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सच का उजागर

सच का उजागर

‘सच कुछ और था….’ कहानी संग्रह सुधा ढिंगरा का नया कहानी संग्रह है। खूबसूरत और रहस्यमय आवरण में लिपटी किताब जिसमें ग्यारह कहानियों को संकलित किया गया है। पहली कहानी  ‘अनुगूंज’ है, यह कहानी सच और झूठ के बीच में निर्णय लेने में फंसी हुई तथा नायिका मनप्रीत के अंतद्र्वंद्व की कहानी है। जब एक तरफ परिवार हो और दूसरी तरफ सच हो, तो निर्णय लेने में ऊहा पोह की स्थिति आना बहुत स्वाभाविक सी बात है।  इस कहानी में भी इसी अंतद्र्वंद्व को बहुत सुंदरता के साथ चित्रण किया गया है। उस मानसिक स्थिति को शब्दों के माध्यम से बहुत खूबसूरती के साथ उकेरा है, जिसमें मनप्रीत जी रही है। वास्तव में कहानी की पठनीयता का सबसे सशक्त पक्ष वह अंतद्र्वंद्व ही है, जो पाठको को अपने साथ जोड़ लेता है। कहानी जैसे समाप्त होती है तो पाठक जैसे राहत की सांस लेता है, क्योंकि वह मनप्रीत से वही चाहता है जो, मनप्रीत अंत में करती है। अच्छी कहानी वही होती है जो जो पाठक को कथा में प्रविष्ट करवा दे और पाठक स्वयं को पात्र मानने लगे। दूसरी कहानी  ‘उसकी खुशबू’ जिस प्रकार की कहानी है, उस प्रकार की कहानियों को लिखना हिन्दी साहित्य में अपराध माना जाता है। हालांकि नई पीढ़ी ने आकर इस परंपरा को भी तोड़ा है। यह कहानी भी एक रहस्य की कहानी है।

सच कुछ और था…

लेखक                    : सुधा ओम ढींगरा

प्रकाशक                : शिवना प्रकाशन

मूल्य                      : २५० रु.

पृष्ठ                        : १२०

कहानी अमेरिका में घटित होती है, लेकिन इस प्रकार की कि उसमें स्थान और पात्रों को भारत का कर दिया जाए तो यह कहानी भारत की हो जाएगी। यह इस कहानी की सबसे बड़ी विशेषता है। एक सामान्य से विषय को उठाकर उस पर रोचक कहानी रच दी गई है। कहानी समाप्त होती है तो इत्र की तीखी खुशबू पाठक को भी महसूस होती है। तीसरी कहानी  ‘सच कुछ और था….’ जो कि संग्रह की शीर्षक कहानी है, सबसे लम्बी कहानी भी है। लेकिन लम्बी कहानी होने के बाद भी यह कहानी अपनी पठनीयता को बनाए रखती है। यह कहानी दाम्पत्य जीवन के उजले पानी के अंदर जमी तलछट पर रोशनी डालती है। सुधा ढींगरा की कहानियों के पात्र मनोविज्ञान के धरातल पर भी शोध करने योग्य पात्र होते हैं। इस कहानी में भी जो तीनों प्रमुख पात्र हैं वे इसी प्रकार के हैं। कहानी भारत और अमेरीका के बीच की जमीन पर दोनों देशों के साझा समय में घटित होती है। एक हत्या को केंद्र में रखकर लेखिका ने कहानी का ताना-बाना बहुत कसावट के साथ बुना है। लम्बी कहानी को यदि कसावट के साथ नहीं बुना जाए तो झोल आने में देर नहीं लगती है। हत्या की पड़ताल करती हुई कहानी धीरे-धीरे दाम्पत्य के अंदरखानों में जमी हुई धूल को उजागर करती है।

कुल मिलाकर सुधा ढ़ींगरा का यह कहानी संग्रह ‘सच कुछ और था….’ एक पठनीय संग्रह है। संग्रह की कहानियां अपने-अपने तरीके से कुछ जटिल प्रश्रों से  मुठभेड़ करती हैं और पाठक को अपने साथ बहुत खामोशी से उस मुठभेड़ में शामिल भी कर लेती हैं। पाठक यदि किसी कहानी को पढ़ते हुए उससे जुड़ाव महसूस करने लगता है तो लेखक का लेखन सफल हो जाता है। किसी भी लेखन का महत्वपूर्ण भाग होता है कि वह पाठको को अपने साथ रखे, जो यह पुस्तक कर रही है।  विभिन्न प्रकार की कहानियों में लिपटी हुई यह पुस्तक पाठकों का ध्यान अपनी ओर जरूर आकर्षित करेगी।

आशुतोष कुमार

 

 

 

 

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