प्रमुख लेख

दागी लोकसेवकों के संरक्षण का कानून वसुंधरा सरकार के गले की फांस

दागी लोकसेवकों के संरक्षण का कानून  वसुंधरा सरकार के गले की फांस

भ्रष्टाचार में लिप्त राजस्थान के दागी लोकसेवकों को कथित रूप से संरक्षण देने की आड़ में विवादित अध्यादेश को कानूनी जामा पहनाने वाले विधेयक के मुद्दे पर प्रखर जनविरोध के चलते बैकफुट पर आयी भाजपा सरकार यह मामला प्रवर समिति को सुपुर्द करने पर मजबूर हो गई। यह मसला लोकतंत्र की चादर पर आपातकाल के काले धब्बे की बहस के साथ मीडिया की आजादी से भी जुड़ गया है। राज्य विधानसभा के संक्षिप्त हंगामेदार सत्र में सरकार अदालती पेचीदगी के बावजूद गुर्जरों सहित पांच जातियों को विशेष आरक्षण देने सम्बन्धी विधेयक की मंजूरी को अपनी उपलब्धि मान रही है वहीं प्रमुख प्रतिपक्ष कांग्रेस किसानों के कर्जे माफी की मांग पर सदन में धरना विरोध प्रकट करने तक सिमट गई। इस दौरान भाजपा के वरिष्ठ विधायक घनश्याम तिवाड़ी दो बार सदन का बर्हिगमन तथा वैल में आकर धरना देने की चेतावनी देकर अपना रौद्र रूप दिखाने से नही चूके। एक तरफ  सत्तारूढ़ भाजपा एवं प्रमुख प्रतिपक्ष कांग्रेस ने राजनीतिक शक्ति परीक्षण के प्रतीक बने अजमेर अलवर लोकसभा एवं मांडलगढ़ (भीलवाड़ा) विधानसभा क्षेत्र के प्रस्तावित चुनाव के लिए अपनी पूरी ताकत झोंक रखी है। वहीं वैधानिक बाध्यता पूरी करने की खातिर मात्र चार दिन चला विधानसभा सत्र सत्तारूढ़ भाजपा सरकार के गले की फांस बन गया। इस मुद्दे पर सरकार राजनीतिक दलों, मीडिया, वकीलों तथा सामाजिक संगठनों के साथ आम जनता के निशाने पर आ गई है।

प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सचिन पायलट ने उच्च न्यायालय में दायर याचिका से विवादास्पद अध्यादेश को चुनौती देकर इस मुद्दे को कानूनी रूप देने के साथ राजनीतिक मोड़ देने की पहल की। न्यायाधीश अजय रस्तोगी एवं न्यायाधीश दीपक माहेश्वरी की खण्डपीठ ने 27 अक्टूबर को पायलट व अन्य सात याचिकाओं पर केन्द्र एवं राज्य सरकार को जारी नोटिस करके यह पूछा है कि नाम और पहचान उजागर करने पर प्रतिबंध लगाकर दागी लोकसेवकों को संरक्षण देने वाले अध्यादेश को क्यों न रद्द कर दिया जाये? सुनवाई के दौरान अदालत को बताया गया कि अध्यादेश के बाद एक आई.ए.एस. अधिकारी के खिलाफ  भ्रष्टाचार के मामले पर सरकार ने अभियोजन की मंजूरी नहीं दी। खण्डपीठ ने चार सप्ताह में जवाब तलब करते हुए इस मामले पर 27 नवम्बर तक सुनवाई टाल दी है। उधर विधानसभा में गठित प्रवर समिति इस मुद्दे पर पुर्नविचार करेगी। विधानसभा अध्यक्ष कैलाश मेघवाल ने उदय इण्डिया को बताया कि दोनो विधेयकों पर पुर्नविचार के लिए गृहमंत्री की अध्यक्षता में दो प्रवर समितियों का गठन किया जायेगा। स्वाभाविक रूप से इस प्रक्रिया में विधायिका और न्यायपालिका के बीच टकराव के हालात बन गए है। गौरतलब है कि सर्वोच्च न्यायालय ने 2012 में भाजपा के वरिष्ठ नेता डॉ. सुब्रह्मण्यम स्वामी की एक याचिका पर यह फैसला दिया था कि आम नागरिकों की ओर से शिकायत दर्ज करने सम्बन्धी संवैधानिक अधिकार को गैर वाजिब शर्तों के दायरे में नहीं रखा जाना चाहिए तथा ऐसी शिकायतों का संज्ञान लिया जाना चाहिए।

