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समाज और हम

समाज और हम

दिलीप सिंह काफी देर तक पासबुक के पन्ने पलट कर देखता रहा। उसे बहुत देर तक यकीन ही नहीं हुआ यह सब कब कैसे और कितनी जल्दी हो गया? पासबुक देखते हुए उसे पुराने लोगों की कहावत याद आ गई-‘बच्चू, संपति बनाना बहुत मुश्किल है और लुटाना बड़ा आसान।’ पर उसने तो लुटाने जैसा कोई काम ही नहीं किया। न ही शराब की आदत डाली और न ही शबाब की। फिर भी चूक तो कहीं हुई ही है। अपनी ही पासबुक पर विश्वास नहीं हो रहा है। करीब दो साल पहले भी तो कुछ-कुछ ऐसा ही हुआ था। लेकिन अभी जो सिंह साहब को दिखाई दे रहा है जिसे लांघने में उसे ही नहीं उसकी आगामी पीढिय़ों को भी बुरी तरह पसीना आ जायेगा। पिछले दो साल में पासबुक में चार बार एंट्री हुई है। जमा रकम मुआवजे की राशि पर मिले छमाही ब्याज की है। वह भी बार-बार कम होते हुए सिर्फ नौ हजार पर आ गया। दिलीप सिंह को लगा जैसे उसकी पासबुक में दीमकें घुसकर रकम चाट गई और उसकी पासबुक दीमक लगे पेड़ की तरह अंदर ही अंदर  खत्म हो गई। यह घटना केवल दिलीप सिंह से ही नही होती, बल्कि ऐसे लाखों लोग है जो इन समस्याओं से निजात पाना चाहते है। हमें इन समस्याओं से पार पाने की आवश्यकता है।

समाज में आए दिन बहुत कुछ घटित होती है। एक लेखक का संवेदनशील हृदय कैसे उन घटनाओं को अपनी कल्पनाशीलता से तराश कर पठनीय और सार्थक कहानियों का रूप देता है, यह इस कथा संकलन की विशेषता है। प्रत्येक कहानी एक दूसरे से अलग और अनूठी है। इन कहानीयों में लेखक ने सरकारी महकमे में व्याप्त भ्रष्टाचार को उजागर किया है, नौकरशाही की विद्रूपताओं को उकेरा है, गरीबी से जुझने का जज्बा दिखाया है, आधुनिक युग के युवकों के दिलों मे पनपने वाली मोहब्बत और नफरत को भली-भाती बया करती हैं। वृद्धों की उपेक्षा का मार्मिक चित्रण किया है। कुदरत के नजारे का मार्मिक चित्रण किया है। शिक्षा के महत्व को रेखांकित किया है। धन की चाहत और उसके उपयोग पर सार्थक बहस छेडऩे की कोशिश की है। साथ ही नशे के जाल में फसकर अनैतिक कृत्य करने वालों का बेबाकी से खुलासा किया है। साथ ही साथ समाज में फैले अंधविश्वासों पर भी गहरी चोट की है। इस संग्रह की कहानियां जिंदगी के खुरदरे यथार्थ और कल्पनाशीलता की उड़ान के इर्द-गिर्द घूमती हैं। ये आपके दिल को स्पर्श करती हैं, कहीं हॅसाती-गुदगुदाती हैं, मानवीय संवेदना और करूणा से ओतप्रोत करा देती हैं और अंत में आपको ऐसे मोड़ पर छोड़ देती हैं, जहां आप गंभीरता से सोचने को विवश हो जाते हैं।

शंभूनाथ का तिलिस्म

लेखक                    : आर. के. पालीवाल

प्रकाशक                : मंजुल पब्लिशिंग हाउस

मूल्य                      : १९५ रु.

पृष्ठ                        : १७१

लेखक ने इस प्रकार की कई कहानियां को अपनी इस पुस्तक के माध्यम से प्रस्तुत किया है जो हमारी सिस्टम पर भी प्रश्र खड़ा करती है। यह ‘शंभूनाथ का तिलिस्म’ नामक पुस्तक जो आम जन मानस की समस्याओं पर आधरित कहानियों को लोगों के समक्ष लाती है, उन पाठकों के लिए आनंदमय होगी जो संसार में हो रही नकारात्मक घटनाओं और भ्रष्टाचार के प्रति चिंतित रहते है। अत: पाठक इस पुस्तक का आनंद ले सकते है।

रवि मिश्रा

 

 

 

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