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संस्कृत की रक्षा करना नाथ ‘योगी’

संस्कृत की रक्षा करना नाथ ‘योगी’

सम्पूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति को अंतत: अपनी जिद से पीछे हटना पड़ा। कुलाधिपति (राज्यपाल) के आदेश और सख्त रूख के कारण उन्हें विश्वविद्यालय की अध्यापक परिषद के आगे झुकना पड़ा। जिस परिषद से वे बात करने को तैयार नहीं थे, उसे बुलाकर यह कहना पड़ा कि  ‘नियुक्तियों के साक्षात्कार बंद हो गये, यूजीसी के संशोधन को परिनियमावली में शामिल करके नये विज्ञापन जारी होंगे। नये सिरे से साक्षात्कार होंगे।’ कर्मचारी संघ की मांगे भी पूरी करनी पड़ीं। उनकी वेतन आदि संबंधी मांगे भी सरकार को भेज दी गयीं। इसी के साथ धरना-अनशन समाप्त हो गया।

काशी का शिक्षा- जगत पिछले दिनों काफी अशांत और आन्दोलित रहा है। यहां के दो प्रमुख विश्वविद्यालय काशी हिन्दू विश्वविद्यालय एवं प्राच्य विद्या का प्रमुख केन्द्र सम्पूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय इस अशांति के चलते खासे प्रभावित रहे हैं। महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि दोनों शिक्षण संस्थाओं में अशांति की वजह कुलपतियों की हठधर्मिता और मनमानी बतायी जा रही है। जिला प्रशासन की रिपोर्ट के मुताबिक विश्वविद्यालय के छात्र-छात्राओं के साथ संवादहीनता और कुछ मुट्ठी भर आचार्यों एवं ‘चाटुकारों’ के घेरे के कारण कुलपति परिसर की स्थिति की ‘नजाकत’ को भांप नहीं पाये। वे इसे कुछ असामाजिक तत्वों की ‘साजिश’ बताकर पल्ला झाड़ रहे थे। लेकिन ‘आंधी’ तो अंधी है, उसे साजिश कह कर टाल देने से बात तो बनती नहीं। यह तूफान काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के वाइसचांसलर को उड़ा ले गया (यद्यपि तकनीकी रूप से वे लंबी छुट्टी पर गये हैं) लेकिन सम्पूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय के वाइसचांसलर प्रो. यदुनाथ दुबे भी (विश्वविद्यालय की एक महिला प्रोफेसर और काउंसलर के मुताबिक) उसी गति को प्राप्त करने की ओर अग्रसर हैं ।

फिलहाल, बीएचयू में कई स्तरों पर बदलाव हुए हैं और जांच व अन्य बदलाओं के लिए बनी समितियों के सुझावों के आने का इंतजार है। उनके आ जाने के बाद कुछ बड़े और मूलभूत बदलाव किये जायेंगे, ऐसा लोगों का कहना है। लेकिन ये बदलाव सम्भवत: नये वीसी के खाते में ही जायेंगे।

खैर, अब बात प्राच्य विद्याओं के प्रमुख केन्द्र सम्पूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी की। यह विश्वविद्यालय प्राच्य विद्याओं के अध्ययन-अध्यापन एवं शोध के बड़े लक्ष्य को पाने के लिए खोला गया था। शुरुआत के दिनों से लेकर वर्ष 2000 के आस-पास तक संस्कृत साहित्य, पालि, प्राकृत, अपभ्रंश सहित धर्म, दर्शन एवं ज्योतिष व बौद्ध दर्शन के प्रख्यात विद्वान यहां से जुड़े रहे। महामहोपाध्याय पंडित सुधाकर द्विवेदी, आचार्य कुबेरनाथ शुक्ल, आचार्य विद्यानिवास मिश्र, आचार्य वागीश शास्त्री जैसे उद्भट विद्वान यहां की आचार्य परम्परा में रहे हैं। लेकिन जैसे अन्य क्षेत्रों में समाज गिरावट का दंश झेल रहा है, प्राच्य विद्या के इस शिखर संस्थान में भी हर स्तर पर गिरावट देखी जा रही है। व्यंग्य में सही, लेकिन यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि यहां के अध्यापक परिषद के अध्यक्ष को यह कहना पड़ा कि-जिसे ‘राम’ शब्द का रूप न आता हो, वह भी यहां की आचार्य परम्परा की कड़ी बन गया है। जाहिर है अध्यापकों की नियुक्तियों से लेकर (ऊपर से लेकर नीचे तक) अधिकारियों-कर्मचारियों तक के चयन में भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद के आरोप लग रहे हैं। मुट्ठी भर लोग विश्वविद्यालय को अपने तरीके से चला रहे हैं। योग्यता कोई पैमाना नहीं रह गया है।


