से पिलाने से यकृत-वृद्धि का शमन होता है। इसके लिए एक मिट्टी के बरतन में रस का रंग हरे से लाल या गुलाबी हो जाए। इसे रात को उबालकर, सुबह ठंडा कर प्रयोग में लाना चाहिये।

प्लीहा वृद्धि- 20-30 मिली मकोय क्वाथ में सेंधा नमक तथा जीरा मिलाकर पीने से प्लीहोदर में लाभ होता है।

कामला- 20-30 मिली मकोय क्वाथ में हल्दी का 2 से 5 ग्राम चूर्ण डाल कर पिलाने से कामला में लाभ होता है।

वृक्कवस्ति रोग

वृक्क विकार- 10-15 मिली मकोय अर्क को नित्य पिलाने से वृक्कशोध, वृक्कशूल आदि वृक्क विकारों का शमन होता है।

सर्वशरीर रोग

अनिद्रा- काकमाची की जड़ों से निर्मित 10-20 मिली क्वाथ में थोड़ा गुड़ मिलाकर  पिलाने से निद्रा आती है।

शोथ- मकोय फलो को पीसकर, सुखोष्ण करके लेप करने से सर्वांग शोथ में लाभ होता है।

त्वचा रोग

कुष्ठ- काकमाची (काली मकोय) की 20-30 ग्राम पत्तियों को पीसकर लेप लगाने से कुष्ठ रोग शमन होता है।

इसके अर्क की थोड़ी मात्रा देने से शरीर में बहुत दिनों के लाल चट्टे मिट जाते हैं।

विसर्प- काकमाची पत्र, शिरीष पुष्प तथा सम्भालू के पत्र कल्क में किंचित् धृत मिलाकर लेप करने से विसर्प में लाभ होता है।

त्वक् विकार- मकोय पत्रा स्वरस को लेप करने से जीर्ण त्वक् विकार, विचर्चिका, दाद, पामा, नासूर, तथा जीवाणुजन्य व्रण में लाभ होता है।

शीतपित- काकमाची स्वरस तथा शुंठी का कल्क बनाकर लेप करने से पिती रोग तथा चकतों में लाभ होता है।

व्रण- मकोय पत्र, पान पत्र तथा हल्दी से निर्मित कल्क का लेप करने से पुराने घाव, क्षतजन्यव्रण, रोमकूपशोध, पूययुक्त व्रण, पामा, परिपर्स, एन्थै्रक्स आदि में लाभ होता है।

व्रणशोथ- काकमाची पंचाग कल्क लेप करने से व्रणशोथ में लाभ होता है।

ज्वर रोग

ज्वर- इसके सरस फलों का प्रयोग ज्वर में हितकर होता है। पंचांग चूर्ण अथवा फाण्ट के सेवन से स्वेद का प्रचुर मात्रा में निर्हरण होकर ज्वर में शीघ्र लाभ प्राप्त होता है।

रसायन वाजीकरण

रसायन- मकोय पंचांग के क्वाथ (10-30 मिली) का सेवन गुड़, पिप्पली अथवा मरिच के साथ सेवन करने से अथवा मकोय स्वरस से पकाए हुए घृत का विधिवत् सेवन करने से रसायन गुण की प्राप्ति होती है।

विष चिकित्सा

मूषक विष- काकादनी तथा मकोय के स्वरस से पकाए हुए घृत का सेवन करने से तथा दंशस्थान पर लगाने से मूषकंदश जन्य विषाक्त प्रभावों का शमन होता है।

जलसंत्रास- मकोय के फलों एवं एवं पुष्पों के क्वाथ का सेवन जलसंत्रास में भी लाभप्रद होता है।

साभार: योग संदेश

आचार्य बालकृष्ण

 

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