Layout 1राजस्थान सरकार के अध्यादेश आपराधिक कानून (राजस्थान संशोधन) 2017 में यह प्रावधान है कि कोई भी मजिस्ट्रेट किसी सरकारी कर्मचारी या अधिकारी के खिलाफ जांच के आदेश तब तक नहीं दे सकता जब तक सम्बन्धित विभाग से इसकी अनुमति नहीं ली गई हो। यही नही अनुमति की अवधि 180 दिन के लिए होगी इसके बाद यह मान लिया जाएगा कि सम्बन्धित मामले पर स्वीकृति मिल चुकी है। मामले की जांच की अनुमति मिलने से पहले शिकायत में दर्ज गड़बडिय़ों को लेकर मीडिया में किसी तरह की खबर प्रकाशित या प्रसारित नहीं की जा सकती। इस तरह न्यायपालिका और मीडिया पर अंकुश लगाकर दागी लोकसेवकों को भ्रष्टाचार करने और साक्ष्य मिटाने का अवसर दिया गया वहीं लोकसेवकों का दायरा भी बढ़ाया गया है। विवादित विधेयक में धारा 156 तथा 190 में संशोधन का प्रस्ताव किया गया है जिसमें अभियोजन की स्वीकृति 180 दिन के भीतर किये जाने और मीडिया में नाम उजागर किये जाने पर दो वर्ष के कारावास और जुर्माने की सजा का प्रावधान है।

लाख टके का सवाल है कि भाजपा सरकार ने अपने कार्यकाल के आखिरी साल में यह कदम क्यों उठाया जिस पर देशव्यापी बवाल खड़ा हो गया है? ईमानदार अफसरों की प्रतिष्ठा बचाने के नाम पर भ्रष्ट लोकसेवकों की पहचान उजागर नहीं करने के लिए मीडिया का मुंह बंद करने की मंशा से लाए गए अध्यादेश के मुद्दे पर स्वयं सरकार ने अपने को कठघरे में खड़ा कर लिया है। यदि लोकसेवक ईमानदार है तो वह किसी का मोहताज क्यों होगा? पिछले वर्षो में खुद मंत्रियों ने अफसरों को इस बात के लिए कोसा है कि वे उनकी परवाह नहीं करते जिससे जनहित और विकास कार्यो तक में बाधा आती है।

वसुंधरा सरकार के पहले कार्यकाल में विधानसभा की प्रथम महिला अध्यक्ष श्रीमती सुमिता सिंह ने भी यही सवाल किया कि ऐसे कानून की आवश्यकता क्यों पड़ी? इससे तो भ्रष्ट लोकसेवकों को संरक्षण ही मिलेगा। उनका कहना है कि प्रदेश में सम्भवत: पहले कभी ऐसा नही हुआ कि अध्यादेश लाया गया और बाद में विधेयक को प्रवर समिति को सुुपुर्द करने की जरूरत हो गई।