 

 मनमानी तो नहीं चलेगी -प्रो. शैलेश, महामंत्री, अध्यापक परिषद


 

बनारस के शिक्षा जगत में बड़ी अशांति है डॉ. साहब। बीएचयू में वीसी को लम्बी छुट्टी पर जाना पड़ा। अभी किसी तरह माहौल शांत हुआ। तब तक आपके विश्वविद्यालय में अध्यापक, कर्मचारी और छात्र आंदोलन पर उतर आये। माहौल बड़ा अराजक बन गया था। क्या कारण है ?

शिक्षा जगत हो या कोई अन्य क्षेत्र, कुछ कानून कायदों से नियंत्रित होकर ही काम होता है । यदि किसी संस्था का प्रमुख उन कानून कायदों की धज्जियां उड़ाते हुए चलेगा तो स्थिति खराब होगी ही। चाहे केन्द्र का विश्वविद्यालय हो या राज्य नियंत्रित हो, उसके वाइसचांसलर को कानून कायदे को ताक पर रखकर चलने की छूट नहीं होती। बी.एच.यू. के  वी.सी. भी मनमानी कर रहे थे  और उसी रास्ते पर हमारे वी.सी. प्रो. यदुनाथ दुबे भी चल रहे थे। हमारे लाख समझाने पर भी वे नहीं माने । अंतत: हमारे निवेदन पर माननीय कुलाधिपति महोदय ने वी.सी. को बुलाकर कहा कि कानून -कायदे के मुताबिक चलिये।

किन अर्थों में वह मनमानी कर रहे थे?

राज्य के विश्वविद्यालयों और कालेजों के लिए यूजीसी की एक गाइड लाइन होती है। उसके परिप्रेक्ष्य में प्रदेश शासन की ओर से महामहिम राज्यपाल महोदय की ओर से निर्देश जारी होता है जिसे मानना विश्वविद्यालयों/कालेजों के लिए अनिवार्यता है। अब कोई वीसी उसे न मानकर अपने कुछ पसंदीदा लोगों, चाटुकारों को लाभ पहुंचाने के लिए प्रावधानों की धज्जियां उड़ाने लगेगा तो स्थिति बिगड़ेगी ही।

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संस्कृत विश्वविद्यालय के वीसी ने क्या गड़बडिय़ां की हैं, जरा आप उस ओर इंगित करें!

हमारे वीसी साहब हर स्तर पर मनमानी कर रहे थे। लेकिन हम फिलहाल नियुक्तियों, प्रमोशन, ईमानदार अधिकारियों एवं अध्यापकों को प्रताडि़त करने की उनकी कार्रवाइयों, पसंदीदा और चाटुकारों को एक साथ कई-कई पदों पर बैठाए जाने का लोकतांत्रिक तरीके से विरोध कर रहे थे। हम चाहते हैं कि विश्वविद्यालय यूजीसी के मानकों को मानते हुए, महामहिम राज्यपाल के आदेशों/निर्देशों के अनुसार चले। ईमानदार अधिकारियों, अध्यापकों, कर्मचारियों का उत्पीडऩ न हो। योग्य लोगों की योग्यता का सम्मान हो। भाई-भतीजावाद को योग्यता से ऊपर रखकर न देखा जाय।

 

तो फिर अब आगे ?

