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रिकार्डधारी फर्राटा धावक साहेब दो जून की रोटी को मोहताज आंखें नहीं पर बिहारी धावक बढ़ा रहा पश्चिम बंगाल का गौरव

रिकार्डधारी फर्राटा धावक साहेब दो जून की रोटी को मोहताज  आंखें नहीं पर बिहारी धावक बढ़ा रहा पश्चिम बंगाल का गौरव

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने नि:शक्तजनों को दिव्यांग नाम देकर बेशक सुर्खियों बटोर ली हों लेकिन नि:शक्त खिलाडयि़ों की पीर कम होने के बजाय लगातार बढ़ती ही जा रही है। पश्चिम बंगाल के नार्थ 24 परगना में अपनी बड़ी बहन सायदा खातून के घर रह रहे फर्राटा धावक साहेब हुसैन के आंखें नहीं हैं लेकिन वह राष्ट्रीय स्तर पर पदक दर पदक बटोर रहा है। बिहार के सीवान जिले के ओरमा नया टोला गांव में तीन फरवरी 1989 को फूल मोहम्मद-नजीफन बीवी के घर जन्मे साहेब हुसैन अपने माता-पिता की चौथी संतान है। साहेब के दो बड़ी बहन और एक बड़े भाई के अलावा एक छोटा भाई भी है। इनमें से किसी में भी खेलकूद के प्रति दिलचस्पी नहीं है लेकिन साहेब आंखों बिना दुनिया जीत लेना चाहता है। अंधत्व पर फतह हासिल कर चुका 28 साल का फर्राटा धावक साहेब हुसैन 100 मीटर दौड़ का राष्ट्रीय चैम्पियन और राष्ट्रीय कीर्तिमानधारी है। टी-12 कैटेगरी का यह धावक अब तक 100 और 200 मीटर दौड़ में राष्ट्रीय स्तर पर एक-दो नहीं बल्कि 28 स्वर्ण, 18 रजत और 34 कांस्य पदक जीत चुका है लेकिन मुस्लिमों की पैरोकार पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और क्रिकेटर से खेल मंत्री बने लक्ष्मीरतन शुक्ला लाख आश्वासनों के बाद भी अब तक इस धावक की एक पैसे की भी मदद नहीं किए हैं। साहेब हुसैन के पिता पश्चिम बंगाल में ही एक जूट मिल में काम करते थे, सो उनका परिवार वहीं बस गया लेकिन 2010 में नौकरी छूटने के बाद फूल मोहम्मद सीवान आ गये। खेलों में अभिरुचि के चलते अब साहेब हुसैन अपनी बड़ी बहन पर आश्रित है।

दो जून की रोटी और तंगहाली से जूझ रहे साहेब हुसैन की अब एकमात्र उम्मीद गो स्पोर्ट्स फाउण्डेशन बेंगलूरु है। यदि गो स्पोर्ट्स फाउण्डेशन बेंगलूरु की मदद साहेब हुसैन को मिल गई तो यह धावक टोक्यो पैरालम्पिक में भारतीय तिरंगा फहरा सकता है। 100 मीटर दौड़ का राष्ट्रीय कीर्तिमान (11.44 सेकेण्ड) साहेब हुसैन के ही नाम है। साहेब दुखी मन से कहता है कि वह देश के लिए दौडऩा चाहता है लेकिन पैसे के अभाव में उसकी सारी उम्मीदों पर पानी फिर रहा है। साहेब कहता है कि वह आर्थिक मदद के लिए हर उस चौखट पर गया जहां से उम्मीद थी लेकिन हर तरफ से उसे निराशा ही हाथ लगी है। इसी साल अप्रैल में जयपुर में हुए पैरा नेशनल खेलों अपनी कामयाबी का परचम फहराने के बाद साहेब मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, खेलनहार अरुप बिस्वास और खेलमंत्री लक्ष्मीरतन शुक्ला से मिला। साहेब ने इन तीनों को अपनी तंगहाली की दास्तां सुनाई। इन तीनों ने आश्वासन दिया था कि उसके आने-जाने, खाने और ठहरने पर जो पैसा खर्च हुआ है, उसे दिया जाएगा लेकिन चार महीने बाद भी उसे एक फूटी कौड़ी भी नसीब नहीं हुई है। साहेब हुसैन बताते हैं कि इससे पहले वह 2012 में पश्चिम बंगाल के पूर्व खेल मंत्री मदन मिश्र से भी मिले थे। उन्होंने भी मदद का भरोसा दिया था लेकिन कोई मदद नहीं की अलबत्ता वह आर्थिक अनियमितताओं के चलते आजकल जेल की रोटियां खा रहे हैं।