Layout 1

इस मुद्दे पर 23 अक्टूबर को विधानसभा सत्र शुरू होते ही लावा फूट पड़ा। विपक्ष के साथ भाजपा के बागी विधायक घनश्याम तिवाड़ी भी खुलकर मैदान में आ गये। हंगामे के बीच गृहमंत्री गुलाब चन्द कटारिया ने पहले विवादास्पद दोनों अध्यादेश दंड प्रक्रिया संहिता (राजस्थान संशोधन) अध्यादेश 2017 एवं दंड विधियां (राजस्थान संशोधन) अध्यादेश 2017 सदन के पटल पर रखा। फिड दंड विधियां (राजस्थान संशोधन) विधेयक 2017 और दंड प्रक्रिया संहिता (राजस्थान संशोधन) विधेयक 2017 को पुर-स्थापित किया। अध्यक्ष कैलाश मेघवाल ने भाजपा के वरिष्ठ विधायक घनश्याम तिवाड़ी को अपनी बात कहने की अनुमति नही दी तो वह सदन से बर्हिगमन कर गए। कांग्रेस विधायको ने भी वाकआउट किया। तिवाड़ी और निर्दलीय माणिक चंद सुराना ने हंगामे के बीच व्यवस्था का प्रश्न उठाया। लेकिन आसन से अनुमति नहीं मिली। विधेयक पुन: स्थापित किये जाने के बाद सुराना ने अनुमति मिलने पर तीखे शब्दो में आपत्ति जतायी। व्यवधान के बीच उन्होंने सता पक्ष को इमरजेंसी की याद दिलाते हुए कहा कि हम कांग्रेस को इमरजेंसी के लिए दोषी मानते है और आज आप क्या कर रहे है ये अघोषित इमरजेंसी लागू करके। यदि आप जो काम मजिस्ट्रेट का है, जो काम पुलिस का है वही एडमिनिस्ट्रेटिव पावर लेना चाहते है तो इससे ज्यादा शर्मनाक कोई बात नहीं हो सकती। आप कानून न्याय को और न्याय एवं एक्जीक्यूटिव एजेंसी दोनो को एक कर रहे हंै। इस विधेयक को लाने के लिए सरकार को किसने प्रेरित किया? सरकार का एक साल बचा है, इतनी जल्दी क्यों है? यह लोकसेवकों के साथ यदि विधायकों के हितों की भी रक्षा करेगा तो हमे रक्षा नहीं चाहिए। बार-बार प्रयास के बावजूद तिवाड़ी को अपनी बात कहने का अवसर नहीं मिलने पर वह दुबारा सदन से चले गए। कांग्रेस विधायक दल के सचेतक गोविन्द सिंह डोटासरा ने टिप्पणी की कि तिवाड़ी जी को मंत्री तो आपने नहीं बनने दिया लेकिन बोलने पर भी आपत्ति लगा रहे हो। तिवाड़ी की प्रतिक्रिया के बीच संसदीय कार्य मंत्री राजेन्द्र राठौड़ ने कहा कि श्री तिवाड़ी जी कांग्रेस के सदस्य नही है। आप- इन्हे डिक्टेट नहीं कर सकते। ये अभी भी भाजपा के सदस्य हैं ।

शोकाभिव्यक्ति के बाद सदन की स्थगित हुई बैठक जब अगले दिन शुरू हुई तो इसी मुद्दे पर फिर हंगामा हुआ। प्रतिपक्ष के नेता रामेश्वर डूडी और गृहमंत्री गुलाब चन्द कटारिया के बीच नोंक-झोक के समय जब घनश्याम तिवाडी ने कहा कि राजस्थान की जनता पर यह काला कानून लेकर क्यों आये तो सत्तारूढ़ दल के दोनों सदस्य आपस मे उलझ गये। कटारिया का कहना था कि राष्ट्रपति से मंजूरी और राज्य सरकार की स्वीकृति के बाद 7 सितम्बर को अध्यादेश की अधिसूचना जारी की गई थी फिर डेढ़ माह की अवधि में किसी ने कही भी इसका विरोध दर्ज नही कराया। तैश में आये तिवाड़ी ने वैल में आकर धरने पर बैठने की चेतावनी दी। इस बीच कांग्रेस विधायकों ने अध्यादेश के विरोध में आसन के सामने आकर नारेबाजी शुरू कर दी। हंगामे के बीच गृहमंत्री ने दण्ड विधियां (राजस्थान संशोधन) विधेयक 2017 को प्रवर समिति को सुपुर्द करने का प्रस्ताव किया। इसी क्रम में 25 अक्टूबर को सदन से दण्ड प्रक्रिया संहिता विधेयक भी प्रवर समिति को सुपुर्द किए जाने की मंजूरी ली गई।