गर्वनर हाउस में बाकायदा बैठक हुई जिसमें कुलपति के विशेष कार्याधिकारी श्री राघवेन्द्र मिश्रा, वी.सी. प्रो. यदुनाथ दुबे, राज्यपाल के सचिव श्री चन्द्रप्रकाश और विशेष कार्याधिकारी शिक्षा श्री राजवीर सिंह राठौर शामिल रहे। इसमें निर्णय लिये गये कि मौजूदा समय में विश्वविद्यालय में चल रही नियुक्ति प्रक्रिया को रोक दिया जाय। हो चुके साक्षात्कार के लिफाफे न खोले जायें। यू.जी.सी. के विनियमावली के अंगीकरण की कार्यवाही प्राथमिकता से करके परिनियमावली में शामिल किया जाय। इसके बाद नये विज्ञापन जारी हों। देखिये, मनमाना -फर्जी तरीके से विश्वविद्यालय तो नहीं चलेगा। इसी बात को माननीय राज्यपाल महोदय ने वी.सी. को बता दिया। इसलिए यह कहना पड़ेगा कि राज्यपाल महोदय के आदेशों-निर्देशों की उपेक्षा करना वी.सी. के लिए भारी पड़ेगा।

फिलहाल तो हम लोगों ने और कर्मचारी परिषद ने हड़ताल खत्म कर दी है। वी.सी. ने जो लगभग महीने भर हमसे बात करने को तैयार नहीं थे, हमें बुलाकर बात करने को मजबूर हुए। हमारी सारी बातें उन्हें माननी पड़ी। लेकिन इस बीच पढ़ाई-लिखाई का जो नुकसान हुआ, जो वक्त गुजर गया उसकी भरपाई कौन करेगा?


विश्वविद्यालय में चीफ  प्राक्टर रह चुकीं प्रो. शशिरानी मिश्रा (इस समय पुराण इतिहास विभागाध्यक्ष हैं) कहती हैं-‘बड़ा क्षोभ होता है विश्वविद्यालय की स्थिति को देखकर। काम करना बहुत मुश्किल हो गया है। जो भी ईमानदार है, उसके लिए काम करना मुश्किल है। कुलसचिव प्रभाष द्विवेदी सज्जन हैं, कायदे-कानून के जानकर हैं। ईमानदार भी हैं लेकिन उन्हें हटाकर ‘डिप्टी’ बना दिया गया। दस महीने में तीन चीफ  प्राक्टर बदले गये। प्रो. शशि रानी मिश्रा, प्रो.रवीन्द्र मिश्रा और शीतला प्रसाद उपाध्याय। कोई क्या काम करेगा। हर कदम पर हस्तक्षेप। दबाव की नीति बनाकर छात्रनेता (जो अब बूढ़े हो गये हैं) नामधारी लोग अवैध ढंग से नियुक्तियां करा रहे हैं। वे कार्यालय में आकर धौंस दिखाकर काम करने के लिए दबाव बनाते हैं।’

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डॉक्टर साहब, जब आप चीफ  प्राक्टर थीं तब एक महिला असिस्टेंट रजिस्ट्रार के साथ किसी छात्रनेता ने दुव्र्यवहार किया था। तब आपने क्या कदम उठाया था? बिल्कुल मैंने कदम उठाया था, दुव्र्यवहार करने वाले पुराने छात्रनेता थे-पूर्व अध्यक्ष छात्रसंघ, गिरिजानंद चौबे। मैंने उनके खिलाफ  एफआईआर दर्ज करवाई। मेरा जो काम था किया’

कुलसचिव प्रभाष द्विवेदी कहते हैं-यह सच है कि प्रो. शशिरानी मिश्रा छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष के खिलाफ  प्राथमिकी दर्ज कराने पर अड़ गयी थीं लेकिन उसी पूर्व अध्यक्ष की बेटी इन दिनों छात्रसंघ की अध्यक्ष हैं। लिहाजा उसी धौंस में आज भी पूर्व छात्रनेता वी.सी. को अपनी उंगली पर नचा रहे हैं। 25 दिसम्बर 2016 को कार्यपरिषद की बैठक में जबरन घुसकर उन्होंने कहा कि यह विश्वविद्यालय  मैं चलाऊंगा। काफी हंगामा हुआ। बाद में उसी छात्रनेता ने मेरे साथ दुव्र्यवहार किया लेकिन मेरी शिकायत और कार्रवाई करने के निवेदन को कुलपति ने उठाकर किनारे रख दिया और आज तक उस पर प्राथमिकी तक दर्ज नहीं कराई गयी।’