साहेब हुसैन को शानदार खेल उपलब्धियों के लिए अब तक दो अवार्ड मिल चुके हैं। साहेब हुसैन को पहला अवार्ड अजात शत्रु उसकी ही जन्मस्थली बिहार में मिला और दूसरा उसकी कर्मस्थली पश्चिम बंगाल में रोल माडल अवार्ड मिला है। साहेब कहता है कि इन अवार्डों से कुछ पल के लिए खुशी तो मिलती है लेकिन इनसे पेट नहीं भरता। पैरा एथलीटों की जहां तक बात है देश के हर राज्य में इनके साथ भेदभाव हो रहा है। पैरालम्पिक में मैडल जीतने वालों पर जरूर हुकूमतों की नजर जाती है और वे मालामाल हो जाते हैं। साहेब हुसैन जैसे गरीब खिलाडयि़ों के पास जब दो वक्त का खाना ही नसीब न हो ऐसे में इनका पैरालम्पिक तक पहुंचना कैसे सम्भव है। दरअसल पैरा खिलाडयि़ों के अलम्बरदार भी ऐसे खिलाडयि़ों की मदद करने की बजाय इनके ही पैसों से देश-विदेश में आरामतलबी करते हैं। इस खबर को पढऩे के बाद क्या किसी धन्नासेठ या हुकूमत का दिल पसीजेगा या एक और दिव्यांग खिलाड़ी अपना सपना चूर-चूर होते देखेगा।

आमतौर पर हमारे देश में दिव्यांगों के प्रति दो तरह की धारणाएं देखने को मिलती हैं। पहली यह कि जरूर इसने पिछले जन्म में कोई पाप किया होगा इसलिए उसे ऐसी सजा मिली है और दूसरा कि उसका जन्म ही कठिनाइयों को सहने के लिए हुआ है, इसलिए उस पर दया दिखानी चाहिए। हालांकि यह दोनों धारणाएं पूरी तरह बेबुनियाद और तर्कहीन हैं। एक नि:शक्त व्यक्ति की जिन्दगी काफी दु:ख भरी होती है। घर-परिवार वाले अगर मानसिक सहयोग न दें तो व्यक्ति अंदर से टूट जाता है। वास्तव में लोगों के तिरस्कार की वजह से ही दिव्यांग स्व-केन्द्रित जीवनशैली व्यतीत करने को विवश हो जाते हैं। देखा जाये तो भारत में दिव्यांगों की स्थिति संसार के अन्य देशों की तुलना में दयनीय है। दयनीय इसलिए कि एक तरफ यहां के लोगों द्वारा दिव्यांगों को प्रेरित कम हतोत्साहित अधिक किया जाता है। सहयोग कम मजाक का पात्र अधिक बनाया जाता है। विदेशों में दिव्यांगों के लिए बीमा तक की व्यवस्था है जिससे उन्हें हरसम्भव मदद मिल जाती है जबकि भारत में ऐसा कुछ भी नहीं है। हां, दिव्यांगों के हित में बने ढेरों अधिनियम संविधान की शोभा जरूर बढ़ा रहे हैं लेकिन व्यवहार के धरातल पर देखा जाये तो आजादी के सात दशक बाद भी समाज में दिव्यांगों की स्थिति सोचनीय ही है। देखा जा रहा है कि प्रतिमाह दिव्यांगों को दी जाने वाली पेंशन में भी राज्यवार भेदभाव होता है। मसलन दिल्ली में यह राशि प्रतिमाह 1500 रुपये है तो झारखंड सहित कुछ अन्य राज्यों में विकलांगजनों को महज तीन-चार सौ रुपये ही रस्म अदायगी के तौर पर दिये जाते हैं। समस्या यह भी कि इस राशि की निकासी के लिए भी उन्हें काफी भागदौड़ करनी पड़ती है। हमारे देश में दिव्यांगों के उत्थान के प्रति सरकारी तंत्र में अजीब-सी शिथिलता नजर आती है। हर स्तर पर दिव्यांगों के प्रति दयाभाव जरूर प्रकट किया जाता है लेकिन इससे किसी दिव्यांग का पेट नहीं भरा जा सकता। दिव्यांगों के लिए क्षमतानुसार कौशल प्रशिक्षण जैसी योजनाओं के होने के बावजूद जागरूकता के अभाव में दिव्यांग आबादी का एक बड़ा हिस्सा ताउम्र बेरोजगार रह जाता है। दिव्यांगजनों को मानसिक सहयोग की जरूरत है। यदि समाज में सहयोग का वातावरण बने, इस वर्ग को आवश्यक संसाधन उपलब्ध कराये जाएं तो ये भी इतिहास रच सकते हैं। साहेब हुसैन जैसे खिलाडयि़ों को यदि थोड़ी सी भी मदद मिल जाए तो ये देश का मान बढ़ा सकते हैं।

श्रीप्रकाश शुक्ला

 

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