गृह मंत्रालय के जानकार सूत्रों के अनुसार पिछले करीब एक वर्ष से तत्सम्बन्धी अध्यादेश लाने की प्रक्रिया पर चर्चा शुरू हुई। वर्ष 2015 में महाराष्ट्र में इसी आशय का विधेयक पारित किया गया। इसी तर्ज पर प्रदेश में पहले अध्यादेश और फिर विधेयक तैयार किया गया। महाराष्ट्र में लोकसेवकों से सम्बन्धित मामलो में 90 दिन में अभियोजन की मंजूरी देने का प्रावधान है जबकि राजस्थान में यह अवधि 180 दिन रखी गई है। इसके अलावा लोकसेवकों की पहचान प्रकट किए जाने पर दो साल तक के कारावास और जुर्माने का प्रावधान भी प्रस्तावित है। इस बिन्दु को लेकर मीडिया तथा न्यायिक क्षेत्र में कड़ा विरोध किया गया है। महाराष्ट्र में कांग्रेस ने भी इस विधेयक का समर्थन किया था लेकिन राजस्थान में अभियोजन की मंजूरी की अवधि बढ़ाने और मीडिया को दण्डित करने के प्रावधान पर कांग्रेस ने अलग स्टैंड लिया है।

मीडिया में विवादित अध्यादेश से जुड़ी खबरों पर आरम्भ में खास नोटिस नहीं लिया गया। अक्टूबर के पहले पखवाड़े में अब गोपनीय रहेगा दागी लोकसेवकों का नाम तथा कोर्ट भी नही दे पाएगा इस्तगासे पर जांच का आदेश इत्यादि शीर्षकों से छपी खबरों पर तीखी प्रतिक्रिया जाहिर की गई। विधानसभा सत्र शुरू होने से एक दिन पहले प्रमुख दैनिक राजस्थान पत्रिका के गुलाब कोठारी लिखित अग्रलेख जनता उखाड़ फेकेगी ने तो कहर बरपा दिया। इस पर तीखी प्रतिक्रिया हुई। राजनीतिक दलों, सामाजिक संगठनों के साथ मीडिया भी सड़कों पर उतर आया तथा विधानसभा पर प्रदर्शन किया। विभिन्न पत्रकार संगठनों की ओर से पिंकसिटी प्रेस क्लब से विधानसभा तक निकाले गये मार्च में दिल्ली से आये वरिष्ठ पत्रकार ओम थानवी भी सम्मिलित हुए। पुलिस ने पत्रकारों को बस में बिठाकर प्रेस क्लब छोड़ा। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सचिन पायलट और नेता प्रतिपक्ष रामेश्वर डूडी सहित विधायकों व पार्टी नेताओं को गिरफ्तार कर शहर से बाहर छोड़ा गया।

राजस्थान पत्रिका के अग्रलेख पर सोशल मीडिया सहित देशव्यापी प्रतिक्रिया हुई। टिप्पणी की गई कि यह बिल प्रेस और नागरिकों के खिलाफ है, अधिकारियों के भी खिलाफ  है। आवाज दबाने की हर कोशिश का विरोध होना चाहिए। किसी भी सरकार का मूल्यांकन पहले इस बात से होना चाहिए कि प्रेस कितना स्वतंत्र है न कि फ्लाई ओवर या एयरपोर्ट से। भारतीय पुलिस सेवा के वरिष्ठ सेवानिवृत्त अधिकारी पी.एन. रछौया का कहना है कि सरकार ने भ्रष्टाचारियों को खुली छूट दे दी। मुख्यमंत्री, विधायक, सांसद व सरकारी अधिकारियों के खिलाफ सबूत होते हुए भी भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो व सीबीआई कुछ नहीं कर सकेगी। कई घोटाले उजागर होने से पहले यह एक्ट लाया जा रहा है। इससे अफसर खुले आम रिश्वत लेंगे। इसके लागू होने से राजस्थान गर्त में चला जाएगा।

कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने इस मसले से जुड़ी खबर को टैग करते हुए टवीट किया-मैडम चीफ  मिनिस्टर हम 21वीं सदी में रहते है, यह 2017 है 1817 नहीं।

अघोषित आपातकाल के आरोप को खारिज करते हुए गृहमंत्री गुलाबचन्द कटारिया ने बार-बार यह सफाई दी कि सरकार की भ्रष्ट लोकसेवकों को बचाने की कोई मंशा नहीं है। भ्रष्टाचार के खिलाफ  जीरो टोलरेंस की नीति पर चलने का दावा करते हुए उन्होंने कहा कि ईमानदार अधिकारियों की प्रतिष्ठा बचाने के लिए यह विधेयक लाया गया है। कोई व्यक्ति गलत इस्तेमाल कर ईमानदार व कर्तव्यनिष्ठ लोकसेवक की छवि खराब नहीं कर सके। विधेयक पेश करते हुए कटारिया का कहना था कि अफसरों नेताओं पर दर्ज किए जाने वाले मामलो में लगभग 73 फीसदी झूठे व फर्जी पाए गए हंै। आंकड़ो पर गौर करें तो वर्ष 2013 से 2017 की अब तक की अवधि में लगभग 2.69 लाख दर्ज मामलो में करीब 1.76 लाख मामले झूठे पाये गये। लम्बित मामलों की संख्या 28 हजार से अधिक आंकी गई है। सवाल खड़ा होता है कि यदि इतनी संख्या में मामले झूठे और फर्जी पाये गये तो इन शिकायतकर्ताओं के खिलाफ कार्यवाही क्यों नहीं की गई जबकि ऐसे मामलों में कानूनी प्रावधान है। शपथपत्र में किसी भी लोकसेवक के खिलाफ  झूठे साक्ष्य देने पर धारा 193 में सात साल की सजा और असीमित जुर्माना किया जा सकता है। इसी तरह धारा 182 में राजकीय कर्मचारी के खिलाफ  झूठी सूचना देने पर एक हजार रूपये जुर्माना एवं छ: माह की सजा देने की व्यवस्था है तो धारा 211 के तहत किसी भी लोकसेवक पर अपराध का आरोप लगाते झूठी सूचना देने पर असीमित जुर्माने के साथ दो साल की सजा देने का प्रावधान है। ए.सी.बी. के आंकड़ो में जायें तो साढ़े तीन वर्षों में 1158 मामले दर्ज किए गए। रिश्वत व अन्य मामलों में 818 लोकसेवकों को टे्रप किया गया। आय से अधिक सम्पत्ति के मामलों में 51 तथा पद के दुरूपयोग के मामलों में 289 लोकसेवकों के खिलाफ  केस दर्ज किए गए।

स्वयं गृहमंत्री ने विधानसभा में भाजपा के मोहन लाल गुप्ता के प्रश्न के जवाब में बताया कि पिछले तीन वर्षो में भारतीय प्रशासनिक सेवा (आई.ए.एस.) के दस अधिकारियों के खिलाफ 18 मामले राजस्थान प्रशासनिक सेवा के 50 अधिकारियों के विरूद्व 54 मामले दर्ज किए गए। यह मामले रिश्वतखोरी या भ्रष्टाचार से जुड़े थे। वर्ष 2014 से 2017 में अब तक दर्ज 72 मामलो में महज दस मामलो में चालान पेश किया गया जबकि 56 मामलो की जांच अभी लम्बित है और छ: मामलों में एफ.आइ.आर लगाई गई है। गृहमंत्री ने सदन में यह भी दावा किया कि इतनी बड़ी संख्या में अधिकारियों के खिलाफ दर्ज मामलों में राजस्थान देश में प्रथम स्थान पर है।