वाइसचांसलर प्रो. यदुनाथ दुबे और कुलसचिव प्रभाष द्विवेदी की कार्य प्रणाली में काफी अंतर है जिसके कारण दोनों के बीच टकराव की स्थिति बनी है। प्रभाष जी उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा भेजे गये अधिकारी हैं और कानून-कायदों से इंच भर भी हटते नहीं। यहां तक कि धमकियों और दुव्र्यवहार से भी नहीं। दूसरी ओर वीसी साहब थोड़े ढीले हैं। कानून-कायदों से बंधकर चलना उनकी फितरत में नहीं है। विश्वविद्यालय के ही एक प्रोफेसर कहते हैं-‘कानून-कायदों में रूचि न होने के चलते वी.सी. साहब को कुछ अन्य लोगों की जरूरत पड़ती है। (उल्लेखनीय है कि इस प्रतिनिधि के भी अधिकांश सवालों के जवाब (फोन पर) एक अन्य अध्यापक दिनेश कुमार गर्ग ने दिये जो विश्वविद्यालय में उपाचार्य (रीडर) हैं।


 

 चाटुकार पुरस्कृत हो रहे -प्रो. आशुतोष मिश्र, अध्यक्ष, अध्यापक परिषद


 

सम्पूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय अध्यापक परिषद के अध्यक्ष प्रो. आशुतोष मिश्र वी.सी. प्रो. यदुनाथ दुबे द्वारा अपनाये जा रहे अवैधानिक तौर-तरीकों, अवैधानिक ढंग से नियुक्तियों के किए जा रहे प्रयासों,भाई-भतीजावाद को बढ़ावा देने, ईमानदार अधिकारियों को प्रताडि़त करने,भ्रष्ट लोगों को पुरस्कृत करने को लेकर बहुत मुखर हैं। उनसे हुई बातचीत के प्रमुख अंश-

अध्यापक परिषद, कर्मचारी संघ और छात्र धरना पर बैठे थे। विश्वविद्यालय का माहौल अशांत रहा आपके असंतोष का कारण क्या रहा?

Layout 1इन सबके मूल में वाइसचांसलर हैं । वे कायदे -कानून को, यूजीसी के नियमों को, महामहिम राज्यपाल के निर्देशों की बखिया उधेड़ते हुए उच्चशिक्षा निदेशक के आदेशों की अवहेलना करके कुछ चाटुकार और निहित स्वार्थी तत्वों के हाथ में खेलते रहे। भ्रष्टाचार में लिप्त होकर विश्वविद्यालय को गर्त में ढकेलने की कोशिश कर रहे थे। हम इसका विरोध करते हुए वैधानिक तरीके से चलने की सलाह दे रहे थे। लेकिन वे अपनी जिद पर अड़े रहकर अवैधानिक रास्ते पर चलते रहने को अडिग थे। हमने महामहिम राज्यपाल के यहां गुहार लगायी। उन्होंने वास्तविकता का पता लगाकर वी.सी. को लखनऊ बुलाया और कायदे-कानून के मुताबिक विश्वविद्यालय चलाने का निर्देश दिया। और अंतत: वी.सी. को रास्ते पर आना पड़ा।

सरकार (केन्द्र और राज्य सरकार दोनों) चाहती हैं कि आधुनिक समाज की दशा-दिशा आधुनिक वैज्ञानिक सोच समझ वाली हों। इसलिए विश्वविद्यालय  के अध्यापक, कर्मचारी भी उस आधुनिक सोच समझ एवं दृष्टि से सम्पन्न हों। लेकिन हमारे वी.सी. का निहित स्वार्थ इससे बाधित होता है ।

वह कैसे?