सूचना के अधिकार के तहत प्राप्त जानकारी के मुताबिक एक जनवरी 2014 से एक मार्च 2016 तक की अवधि में एसीबी को नेताओं एवं अफसरों द्वारा किए गए भ्रष्टाचार सम्बन्धी 16 हजार से अधिक शिकायतें मिली लेकिन दर्ज मामलों की संख्या महज 51 रही। ब्यूरो ने प्रारंभिक जांच हेतु 89 मामले लिए तथा सम्बन्धित विभागों के अध्यक्षों को अग्रिम कार्यवाही के लिए लगभग दस हजार परिवाद भेजे गये। कुल 16278 परिवादों में महज 89 परिवादों पर प्राथमिक जांच दर्ज की गई।

इसी सत्र में सरकार ने राजस्थान विधानसभा सदस्य (निरर्हता निवारण) विधेयक 2017 भी पारित करवाकर फिर से विवाद को न्यौता दे दिया। इस कानून में संसदीय सचिव को लाभ के पद से फिर बाहर किया गया है और पूर्व में 1956 तथा 1962 में बने कानून खत्म किए गए। इस कानून पर आपत्ति करते हुए भाजपा के घनश्याम तिवाड़ी ने संसदीय सचिवों के मामले में अदालती फैसलों का उल्लेख किया और कहा कि संविधान के बिजनेस रूल्स में संसदीय सचिवों को मंत्री माना गया है। जुलाई 2017 को उच्चतम न्यायालय की तीन सदस्यीय बैंच ने भी संसदीय सचिव को लाभ का पद मानने का फैसला लिया है और कहा है कि कोई विधानसभा इस पर कानून नही बना सकती। फिर सरकार टकराव की स्थिति क्यों पैदा कर रही है। यह उल्लेखनीय है कि राजस्थान विधानसभा में 200 विधायकों की संख्या के आधार पर 30 मंत्री बनाये जा सकते हैं। वर्तमान में मंत्रियों के अलावा 10 विधायकों को संसदीय सचिव बनाया गया है।  विधानसभा सत्र में दूसरे दिन की बैठक के समय कांग्रेस के विधायकों ने किसानों की कर्ज माफी की मांग को लेकर वैल में नारेबाजी करते हुए धरना दिया। उपाध्यक्ष राव राजेन्द्र सिंह द्वारा 26 अक्टूबर को सदन की कार्यवाही अनिष्चित काल के लिए स्थगित किए जाने तक करीब 54 घंटे तक यह धरना जारी रहा। बैठक समाप्त होने पर मुख्यमंत्री श्रीमती वसुंधरा राजे विधायकों से मिली। कांग्रेस विधायक सरकार से कर्ज माफी के मामले में हा या ना में स्पष्ट जवाब देने की मांग कर रहे थे। कृषि मंत्री प्रभु लाल सैनी का स्पष्ट जवाब था कि विभिन्न किसान संगठनों की कर्ज माफी सहित अन्य मांगों पर विचार हेतु उच्च स्तरीय समिति गठित की गई है। समिति की रिपोर्ट आने पर सरकार आवश्यक कार्यवाही करेगी। सैनी ने कर्नाटक, पंजाब, उत्तर प्रदेश आदि राज्यों में कर्ज माफी से जुड़ी विसंगतियों की चर्चा करते हुए कहा कि हमारी मंशा किसानों को उचित लाभ देने की है। हंगामे के बीच राजस्थान सिंचाई प्रणाली के प्रबन्ध में कृषकों की सहभागिता (संशोधन) विधेयक 2017 पर हुई संक्षिप्त चर्चा के जवाब में जल संसाधन मंत्री डॉ. राम प्रताप ने कांग्रेस पर किसानों के नाम पर घडिय़ाली आंसू बहाने का आरोप लगाते हुए बताया कि कांग्रेस सरकार ने सिंचाई प्रणाली पर डेढ हजार से अधिक बजट प्रावधान के बावजूद महज पांच करोड़ रूपये की धनराशि खर्च की।

गुर्जरों सहित पांच जातियों के आरक्षण के मुद्दे पर भी सत्तापक्ष ने कांग्रेस को निशाने पर लिया। सामाजिक न्याय व अधिकारिता मंत्री अरूण चतुर्वेदी ने राजस्थान पिछड़ा वर्ग (राज्य की शैक्षिक संस्थाओ में सीटों और राज्य के अधीन सेवाओ में नियुक्तियों और पदों का आरक्षण) विधेयक 2017 पारित किए जाने का प्रस्ताव किया। इस बीच कांग्रेस विधायकों ने तख्तियां हाथ में लेकर भाजपा सरकार के समय हुए गुर्जर आंदोलन में गोली के शिकार गुर्जरों के मुद्दे पर नारेबाजी की। संसदीय कार्यमंत्री राजेन्द्र राठौड़ ने विपक्ष पर निशाना साधते हुए गुर्जर आरक्षण पर अपनी स्थिति स्पष्ट करने की चुनौती दी। विधेयक पर चर्चा के जवाब में अरूण चतुर्वेदी ने कहा कि आरक्षण सम्बन्धी मुद्दे पर पिछले कानूनों से उत्पन्न परिस्थितियों के मद्देनजर नये विधयेक में सभी पहलुओं को ध्यान में रखा गया है। प्रदेश में ओबीसी की 52 फीसदी आबादी में जातियों की संख्या 91 है। ओबीसी के 21 फीसदी आरक्षण को 26 फीसदी करते हुए गुर्जरों सहित पांच जातियों को आरक्षण की सुविधा दी जायेगी। इससे आरक्षण का प्रतिशत 54 हो जाएगा। उच्चतम न्यायालय ने परिकल्पित विशेष परिस्थितियों में 50 प्रतिशत से अधिक आरक्षण देने पर सहमति जतायी है। चर्चा के दौरान मंत्री चतुर्वेदी की भाजपा के वरिष्ठ विधायक घनश्याम तिवाड़ी से तीखी नोक-झोंक हुई। तिवाड़ी का कहना था कि पिछले दशक में गुर्जरों व अन्यों को आरक्षण देने का यह तीसरा प्रयास है। उनका सवाल था कि जब राज्य में अनुसूचित जाति व जनजाति को अधिसूचना के तहत आरक्षण सुविधा दी गई है तब विधेयक लाने की क्या आवश्यकता है। उन्होने आरक्षण के नाम पर जनता को भ्रमित नहीं करने और आर्थिक दृष्टि से वंचित वर्ग को आरक्षण सुविधा से न्याय देने की मांग दोहरायी। तिवाड़ी का यह भी सुझाव था कि पहले की तरह यह विधेयक भी न्यायालय की भेंट नहीं चढ़ जाये। अत: इसे प्रवर समिति के सुपुर्द भी किया जा सकता है। इसी दौरान उपाध्यक्ष राव राजेन्द्र सिंह ने आरक्षण जैसे संवेदनशील मुद्दे पर सत्तापक्ष एवं प्रतिपक्ष को सदन की गरिमा बनाये रखने के लिए कड़े शब्दों में लताड़ा।

विधानसभा का अगला सत्र बजट सत्र होगा जिसमे विवादित विधेयकों पर प्रवर समिति की रिपोर्ट पेश की जानी है। इससे पहले लोकसभा के दो और विधानसभा के लिए एक उपचुनाव की तिथियां घोषित हो जायेंगी। राज्य के निर्वाचन विभाग के सूत्रों के अनुसार हिमाचल में मतदान के पश्चात 09 नवम्बर के बाद इन उपचुनावों के लिए तिथि घोषित किये जाने की संभावना है। उपचुनाव के लिए नई ई वी एम मषीनों की व्यवस्था भी की जानी है। इस उपचुनाव के नतीजे आगामी चुनावो के नतीजो को प्रभावित करेंगे।

 

जयपुर से गुलाब बत्रा

 

Leave a Reply

Your email address will not be published.