वे भ्रष्ट तरीके अपना कर नियुक्तियां करते रहे। कॉलेजों में ‘अर्थ’ के जरिये गलत और अयोग्य लोगों की नियुक्तियों के कई उदाहरण सामने आये हैं। इसके लिए कुछ गिनती के लोगों को ही बार-बार विषय विशेषज्ञ बनाया जाता है। विश्वविद्यालय में वी.सी. ने चार-चार महत्वपूर्ण पदों पर एक प्रोफेसर को स्थापित किया है जो कि नियम के अनुसार उस पद के योग्य नहीं हैं।

अभी रजिस्ट्रार बनाये गये एक प्रोफेसर। वे आयु सीमा पार करने के बावजूद एन.एस.एस. के क्वार्डिनेटर पहले से हैं। विश्वविद्यालय के बहुत ही महत्वपूर्ण पद आई.क्यू.ए.सी (नियुक्तियों में अभ्यर्थियों की योग्यता की जांच-परख वाली स्क्रीनिंग कमेटी के प्रमुख) के हेड और अध्यापक के रुप में वेदांत विभाग के आचार्य एवं अध्यक्ष हैं ही। बताइये यह कैसे जायज है?

पुराने कुल सचिव का क्या हुआ?

उन्हें उप कुल सचिव बना कर बैठा दिया गया। क्योंकि वे ईमानदार हैं । शासन के नियमों के अनुरुप काम कर रहे थे। वी.सी. के हाथ की कठपुतली नहीं थे। उन्हें अनेक तरह से अपमानित किया एवं करवाया गया।

आपने अयोग्य लोगों को ‘पुरस्कृत’ करने की बात भी कही है?

हां भाई, जिन्हें ‘राम’ शब्द का रुप नहीं आता, वे आचार्य हो गये। विश्वविद्यालय का इससे बड़ा दुर्भाग्य और क्या होगा?


यह पूछने पर कि विश्वविद्यालय की स्थिति ठीक नहीं है। अराजकता के कारण क्या हैं? उनका कहना था- कुछ स्वार्थी अध्यापक और कर्मचारी निहित स्वार्थ में साजिश कर यह स्थिति ला दिये हैं।

अध्यापक परिषद के अध्यक्ष प्रो. आशुतोष मिश्र और महामंत्री प्रो. शैलेश अपने पद का दुरूपयोग कर रहे हैं ।

लेकिन ऐसा कैसे हो सकता है? अध्यापक बौद्धिक समाज का क्रीम होता है। वह दूसरों के बरगलाने से कैसे बहक जायेगा?

इसके जवाब में उनका कहना था-हमारे वी.सी. साहब सज्जन और सरल हैं। लोगों के कहने में आ जाते हैं। जब प्रमोशन और साक्षात्कार की बात आयी तो इन्हीं लोगों ने कहा प्रमोशन तो ड्यू है, दे दीजिए। साक्षात्कार वगैरह बाद में होता रहेगा। वी.सी. मान गये। अब तो प्रमोशन दे दिया। लेकिन इसके बाद जब इन्टरव्यू की बात होने लगी तो सब अड़ गये। अब यूजीसी का हवाला देने लगे।

तो इसमें बुरा क्या है? आखिर यूजीसी या राज्य शासन की परिनियमावली/नियमों का पालन तो होना चाहिए। नहीं?

‘यूजीसी के गाइड लाइन के अन्तर्गत और राज्य शासन के निर्देशों को मानते हुए ही नियुक्तियों के लिए साक्षात्कार हो रहे थे। फिलहाल तो माननीय कुलाधिपति के निर्देशों के मुताबिक अब सब कुछ होगा। इसलिए अब किसी अन्य बात का कोई मतलब नहीं रह गया।

कुलसचिव को हटाकर उन्हें उपकुलसचिव बना देने के औचित्य पर दिनेश गर्ग का कहना था कि वह जरुरी था। वह हर काम में रोड़ा अटका रहे थे। आप ही बताइये, विश्वविद्यालय वी.सी. चलायेगा या रजिस्ट्रार। आपको अपने दायित्व और अधिकार क्षेत्र का ज्ञान न हो तो फिर आपको किनारे होना पड़ेगा। कोई दूसरी व्यवस्था होने तक किसी सक्षम व्यक्ति को यह काम देखना पड़ेगा।


 

मैं आज्ञाकारी सेवक हूं -प्रो. सुधाकर मिश्र  (नए कुलसचिव)


 

Layout 1डाक्टर साहब, आपको कुलसचिव का नया पदभार दिया गया है ?

जी हां, कुलपति महोदय का आदेश हुआ है तो मैंने स्वीकार कर लिया।

लेकिन सरकार द्वारा इस पद पर नियुक्त कुलसचिव को उपकुलसचिव बना कर किनारे कर दिया है?

नहीं, नहीं। उन्हें उनके मूल पद पर भेज दिया गया ।

क्या वी.सी. का यह निर्णय नियम विरूद्ध नहीं है?

यह उनका अधिकार है । प्रभाष द्विवेदी जी का मूल पद उपकुलसचिव का ही है ।

लेकिन आप तो पहले से ही तीन-तीन  महत्वपूर्ण पदों- आचार्य एवं अध्यक्ष (वेदांत) एन.एस.एस. के समन्वयक और आई.क्यू.ए.सी. के चीफ  हैं। इसके साथ ही नया और भारी-भरकम पद रजिस्ट्रार का। कुछ ज्यादा ही भारी नहीं लग रहा है?

मैं तो आदेश को सिरोधार्य करने वाला हूं। काम करते रहना मेरी आदत है।


 

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इस बीच विश्वविद्यालय परिसर में तरह-तरह की चर्चाओं का बाजार गर्म है। एक प्रोफेसर का कहना है-‘असल में प्रदेश में बनने जा रहे महामना संस्कृत विश्वविद्यालय की समिति के प्रमुख के रूप में नाम आने के बाद से उनकी (वी.सी. की) उम्मीदें बढ़ गयी हैं। उनके लोगों ने उन्हें समझाया है कि आप लग जाइए तो नए विश्वविद्यालय के वी.सी. के रूप में आपके ‘पैरलल’ कोई है ही नहीं। बस, व्यक्तित्व को दृढ़ बनाइए।  तो दृढ़ता के चक्कर में वी.सी. ने अध्यापक परिषद, कर्मचारी परिषद से संवाद न करने का फैसला कर लिया था। एक कर्मचारी नेता ने टिप्पणी की -अरे डाक्टर साहब, योगी जी दृढ़ व्यक्तित्व वाले लोगों को पसंद करते हैं । फिलहाल, यह सच है या निरा गप इसे तो योगिराज (भगवान शिव) ही जाने। ‘हां संस्कृत की रक्षा भी उन्हीं (योगीनाथ) के हाथों है। ‘फिर प्रोफेसर साहब की टिप्पणी आयी।

और सचमुच विश्वविद्यालय परिवार इस समय मुख्यमंत्री और राज्यपाल दोनों से बहुत खुश है। दरअसल मुख्यमंत्री सरकार के निर्देशों की अनदेखी करके चलने वालों से बेहद खफा चल रहे हैं। चाहे वे अधिकारी हों या कर्मचारी, वाइसचांसलर हों या प्रोफेसर। डॉक्टर हों या पुलिस के लोग। जो भी चपेट में आ जा रहा है उसे वे माफ नहीं कर रहे हैं। प्रधानमंत्री के वाराणसी दौरे के समय उनका स्वागत करने के चक्कर में बीएचयू के वाइसचांसलर ने विश्वविद्यालय में अराजक स्थिति बन जाने दी। वे मुख्यमंत्री के निर्देश के बावजूद कैंपस में नहीं गये और स्थिति नियंत्रण के बाहर हो गयी। जिससे बीएचयू की बदनामी के साथ-साथ सरकार की भी बदनामी हुई। ठीक यही बात संस्कृत विश्वविद्यालय में हुई। अध्यापक परिषद के लाख समझाने के बावजूद वी.सी अपनी जिद पर अड़े रहे। वे प्रदेश के सभी वाइसचांसलर के रवैयों को उपेक्षा की दृष्टि से देखते हुए यह कहते रहे कि ‘हम अपनी बात जानते हैं, दूसरे क्या कर रहे हैं हमें उससे क्या।’ और अंतत: उन्हें राज्यपाल की झिड़की झेलनी पड़ी। अब आगे उनका क्या हाल होगा, भगवान ही जाने।

वाराणसी से सियाराम यादव

 

 

 

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